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Sunday, March 12, 2017

मन

आज फिर मन सपनो के रथ पर सवार दूर गगन की सैर करने चला हैं ,इस बार इस सुनहले रथ में कई सारे  घोड़े हैं ,कुछ सफ़ेद ,कुछ आसमानी रंग के,कुछ सूरज की किरणों से प्रकाशित हो ,सुनहले ,केसरी रंग के।
सरपट भागे जा रहे हैं ये घोड़े और सरपट भाग रहा हैं मेरा मन।

मन का भागना कुछ ऐसा ही होता हैं ,दायां -बायां ,आजु -बाजु कुछ दीखता ही नहीं।

आसपास जैसे सब कुछ धुंधला हैं ,बादल ही बादल ,पर मन बाँवरे को इस धुंधलेपन से मतलब ही क्या ,वो तो बस आगे देख रहा हैं ,सीधा -सामने ,न बाएं ,न दाएं।
आँखों के सामने कुछ अनोखी सी दुनियां हैं ,एक अनोखा प्रभात ,उगते सूर्य ने फैलाई रंग,बिरंगी रश्मियां। लगता हैं ये पूरी सृष्टि रंग खेल रही हैं ,नीले , पिले , हरे ,लाल ,गुलाबी स्वयं में मग्न मतवारे रंग और मैं इन रंगों के बीचोबीच ...  मैं ,रंगों से सराबोर।

सुना हैं आज होली हैं ,धरती पर लोग एक दूजे पर रंग फेंक रहे हैं ,अबीर -गुलाल की पिचकारियां भर -भर एक दूसरे पर रंग छिटक रहे हैं ,वहां वो रंग और यहाँ ये रंग।

मन जैसे धरती से करोडो योजन की दुरी पर पहुँच गया हैं ,कौनसा जग हैं ये ? जहाँ पैरो के निचे धरा ही नहीं ,पर फिर भी में सीधी खड़ी हूँ ,अपने पैरों पर। दूर -दूर तक सिर्फ रंग ही रंग हैं।  सप्तरंगों के बादल ,सप्तरंगों के गिरिवर ,पुष्प और पक्षी भी तो यहाँ सप्तरंगी हैं। यहाँ का जल न जाने किस पर्वत श्रृंखला से होकर धरणी पर गिरता हैं ,जल की बूंदो में रंगों के कोटि-कोटि रंगढंग और इन रंगों में पूरी तरह डूब मेरा अंतरंग।

देख पा रही हूँ रंगों के इस अनूठे विश्व में लाल रंग कुछ ज्यादा ही हैं। प्रेम का रंग , लाल रंग।  यही रंग कभी बरसाने में बिखरा था ,तब राधा ने अपने हाथो से इसे समेटा था , तब न तो बिरज की होरी थी ,न ब्रिज का वो राजकुमार। तब अकेली राधिका थी ,आसमंत ने धरती पर जो गिराया और पलाश के वृक्ष ने जिसे अपने पुष्पो में समेट लिया ,राधिका  ने उसी लाल रंग से , रात के अंधियारे में अपने हिय में बरसो से बैठी  प्रेम की मूर्ति को आकार दिया और गोकुल के उस ग्वाले को रच दिया , जिसे संसार ने परमपुरुष श्रीकृष्ण के रूप में जाना।

 राधा, कृष्ण से उम्र में बड़ी थी  और शायद वही कृष्ण की जननी थी। देवकी ने तो बस जन्म दिया ,यशोदा ने माटी के उस गोले को संभाल भर लिया। पर राधा  थी  कृष्ण की जननी ,उसीने उस मूरत को जीवन के रंगों का ज्ञान दिया , उस लाल माटी के गोले को प्रेम का ज्ञान दिया  और  जब वो लाल सूर्य  का गोला प्रेम और जीवन ज्ञान के रंगों से परिपूर्ण हुआ ,उसका रंग सम्पूर्ण गगन में बिखर गया ,प्रेम का लाल रंग अब परम ज्ञान का नीलवर्ण बन चूका था ,और वो लाल माटी  मूरत ,योगेश्वर ,परमेश्वर श्री कृष्ण। राधा ने कृष्ण को जन्म दिया ,उनको नीलवर्ण दिया ,और मेरे मन को कृष्ण नाम की सुध।

