Monday, February 23, 2009

क्या कला सम्मान की मोहताज हैं ?(स्लमडॉग और ऑस्कर )

कुछ लोग खुशिया मना रहे हैं ,कुछ दुःख.....कुछ ..................कुछ भी नही कह रहे और मैं .......हैरान हूँ । रहमान साहब और गुलज़ार साहब को ऑस्कर मिला इस बात की बहुत खुशी हैं। हम सब जानते हैं की स्लमडॉग से कई- कई -कई -कई गुना बेहतर फिल्मे हमारे देश में बनी हैं । हमारी फिल्मो का संगीत भी बहुत अच्छा रहा हैं ,वैसे भी भारतीय संगीत सदैव श्रेष्ट रहा हैं ,इसलिए ही भारतीय संगीत सीखने की ,जानने की चाह हर व्यक्ति के मन में रहती हैं ।
लेकिन प्रश्न यह हैं की हम सब कला को ,चाहे वह संगीत हो या फ़िल्म निर्माण,अभिनय ,चित्रकला या साहित्य सृजन । कब तक पुरस्कारों के वजन से तौलते रहेंगे ?

कला कभी भी किसी सम्मान और पुरस्कार की मोहताज नही होती ,यह बात ठीक हैं की पुरस्कार और सम्मान मिलने से उस कलाकर की हौसला अफजाई होती हैं ,उसे खुशी मिलती हैं । लेकिन कोई भी पुरस्कार किसी भी कला की श्रेष्टता का तौल नही होता । कला स्वयं ही सबसे बडा सम्मान और पुरस्कार होती हैं ।


जरुरत हैं की हम कलाओ का और कलाकारों का तहेदिल से आदर करे.

Thursday, February 12, 2009

प्यार को प्यार ही रहने दो ....


प्रेम .....यह शब्द मन मस्तिष्क में आते ही जो सबसे पहला नाम याद आता हैं वह उनका ही,उनके प्रेम की जयकारे सभी करते हैं ,युवक युवतियों से लेकर दादी नानी तक उनके प्रेम का यशोगान करती हैं ,प्रेमी प्रेमिका का वह आदर्श हैं ।

न........ नही, मैं न हीर राँझा के प्रेम की बात कर रही हूँ न सलीम अनारकली के । मैं बात कर रही हूँ युगों युगों से सभी प्रेमियों के ह्रदय में विराजमान कृष्ण राधा के प्रेम की । राधा कृष्ण का प्रेम.............. जिसकी महिमा में संत कवियों ने बडे बडे महाकाव्य रच दिए ,ग्रन्थ लिख दिए ,गीत कह दिए ।

लेकिन जब कृष्ण राधा को साथ देखती हूँ तो मन में हमेशा यह प्रश्न उठता हैं की कृष्ण राधा का प्रेम क्या वास्तव में वही हैं जो हमने अब तक समझा हैं ,कहानी कविताओ में पढ़ा हैं ,गीतों में सुना हैं । मन कभी यह मानने को ही तैयार नही हुआ की कृष्ण और राधा प्रेमी और प्रेमिका थे ।

वास्तव में राधा की छवि भारतीय जनमानस के मन में इतनी गहरी बैठ गई हैं की उसे सिरे से खारिज करना बहुत कठिन हैं ,लेकिन सच यह हैं की श्रीमदभागवत,महाभारत ,हरिवंशपुराण ,ब्रह्मवैवर्त जैसे किसी भी ग्रन्थ में राधा नाम की किसी स्त्री का कोंई नामोउल्ल्लेख भी नही हैं । दरअसल पंद्रहवे शतक में जयदेव कृत गीतगोविंद में
प्रथम बार राधा का आगमन हुआ । गीतगोविंद की लोकप्रियता को देखते हुए अन्य कवियों न राधा कृष्ण के प्रेम कि कविताये रच दी और श्री कृष्ण और राधा प्रेमी प्रेमिका के रूप में भारतीय जनमानस में अवतरित हुए ।
इसी प्रेमी प्रेमिका की कविता के चलते भगवान श्रीकृष्ण की छवि किसी रसियाँ छलिया नायक की तरह हुई ,राधा तो उनकी प्रियतमा बना ही दी गई और अन्य गोपियो के साथ भी वह रास रचाते ,छलिक प्रेमी की तरह दर्शाए गाये ।
राधा का शब्दश:अर्थ कहे तो रा याने प्राप्ति और धा याने मोक्ष ,राधा अर्थात मोक्ष के लिए लालायित जीव ,कृष्ण अर्थात परमात्मा जो उस जीव को जीवन मृत्यु के चक्र से मुक्ति या मोक्ष दे सके । इस तरह देखे तो गोकुल की हर गोपिका जो कृष्ण से अत्यधिक प्रेम करती थी वह राधा हुई ।(संदर्भ :युगंधर )

