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Thursday, September 11, 2008

नारी :आख़िर संघर्ष किससे ?

आजकल सब जगह नारी स्वतंत्रता की बात हो रही हैं२१ वीं सदीं में जीवन के हर क्षेत्र में नारी ने स्वयं को सिद्ध कर दिखाया हैंउसने यह साबित कर दिखाया हैं की वह भी उन्नति के रथ पर आरूढ़ होकर सफलता के शिखर पर अपनी गौरव ध्वजा फहरा सकती हैंफ़िर भी नारी संघर्ष अभी जारी हैं और आने वाले कुछ वर्षो तक जारी रहेगापरन्तु संप्रति हो रही नारी चर्चा सुनकर ऐसा लग रहा हैं की नारी शायद भूल रही हैं की उसका संघर्ष किससे हैं ?
पुरूष और नारी समाज के दो आवश्यक घटक हैं ,अगर कहे की नारी और पुरूष से मिलकर ही समाज का निर्माण हुआ हैं तो ग़लत होगाऐसे में,जब कहा जाता हैं की नारी को पुरुषों से संघर्ष करना हैं या उनके विरुध्द खडें रह कर आगे बढ़ना हैंऐसे ही जब पुरुषों पर बात आती हैं तो वह स्त्री विरोधी अभियान के प्रमुख सेनानी बन जाते हैं . यह सब देखकर लगने लगता हैं की हम कहाँ जा रहे हैं ? मन सोचने पर मजबूर हो जाता हैं की क्या नारी ,पुरूष की प्रतियोगी हैं ? या पुरूष,नारी का प्रतियोगी हैं ?
नारी जहाँ पुरूष की माता हैं ,बहन हैं,सखी हैं ,पत्नी हैं , वही पुरूष भी स्त्री का भाई हैं ,सखा हैं ,पति हैं ,पिता हैंनारी और पुरूष संसार रूपी नाटक के वह पात्र हैं जिनके बिना संसार नाट्य की प्रस्तुति असंभव हैंअगर पुरुषों द्वारा नारी पर अत्याचार हुए हैं तो नारी भी नारी दुःख में कम सहभागी नही हैं

कुछ दिनों पहले कहीं सुना की नारी जब पुरुषों के विरुध्द खडी हो सकती हैं तो वह ईश्वर की सत्ता को चुनौती क्यों नही दे सकती ?संसार का हर धर्म और ईश्वर नारी की प्रगति के खिलाफ हैंमन बहुत दुखी हो गया . सोचा, क्या नारी केवल विरोधी बनकर रह गई हैं ?आधुनिकता के मायने पुराने संस्कारो और विश्वास को छोड़ देना तो नही हैंसंस्कार इन्सान को इन्सान बनाते हैं ,वही धर्म शब्द की व्याख्या इस प्रकार की गई हैं "ध्रु धातु धारणायत धर्म इत्याहु :"एवं -धारयति :धर्म:" अर्थात वह नियम जो संसार को सँभालते हैं ,जिनके आधार पर संसार टिका हुआ हैं वह धर्म हैंइस प्रकार धर्म शब्द का अर्थ व्यापक हैं ,हमारे पवित्र धर्मग्रन्थ गीता में भी कही नारी की प्रगति को रोकने के फार्मूले नही दिए गएही कही किसी धर्म में नारी पर अत्याचार करने की बात कही गई हैंहाँ मध्यकाल में कुछ बाते कुछ स्वार्थी लोगो द्वारा विशिष्ट उद्देश्यों से धर्म के साथ जोड़ दी गई ,नारी को सिर्फ़ उन बातो का विरोध करना हैं,साथ ही यह भी है की कुछ बाते जो वैज्ञानिक रूप से सही हैं उन्हें भी धर्म के माध्यम से नारी को बताया गया ताकि वो उनका पालन करे ,यह हमारे उपर हैं की हम किस बात को मानते हैं पर अधार्मिक हो जाने से नारी प्रगतिमान हो जायेगी यह बात मुझे नही रुचतीईश्वर के मानने वालो के लिए वह प्रेम ,शान्ति और शक्ति का केन्द्र हैं और जाने कितने देवी रूप हैं जो प्राचीन काल से हर नारी का आदर्श रहे हैइसलिए ईश्वर और धर्म का विरोध करके नारी यह जंग जीत जायेगी ऐसा नही हैं
दरसल नारी का संघर्ष पुरूष से हैं, नारी से, नही ईश्वर और धर्म सेनारी का संघर्ष हैं तो सिर्फ़ उन बुराइयों से जो नारी को अपना श्रेष्ठत्व सिद्ध करने से रोकती हैंउन रुढियों से हैं जो नारी को सदियों से छलती आई हैंअपनी प्रगति के लिए नारी को आधुनिकता के नए अर्थ खोजने की या पुरुषों के विरुध्द खडे रहने की कोई आवश्यकता नही हैंनारी स्वयं एक शक्ति हैं, प्रेरणा हैं,ज्योति हैं, जीवन हैं और जीत हैंइसलिए अगर आवश्यकता हैं तो सिर्फ़ अपनी पुरी ताकत बटोरके अपने उचित उद्देश्य के पथ पर आगे बढ़ने कीआत्म शक्ति और दृढ़ इच्छा शक्ति के बल पर दुनिया की कठिनतम वस्तुए भी प्राप्त की जा सकती हैंअपनी निर्णय क्षमता पर भरोसा हैं तो मुझ पर विश्वास कर सारे विरोध त्याग कर प्रेम से मन लगा कर ,अपनी मंजिल पाने की कोशिश करे ,दुनिया की कोई भी ताकत आपको नही रोक सकतीइसी प्रकार पुरूष भी नारी को उसके दुःख को दूर करने में सहायक बने ,उसके जीवन लक्ष्य को पाने में सहभागी बनेतभी एक सुखी,समृद्ध,स्वस्थ समाज का निर्माण हो सकता हैं
इति