मेरे मन में जैसे कई रंगों के फव्वारे फुट रहे हैं ,हर रंग के साथ एक अनूठा आनंद ,ये आनंद  क्या हैं ? ये नंदनंदन क्या हैं ? मेरी आँखों में जैसे दिव्य शुभ्र रंग के सितारे चमक रहे हैं। मेरी आँखे और मेरा मन इस शरीर को छोड़ कर जा चूका हैं।  रंगों के इस संसार में अनंत पर मैं रंग-रंगीले चित्र बना रही हूँ , इन चित्रो में कई सारे स्वपन हैं ,नित्य -नूतन -निराले स्वप्न। मेरे पग थिरक रहे हैं ,संग मेरे थिरक रही हैं सम्पूर्ण सृष्टि।  कहींसे सुर सुनाई आ रहे हैं ,फागुन गीत के ,बसंत राग के ,कही से सुनाई दे रही हैं पखावज की गंभीर थाप। स्वर-लय -गीत और रंगों में मगन मेरा आत्मरंग।  सच कहते हैं लोग ,मैं इस दुनियाँ की हूँ ही नहीं , शरीर मात्र यहाँ हैं ,मन तो उस रंगीन सृष्टि का गोकुल ,वृन्दावन हैं। मैं बरसाने की राधा हूँ और वही कही आनंद रंग श्रीकृष्ण।


कृष्णार्पणमस्तु।।

होली की अनंत शुभकामनायें

©  डॉ.राधिका वीणा साधिका 

Tuesday, January 17, 2017

एक छोटी सी कहानी

           एक छोटी सी कहानी

उसने आँखे खोली और वो नदारत।
शायद था ही नही कभी वहां।

पर वो जानती थी वो वहां हैं। वो जिससे वह अभी-अभी बातें कर रही थी।

बातें क्या अपना मन परत दर परत खोल रही थी,कह रही थी " ऐसे नही जीना उसे,बाहरी तौर पर।"

"उसके लिए जीवन, यथार्थ ,भौतिक, दृश्य जगत नही,उसके लिए जीवन आत्मानंद हैं,उसके ह्रदय में प्रज्वलित जो अग्नि हैं उसका नाम जीवन हैं।"

कह रही थी " न जाने कबसे कहना था तुम्हें की तुम और कोई नही मेरा विश्वास हो।"

"विश्वास जिसका कोई नाम नही,धर्म नही,उम्र नही,जिसका कोई भौतिक रूप भी नही।
यही विश्वास उसने कभी मंदिर की मूर्ति में पाया था,आज जीवंत रूप में पाया हैं।"

कह रही थी," तुमसे कोई लोभ नही, तुमसे मोह हैं पर तुम मोह भी नही,तुम मुक्ति हो मेरे लिए ।"

इंसान जब पहली बार आँखे खोलता हैं तो महसूस होता हैं,जीवन कितना विकट हैं ।
आसपास भटकती, अपेक्षाओं के कवच से पूरी तरह लदी,जीवित शरीर ढोती मृतआत्माएं , मस्तिष्क की नसों ने एक क्षण में भेजे करोडों-अरबो संदेशो के जाल में उलझी, उस जाल को जीवन समझती, जर्जर मन से झीनी , सदैव अतृप्त आत्माएं ।

समाज की रीति,नीति,नियमो को स्वसंचालित पद्धति से कार्यान्वित करते अंदर ही अंदर खोखले देह। उन शरीरो के अंदर पैदा होती, मरती असंख्य मृर्गमारिचकाए। इन सब में मृतप्राय:आत्मन की गगनभेदी रुदन चीत्कारों में आनंदित होने का दिखावा करता जीवन।
सच जीवन कितना विकट हैं।
और इस विकटता को नष्ट करने का एक ही उपाय....विश्वास।

उसे उससे कुछ नही चाहिये था,कुछ पाने की अभिलाषा भी नही जागी शायद, जागती तो यह रिश्ता भी उसी भयंकर भौतिक- भ्रम , जग-जाल में फंस जाता और नष्ट हो जाता।

उसके लिए इतना ही काफी था की वो हैं।
वह उसकी माँ नही थी,बेटी नहीं थी, बहन, दोस्त नही थी, शायद कुछ भी नही थी,  और यह "कुछ भी नही" ही शायद सब कुछ था।

ईश्वर के मंदिर में याचनाओं की फेरहिस्त ले जाने वाले उस परमेश्वर को कहाँ पाते हैं !!
जो सच्चे दिल से जाते हैं, उसको मूरत को देखकर ,उससे मिलकर ही सब कुछ पा जाते हैं, ईश्वर के समक्ष उनका खड़े हो पाना ही सब पा जाना होता हैं।

