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Thursday, April 14, 2016

सागर किनारे दिल ये पुकारे






उतरती साँझ की  बेला थी वह ,कुछ गुनगुनाती सी। पास के बागीचे से उड़कर चिरोंजी के पत्ते और चिरोंजियाँ  हमारे आँगन में बिखरी जा रही थी।  चिरौंजिया ?    वो मावे वाली ?          नहीं ! माँ कहती थी इन्हे मत खाओ ये जहर हैं ! पर हम मानते ही नहीं थे ,चुन -चुन चिरोंजी जैसी दिखने वाली उन हमशक्ल चिरोंजियों को छुप- छुप खाते और खुश होते। बचपन था वो आखिर !! 

उनका घर में न होना ,हमारी स्वतंत्रता का बिगुल होता ,उन्हें जो भी नापसंद था और माँ को जिससे विशेष आपत्ति नहीं थी वैसा सब हम उनके घर में ना होने  पर किया करते। जैसे चददरो  से टेंट बनना और सब संगियों के साथ उस टेंट के अंदर खिलौने खेलना। पाकगृह से नमक,मिर्च ,चावल उठाकर झूठा - झूठा खाना बनाना   पीछे मैदान में पड़ी रेत से टीले बनाना उन टीलों पर चढ़कर खुद को राजा विक्रमादित्य समझना , पीछले आँगन में रखें टैंक  में से  बाल्टी डुबो पानी निकलना और एक दूसरे पर भर - भर फेंकना।  पिताजी की नज़रो में यह सब समय की बर्बादी था ,किताबें और स्वर-वाद्य इतना ही  और बस इतना ही उनकी नज़रों में समझदारी था।

अलबत्ता पिताजी घर पर न होने के समय हम जो कुछ भी किया करते , उस करने में मेरा  कुछ  सुनना भी शामिल था। फिल्म  का  एक गीत, उस उम्र में भी वह गीत मुझे भाता ,उस गीत के माने नहीं जानती थी मैं ,पर जानती थी सागर और सागर का किनारा। उत्तुंग विशाल सिमाविहीन सागर  ..

माँ कहती थी जब कुछ साल भर की थी तब दिन - दिन  भर नीला आसमान यह गाना सुनती  और जैसे ही यह गीत खत्म होता मेरा रोना - धोना शुरू अब सोचती हूँ क्यों सुनती थी मैं ये गीत ? शब्द और सुरों का ज्ञान कहाँ था तब ? तब तो शायद 'माँ खाना दो ' यह वाक्य भी बोलना संभव नही था मुझे।  फिर क्यों ?



आज, सुबह- सुबह कॉफी बनाते वक्त कही पास से एक श्रुति मधुर आवाज सुनाई दी ,वह स्वरमधुरा किसी डाल पर बैठी कुक रही थी ,कान शरीर का साथ छोड़ उस अंजान कोकिला के पास डाल पर विराजित हो गए ,उन्हें धर - पकड़ वापस ले आई। 

स्टेशन पर सैकड़ो मानव शरीरधारियों की भीड़ थी ,गाडी संख्या दो -दो-पांच-पांच की घोषणा बड़े जोरो पर थी ,लोग आवश्यक -अनावश्यक न जाने किन - किन विषयों पर स्टेशन पर ही खड़े हो चर्चा सत्र कर रहे थे ,मानो रेलवे स्थानक नहीं संसद हो। पर  मेरे दोनों कानो ने फिर कहीं और का रास्ता पकड़ लिया ,आँखों ने देखा ,स्टेशन की छत के निचे की ओर  दो चिड़िया  आपस में कुछ कह-सुन रही थी ,मुझे लगा जैसे एक ने दूजी से कहा ,बच्चा कहा गया ? अकेले कहा उड़ा ? मुझे अपने विचार पर हंसी आई।

गाडी में बैठी ,आँखे बंद की ,मन बरसो का सफर पल -पल में तय करने लगा ,अच्छा -बुरा ,ऊँचा - निचा ,कहा -सुना ,देखा -भला सब -सब देखने सुनने लगा मन। उस  सफर में चाँद को घंटो देखता मेरा बालक मन था तो दर्शनशास्त्रियों के शास्त्र लिखान पे टिका करता मेरा मस्तिष्क।  कही धुप थी कही छाँव। कभी आंसू थे ,कभी मनमुटाव ,कभी हँसना -खिलखिलाना, तो कभी संग था सपने सजाना और सब कुछ भूल जाना।  खारघर स्टेशन से पनवेल स्टेशन
का सफर होता ही कितना हैं ,चंद मिनटों का ! मानसरोवर आते - आते रोज देखती हूँ दूर तक फैली हरियाली ,उस पार फैले कुछ पर्वत - पहाड़।
एक विचित्र पेड़ भी देखती हूँ हर रोज, जिसकी डाली  पर पत्ते नहीं बस फूल ही फूल हैं !