वह प्रेम किसी नायक नायिका का प्रेम नही था बल्कि कहानी ,कथा और कविताओ से परे ,जो शब्दों में नही ढाला जा सकता वह अत्यन्त ऊँचा और पवित्र प्रेम था ,जब कृष्ण गोकुल में थे तो महज कुछ साल की उम्र थी उनकी ,और गोपिया जो नटखट कान्हा के प्रेम में पागल हो रही थी,काफी बड़ी थी उनसे ,अत:उनका प्रेम वात्सल्य ,ममत्व ,बंधुत्व ,सखत्व लिए श्रेष्ठ प्रेम था .जिसे कोंई भी नाम नही दिया जा सकता ।

हम अक्सर प्रेम को कोई नाम देना चाहते हैं ,वह या तो माँ पुत्र का हो ,भाई बहन का हो ,पिता पुत्री का हो ,पति पत्नी का हो या कोंई और नाता हो । जबकि प्रेम, प्रेम हैं. वह रिश्ते नाते भी निभाता हैं और कभी कभी उससे उपर उठ कर भक्ति का स्वरूप भी ले लेता हैं ,प्रेम वह भी होता हैं जो एक मनुष्य दुसरे मनुष्य से करता हैं ,प्रेम वह भी होता हैं जो व्यक्ति अपने आदर्श से करता हैं , प्रेम वह भी होता हैं जो स्रष्टि के हर जड़ चेतन से किया जाता हैं ।

हमें दुःख होना चाहिए की हमने अपने ही आदर्श कृष्ण के प्रेम के साथ उसकी प्रतिमा को भी बदनाम किया .जरुरत हैं की हम प्रेम के सही अर्थ को समझे । संत कबीर न युहीं नही कहा " ढाई आखर प्रेम के पढ़े सो पंडित होय

Thursday, February 5, 2009

खुदा की उम्र यहीं होगी तक़रीबन .......................

वह रास्ते पर चलती जा रही थी ,राह में मिलते हर इंसान से बोलती बतियाती ,हँसती हसाती ,इठलाती बलखाती चली जा रही थी । हमारे आपके लिए वह सड़क होगी ,जहाँ शांति से चलना ,धीरे बोलना ही सभ्यता में आता हैं ,पर उसके लिए वह खुली हवा में साँस लेने का मौका था ,शाम के सुंदर मौसम में आनंदित होने का अवसर था,जीवन को भरपूर जीने का तरीका था ।

मिलने वाला हर इंसान उससे मिलकर खुश था ,अपनी सारी परेशानिया ,दुःख ,मुसीबते ,भूल चुका था , कोई उसे टॉफी देता ,कोई खिलौना । रंग बिरंगे गुब्बारे लेकर जब गुब्बारे वाला आया तो दो रुपये में चार गुब्बारे देकर, धुप में चल कर ;पेट भरने की जद्दोजहद का गम भूल कर,चेहरे पर असीम मुस्कराहट भर कर गया ।

आलू चिप्स का एक छोटा सा पेकेट पाकर वह अत्याधिक संतोष से मुझे देखकर मुस्कुराती जा रही थी ,मानों सारे जहाँ की खुशिया मैंने उसके कदमो में बिछा दी हो ।सदा खी खी खी खी करते हुए बिन बात हसँते रहना,कुछ बोलना न आते हुए भी अपनी तोतली जुबान से ज़माने भर की कहानियाँ बताना ,और अंत में वही मीठी सी हँसी ...................

मैंने पूछा "अरु क्यो इतनी खुश हो ?ऐसा क्या पा लिया" ?

यही होता हैं अक्सर ...हम खुशी का कारण पूछते हैं । खुशी के लिए कारण ढूंढ़ते हैं । हमें हँसने, गाने, गुनगुनाने के लिए कोई वजह चाहिए होती हैं । इसलिए शायद हम खुश नही हो पाते,ज़माने भर की खुशिया पाकर भी वह खुशी नही पाते जो हमारे अंतरमन को और संसार को खुशियों से भरदे ।

हम मंदिर जाते हैं ,मस्जिद जाते हैं ,चर्च भी जाते हैं ,हर देवस्थान पूज डालते हैं ,लेकिन शांति कहीं नही मिलती,क्योकि हम वहां भी अपनी मुसीबतों का पिटारा साथ ले जाते हैं ,देवता की मूर्ति देखकर और भावुक हो जाते हैं । लेकिन जब हम किसी बच्चे का चेहरा देखते हैं तो शायद किसी देवी देवता के दर्शन कर लेने पर नही मिलती ,इतनी शांति हमें मिल जाती हैं ,क्योकि वह इच्छा ,अनिच्छा ,आशा ,अपेक्षा ,सुख ,दुःख ,स्वार्थ ,आकांक्षा सबसे परे होते हैं । कुछ भी नही पता होता सिवाय इसके की वह जी रहे हैं ,उन्हें हर क्षण का आनंद उठाना हैं ,उन्हें हँसाना हैं और बस हसँते जाना हैं ।