Friday, September 5, 2008

चलो भिखारी बने



गरीबो की सुनो, वो तुम्हारी सुनेगा,तुम १ पैसा दोगे वो दस लाख देगा। कितनी दुआ हैं इस गीत में और कितना फायदा 1 पैसे के बदले दस लाख !!!!!!!!!!!!!!!!इतने तो २००० हर माह की किस्त देकर बीमा करवाने पर भी नही मिलते ,शेयर खरीदो 50000 के ,तब भी इतना फायदा होना तो मुश्किल ही हैं . यहाँ तो एक पैसे में काम हो रहा हैं . और कोई झंझट भी नही सिर्फ़ जेब से एक पैसा (अब पैसा होता ही कहाँ हैं?तो 1 रुपया ) निकाला और मांगने वाले की खाली कटोरी में डाला ।और हो गया काम।

वैसे देखा जाए तो बहुत अच्छा धंधा हैं भिखारी का ,यहाँ पढ़ पढ़ के मर जाओ,डिग्री -डिप्लोमा
के पहाड़ बना लो,फ़िर भी नौकरी तो मिलती ही नही .,अजी मील भी गई तो ये क्या 10-15000 की ? क्या होता हैं इसमे ?8-9 हज़ार तो घर भाड़े में ही निकल जाते हैं,उस पर दाल -रोटी- चावल महंगे !ये भी छोडे अब भाग्य से किसी मल्टी नेशनल कंपनी में नौकरी लग गई ,पैसा भी बरसने लगा तो भी आपकी जिन्दगी खत्म,24 में से 20 घंटे नौकरों की तरह नौकरी करो,उपर से बात -बेबात बॉस की गालियाँ खाओ . नौकरी छोड़ कोई व्यवसाय धंधा किया तो भी कभी मार्केट के गिरने का डर ,कभी लॉस का टेंशन ,और दिमाग को सदा की झंझट ।