इस रिश्ते का भी कुछ ऐसा ही था,उसका होना ही काफी था, " वह हैं , बस यही काफी हैं , बस यहीं सब कुछ था।"
उस रिश्ते का कोई नाम नही था,उस रिश्ते में कोई स्वार्थ नही था,कोई आशा,अभिलाषा,इच्छा कुछ भी नही।"
'जग के किसी कोने में वह रहता हैं, वह हैं, और मुझे याद कर लेता हैं ,इतना ही और बस इतना ही सब कुछ था।"

उसने फिर आँखे बंद की,कहने लगी "शायद युगों में पाया वह एकमात्र रिश्ता हो तुम ,जो हर बंधन - अभिलाषा , इच्छा से परे हो।माँ,बहन,सखी कुछ नही हूँ तुम्हारी, कुछ होने की इच्छा से परे मेरे लिए तुम्हारा होना हैं, तुम्हारे होने का विश्वास ही जीवन हैं।और यही बस हैं।"

अब भय नही था कि आँखे खोलते ही वह खो जायेगा,शायद सारे भय समाप्त हो गए थे।

उसने आँखे खोली ,देखा वह बैठा मैस्कुरा रहा था,सशरीर नही सआत्मन,वह अब उसके साथ था,ह्रदय में जीवन का विश्वास बन।

इस रिश्ते का कोई नाम नही था,रूप नही था। बस विश्वास था,संसार की भयंकरता में अच्छाई और सच्चाई होने का,किसी के होने का विश्वास।।

©डॉ. राधिका वीणा साधिका

Monday, January 2, 2017

Spirituality is the science of the self..
Dt.Radhika Veena Sadhika

Tuesday, December 27, 2016

अनुभूति....

किस चोले को ओढ़ जी रही हूँ मैं ,एक साध्वी सा यह भगवा चोला ,कौन कहता हैं मैंने भगवा नहीं पहन रखा ?

यह मेरा भगवा ही तो हैं ,एक रंगी ,जिसमे कुमकुम लाल रंग का अलग से छिटकाव नहीं ,यह भगवा ही हैं ,जिसने सूरज की रोशनी से उभरे ,गहरे पिले रंग को स्वत; की मटमैली चादर में छुपा लिया हैं ,यह भगवा ही हैं ,जिसने अपने अंदर एक ज्वार को दबा लिया हैं।
न जाने कितने रंग हैं मेरे ,खुद से अपरिचित ,कही कुमकुम का गहरा लाल ,कही धूल माटी में खेलते बच्चो सा सुखद ,अनूठा भूरा। कही शांत,अनोखा ,अद्वितीय नीला। कही नव अंकुरित पर्णो सा हल्का ,सुलज्जित हरा ,कही अनुभव की बरखा में नहाये बरसो से अपनी जगह पर डटे अश्वत्थ वृक्ष के पत्तो का सा गहरा हरा। कभी पंछियों के कलरव से भरे स्वयं में तृप्त ,परम विस्तारित आसमंत सा गहरा नीला। कभी शारदीय शीतलता की दुग्ध आकाश गंगा सा मेरा रंग शुद्ध ,चमकीला शुभ्र-सफ़ेद। कभी हरिद्रा के लेप सा गहरा पिला , कभी गर्व से दीप्त विजयिनी सा सुनहरा।

मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व हिल रहा हैं ,समुन्दर के अंदर आये उछाल सा।  लगता हैं किसी झूले की सवारी  पर बिठा दिया गया हैं मुझे , मन ,सर ,प्राण सब हिल रहे हैं ,मेरे अस्तित्व और अब तक के मेरे विश्वासों पे प्रश्न चिन्ह लगा रहे हैं।

प्रश्न यह नहीं की क्या हो रहा हैं ? प्रश्न यह हैं, कि मैं क्या हूँ ? आने वाली आंधी आती हैं और मेरे स्वयं के बारे में सारी धारणाओं पर प्रश्न चिन्ह लगा जाती हैं।

स्वयं को परिभाषित करना नामुमकिन हो गया हैं ?मैं कौन हूँ ?

