Monday, March 19, 2012

या चिमण्यांनो परत फिरा ग़....

एक छोटा सा आँगन  और आँगन में बिखरे कुछ चावल के दाने ...फुर्र र रर .. से उड़ कर आती  फुदकती इठलाती एक छोटे से दाने को मुँह में उठा हवा में पंख फैलाती सामने वाले पेड़ पर बने  छोटे से आशियाने में छुपती छुपाती वह ..उसके आने से हम बच्चो के चेहरों पर बासमती चावल के दानो सी खिली खिली मुस्कान आती ,उन के पीछे दौड़ कर लगता इन्ही की तरह फर्र र र ..से उड़ कर किसी दिन हमारे सपनो को  छू लेंगे हम..


वह हमारी सखी संगिनी थी ..बिन बुलाये ही हमारे आँगन में आ जाती और इंतजार करती की उसे कोई भरपेट खाना खिला दे ..कभी कभी  इस जबरदस्ती के आतिथ्य पर हम कुछ तुनक से जाते ,क्यों दे इसे हम खाना ??? पर कभी किसी सवेरे उठते ही अगर वह नहीं आती तो मन कुछ उदास हो जाता ..वह क्यों नहीं आई ??फिर कुछ चावल ,बाजारी के दाने आँगन में अनायास ही बिखर जाते हमसे और गालो पर हाथ रखे आँगन के एक कोने में बैठ होता रहता उसका इंतजार ...


चिड़ियाँ ...और उसकी चहचहाट ....दिन का अभिन्न अंग हुआ करती थी ...छोटी छोटी सुन्दर सुन्दर चिड़ियाँ मुझे हमेशा से ही प्रिय रही हैं ...कल परसों जब वापस उसी आँगन जाना हुआ तो उनकी नामौजूदगी का सूनापन कुछ अखर सा गया मुझे ..माँ चिड़ियाँ क्यों नहीं आ रही ? "नहीं रे अब नहीं आती चिड़ियाँ "


जिस चिड़ियाँ ने बचपन का पहला गीत सिखाया ,हमें अनेकता में एकता का पाठ सिखाया ,पहली आवाज़ सुनाई,बचपन के सपनो को पहले पहल स्वपन दिए ,जिसने बताया किस तरह एक छोटा सा प्राणी दिन भर उड़ उड़ कर अन्न  के दानो को बिना थके इकठ्ठा करता हैं और पहला पहला निवाला अपने बच्चे के मुँह में डालता हैं ,कितनी ही सुबहों को जिसने अपनी चहक से सुबह का सम्मान दिया ..इस छोटे से प्राणी के कितने उपकार हैं हम पर..
http://www.youtube.com/watch?v=R-tTOJ1RvUY


हम मनुष्य ..एक बार फिर बधाई के पात्र हैं ..कभी नहीं सोचते हम स्वयं के आलावा किसी और के बारे में फिर भी मनुष्यत्व की बातें करते हैं ...इन नन्हे जीवो की अचानक हो रही गुमनामी का कारण भी हमारी ही स्वार्थपरता हैं ..शहरीकरण ..बढ़ते मोबाईल टॉवर ,प्रदुषण .
आस पास की सुन्दरता सुन्दर जीवो को हम ही नष्ट कर रहे हैं ...धिक्कार हैं हम पर ...




कितना अच्छा लगता अगर आज मेरे घर की बालकनी में चिड़ियाँ आती उन्हें देख खिलखिलाती मेरी बेटी .कहती माँ चिड़ियाँ कितनी प्यारी हैं ...

इस प्यारे से स्वार्थ के लिए अपनी ही धुन में बढ़ते हमारे स्वार्थी कदम एक बार उन सब के बारे में भी तो सोच सकते हैं जिन्हें हमारी ही तरह ईश्वर ने बनाया हैं ..इतने काबिल हैं हम की तमाम तरह की मशीने उपकरण बना रहे हैं ...न जाने कितना तकनिकी विकास कर लिया हैं हमने ..क्या हमसे यह सच में मुमकिन नहीं हैं की अपने विकास के साथ साथ हमारे इन संगी साथियों के अस्तित्व की रक्षा के बारे में भी कुछ प्रयत्न करे ?
क्या इतना कठिन हैं यह की कुछ ऐसा करे की हम भी आगे बढे पर हमारे आँगन न सही बालकनी में ही कुछ चिड़ियों का डेरा हो,हमारे घर में हमारे साथ इनके भी परिवार का बसेरा हो ?




नीड़ न दो चाहे टहनी का आश्रय छिन्न भिन्न कर डालो ..लेकिन पंख दिए हैं तो आकुल उडान में विघ्न न डालो ...


 नीड़ तो छीन ही लिया हमने,अब मन आकुल हैं मेरा उनकी उड़ान देखने के लिए ..छोटे से पंखो से पुरे आसमान को समेटने का उनका जज्बा देखने के लिए ..पता नहीं क्यों पर दो आसूं उमड़ आये हैं ..मन उस  मराठी गीत की वही पंक्ति पुन: पुन: दोहरा रहा हैं ...या चिमण्यांनो  परत फिरा ग़....








एक चिड़ियाँ अनेक चिड़ियाँ
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