कुछ दिनों पहले अनुराग जी ने एक पोस्ट में पूछा था ,वैसे खुदा की उम्र क्या होगी तक़रीबन ?
http://anuragarya.blogspot.com/2009/01/blog-post.html

आज मेरे पास उनके प्रश्न का उत्तर हैं, खुदा की उम्र होगी तक़रीबन .................यही कोई दो - चार -पॉँच साल या कुछ महीने .................................

Wednesday, February 4, 2009

अहं ब्रह्मास्मि .......लॉटरी सिस्टम तय करता हैं आपके बच्चे का भविष्य .

सुबह से ही मेरे घर में उत्सव जैसा वातावरण था,पतिदेव जो कभी ८ बजे से पहले सोकर नही उठते ,उस दिन सुबह ५ बजे ही उठ गए . सुबह सुबह अख़बार पढ़ना चाहे सारे विश्व की आदत हो लेकिन मैं ऐसा भूल कर भी नही करती ,आख़िर अख़बार उठाते ही खून,हिंसा अत्याचार की खबरे पढ़कर क्यों अपना मन ख़राब करू ?लेकिन उस दिन सबेरे सबेरे चारो पांचो अख़बार पढ़ लिए ,न्यूज़ भी देख ली । आख़िर वह दिन हमारी जिंदगी का बहुत महत्वपूर्ण दिन था ,हम पहली बार अपनी बेटी को स्कूल में दाखिला दिलवाने के लिए इंटरव्यू देने जा रहे थे ,बेटी ने तो इससे पहले ही दोनों इंटरव्यू सफलता पूर्वक दे दिए थे ,शहर के नामचीन और बहुत बडे विद्यालय ने उसे विद्यालय में दाखिला देने के काबिल भी घोषित कर दिया था ,अब हमारी बारी थी ,स्वयं को उसको पढाने के काबिल माता पिता सिद्ध करने की ।


वैसे तो पुरा विश्वास था हमें की हम इस इंटरव्यू को सफल बनायेंगे ,क्योकी हम दोनों ने ही उच्च शिक्षा ग्रहण की हैं ,पतिदेव भी अच्छी कंपनी में ,अच्छे ओहदे पर काम करते हैं ।

खैर नियत समय से १५ मिनिट पहले हम विद्यालय पहुँच गए ,विद्यालय की प्रिंसिपल साहिबा हमारा इंटरव्यू लेने वाली थी ,जिसे उन्होंने बडी कलात्मकता से अभिभावक परिचय समारोह का नाम दिया था ,वह किसी फोटो कार्यक्रम में वयस्त थी। हम लोग करीब १ घंटा उनका इंतजार करते रहे ,इतने समय में अभिभावकों की खासी भीड़ विद्यालय में जमा हो गई ,घंटे भर बाद एक -एक कर प्रिंसिपल साहिबा ने अभिभावकों को मिलने के लिए अपने कक्ष में आमंत्रित किया ,हर एक को मिनिट के अंदर बडे प्यार से विदाई भी दे दी । हम समझ नही पा रहे थे की इतनी जल्दी प्रिंसिपल साहिबा ,अभिभावको के बारे क्या जान पा रही हैं ,खैर हमारी बारी आने पर प्रिंसिपल से मिलने उनके कक्ष में गए ,बडे प्यार से उन्होंने हमें बिठाया ,मुझे पूछा "अच्छा तो आपने अभी अभी संगीत विषय में पीएचडी की हैं" ?पतिदेव से भी इस तरह से दो तीन सवाल पूछे और हमें विदा दी ।

हम बडे खुश थे और विश्वास भी हो गया था की बस अब इस विद्यालय में हमारी बेटी का दाखिला हो जाएगा ,नियत दिवस पर विद्यालय में भरती किए गए छात्रों की सूचि देखने मैं पहुची ,चार पॉँच बार पुरी लिस्ट पढने के बाद भी आरोही का नाम कहीं नही दिखा

रास्ते भर सोचती रही की पतिदेव को कैसे बताऊ ,वो बहुत दुखी हो जायेंगे । खैर उन्हें बताना तो था ही बता दिया ,उस दिन से लेकर तीन दिन तक हम सोचते रहे की हमारे बोलचाल में ,वह्य्वार में ,शिक्षण में ,घर की आर्थिक वयवस्था में प्रिंसिपल साहिबा को क्या कमी दिखी की आरोही का दाखिला उस विद्यालय में नही हो पाया ,हम दोनों दुखी थे । इस कारण नही ,की उस विद्यालय में आरोही का दाखिला नही हुआ ,बल्कि इस कारण की हमारी वजह से आरोही को उस स्कूल में दाखिला नही मिला