जब कॉलेज ख़त्म हुआ लगा , अब पढाई पूरी हो गयी ,फिर जब डॉक्टरेट कर ली तो लगा , अब पढाई पूरी हो गयी ,जब संगीत में अवार्ड लिए लगा ,लगा  संगीत आ गया ,जब लिखने पर वाहवाही मिली सोचा लिखना आ गया। बहुत कुछ आ गया था मुझे !! सोचा दुनिया  जान ली मैंने ,आखिर विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी डिग्री मेरे हाथ थी ,इतना ही नहीं तो कुछ बड़े मान - सम्मान चिन्ह मेरे साथ थे ,कोई भी विषय ऐसा न था जो सीखा -समझा न था। लगा यह संसार मेरा हैं ,जान लिया हैं मैंने इसे  ,खुदको पहचान लिया हैं मैंने।

  पर.....  फिर  बारी आई जीवन जीने की  ,यु तो सब कुछ आता था ,किन्तु कही लगने लगा , कक्षा में सबसे ज्यादा नापास होने वाली ,सबसे बुद्धिहीन बालिका हूँ मैं। जिन किताबो को मैंने घोट के पिया था उनमे मेरे प्रश्नों के उत्तर नहीं थे ,जिन विषयों पर अधिकार सा पा लिया था वह जीवन की परीक्षा के विषय ही नहीं थे ,पढ़ा - पढ़ाया ,लिखा -सिखाया सब वयर्थ लगने लगा ,शास्त्र -दर्शन - विज्ञान कुछ भी काम नहीं आ रहे थे। जिन विषयों में मैंने विद्यालय- विश्वविद्यालय  में सबसे ऊँचा क्रमांक पाया था उनका तो यहाँ कोई उल्लेख  ही नहीं था। किताबों का लिखा -पढ़ा यहाँ तक की गुरु से पाई शिक्षा सब निष्काम हो गयी।  
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अनुत्तरित प्रश्न -निरुत्तर मैं दूर तक फैले विशाल सागर को देख रहे थे, पारावार नहीं था जिसका वह उदधि ,वह अर्णव ,वह समुद्र।

मेरी भावनाएं ,मेरे प्रश्न उस सागर की गहराइयों में उतरते जा रहे थे।

  मैंने पूछा सागर से " तुम तो आपार हो ,विस्तार हो तुम भी क्या मेरे प्रश्नों पर निरुत्तरित रहोगे  ? शांत ,निश्चिन्त ,निष्चल , बने रहोगे ?

उसने कहा मैं जल हूँ ,खारा जल ,नदियां ,चट्टान ,जलधारा,सिप ,मोती हूँ मैं हूँ ,मेरे समक्ष कोई प्रश्न नहीं क्योकि सीमाएं नहीं हैं मेरी। 

मुझे सागर के दर्प पर बड़ा क्रोध आया। मैंने पूछा " मैंने कौनसी सीमाएं बाँधी रे " ?

उसने कहा " विषयों की सीमाएं ,शब्दों की सीमाएं गणितो ,तर्क -वितर्कों की सीमाएं ।  सीमाएं बांधी ज्ञान की ,मान की  ,जश - गान की।
जीवन वह नहीं होता जो सीमाओं से बंधा हो ,किसी विषय का आसरा लिए ,मुख्य धारा से बचते- बचाते  पगडंडी पर चलता जीवन ,जीवन नहीं होता । जीवन वह नहीं होता जो अभ्यास की पुस्तक -पुस्तिकाओं में छपा हो ,किसी गुरु ज्ञानी ने कहा हो। जीवन तो प्रबल झंझावात में असीम विश्वास -शक्ति और  स्वगुणो के संग कूद पड़ना हैं। जीवन विद्या और विषयों को रट्टा  मारके पी जाना नहीं ,नहीं रटे -रटाये प्रशन -उत्तरो को जस का तस लिख मारना हैं।  जीवन तो असीम हैं ,अगाध हैं ,अपरिमित हैं ,यह कोई शब्द -अर्थ ,मात्र एक प्रसंग , एक लहर ,एक उमंग नहीं ,यह संतुलन हैं ,शांति हैं ,अनुभव हैं। यह मात्र ज्ञान नहीं ,विज्ञान नहीं ,सद्ज्ञान नहीं ,यह पुराण या धर्मग्रन्थ नहीं ,यह लिखी - लिखाई ,बरसो से चली आई ,सुनी -सुनाई कोई कथा -कहानी नहीं ,यह एक  कला हैं ,संपूर्ण कला ,बाकि सब कलाएँ और विषय जीवन -कला का अंग मात्र हैं। किताबो और ज्ञान की गुणवत्ता अकाट्य हैं किन्तु सिमित हैं।

सागर ने फिर कहा " तुम सुनती थी गीत वह ,क्योकि तुम्हे असीमितता में विश्वास था ,तुम्हारी आत्मा को विशालता का  आभास था तुम्हारे मन को ज्ञात था संगीत की तरह ही जीवन वृहत है।  स्वर और ताल को कोई  बंधनो में बाँध सका हैं ? वह संसार  में बसने वाले ,हर धर्म ,सम्प्रदाय ,जाती ,राष्ट्र,राज्य ,यहाँ तक की वृक्ष ,पर्वत ,पवन ,जल ,आकाश ,धरणी सभी में प्रस्फुटित हैं बिलकुल जीवन की तरह।  तुम जानती  थी जीवन आदि हैं ,अनन्त हैं ,कुछ सौ बरसो नहीं ,नहीं किसी नाम से जुड़ा हैं जीवन ।आसमान सागर सब असीमित ,विश्व ,संसार  असीमित। फिर जीवन जीने के लिए सिमित विषयों का ज्ञान क्यों ? मेरे किनारें खड़े रह तुम सबसे अनमोल रत्न नहीं पा सकती ,उसे पाने के लिए तुम्हे मेरे अंदर खो जाना होगा ,मेरे अंतर में पलते वृक्ष ,जीव सभी से नाता जोड़ना होगा।   यह आकाश देख रही हो तुम ? रोज न जाने कितने पंछी उड़ते हैं ,कितने सहस्त्र तारांगण इसके आँगन में खिलते हैं ,तुम  क्या मानती हो ? तुम्हारी आँखों की सीमा तक दिखने वाला गगन ही केवल सत्य हैं ? तुम्हारी बुद्धि ,और नयनो की मर्यादा तक सिमित नील नभ ही केवल अस्तित्व में हैं ? एक बार सृष्टि की  विशालता तो देखो. ,अपने आस -पास पलने - जीने वाली हर वास्तु ,हर प्राणी ,हर किट -कंटक ,हर मनुष्य और समस्त विश्व को अपना गुरु बना जीवन के गुर तो सीखो। ."