ये धंधा बढ़िया हैं ,बस सुबह सुबह उठो दस -१२ बजे तक आराम फरमा कर बैठ जाओ किसी मन्दिर ,मस्जिद ,गुरुद्वारे के बाहार .नही तो किसी मेले में ,किसी सार्वजानिक स्थान के बाहर. वैसे आजकल भिखारी भी स्मार्ट हो गए हैं ,बड़े बड़े होटल के बाहर ,कभी पिज्जा हट के बाहर ,कभी कैफे कॉफी डे के बाहर भी बैठने लगे हैं। ये तो आपकी चॉईस हैं की आप कहाँ बैठना चाहते हैं । बस बैठे रहे आराम से अपने मित्रो के पास गपशप करते हुए,और जैसे ही कोई साधा सरल इन्सान दिखे उठ के चलदे साथ उसके और कहने लगे दे दे बाबा ,भगवान भला करेगा,और हाँ आजकल इमोशनली ब्लैकमेल कर इस धंधे में बहुत ज्यादा कमाई हो रही हैं ,सबसे ज्यादा दुखती रग पर चोंट करे , कोई उदास परेशान .पर पढ़ा लिखा युवक- युवती दिखे ,तो कहे , बेटा देदे,20-25 रुपया भाई, नौकरी मिलेगी। कोई नईनवेली दुल्हन और पति साथ जा रहे हो तो कहे ,तुम्हारा साथ बना रहे बेटा । कोई माँ दिखे तो कहे तेरे बच्चे 99% से पास हो जाए .बस सिंपल .और हाँ मांगे जरुर ऊँची रखे कोई एक रुपया दे तो ले नही.10-20 रूपये से कम में कोई दुआ न दे।
वैसे भी हम भारतीय कुछ ज्यादा वात्सल्य और करुण रस से ओतप्रोत हैं ,कोई भिखारी दिखा नही,जरा आँखों में आंसू भर के बोला नही कि दे दिए 40-50 रूपये ,चाहे जितना सरकार चिल्लाये,जागरूकता संस्थान बताये कि भीख मत दो ,भिक्षा वृती को बढ़ावा मत दो,चाहे जितना समझ जाए कि ये भीख मांग कर अपना घर और पेट ही नही तिजौरिया भी भरते हैं,दारू पीते हैं,जुआ खेलते हैं .हम तो ॐ भवति :भिक्षाम देही कि परम्परा में विश्वास करने वाले भोले भाले संस्कारी मानव हैं ,हम तो भीख देंगे ही । तो क्यों न ख़ुद ही मांग ले,कम से कम हमारी ही तिजौरिया भरेंगी. और घर में जितने भी बच्चे हैं सबको सिखा पढ़ा कर काम पर लगा दे,थोड़े मैले कुचेले कपड़े पहना दे,और थोडी सीख दे दे ।क्योकि आजकल न जाने कितने बच्चे लगे हैं भीख माँगने में,अब भाई कोई कहे कि यह बच्चो का शोषण हैं ,उन पर अत्याचार हैं ,हम तो नही मानने वाले,हम करुणामूर्ति ,दयाघन, बच्चो को कैसे खाली हाथ रहने दे. और क्या जाता हैं 20-25 रूपये देने में?उनका भविष्य बिघडे तो बिघडे,हम पर पाप तो नही चढ़ेगा . और दुआएँ भी मिल जाएँगी बच्चो के मुँह से निकली,बच्चे जो कि भगवान का रूप होते हैं.
इसलिए अच्छा हैं कि अपने बच्चो को ही काम पर लगाये ढ़ेर सारे पैसे बनाये,आख़िर खाली पिली दुआएँ तो बाँट ही सकते हैं न ।
हैं न आसान ?वैसे भी हम सब भिखारी ही हैं ,दिन में कितनी बार ही भीख मांगते हैं हम।
कभी पैसे के लिए ,कभी प्यार के लिए ,कभी नाम के लिए .कभी रिश्तो के लिए ,बस अन्तर यह हैं की ये हमसे भीख मांगते हैं और हम ईश्वर से । अब देखिये अदनान सामी जी को, किस चीज़ की कमी हैं इनके पास? नाम,पैसा ,शोहरत सब कुछ तो हैं . फ़िर भी गा गा कर माँगते हैं,"ऐसे ऐसो को दिया हैं,कैसे कैसो को दिया हैं ,गाड़ी, बंगला, कार दिला दे ,एक नही दो चार दिला दे ।"

