Monday, October 6, 2008

जिम्मेदार कौन?

कल कुछ काम से बाहर जाना था ,बेटी के साथ ऑटो में बैठी ,दुपहर का समय फ़िर भी रास्तो पर भीड़,चारो तरफ़ वाहनों का कोलाहल सब कुछ बडा बुरा लग रहा था , तभी ऑटो के सामने की तरफ़ छोटे छोटे अक्षरों में लिखे एक वाक्य पर नज़र गई ,वाक्य था "तूच तुझ्या जीवनाचा शिल्पकार "अर्थात तू स्वत: ही तेरे जीवन का शिल्पकार हैं ,अक्सर ऑटो पर कभी कोई शायरी ,कोई गीत लिखा होता हैं , पहली बार मैंने किसी ऑटो में इतना सुंदर और सच्चा वाक्य लिखा हुआ देखा ।

हम अक्सर सोचते हैं ?ऐसा हमारे साथ क्यों हुआ ?हमारी जिन्दगी में वह खुशियाँ क्यों नही हैं जो दूसरो के जीवन में हैं ?हम उससे अधिक काबिल हैं फ़िर भी उसे जो मान सम्मान मिला हैं ,हमारे पास क्यों नही ?उसके पास ये हैं ,वो हैं ,हमारे पास क्यों नही ?क्यों आख़िर हम हर क्षेत्र में उससे ज्यादा बुद्धिमान ,विद्वान होकर भी उससे काफी पीछे हैं ?गीता में कहा हैं जैसा कर्म करोगे वैसा फल मिलेगा । हमारा कर्म तो काफी अच्छा था ,तो हमें वैसा फल क्यो नही मिला ?आदि आदि आदि ............... और यह सब सोच कर कभी हम निराश हो जाते हैं ,कभी उदास ,परेशान और हताश । जीवन भर सोचने के बाद हमें जब इस प्रश्न का उत्तर नही मिलता तो एक सीधा सरल उपाय हम अपना लेते हैं ,आशावादी ,हताशावादी होने के बाद हम भाग्यवादी हो जाते हैं ।" क्या करे यह हमारे भाग्य में ही नही था ",ये वाक्य अकर्मण्यता और अपराध बोध को छुपाने वाला एकमात्र आदर्श वाक्य हैं । इसे कहने के बाद कहने और सुनने वाले के पास दूसरा कुछ कहने और सुनने के लिए नही रह जाता ।

वस्तुत: हम अपने जीवन से जुड़ी सभी घटनाओ की, परिस्तिथियों की जिम्मेदारी लेना ही नही चाहते ,हम जानकर भी नही जानना चाहते की हमने अपने जीवन में जो भी असफलताएँ पाई हैं उनके मूल कारण कहीं न कहीं हम स्वयम ही हैं ,हम अगर गहरे से विचार करे ,चिंतन करे तो हम आसानी से जान सकते हैं की हम औरो से ज्यादा बुद्धिमान ,मेहनती ,कर्तव्य निष्ठ होकर भी आज उससे हारे हुए क्यों हैं ?सिर्फ़ मंथन पुरी सच्चाई से किया जाना जरुरी हैं ,उसमे स्वयं से स्वयं की असफलता छुपा लेने वाला भाव नही होना चाहिए ।

हम कभी दोष देते हैं अपने माता पिता को,रिश्तेदारों को ,भाई -बहनों को,संस्कृति,संस्कारो को ,समाज को, देश को ,गरीबी को ,अमीरी को पर हमारी हार में दोष सिर्फ़ हमारा होता हैं ।
उदहारण स्वरुप हमने एक अच्छा अभिनेता/अभिनेत्री होने की ठानी ,पर हम नही बन सके ,जबकि हम जानते हैं की हम औरो से अच्छे अभिनेता या अभिनेत्री बन सकते थे ,वह भी अपनी शर्तो पर । अब जब हम सोचते हैं हम अभिनेता क्यों नही बन सके . तो विचारो का क्रम कुछ इस प्रकार शुरू होता हैं , हमारे माता पिता को हमारा अभिनय करना पसंद नही था .................. माता पिता की तो मनाही नही थी पर दादा दादी को पसंद नही था ,..........हमारे चाचा की बड़ी इच्छा थी की हम लेखक /लेखिका बने , ...............घर की आर्थिक परिस्तिथी अच्छी नही थी ,............ आसपास कोई अच्छा अभिनय विद्यालय नही था , ..............हमारे घर के लोगो की टीवी चेनल्स में जान पहचान नही थी ,हम छ: भाई- बहन थे ,मैं बड़ा भाई था /बहन थी । और अंत में वही सुंदर सा वाक्य शायद मेरे भाग्य में ही नही था ।

जबकि विचारो का क्रम ऐसा होना चाहिए ,मैं अपने माता पिता ,दादा-दादी ,को अपनी बात समझा नही सका /सकी ,मैंने अपने चाचा की इच्छा का सम्मान करते हुए अपनी इच्छा का सम्मान नही किया ,जबकि दोनों की इच्छा को न्याय दिया जा सकता था , मैं चाहता /चाहती तो इस सब पर कोई न कोई उपाय जरुर निकला जा सकता था। और अंत में मैंने कहीं न कहीं अपने जीवन को गुण ,ज्ञान और सफलता के शिखर पर ले जाने में कोई कमी की हैं और इसी कारण से आज मैं पीछे हूँ,हारा हुआ /हुई हूँ ।

यह सत्य हैं की मानव जीवन कठिनाइयों से भरा हुआ हैं ,अपने सपनो को सच करना कभी आसन नही था, नही होगा पर अगर वास्तव में अपने सपनो को सच करना हैं तो मन में पुरा विश्वास ,प्रबल इच्छा शक्ति के साथ इस बात का भी एहसास होना चाहिए की कोई और नही हमारे जीवन के शिल्पकार हम स्वयं हैं ,यह किसी ओर का जीवन नही और हमारी सफलताओ -असफलताओ की जिम्मेदारी किसी ओर की नही हमारी स्वयं की हैं ,जब हम ये सत्य मान लेते हैं तो अपने सफलता के मार्ग में बैठे हुए अपने स्वयं के डरपोक और भाग्यवादी रूप को हटा देते हैं और वही से शुरू होता हैं हमारी सफलता का सफर ।
सधन्यवाद ।
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