मैं शांत भाव से समुद्र को सुन रही थी।

पास ही लहरों से खेलता नन्हा सा बचपन दिखाई दिया ,बचपन जिसे यह ज्ञात भी नहीं था की कोई ज्ञान का मानी उसकी बहती नाक और मुंह पे चिपटी रेती देख कर हँस रहा हैं।  मुझे अचानक याद आया ,  मेरा घर और घर में बैठा मेरा बचपन ,बचपन जिसे  अब मैं अपनी बेटी कहा करती हूँ और जो मुझे माँ कहता हैं। असीम शक्ति हैं  उस बचपन में , आठ बरस की उम्र में मुंबई के रहीसी जीवन में झूलता मेरा नया बचपन ,बड़े स्कूल में बड़ा  सा बस्ता लिए ,बड़ी बड़ी बातें करता मेरा नया बचपन। मुझे याद आया कल ही इस बचपन पर क्रोध किया हैं क्योकि उसने किताबो में लिखे बर्ह्म वाक्य को रटना स्वीकार न कर ,टेरिस गार्डन में लगे फूल और फूलों पे बैठी तितलियों को पकड़ना चाहा था।  मैंने खुदको धिक्कारा और स्वयं  को वचन दिया ,किताबों में लिखे सत्य का ज्ञान जरूर करवाउंगी मैं बेटी को ,हर परीक्षा में बिठाउँगी ,सब विषय पढ़ाऊंगी, पर आँगन में जाकर पौधों की गीली  माटी से खेलना ,बादलों के पीछे गिरते ओलो को समेट बूंदों के साथ हठखेलियां करना ,जीवन के हर रूप को समझ उसकी हर  परीक्षा उत्तीर्ण होना जरूर सिखाऊंगी मैं।  मुझे उसे  बड़ी बड़ी डिग्रियां   दिलाके, बड़े से बड़े ओहदे पे बिठा के ,बड़ा -बड़ा पैसा कमवाके ,जीवन के छोटे से छोटे प्रश्न पर अनुत्तरित होते हुए नहीं  देखना ,प्रतिस्पर्धाओं  में जीतते और  यथार्थ में हारते हुए नहीं देखना ,वह वो बनेगी जो वह बनना चाहे ,वह सब सीखेगी जो सीखना चाहे ,वहां जरूर पहुंचेगी जहाँ पहुंचना चाहे।  मेरी इच्छाओं ,इच्छाओं की पराकाष्ठाओं में ,पुस्तकों ,नौकरियों ,डिग्रियों के बंधन में उसे नहीं बांधना ,उसे जीवन देना हैं ,स्वतंत्र ,समृद्ध ,सशक्त जीवन,सचकह और सच्चा और संपूर्ण जीवन। 

बरसो बाद ही सही  आज समझ आया मुझे ,मैं वह गीत क्यों  सुनती  थी !!!!

मैंने सागर की ओर देखा और आनंद मग्न  भाव से किसी सखी की तरह उसके लिए गाने लगी " सागर किनारे दिल ये पुकारे  तू जो नहीं तो मेरा कोई नहीं हैं ".......


Friday, January 29, 2016

जैसे भाव तिहारे


कहते हैं ये संपूर्ण जगत  भाव मात्र हैं ,भाव से बना ,भाव से रचा ,भावों से सजा ,भाव निर्मित भाव -विश्व ।
सूर्य की रौशनी हो ,चाँद और चांदनी हो ,अमावस की कालिमा हो या भादो की पूर्णिमा हो सब कुछ मात्र भाव !
भाव मन ,भाव तन ,भाव ही धन।
नाना रत्नो ,विल्व पत्रो ,पायस से पूर्ण सुवर्ण घट ,मृदंग -वीणा  का वादन , हीरे रत्नो से मंडित सोने के छत्र  यह सब मैं तुम्हे अपने भाव से अर्पण करती हूँ , माना की मेरे हाथ में तुम्हे चढ़ाने के लिए एक गेंदे का पुष्प मात्र ही हैं किन्तु मेरा भाव वृहत हैं। .....
 सुना हैं  मानस पूजा का पुण्य उतना ही हैं जितना इस प्रपंच के साथ की गयी वास्तविक पूजा का।  कलश के मुख में विष्णु ,कंठ में रूद्र और मूल में ब्रह्मा जी का वास हैं इस कलश में निवास करने हेतु सातों पवित्र नदियों का जल आमंत्रित हैं।
मस्तिष्क तर्क करता हैं.......   मस्तिष्क तर्क करता हैं कि  मात्र मन में भाव रख मूर्ति पर सुवर्ण पुष्प चढ़ाने से क्या सच में सुवर्ण पुष्प ईश्वर पर चढ़ जाया करते हैं ? क्या भोजन से भरी थाली सामने रख पानी के छीटों के साथ मन्त्र बुदबुदाते हुए हाथ हिलाने से भगवान  भोग खाया करते हैं ?  हवा में हाथ हिलाने से और  कहने से की रोगी को हमने हीलिंग दी हैं क्या रोगी का रोग दूर हो सकता हैं ? क्या सूर्य की किरणों को भाव मात्र से पकड़कर बीमार शरीर पर फेर देने से क्लीनिंग हो जाया करती हैं ?
कहते हैं प्रार्थना में बड़ी शक्ति हैं पर प्रार्थना करनी किसकी हैं ,जिसे देखा नहीं फकत मन में  भाव धर लिया उसकी ? मन के भाव ने जो छवि मान ली उसकी ?