अलबत्ता हम दोनों ने तय किया की प्रिंसिपल साहिबा से पूछेंगे जरुर की उन्हें हमारे शैक्षणिक स्तर ,आर्थिक स्तर में कहाँ कमी दिखी . ताकि अगले किसी विद्यालय में इस घटना की पुनरावृत्ति न हो ।

मैं अगले दिन विद्यालय पहुँची और कहा की" प्रिंसिपल से मिलना हैं "।
रिसेप्शनिस्ट ने पूछा " क्यो किसलिए "?
बच्चे के विद्यालय में दाखिले संबंध में ।
जो लिस्ट लगी हैं वह फायनल हैं ,आप प्रिंसिपल से नही मिल सकती ।
देखिये मैं उसका दाखिला नही करवाना चाहती ,बस जानना चाहती हूँ की किस कारण से दाखिला नही हुआ ?
उसका कोई कारण नही हैं ।
कुछ तो कारण होगा ।
कहा न ,कोई कारण नही हैं ।
अरे ,पर आपने भी तो विद्यालय में भरती किए जाने वाले बच्चो का चुनाव किसी आधार पर किया होगा न ?
नही कोई आधार नही ।
मैं जानना चाहती हूँ की हमारे इंटरव्यू में कहाँ कमी रह गई ?मुझे प्रिंसिपल से मिलना हैं ।
कोई कमी नही रह गई इंटरव्यू में ,बच्चा भी होशियार है ।
तो माता पिता शायद नही ?मैंने कहा ।
नही ऐसा नही हैं ?
तो फ़िर क्या कारण हैं ?
कुछ भी नही ।
बच्चो का दाखिला किस आधार पर करते हैं ?
कोई आधार तय नही हैं ,कुछ लॉटरी की तरह होता हैं
लॉटरी की तरह!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! ?
हाँ वैसा ही कुछ ।
मैं प्रिंसिपल से मिलना चाहती हूँ ।
आप नही मिल सकती ।
क्यो ????
नही ।

इस बीच मेरी ही तरह प्रश्न लिए कुछ और माता पिता भी वहाँ एकत्रित हो गए . सबने मिल कर विशेष आग्रह किया ,घंटे भर इंतजार करने को भी तैयार हो गए ,तब जाकर प्रिंसिपल साहिबा मिलने को तैयार हुई ।
मैंने जाकर बडी विनम्रता से अपने सवाल दोहराए ।

मेरे आश्चर्य की सारी सीमाए समाप्त हो गई जब प्रिंसिपल साहिबा ने भी यही जवाब दिया की हम लॉटरी सिस्टम की तरह ही किसी सिस्टम से बच्चे विद्यालय में दाखिला देने के लिए चुनते हैं
मैंने गंभीर होकर पूछा क्यो?
जवाब मिला इतने विद्यार्थीयो के फॉर्म आते हैं ,किसे चुने किसे नही सभीके माता पिता उच्च शिक्षा प्राप्त ।५० फॉर्म चुन कर लॉटरी करते हैं । आप ही बताये ,क्या आधार रखे .आपको विद्यालय के निर्णय पर विश्वास करना चाहिए
मैंने कहा की फ़िर आप सौ में से ५० फॉर्म चुनने के बजाय १५ ही चुने जिन्हें आप वाकई दाखिला देने के काबिल समझते हैं । परिवार की आर्थिक स्थिति ,शिक्षण आदि बातो को अगर आप आधार नही मानते तो इतने इंटरव्यूस की क्या जरुरत हैं ?
इस बार वह निरुत्तर थी . मैं धन्यवाद कह कर वहाँ से चली आई .
मेरी एक सहेली से जो एक बडे विद्यालय में बडे ओहदे पर हैं ,पूछने पर पता चला की सिर्फ़ उसी विद्यालय में नही बल्कि अन्य नामी विद्यालयों में भी इसी तरह से बच्चो को दाखिला दिया जाता हैं .
मैं सोचने लगी की यह हमारे बच्चो के भाग्य विधाता स्वयं को "अहं ब्रह्मास्मि "कह कर हमारे बच्चो के भविष्य से खेलते हैं ,शिक्षा का कैसा स्वरुप हैं यह ? आम इंसान अपने बच्चो को ऊँची फीस देने की तैयारी रखकर भी अच्छे विद्यालय में नही पढ़वा सकता ,यह कैसी विडम्बना हैं ?
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