अभी भिखारियों की चांदी ही चांदी हैं, उनकी एक यूनियन हैं ,सत्ता हैं ,उनके पास काम हैं नाम हैं और ढ़ेर सारा पैसा हैं.तो लग जाए इस धंधे में । चलो भिखारी बने ।

और लीजिये ये गीत भी कंठस्थ कर डालिए :->
चाहे लाख करो तुम पूजा तीरथ करो हज़ार
दीन -दुखी को ठुकराया तो सब -कुछ है बेकार

गरीबों कि सुनो वो तुम्हारी सुनेगा -2
तुम एक पैसा दोगे वो दस लाख देगा
गरीबों कि सुनो ...

भूख लगे तो ये बच्चे आंसू पी कर रह जाते हैं
हाय गरीबों कि मजबूरी क्या -क्या ये सह जाते हैं
ये बचपन के दिन हैं घड़ी खेलने की
उमर ये नही ऐसे दुःख झेलने की
तरस खाओ इनपे ऐ औलाद वालों
उठा लो इन्हें भी गले से लगा लो
लो इन्हें भी गले से लगा लो
न फूल कहीं ये आंधी और बरसात में
गरीबो की सुनो ...

बीमार ये बूढा क़दम -क़दम पर गिरता है
फिर भी इन बच्चों की कातिर हाथ पसारे फिरता है
कहीं इनका ये साथ न छूट जाए
आंखरी न ये आस भी टूट जाए
कहाँ जायेंगे ये मुक़द्दर के मारे
ये बुझाते दिए टिमटिमाते सितारे

इन बेघर बेचारों की किस्मत है तुम्हारे हाथ में
गरीबों की सुनो ...

Wednesday, September 3, 2008

क्या आप सुंदर बनना चाहेंगे ?



क्या आप अपनी फेयर नेस एक्सपर्ट बनना चाहेंगी?
7 दिन में लौटाऐ चेहरे का खोया आकर्षण । बनाये आपको ज्यादा गोरा। मेरी त्वचा से मेरी उम्र का पता ही नही चलता । असली नीम का साबुन। मेरी सुन्दरता का राज़ ............और क्या ?असली आयुर्वेदिक क्रीम आपको बनाये 7 दिनों में गोरा ।आपके रंग में 14 दिनों में फर्क नज़र आए । अब लगाए लिपकलर ,यानि ग्लोस ,लिप बाम ,लिपिस्टिक का झंझट ही नही । कितना सुंदर रंग,और कितने मुलायम बाल ,माँ, मैं अपने हेयरकलर की बात कर रही हूँ ।



आप
सभी ने ये विज्ञापन तो सुने ही होंगे ,रोज़ टीवी पर आते हैं,हर चेनल पर आते हैं ,दिन में हज़ार बार आते हैं . आते हैं और सब नारियो के मन को लुभा जाते हैं ,साथ ही तय कर जाते हैं आपकी एक न एक बार इन सबकी खरीददारी,और दुकानदार और निर्माता के लिए ढेर सारा पैसा ।
यह तो छोडिये अब पुरषों के भी सौन्दर्य प्रसाधन आने लगे हैं,उनकी भी फेयर नेस क्रीम आ चुकी हैं । तरह तरह के प्रोडक्टस से बाज़ार भरा पड़ा हैं .
न जाने कितने ही तरह की क्रीम ,साबुन ,पावडर,परफ्यूम महंगे महंगे दामो में बिक रही हैं.हर गली में ब्यूटी पार्लर खुल गए हैं ,कपड़ो का बाज़ार तो अद्भुत रूप से दिनों दिन बढ़ता जा रहा हैं .कभी बच्चो के लिए माँ कपड़े सिला करती थी ,दर्जी हुआ करते थे .आज तो बुटिक हैं बडे -बडे मॉल हैं,शोरूम हैं.ब्रांडेड कपड़े हैं ,फैशन इंडस्ट्री अमृतपात्र की तरह धन उगल रही हैं ।