डर लगता हैं उस खंडहर में जाते हुए , कहते हैं वहां भुत हैं।   माँ कहती हैं भुत -वुत कुछ नहीं होता तुम्हारे मन का भाव हैं बस !  पिताजी कहते हैं  "भित्र्या पाठी ब्रह्मराक्षस " अर्थात जिसके मन में डर का भाव बैठ गया हैं उसके साथ ब्रह्मराक्षस। ये क्या हैं भई ! अगर सब कुछ बस  भाव हैं तो हम क्या हैं ? आप क्या हैं ? वास्तविक दिखने वाला , शरीर धारण करने वाला , हँसने - बोलने वाला सारा जग क्या हैं ?

सुना हैं की मंगोलिया में एक २०० वर्ष के संत मिले  हैं ध्यान में लीन। २०० वर्ष ध्यान में लीन ?  यह ध्यान का कैसा भाव हैं की २०० वर्ष बीत गए  और उन्हें खबर भी नहीं !
शंकराचार्य कह गए ब्रह्मं सत्य जगन मिथ्या।  भाव - विश्व  के लोग कहते हैं भाव सत्य जगन मिथ्या , तर्कशास्त्री कहते हैं प्रत्यक्ष सत्य इतरत्र मिथ्या।
इस सत्य - मिथ्या के झमेले में  हम जैसे मूढ़मतियों का क्या ? किसे माने सत्य और कहे किसे मिथ्या ?

माना की इंसानी मस्तिष्क बहुत चतुर और ज्ञानी हैं ,विज्ञान पर उसकी श्रद्धा और वह हर रूप में विज्ञानी हैं।  किन्तु मस्तिष्क के ऊपर , उससे भी अधिक सयाना और सज्ञान एक तत्व हैं  और वह हैं आत्मतत्व।
सारे जग में अगर कुछ सत्य हैं तो वह हैं आत्मतत्व ,यह आत्मतत्व  जीवधारियों में हैं अजीवधारियों में हैं ,स्थूल में हैं ,सूक्ष्म में  हैं ,शरीरधारियों में हैं ,अशरीरधारियों में हैं  , विस्तार में हैं ,अंतराल में हैं ,अगम -निर्गम -दुर्गम  पर्वत प्रस्तार में हैं। इस आत्मतत्व का कोई रूप नहीं ,गंध नहीं , दर्शन नहीं ,धर्म- सम्प्रदाय ,अनास्था नहीं। यह आत्मतत्व हर एक में विद्यमान , कण में कण विराजमान ,सर्वशक्तिवान और अखंड सत्तावान हैं। क्योकि इसका कोई रंग-रूप- गंध नहीं इसलिए सृष्टि  में जहाँ - जहाँ जो कुछ भी दृशय -अदृश्य ,सहनीय -असहनीय हैं वह सब आत्मतत्व हैं आत्मा हैं , चैतन्य हैं।  यही आत्म तत्व ,जीवआत्म,परमात्म ,ब्रह्मात्म हैं। अब चूँकि इसे देखा-सुना -मिला-कहा -धोया -सुखाया -काटा -पिटा-लटकाया -उलटाया -भड़काया -सुलझाया नहीं जा सकता इसलिए एकमात्र भाव ही  हैं जिससे इसे समझा जा सकता है ,देखा -सुना -सहलाया -बतलाया जा सकता हैं।   इसलिए हम जहाँ कही भी जिस भी भाव के साथ आते -जाते- गुनते -गाते -कहते-रोते -हँसते -बतियाते हैं वही जीवन का सत्य बन जाता हैं ,हम जो भी करते हैं -भोगते हैं -पाते और खोते हैं उसके पीछे युगों -युगो से संजोया हमारा भाव होता हैं। यही भाव हमें मनुष्य बनाता हैं ,जीवन से मोह लगाता हैं ,जीवन से वितृष्णा करवाता हैं और यही भाव आत्मतत्व में लीन हो भवतम हो जाता हैं। भव सागर  भाव - सागर हैं  और भावमय आत्म भवात्म। इसलिए ही शायद संत कबीर कह गए हैं "मन चंगा तो कटौती में गंगा " .
भावों में बहकर प्रेम किया जाता हैं ,भावों में बहकर ही संगीत रचा जाता हैं ,भावों के बंधन में बंधे भावमय ह्रदय से ही जीवन जिया जाता हैं। तभी तो भावों से चढ़ाया अमृत सत्य हैं तो भाव से की गयी किसी की हत्या भी उतनी ही सत्य।

" कारी मूरत में पा गए श्याम नटनागर न्यारे ,मूरत कारी चाहे रही साँचे भाव हमारे " ..........


 डॉ. राधिका 



                                                                                                                           

Tuesday, January 5, 2016

लुका छिपी जिंदगी की 

  
  सुबह का सुंदर समय सड़क के दोनों ओर बहती खारे पानी की नदी और सड़क पर अंधाधुंध बहते वाहन।  गत्यात्मकता ,प्रवाह ,गति। मुंबई नगरी में बसे एक छोटे से शहर की रोज की कहानी और कहानी एक ठहराव की ,वह ठहराव जो हर मुंबईकर को रोज कुछ समय के लिए देवी अहिल्या की तरह पत्थर सा जमा देता हैं।  यह नगरी कभी रूकती ही तो नहीं  ,रूकती नहीं किसी की ख़ुशी में शामिल होने के होने के लिए ,किसी के दुःख में रोने के लिए, अरे ! यह नगरी तो तब  भी नहीं रूकती जब भागती ट्रैन में दौड़कर चढ़ते हुए कोई गिर जाता हैं ,उसकी सांसे सदैव के लिए रुक जाती हैं। पर यहाँ बसने  वाले प्रत्येक को एक बार अवश्य रुकना पड़ता हैं। रुकना पड़ता हैं उस अबोले ,निर्हृदयी ,अपंग के आदेश पर।  वह पंगु हाथ पैर से रहित , जिव्हा रहित ,वाणी रहित ,शब्द रहित होकर भी कुछ क्षणों  के लिए सर्वशक्तिमान ,सर्व सत्तावान बन जाता हैं ,कालचक्र और जीवन की गति वह निशब्द बिना किसी शब्द के कुछ समय के लिए रोक लेता हैं और हर मुंबईकर उसका दास हो थम जाता हैं ,जम जाता हैं।