 शायद ..  मैं बदलाव हूँ।  ठहराव या रुकाव नहीं ,सच भी नहीं झूठ भी नहीं ,नीति नियम धर्म कुछ नहीं ,मैं... मैं  शायद अनुभूति हूँ। जो हर पल स्वयं को ही नए रूप,नए विचारो  ,नए विश्वासों के साथ अनुभूत कर रही हैं। मैं कोई नाम नहीं , कोई जाती ,कोई संज्ञा नहीं,धर्म भी नहीं ।

  मैं हास्य हूँ ,कुछ अर्थो में रुदन भी , मैं भक्ति हूँ ,करुणा हूँ,क्रोध हूँ ,आनंद हूँ।  मैं चंचल हूँ ,सतत गतिमान भी।  जीवन मेरे लिए हर पल नए रूप रंग ले आता हैं ,कभी मुस्कुरा देती हूँ ,कभी गुमसुम हो जाती हूँ।

दूर पहाड़ो पर , आज भी मुझे लगता हैं की वो मेरा इंतज़ार कर रहा हैं।  शायद यहाँ तो बस ये चोला हैं ,मैं वही रहती हूँ ,उस पहाड़ पर , स्वप्नों की सप्तरंगी दुनिया में ,जहाँ वो हैं और मैं हूँ ,उसने पहने उस मोरपंख में मेरे मन में पंख पसारे सारे रंग विराजमान हैं ,शायद इसलिए वो मेरी याद में मोरपंख लगाए हैं। उसके सुरो में मेरे अंतर के सारे सुर विद्यमान हैं ,इसलिए वो बांसुरी होठो पे लगाए हैं।

उस झूले  की डोरे तो हैं पर कोई आधार नहीं , वह निरालंब झूला ही मेरा आलंब हैं। स्वप्न परबत के आंगन  में पड़े उस झूले पर राधा कृष्ण विराजमान हैं ,राधा रूप में मैं हूँ या स्वयं कान्ह रूप में मैं हूँ ? मुझे ज्ञात नहीं।
 बस मैं हूँ वही कही। इस दुनिया से मेरा शायद कोई नाता नहीं ,या कहूँ मैं यहाँ हूँ ही नहीं। मेरी आँखे उस पठार की चोटी पर जा चिपकी हैं ,शायद मेरा कान्ह उस पहाड़ से उतर मेरा हाथ थामने आ जाये।  मांगती हूँ की कही कोई दुनियां हो जहाँ सदियों से कालापानी की सजा पा रहे नारी मन को मुखरित होने की छूट हो।  जहाँ शास्त्रो और शास्त्रीयता का दिखावा न हो ,बस जीवन को जीने की इच्छा और स्वतंत्रता  मात्र हो। जहाँ अपने अस्तित्व को प्रमाणित करने के लिए , भौतिक वस्तुओ की नहीं मात्र मानवीयता की जरुरत हो।

कभी कभी लगता हैं दूर आकाश में उड़ते उस विमान के पंखो पर बैठके दूर बहुत दूर चला जाये ,इतनी दूर जहाँ से  इस भौतिक जगत का कोई वास्ता न रहे ,जहाँ सिर्फ शांति हो ,एक मधुर गीत हो ,खुली हँसी हो।  जहाँ नदियां ,पहाड़,वृक्ष ,प्राणी सभी मित्र हो और मैत्री में कोई स्वार्थ न हो। जहाँ उम्र के अंतर न हो , न नर नारी का भेद , जहाँ कलुषता न हो ,कृपणता न हो ,जहाँ जीवन का अर्थ सिर्फ सच्चा आनंद हो ,खरा सा निष्पाप सा प्रेम।

प्रेम जो कभी वृन्दावन में था ,कभी गोकुल के हर आँगन द्वार पे।

कौन कहता हैं कृष्ण चले गए हैं , वो अपने हर रूप में मेरे अंदर विद्यमान है।
कहते हैं अर्जुन को उन्होंने ही दिव्य रूप के दर्शन कराये थे ,जब अपने अंदर जब  कोटि-कोटि समुद्रों की हलचल,नदियों की झिलमिल ,पवन की गति ,बुद्ध की शांति , बालको सी शरारत वह मन्त्र मुग्ध सरल हँसी , कभी काली की शक्ति,प्रेम और भक्ति महसूस करती हूँ तो लगता हैं ,कृष्ण मेरे अंदर ही हैं ,अपने हर रूप में विराजित। कृष्ण मेरा ही रूप।