इस अर्थ बाज़ार और कंपनियों की मारामार के भीषण चक्र्व्ह्यु में फंस रहे हैं ,हम और आप ।
मनुष्य ह्रदय को सदा ही सुन्दरता से प्रेम रहा हैं ,सुन्दरता के इसी प्रेम के चलते उसने कलाओ से भी प्रेम किया हैं,क्योकि कला सुन्दरता का दूसरा नाम हैं ,भोजन,पठन, लेखन,और सज्जा हर चीज़ में एक कला हैं ,और कलाकारी से अगर आप पत्थर पर हथौडा भी मारे तो वह सुंदर मूर्ति का रूप ले लेता हैं . कुछ इसी तर्ज पर इन देशी विदेशी सौन्दर्य प्रसाधनों के बाज़ार ने सबके दिलो में जगह बनाई। ईश्वर ने सभी को सुंदर बनाया हैं,यह देह भी ईश्वर ने ही दी हैं ,इसलिए सजना-सवारना कोई गुनाह नही,बल्कि पुण्य हैं ,मैं भी इस बात को मानती हूँ । लेकिन जिन कंपनियों के भुलावो में, वादों में हम सब बहे जा रहे हैं ,वह यह सब नही मानती ,वह मानती हैं तो सिर्फ़ पैसा और जानती हैं तो सिर्फ़ पैसा कमाना। आपको झूठे रंग बिरंगे सुंदर सपने दिखा-दिखा कर यह सिर्फ़ आपसे पैसा ही नही उगल रही ,बल्कि सुन्दरता के पैमाने भी बदल रही हैं ।

भारत एक संस्कारशील देश हैं ,यहाँ सदा सुन्दरता को सन्मान दिया गया हैं ,पूजा गया हैं ,पर वह सुन्दरता याने आत्मिक सुन्दरता।
सुंदर व्यक्ति का अर्थ हैं,वह इन्सान जिसका मन सुंदर हो,जिसकी आत्मा पवित्र हो।
सुंदर वह इन्सान होता हैं जिसका चरित्र सुंदर हो.जिसमे अनेको गुण हो, सुन्दरता शब्द बौध्दिक ,नैतिक सुन्दरता का भी परिचायक हैं,एक व्यक्ति तभी सुंदर कहला सकता हैं जब वह अपने मृदु व्ह्यवार ,प्रेम, गुण, ज्ञान से सबका ह्रदय जीत ले,सच्चा सुंदर वह हैं जो अपनों से परायों से हर मानव से प्रेम करे ।
ईश्वर ने किसी को गोरा बनाया हैं ,किसी को साँवला ,किसी की आँखे बड़ी हैं ,किसी की छोटी ,
कोई लंबा हैं ,कोई नाटा ,कोई भूरे बालो वाला हैं कोई काले बालो वाला,किसी की आंखे नीली हैं किसी की काली,।
जरा कल्पना कीजिये उस दुनिया की जहाँ हर कोई गोरा हैं,हर किसिकी आँखे नीली हैं ,हर कोई उतना ही लम्बा हैं , हर कोई एक ही जैसा दीखता हैं ,कितनी अजीब कल्पना हैं न!

ईश्वर ने हम सबको एक दुसरे से अलग बनाया हैं तो कुछ सोचकर ही न । ये कंपनिया एक तरह से रंगभेद को बढ़ावा दे रही हैं। अगर गोरा व्यक्ति कुछ मायनो में सुंदर हैं तो साँवला व्यक्ति भी हो सकता हैं । अगर काले बालो वाला सुंदर हैं तो भूरे बालो वाला भी सुंदर हो सकता हैं । सुन्दरता देखने वालो की आँखों में होती हैं ,सुन्दरता आत्मविश्वास में होती हैं ,सुन्दरता मुस्कराहट में होती हैं , न की इन प्रसाधनों में और ब्रांडेड कपड़ो में।

हाँ अगर आपकी जेब में भरपूर पैसा हैं और आप खर्च करने की इच्छा रखते हैं ,तो इन पर खर्च कीजिये,पर उस समय यह न भूलिए की यह खर्च आपको मुश्किल में भी डाल सकता हैं .इन प्रसाधनों का आप के सौन्दर्य पर नकारात्मक असर भी हो सकता हैं । जो भी कीजिये सोच समझकर और एक बात दिल में अच्छी तरह बिठाकर की सभी सुंदर हैं ,अपनी सुन्दरता के लिए आप इन कपड़ो और सौन्दय प्रसाधनों पर निर्भर नही हैं ,जो भी जैसे भी दीखते हैं ,आपको ईश्वर ने बनाया हैं ,इसलिए आप अतुलनीय सुंदर हैं और अपने नैतिक और आत्मिक गुणों के कारण सदा सुंदर ही नज़र आयेंगे ।
इति ।

ये कैसी औरते ?