आज जब कार में सवार मैं मुंबई की गति के ताल में ताल मिलाते अचानक ही रुक गयी तब समझ आया सामने वह हैं ,वह समय संरक्षक ,नियमो का निर्धारक, अविरत गति का संहारक।  वह जिसे लोग यहाँ कहते हैं ट्रैफिक सिग्नल।
मैं मन ही मन कुन्नाई ,बड़बड़ाई ,गुस्साई पर रुकना तो था ही। सो क्षण मात्र में शांत भी हुई ,दाई तरफ मुंह फेर के देखा तो सड़क के उस ओर बड़े - बड़े तम्बू लगे थे पास में बोर्ड था बॉम्बे सर्कस।  
हम्म तो यहाँ  लगा हैं बॉम्बे सर्कस ,रोज पेपर  में चाहे -अनचाहे विज्ञापन देख रही हूँ। मैंने खुद से ही कहा।  
मेरी बेटी रोज पीछे पड़ी हुई हैं ,माँ देखते हैं न और मैं उसे रोज दुहरा रही हूँ बेटा अभी ४ महीने पहले ही तो एक सर्कस  देखा था ,बिलकुल वैसा ही होगा और याद है न माँ कितनी बोर हुई थी। पर वो सुन नहीं रही और मैं उसका मन रखने  के लिए कह दे रही हूँ जायेंगे बेटा जायेंगे। 
आज अनायास जब सिग्नल पर रुकने से सर्कस पर नज़र पड़ी तो मन बोला ,अंदर कौन होगा ? शायद सब कलाकार होंगे ,क्या कर रहे होंगे ? शायद अगले शो की रिहर्सल..... 

कभी सुना था सर्कस वालो की जिंदगी बहुत कठिन होती हों ,मन हुआ कार पार्क करवा सीधा सर्कस के तम्बू के अंदर चली जाऊ और उन लोगो से कहु मैं आपके बारे में जानना चाहती हूँ ,कुछ लिखना चाहती हूँ। पर कम्बख़त सिग्नल ने  तभी आगे बढ़ने का इशारा किया और मैं आगे बढ़ गयी। समझ नहीं आ रहा था की सिग्नल महाशय को धन्यवाद दू या कोसु। 

कार आगे बढ़ी ,ड्राइवर ने स्पीड बढ़ाई और मैंने आँखे बंद कर ली ,स्मृति के किसी कक्ष से एक छवि बाहर आई, उसे देखते ही मन को असीम शांति मिली ,उस छवि के समक्ष रखी सुवासों की सुवास से मन प्रफुल्ल हो गया , वह छवि जिस गृह में विराजित थी वहां गूंजते विविध स्वर -शब्दों से  कान तृप्त हो गए।  मैंने आखे खोली। मन को न जाने कबसे इन्तजार था ऐसे कुछ दिनों का जब मेरा प्रभात उस मनमोहिनी छवि के आलिंगन में हो , उन तेजस्वी नैनों के हवन कुण्ड में ,मैं अपने नयनो का हविष दे दू , उस परम विशाल के हृदयाचल को निहारती मैं लाल गुलाब पुष्प उस पर निछावरती रहु ,उन चरणो पर मैं अपना समय और जीवन वारती रहु ,पर जीवन में आज तक ऐसा एक पूरा दिन मुझे उसके साह्य में नहीं मिला ,जब मैं सारा जग भूल के बस उस आदि जगदंबा के किसी मंदिर में उसका सिर्फ उसीका ध्यान करती रहू। 

 मैंने एक निश्वास छोड़ आँखे खोली ,कार आगे बढ़ी ,प्रसाद स्वीट्स की दूकान पर बहुत से लोगो का जमाव दिखा ,सुबह - सुबह दुकान पर खड़े वे सब समोसा ,कचौरी का लुफ्त उठा रहे थे। घर से आते समय नाश्ते में खाया गाजर का पराठा मुझे उस समोसे की हरी चटनी के स्वाद के आगे निस्वाद मालूम हुआ ,मन उड़ता सा तेरह साल पहले के ग्वालियर में जा पंहुचा ,सुबह के आठ बजे का समय था ,मैं संगीत कक्ष में रियाज़ कर रही थी ,माँ चाय बना रही थी ,भाई -बहन आँगन में खेल  रहे थे, पिताजी कही बाहर  गए थे ।  अचानक पिताजी तेजी से घर में घुसे उन्होंने एक ही बार में हम सबको तेज आवाज दी जल्दी आओ,जल्दी आओ मैं समोसे कचौरी ,जलेबी लाया हूँ। माँ ने सबको थाली में गरमागरम समोसे हरी ,लाल चटनी के साथ परोसे। उन जलेबियों के पाक की मिठास आज तक मैं नहीं भूली ,लेकिन इतने सालो में आज तक ग्वालियर के उन समोसे ,जलेबी ,चटनी को चखने का अवसर भी न मिला। मैं और आरोही जब भी मुंबई की किसी चाट दुकान में चाट खाते हैं मैं हर बार आरोही से कहती हूँ ,आरोही ग्वालियर की चाट के आगे यह चाट पानी हैं। 