शून्य भाव से किनारे पर बैठ जब सागर को निरंतर देखती रहती हूँ तो लगता हैं मेरा मन ही सागर हैं ,जिसके अंतर में मेरी सारी स्मृतियां विराजमान हैं ,कही मोती -  रत्नों के रूप में ,तो कोई पानी में जीती मत्स्याओं के रूप में ,कोई जल में  निमग्न ज्वालामुखियों के रूप में ,कोई मस्तिष्क की कठिनतम रचना शंख के रूप में ,सागर को भी उसका अंत कहाँ पता हैं  ? वो तो केवल विस्तार हैं ,मेरा मन ...  भी तो  केवल विस्तार हैं।  भौतिक जगत के लिए वह विस्तार , लहरो के रूप में किनारे तक आता हैं। ऊँचे - ऊँचे उछाल खा सागर तट पर आती लहरे ,जैसे मेरे भाव ,कभी आनंद ,कभी रुदन ,कभी दोनों का संगम। कभी कभी कोई याद सिंपलों के रूप में तट तक चली आती हैं ,दुनिया उसे अच्छे/बुरे नाम दे देती हैं ,पर मेरे लिए हैं वो केवल मेरे मन का विस्तार !

मैं नीतिनियमो की कोई पुस्तक नहीं हूँ ,न पूर्व लीखित कोई विधान , सही-गलत ,उत्तर -अनुत्तर मैं कुछ भी नहीं ,
मेरा मन स्वयं को अनुभूत करने में निमग्न हैं । हर श्वास के साथ आती - जाती ,समुन्दर की तरह उछाले खाती , चट्टानों को तोड़ती ,खुद टूटती -बिखरती ,गिरती -लहराती ,आँखों को शांति देती ,मन को असीम पूर्णता का भाव देती , जीवन अनुभूति।

