Sunday, November 2, 2008

कौन हिंदू, कौन मुस्लिम ?


तक़रीबन १२ बजे का समय ,हम कोल्हापुर महालक्ष्मी देवस्थान से बाहर निकले ,वह तेजी से दौड़ता हुआ मेरे पतिदेव के पास आया और बोला "साहेब गाड़ी तैयार आहे" ,(गाड़ी तैयार हैं ) वो............ सफ़ेद कुर्ता पायजामा पहने,शुद्ध मराठी बोलता हुआ ,मराठी माणुस सा ।

आज सुबह ही हम कोल्हापुर पहुंचे थे ,मैं ,सासु माँ ,ससुर जी ,पतिदेव और बेटी हम सब गाड़ी में बैठ गए ,सब चुप थे ,पर वह बोलता जा रहा था ,"बघा साहेब इथे जवळस देवीच देवुळ आहे ...नंतर आपण ज्योतिबा मन्दिर चे दर्शन करू ,औदुम्बरच्या वाडीत चलू ..................................(यहाँ पास ही देवी का मन्दिर हैं ,बाद में हम ज्योतिबा मन्दिर के दर्शन को जायेंगे ,औदुम्बर के मन्दिर भी जायेंगे )आदि आदि आदि । मैं सोच रही थी ,यह बोलते बोलते थका नही क्या ?उस दिन वह हमें कम से कम चार तीर्थ स्थलों पर ले गया । दुसरे दिन फ़िर सुबह ७ से हम देव दर्शन के लिए निकल पड़े ,आज भी कल की तरह ही उसकी बातें- बातें । "बघा वहिनी हे आमच्या कोल्हापुरातले महान व्यक्तिंच घर । तुम्हाला सांगलीच्या गणपतीची गोष्ट सांगतो ....."(देखिये भाभी ये हमारे कोल्हापुर के महान व्यक्ति का घर,आपको सांगली के गणपति की कहानी सुनाता हूँ । )

एक जगह हम कुछ देर रुके उसके पास एक फोन आया ..........."हाँ बोल..काय?अस !!!!!!!जा ,बघू ...और उसने गुस्से से फ़ोन पटका धम्मम !!!!!!!!!!!!!!
फ़िर मेरी सासु माँ से कहने लगा ,बघा आई मैं सुबह से नमाज़ पढ़के निकलता हूँ ,पर मेरा भाई कुछ नही करता ,दिन भर घर में बैठा रहता हैं ,माझी आई म्हणते लहान ऐ ....(मेरी माँ कहती हैं वह तुम्हारा छोटा भाई हैं )

सासु माँ आश्चर्य से हक्की बक्की ...
घर आने के बाद उन्होंने मुझसे पूछा "राधिका ये भाई मुस्लिम था ....?"

हाँ वह मराठी माणुस सा दिखने वाला ड्राईवर मुसलमान था ,उसका नाम था "अल्ला बख्श बागबान "।

कोल्हापुर में हम तीन दिन थे . वही नही न जाने कितने मुसलमान शुद्ध मराठी बोल रहे थे,देवी महालक्ष्मी के दर्शनों को आतुर थे ,कुछ माँ की तस्वीरे बेच रहे थे,कुछ देवी की साडी और चूड़ी बेच रहे थे । सब देख कर मैं सोच में पड़ गई,जब मैं गुजरात में होती हूँ तो वहाँ हर कोई गुजराती दीखता हैं ,हिंदू ,मुस्लिम ,सिख, इसाई ...हर कोई ,जब महाराष्ट्र में होती हूँ तो हर कोई मराठी ...पंजाब में हर व्यक्ति वाहेगुरु की फतह कहता हैं ,और दक्षिण में हर व्यक्ति तिरुपति बालाजी को नमन करता हैं ।हम सब हाजी अली जाते हैं ,मियां तानसेन के मकबरे पर सब संगीतज्ञ मत्था टेकते हैं। मैं सोचती रह जाती हूँ कहीं कोई हिंदू दिखे,कहीं मुस्लिम ,कहीं सिख या फ़िर इसाई ,पर दीखते हैं सिर्फ़ इंसान ,धर्म ,जाती ,देश ,राज्य की सीमओं से परे,एक दुसरे के धर्मो का सन्मान करते ,मानवीय रिश्ते निभाते ,एक दुसरे से प्रेम भाव और बंधुता रखते इंसान और भारतीय । सच्चे भारतीय ,जिनकी नज़रे न तो हिंदू मुस्लिम का भेद जानती हैं ,न धर्म मजहब की चौखटे ,वह जानती हैं सिर्फ़ जीवन के मायने और भारतीयत्व ।

धर्म ,मजहब का द्वेष जिनके मनो में हैं ,वह मुस्लिम नही ,हिंदू भी नही ,उनका कोई धर्म नही वह या तो ख़ुद विकृत मनस्तिथि के हैं ,या अपना स्वार्थ चाहते हैं। सच्चा भारतीय तो भारत में हर कहीं हैं ,उसे देखकर मुझसा कोई भी प्रश्न में पड़ जाए की कौन हिंदू, कौन मुस्लिम ?
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