अलबत्ता ! कार के पास कुछ धड़कने की आवाज से मैं वर्तमान में आ पहुंची।  हम फिर ट्रैफिक सिग्नल में अटक गए थे ,बाजु में खड़े  स्कूटर पर एक छह  माह का गोरा -गोरा बच्चा मुझे देख कर मुस्कुरा रहा था मानों कुछ कह रहा हो ,उसके पास पांच साल का एक काला - पीला बच्चा एक नाक बहते ,उससे भी अधिक काले ,धूल माटी से भरे छह माह के बच्चे को गोद में लिए खड़ा उस सुंदर गोरे बच्चे की माँ से भीख मांग रहा था।  मन में आया कार से उतरु उन दोनों काले -पीले बच्चो को खीच के कार में डालु ,घर ले जाकर बाथरूम में  रगड़ - रगड़ कर नहलाऊ ,ठीक - ठाक  कपडे पहनाऊ , ढंग का नाश्ता करवाऊ और बड़े को किताबें छोटे को खिलौने दे बिठलाऊ। मेरे मन ने याद दिलाया  की मैं कबसे बच्चो के लिए कुछ ऐसा करना चाहती हूँ  जो इनका जीवन संवार सके। 

मैं आगे बढ़ गयी बिलकुल मुंबई की जिंदगी की तरह पर कुछ छोटी बड़ी इच्छाए मन  में दबी रह गयी।  सिर्फ मेरे ही मन में नहीं ,हम सबके मन में ऐसी कुछ छोटी - बड़ी इच्छाए हैं ,जो जिंदगी को जिंदगी बनाती हैं।  हम सब कुछ करते हैं ,बड़ी -बड़ी बाते,बड़े -बड़े वादे ,बड़े -बड़े काम पर कुछ बाते जिनका नाम जिंदगी हैं ,जो जीवन का उत्साह हैं उन्हें करना हम भूल जाते  हैं वो छूट ही जाती हैं।  और ,कभी ऐसे ही किन्ही बाहनों का सहारा ले लुका - छीपी करती जिंदगी हमारे सामने आती हैं और कहती हैं बस कुछ पल के लिए मुझे भी जी लो। मैंने तो तय कर लिया हैं मैं इस लुका छिपी का खेल इस साल जीत के रहूंगी ,कुछ पल के लिए ही सही जिंदगी जी के रहूंगी।  

आपने क्या सोचा हैं ?

Thursday, November 12, 2015

भंवरा बावरा -बावरा

 आज भोर मन कुछ गुनगुनाते हुए  जागा। ठंडी पुरवाई ने  रिमझिम के  संग जैसे शब्द भी अनंत पर बिखेर दिए हो।
कुछ क्षण यु ही बीते ,फिर बरबस ही वह शब्द सुरों का संग ले मेरी गायत्री वीणा से मुखरित हो घर में मधु वर्षा करने लगे ,दीवारो  प्रतिध्वनित होते हुए उन्हें मैंने सुना, रोज रोज डाली - डाली क्या लिख जाये भंवरा बावरा - बावरा . मैं मुग्ध ह्रदय बर्तनो की खड़खड़ से ताल दे गीत की वाक्य रचना को वाह -वाही देने लगी ,भंवरा बावरा -बावरा। … वाह -वाह.

बड़ी सुन्दर प्रात :बेला थी ,सप्तरंगी इंद्र-धनुष आसमान पर आसन लगा मुझे अपने रंगो में डूब जाने को विवश कर रहा था ,सामने शिव मंदिर  लगे वृक्ष उनके प्रेम-पत्र  पवन के झोके से ;पुष्पों की चुनरी संग बहा उनकी प्रिया अर्थात मुझ तक पंहुचा रहे थे।  वह विविध रंग फूल सप्तरंगो से सजे इद्रधनुषी हिंडोले पे विराजित हो ' जीवन सौंदर्य स्वरूप ' यह सन्देश इस जीवनकथ्य नायिका को बतला रहे थे।

  मैंने अपने ओठो पर  कॉफ़ी का मग लगाया ,मेरे ओष्टो ने गीत गुनगुनाना बंद किया ,पन मन भ्र्मर अद्यपि गुनगुना रहा था। …बावरा -बावरा।

अखबार के प्रथम पृष्ठ पर नज़र डालते ही समाचार दिखा "Death,Destruction in Neighborhood" ..
भारत के तीन पडोसी देशो में अनेक प्राकृतिक आपदाओ के चलते लाखो लोगो ने प्राण गवाए।  धप से  समाचार पत्र का मुंह बंद किया।  सुन्दर समाचार की आशा में मराठी समाचार पत्र को तरेरा . " मालनीवर माटी ओतुन सम्पूर्ण ओळख पुसनार ! यह खबर थी महाराष्ट्र के मालिन गांव में  धरती धसने के कारण पूरा गांव माटी में गड के नष्ट हो जाने की।
मेरा मन अभी भी जीवन का सुन्दर  स्वप्न  मुझे सुना रहा था और मेरी आँखे जीवन का सत्य ,जीवन की विभीषिका दिखला रही थी।

प्रकृति कोप ,मृत्यु ,जीवन का सर्वनाश…
 जीव हत्या ,प्रिय बिछोह ,अन्न -जल त्रासदी…
लज़्ज़ा -हरण ,भीत - वदन ,ह्रदय -खंडन ……

 त्राहिमाम् ....... त्राहिमाम् ....... त्राहिमाम् ....... 