एक महिला जिसकी उम्र 30 -35 साल के करीब हैं,एक दूसरी महिला विद्या से और उसके पति से किसी अकेली पहाडी पर मिलती हैं , पुरूष की आवाज: "सिंदुरा दीदी मैं आपको माँ से भी बढकर मानता था,आप ऐसा नही कर सकती", सिंदुरा की भयावह हँसी ....और एक साथ ६ बार गोलियों की आवाज़ ,विद्या और उसका पति गोलियों से जख्मी होकर निढाल.दीदी के चेहरे पर खतरनाक, अभिमानास्पद मुस्कान.धारावाहिक की कड़ी यही ख़तम .........धारावाहिक का टाइटल गीत: बनू मैं तेरी दुल्हन ।

ग ग सारे सा,ग म प म ग ग सा रे सा । कयोकी सास भी कभी बहु थी ..........इस गीत के बोलो से शायद ही कोई अपरिचित होगा ....इस धारावाहिक ने प्रसिद्धि के सारे पुराने रिकॉर्ड तोड़ दिए,कुछ समय पहले तक महिलाओ पर इस धारावाहिक ने ऐसा जादू किया था कि हर महिला इसकी दीवानी हुए जा रही थी .कहानी क्या ??एक महिला तुलसी जो अत्यन्त पवित्र महिला हैं,घर की सारी महिलाये उसके दुःख का कारण बनती हैं ,पहले वह सास के अत्याचार सहती हैं ,फ़िर पति कि मृत्यु हो जाती हैं ,पति जिन्दा निकलते हैं तो एक दूसरी महिला उस पर अत्याचार करती हैं ,पिढीयाँ पर पिढीयाँ बदल जाती हैं पर ये अकेली अत्याचार से लड़ती हैं ,बाकि सारी महिलाये जो कि महिलाओ के नाम पर राक्षसी होती हैं,एक दूसरे का प्यार छीनती हैं ,चालें चलती हैं ,"तुलसी वीरानी "एक नारी सब कुछ सहती,सुलझाती रहती हैं ।

"कसौटी जिन्दगी की"की प्रेरणा एक ही जीवन में न जाने कितनी शादियाँ करती हैं,फ़िर भी महासती कहलाती हैं ।

ये बात इन्ही दो धारावाहिकों की नही हैं ..इन जैसे न जाने कितने धारावाहिक हमारे हिन्दी- प्रादेशिक चेनलों पर चल रहे हैं .
मजे की बात तो यह हैं की ये सारी महिलाये जन्मत: ही पिस्तोल चलाना,खून करना बखूबी जानती हैं ।
डायरेक्शन की तो बात ही क्या करे ,इतनी इतनी त्रुटियाँ की कोई बच्चा भी पकड़ ले ।

एक धारावाहिक में किसी की मौत हो जाती हैं और उस समय स्वस्तिवाचन मंत्र सुनाते हैं,पखावज बेकग्राउंड म्यूजिक में चल रहा होता हैं ,पर वह कही नही दीखता ,सामने लोग ढोल बजाते हैं ।

हमारी संस्कृति में मंत्रो को बहुत पवित्र स्थान प्राप्त हैं,इन धारावाहिकों में मौके-बेमौके मंत्रो का वाचन होता हैं ,कभी कभी तो मंत्रो का तोड़ मरोड़ कर ,गलत- सलत वाचन होता हैं । मुख्यापात्र नारी जब भी कुछ करती हैं ,उदाहरण के लिए वह नज़रे उठा कर किसीको देखती हैं तो "या देवी सर्व भूतेशु विद्या रूपेण संस्तिथा ....."का पाठ शुरू हो जाता हैं ।

मर मर के जिन्दा होना तो कोई इन धारावाहिकों से सीखे,शुक्राचार्य की संजीवनी विद्या भी इनके सामने शरमा जाए .