मैं मात्र एक अनुभूति।

डॉ. राधिका
वीणा साधिका

Thursday, December 15, 2016

कभी - कभी डर लगता हैं ,की झूठेपन और लालच से भरी इस दुनिया में हम जैसी सच की राह पर चलने वाली ,अंधी होकर समाज के नियमो को सहज स्वीकार न करने वाली ,अन्याय और अत्याचार के खिलाफ अकेले ही खड़ी हो जाने वाली लड़कियां सुरक्षित हैं ? रहेंगी ? लड़की हो डर के रहो ,सुरक्षित रहो और समाज की नज़रो में ऊँची बनी रहने के लिए चाहे तो प्राण भी दे दो ,पर चुप रहो ,सहती रहो ,प्रतिकार मत करो . सजी संवरी सी , हंसती -खेलती एक गुडिया बनी रहो ,जिसे देखते कोई कहे ,बेटी हैं ,बहूँ हैं ,नातिन हैं ,माँ हैं ,घर की इज्जत हैं ,पत्नी हैं .पर कोई यह न कहे की यही वो जो हटके हैं ,औरो से अलग अपनी राह में चलने वाली शक्ति हैं . अब आज ये सब क्यों कह रही हूँ क्योकि ,आज भरे स्टेशन पर एक नाटक हुआ ,एक और मैं थी जो सच्चाई का हाथ थामे बैठी थी ,एक और वह था जिसकी आवाज आसमान को भी फाड़ दे ,और टोन ऐसा की सभ्यता शर्मा जाये .
सुबह के ११:३० का समय ,बैंक से निकल कर स्टेशन पहुचने की जल्दी में मैंने एक ऑटो पकड़ा ,स्टेशन आते ही मैंने उसे तय २० रूपये निकाल कर दिए , मैं आजकल ट्रेन से सफ़र करती नहीं तो मेरे पास कोई पास नहीं था ,जाहिर हैं टिकट की लाइन में खड़े होकर मुझे टिकिट भी निकालना था और मैंने १२:३० बजे का अपॉइंटमेंट मेरी एक म्यूजिक थेरेपी की पेशेंट को दे रखा था .
ऑटो वाले ने २० का नोट देखते ही चिल्लाना शुरू कर दिया " मेडम ५० रूपये होते हैं " मैंने कहाँ भाई मीटर क्यों नहीं डाला ,दुरी के हिसाब से २० ही होते हैं बात भी हुई थी .,वो और गरजने लगा " अरे औकात नहीं हैं तो ऑटो में क्यों बैठते हो ,पैसा दो मेरा आदि "
मैंने कहा भाई ईमानदारी से जो होता हैं वो लो . मीटर से हज़ार रुपया भी होगा तो दूंगी ,झूठा पैसा नहीं दूंगी .
चुकीं मैं जल्दी में थी और उससे बात करने का कोई फायदा नहीं था तो टिकिट लेने चली गयी ,थोड़ी देर बाद वह वहां भी प्रकट हो गया ,मेडम पैसा दो ,औकात नहीं हैं तुम्हारी , और फालतू की बुरी बाते .
मैंने उसे कहा मैं तुम्हारी कंप्लेंट करुँगी ,ऑटो का नंबर नोट किया ,आसपास खड़े लोगो को बताया ,फिर भी उसकी हिम्मत मुझे मेरे पैसे देते हुए कहने लगा " " औकात नहीं हैं ऑटो में बैठने की ,ये रख लो पैसे जाओ वडा पाव खाओ ,मीटर से नहीं चलता ऑटो ,चलो मैं वापस लेके चलता हूँ तुम्हे ,दिखाता हूँ कितना पैसा होता हैं "
सारा स्टेशन तमाशा देख रहा था ,मैंने वापस पैसे उसे थमाये और गुस्से से आगे बढ़ दी .
वहां खड़े लोगो और सिड्को के एक सिक्यूरिटी ऑफिसर ने मुझे सलाह दी की मुझे इसकी पोलिस कंप्लेंट करनी चाहिए . मेरा पास उतना समय नहीं था .मैंने RTO क्लाम्बोली के नंबर घुमाये ,पर सारी लाइन्स व्यस्त !
JPR रेलवे हेल्प लाइन को फ़ोन किया उन्होंने कहा हम आपकी इसमें मदद नहीं कर सकते आप नजदीकी पोलिस स्टेशन जाये .
अलबत्ता !! इस बीच ऑटो वाला भाग चूका था ,मेरे पास उसका नंबर ३८८७ नोट था ,लेकिन पोलिस स्टेशन जाना यानि और २ -३ घंटे बर्बाद करना . मुझे फाउंडेशन पहुंचना जरुरी था ,सो बिना कंप्लेंट किये निकल ली .
खैर आज का मामला तो निपट गया ,मेरी जगह कोई दूसरी सीधी लड़की होती तो ऑटो वाले की चीखती आवाज उसका वो भयंकर अंदाज़ और धमकी सुनके डर के जितना मांगता दे देती ,पर मैं तो मैं हूँ ,अन्याय के सामने कभी सर न झुकाने वाली .
यह कहानी आज की नहीं ,रोज की हैं ,या तो आप अपनी कार से जाओ या कैब से क्योकि ऑटो वाले मीटर डालते नहीं ,घर के बहार जो ऑटो स्टैंड हैं ,वहां कई बार जब आपकी गाड़ी पास न हो ,कैब न मिले ,तो किसी इमानदार मीटर से जाने वाले ऑटो वाले के इंतजार में आधा घंटा भी बिताना पड़ता हैं .क्योकि स्टैंड पे खड़े ऑटो वाले जो मुंह में आये वो पैसे बोलते हैं ,जिस जगह जाने के लिए ३०-३५ रूपये लगते हैं लोगो को वहां पहुचने के लिए ऑटो वालो को ८०-१०० रुपये देने पड़ते हैं ,अगर समय रात का हो तो नाईट चार्जेज के नाम पे दुगुने से भी अधिक राशी वो लोग मांगते हैं .
कुछ लोग बोलते हैं पर ज्यादा कर लोग या तो चुप सह लेते हैं हैं या बस ,कार ,कैब से निकल लेते हैं .
पर मुद्दा यह हैं की यह सब कब तक ? RTO वाले बड़े जोश से कम करते हैं चार दिन ,पांचवे दिन से वहीँ हाल .क्या किया जाये इन ऑटो वालो और इनकी तरह के लोगो का .
शर्म आती हैं मुझे की मेरे देश में इस तरह के लोग अपना राज चलाते हैं और कोई कुछ नहीं कर सकता . उस पर आप लडकी हो तो आपको उनसे कोई भी बात कहने से पहले सौ बार सोचना पड़ता हैं क्योकि प्रश्न आपकी सुरक्षा का हैं .
न जाने वो कौनसी घडी आएगी जब लडकिया अपना स्वाभिमान संभाले सर उठाये जी पाएंगी ,हर बुरी बात का विरोध कर देश के कुछ लोगो को सुधार सकेंगी ,न जाने इस भारतीय समाज में लडकियाँ कब शक्ति बन पाएंगी ................................
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