मैं चिल्ला उठी ,लड़खड़ाते -गिरते - कँपकँपाते घर के देवालय की और भागी।
सामने माँ त्रिभुवन सुंदरी की मूर्ति के सामने गिरकर विव्हल कंठ से भयनाद करने लगी ,त्राहिमाम् शरणागतम।
माँ त्राहिमाम् शरणागतम।

मेरी मुंदी हुई आँखों से अश्रुधारा बहती रहती ,समय सम्राज्ञी अपनी धीर गति में मेरे अश्रुओ को आबादित कर चंचल - विचल बहती रही।

आँखे खुली, बरखा रानी बादलो के संग कदाचित मेरे मित के देश ,मेरी व्यथा का गान सुनाने जा पहुंची थी।  बड़बोली कही की  …  अब हर बात पी को सुनना आवश्यक तो नहीं।

अंतर्मन भ्र्मर सत्य बाणों से छिद्रित लहुमय होने के उपरांत अब शांत हो चूका था। न प्रभाती का गीत था ,न जीवन की वेदना।  मैंने  शांत भाव से माँ मातंगी को देखा ,उसके श्याम वर्ण पर करुणा की रक्तिम आभा छलक रही थी।

मन की गति और भी धीमी हुई ,मानो कोई धड़धड़ाती हुई लौहपथ गामिनी तय गंतव्य स्थान तक पहुँचने के मद में गज -गति से झूमती -झूलती चल रही हो।

समाचार पत्रो पर पुनः नज़र डाली।

कुछ असह्य क्रंदन करते चेहरों के चित्र दिखे ,कुछ ;यहाँ सब कुछ था -अब कुछ नहीं की विवशता को बखानते सन्देश।

एक चित्र में चीन की एक महिला अपनी शहर के मलबे पर बैठी थी ,उस मलबे में दबे थे उसके परिजन ,उसके घर गृहस्थी का सामान ,उसके सुन्दर स्वप्न।

मैं स्वयं से कहने लगी ,इस स्त्री के पास कल तक सब कुछ था  आज उसका नाम: शेष ,फिर भी संयत !
यह इसके जीवन का अंत हैं या प्रारम्भ ?

मस्तिष्क ने कहा अंत ,ह्रदय ने कहा प्रारम्भ ! 

चीन की वह महिला ही क्यों ,न जाने कितने लोग रोज जीवन को इस दशा में पाते है जब सारा संसार उनके सब कुछ के अंत पर शोक मनाता हैं। उनके सामने कुछ नहीं होता ,अब तक जिए उनके इतने साल ,उनके संगी ,उनके प्रियकर ,उनकी उपलब्धिया ,उनके पारितोषिक ,उनके विश्वास ,उनकी सुख  - सम्पत्ति सब के सब किसी न किसी रूप में माटीमोल हो जाते हैं। शेष रहती हैं तो केवल जिजीविषा ,आत्मविश्वास और जीवन पर श्रद्धा।

मैंने स्वयं से कहा ,मैं किस -किस से घबराती हूँ ? मैं ही क्यों हम सब ही समय-असमय  न जाने किन -किन से घबराते हैं।  कभी संपत्ति खो जाने का भय ,कभी नाम -बदनाम होने का भय ,कभी अपनों से बिछुड़ने का भय। कपोल - कल्पित यद्यपि अघटित अनजानी  का भय ,सदा सर्व हमारे अंतर्मनो में समाहित -विराजित -स्थापित ,अनाम भय।

कुछ इन्ही विचारो में खोयी थी की बालकनी में सजे  पुष्पवाड़े में कही से अचानक एक भ्र्मर आकर स्थित हो गया।  पुष्पों से रस - गंध लेता वह मेरे शयन कक्ष में लगी ट्यूबलाइट पर जा बैठा ,शायद उसे तीव्र गर्मी महसूस हुई।,अधजले पंखो से उड़ता वह पुनः पर्णकुटिका में पहुंच हरित पर्ण पर विश्राम करने लगा।

मैंने स्वयं से कहा मैं क्यों डरती हूँ ? जीवन रूपी पुष्प वाटिका में मधु हैं ,रंग हैं ,रस हैं ,गंध हैं  तो कंटक  हैं ,किटक हैं ,कटुरस हैं ,काली माटी हैं और फिर कैवल्य भी हैं।

आत्मन रूपी भ्र्मर न जाने कितने शरीर ले हर जन्म में इस डाली से उस डाली बैठ जीव - लीलाये करता हैं ,कभी जीवनरस पिता हैं ,कभी कंटक-कुसुमावली  में फंस छिन्न-विछिन्न हो जाता हैं ,पुनः मधु रस पी मधुर-सुमधुर हो जाता हैं।  शरीर न बदले तो हो तब भी एक ही शरीर में रह कितनी बार मृत्यु का वरण कर, कितनी ही बार नवजीवन का प्रारम्भ करता है ,अंत और आरम्भ से लिखे इस प्रारब्ध से ही जीवभ्र्मर जीवन का इतिहास लिखता हैं।

शंका -कुशंका ,शोक -दुःख ,भय -त्रास के बादल अब छट चुके थे ,सुवर्णरवि अपनी स्वर्णकिरणो से मेरे मेरे ह्रदय को आरोग्य दे रहा था। मन पर स्वर्णरश्मियाँ कुछ कुरेद रही थी मैंने वह शब्द पढ़े, शांत उच्छ्वास छोड़ ,पुनः पूर्ववत मुस्कुरा मैं उन शब्द को गुनगुनाने लगी .... रोज -रोज डाली -डाली क्या लिख जाए भंवरा बावरा -बावरा।

           " लिखीस्तवं लिखिस्त्वं त्वमेका वाणी " 