हर दूसरे दिन पात्र बदल जाते हैं ,आज माँ, कल बेटी ,परसों नाना ,तरसों ताई ।

एक मराठी धारावाहिक में एक सास अपनी बहू को मारने के हर सम्भव प्रयत्न करती हैं ,और जब थक जाती हैं , तो उसे जला के मारती हैं,और अपने बचाव के लिए पागलपन का नाटक भी करती हैं ।अन्य एक धारावाहिक में एक नारी पात्र "आसावरी" अपने पति के जुल्म सहती हैं फ़िर भी उसको महान कहती हैं ,अन्दर रोती हैं ,परोक्ष में हँसती हैं,जी अवार्ड में इस पात्र को सर्वश्रेष्ठ व्यक्ति रेखा का सन्मान मिला हैं। अब क्या कहियेगा?

"अब सुनिए कहानी महाभारत की ".."एकता कपूर" की इस महाभारत में सारे पात्र एकदम बचकाना अभिनय करते हैं ,उनकी वेशभूषा कही से हमारी संस्कृति से तालमेल नही बिठा पाती,भीष्म की भाभियाँ आधुनिक हेयरकट में नज़र आती हैं .द्रौपदी जैसी संन्नारी के चेहरे पर न तो वह सात्विक भावः दिखता हैं ,न वह तेज ।गौरवशाली महाभारत के इस तरह के प्रदर्शन से स्वयं गणेश जी और महर्षि व्यास भी दुखी हो रहे होंगे ।

मुझे समझ नही आता की ये धारावाहिक आख़िर बताना क्या चाहते हैं ?ये कौनसी मानसिकता के परिचायक हैं ?समाज में अच्छे -बुरे सब तरह के लोग होते हैं,पर" एक ही देवी बाकि दानव "ऐसा नही होता,हर मनुष्य के ह्रदय में प्रेम होता हैं ,सास बहू में कितनी ही लडाई क्यों न हो ,अन्दर एक दुसरे के प्रति श्रध्दा होती हैं ,सारी की सारी बहूएँ भी क्रूर नही होती ।
कुछ घरो में सास -बहू के अत्याचारों वाली घटनाये हो रही हैं ,पर यह समाज का एकतरफा दर्शन हैं ,कई घरो में उनमे भी स्नेहिल सम्बन्ध हैं । कितनी ही लड़कियाँ आज भी भारतीय समाज का आदर्श कहलाने के काबिल हैं ।पर इन धारावाहिकों में जो दिखाया जा रहा हैं ,वह बहुत ही ग़लत ,विकृत मानसिकता का परिचायक हैं ,इन धारावाहिकों का भरपूर विरोध करने के बजाय कई नारिया बडे प्रेम से इन्हे देख रही हैं .यह जानते हुए भी की इन धारावाहिकों के माध्यम से स्त्री पुरुषों के ह्रदय में बसते विश्वास ,प्रेम ,आदर,दया जैसे भावो को धीमे- धीमे मारा जा रहा हैं ।
यह सब धारावाहिक हमारे समाज के लिए धीमा जहर ही हैं । जरुरत हैं बदलाव की ,इन धारावाहिकों के स्थान पर, ऐसे धारावाहिक दिखाए जाए जो वाकई शिक्षाप्रद हो,जो हमारे समाज को प्रेम और नैतिकता का रास्ता दिखा सके। ऐसे धारावाहिकों का प्रसारण बंद होना ही चाहिए जो मानवीय मूल्यों और भावनाओ से खेलकर अपनी रोटी कमा रहे हैं ,इन धारावाहिक निर्माताओ से मेरा एक ही अनुरोध हैं की कृपया अपनी शक्ति का सदुपयोग कर हमारे समाज को सबल, सक्षम और गौरवान्वित बनाये ,नही दुर्बल,विकृत और लज्जाजनक ।
इति ।
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