न जाने कितने दिन से मेरी उँगलियाँ कंप्यूटर के कीबोर्ड पर, मेरे ह्रदय रूपी अवनद्य वाद्य पर बजते त्रिताल की गति को थाम नृत्यमग्न होना चाहती हैं। बालपन की मस्ती में झूमती किसी  चार वर्षीय बालिका की तरह मेरी अंगुलियां दृश्य जगत का भान भुला ह्रदय के ताल को थाम उससे आठ गुनी लय में कंप्यूटर के कुंजीपटल पर थिरकने को आतुर हैं।

 कितना विचित्र हैं न यह ,जब हमारे पास कुछ लिखने का समय होता हैं तब न मन में विचारो का चक्रवात उठता हैं ,नाही आत्म प्रेरणा तूफ़ान का रूप ले ;हृदसमुद्र की भावनाओ का जल उथल-पुथल उन्हें शब्दों की नौका दे, पन्नो के किनारे दिखाती हैं। तब.......... तब एक शून्य होता हैं, उस शून्य का न तो कोई रूप होता हैं नहीं कोई भाव,  उस शून्य में विचरते हम,शायद हम ही नहीं होते।भावनाओ का शून्य ,विचारो का शून्य ,जीवन शून्य …।
और जब हमारे पास एक क्षण का भी समय नहीं होता ,हमारी आत्मा चीख-चीख कर हमें कहती हैं तू लिख ,कुछ लिख ,अभी लिख ,छोड़ बाकि सब बस लिख। अरे !! लिख -लिख पर क्या लिख ? न विचारो की कोई संगति हैं ,न भावो का कोई ठिकाना ,न शब्द युग्मों का कोई जोड़ हैं ,न लेखन सौंदर्य का कोई तराना। क्या लिख ? लिखू क्या ?
पर हठी आत्मा। . यह कभी किसी की कही मानती हैं भला !

  सुना था कभी लोग मोर पंख को स्याही में डुबो ताम्रपत्र पर लिखते थे। समय बदला लोग पेन-पेन्सिल की मदद से कागज़ पर लिखने लगे। समय कुछ और आगे बढ़ा अब लोग कंप्यूटर के कीबोर्ड पर अपने ह्रदय की बात टंकित करते हैं।  एक बात न बदली वह थी लेखन या लिखना ।

कभी कभी सोचती हूँ लेखन मेरे लिए  इतना अनिवार्य क्यों हैं ? शायद इसलिए क्योकि जब मैंने बोलकर भी बोलना नहीं सीखा था तब भी मुझे लिखकर अपनी बात कहना आता था।

गूंगा होना एक अभिशाप माना जाता हैं ,लेकिन संसार में कितने ही लोग ऐसे हैं जो बोल सकते हैं ,बोलते हैं पर बोलना उन्हें नहीं आता ,या कहे सही बोलना उन्हें नहीं आता।

सुनकर विचित्र लगता हैं किन्तु जैसे पढ़े-लिखे लोगो का अनपढ़ होना सत्य हैं वैसे ही बड़बोलों को भी बोलने की कला न आना सत्य हैं। हमें बचपन से सिखाया जाता हैं बेटा ऐसे बोलो ,ऐसे न बोलो पर कभी कोई सिखाता हैं की बेटा बोलते समय आवाज को ऐसे लगाओ। किस शब्द पर जोर दो ,किस वाक्य को बलवान बनाओ।  यहाँ न्यास दो यहाँ विराम ,अल्प विराम दो।  लिखते समय लेखक कुछ इस अंदाज़ से लिख जाता हैं की पढ़ने वाला उसके भावो - विचारो से लगभग सौ प्रतिशत सहमत हो जाता हैं ,पर क्या कोई हमें बचपन में स्वयं को वयक्त करने की कला सिखाता हैं ? नहीं न ! बोलना या कहना क्या हैं ,बोलना ,भाषण करना  यह स्वयं को प्रकट करने ,वयक्त करने की कला हैं।  हम तमाम भाषाएँ सिख लेते हैं ,व्याकरण जान लेते हैं लेकिन संवाद की आत्मा को हम नहीं जान पाते। हमें यह ज्ञात ही नहीं होता की हम कहते क्यों हैं बोलते क्यों हैं ?

जो अकेला बोलता हो  उसे पागल इस अलंकरण से हम सुशोभित करते हैं पर हम क्या करते हैं ,हम बोलते हैं ,सुनाते हैं ,लोग सुनते हैं ,सुनकर भूल जाते हैं ,समझ नहीं पाते की हम क्या कह रहे हैं ,क्यों कह रहे हैं।  क्योकि संवाद की कला को हम नहीं जानते। हमारी अवस्था उस पंगु वयक्ति की तरह होती हैं जिसके हाथ पैर तो हैं पर वह उनका इस्तेमाल ही नहीं जानता।

न्यूज़ चैनल लगाओ तो सुनाई देता हैं अमके नेता ने तमके नेता को अमुक शब्द कहे ,अमुक देश ने तमुक देश को ये कहा ,अमकी अदाकारा ने तमकि अदाकारा को ऐसा कहा और फिर शुरू हो जाते हैं दंगे,विषाद ,विवाद।

बोलना या कहना इतना आसान नहीं हैं। क्योकि कहने से पहले सुनना जरुरी हैं ,बोलने से पहले समझना जरुरी हैं। भाषा का विज्ञान समझ लेना बस नहीं हैं ,भाषा का प्राण ,संवाद की आत्मा ,सुसंवाद की कला जिसने सीखी वह विजयी।

हम जैसे संवाद शिक्षार्थियों के लिए लेखन ही शायद परम मित्र हैं। संवाद की कला में निपुणता आने तक   ....
" लिखीस्तवं लिखिस्त्वं त्वमेका वाणी "



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