Tuesday, December 27, 2016

अनुभूति....

किस चोले को ओढ़ जी रही हूँ मैं ,एक साध्वी सा यह भगवा चोला ,कौन कहता हैं मैंने भगवा नहीं पहन रखा ?

यह मेरा भगवा ही तो हैं ,एक रंगी ,जिसमे कुमकुम लाल रंग का अलग से छिटकाव नहीं ,यह भगवा ही हैं ,जिसने सूरज की रोशनी से उभरे ,गहरे पिले रंग को स्वत; की मटमैली चादर में छुपा लिया हैं ,यह भगवा ही हैं ,जिसने अपने अंदर एक ज्वार को दबा लिया हैं।
न जाने कितने रंग हैं मेरे ,खुद से अपरिचित ,कही कुमकुम का गहरा लाल ,कही धूल माटी में खेलते बच्चो सा सुखद ,अनूठा भूरा। कही शांत,अनोखा ,अद्वितीय नीला। कही नव अंकुरित पर्णो सा हल्का ,सुलज्जित हरा ,कही अनुभव की बरखा में नहाये बरसो से अपनी जगह पर डटे अश्वत्थ वृक्ष के पत्तो का सा गहरा हरा। कभी पंछियों के कलरव से भरे स्वयं में तृप्त ,परम विस्तारित आसमंत सा गहरा नीला। कभी शारदीय शीतलता की दुग्ध आकाश गंगा सा मेरा रंग शुद्ध ,चमकीला शुभ्र-सफ़ेद। कभी हरिद्रा के लेप सा गहरा पिला , कभी गर्व से दीप्त विजयिनी सा सुनहरा।

मेरा सम्पूर्ण अस्तित्व हिल रहा हैं ,समुन्दर के अंदर आये उछाल सा।  लगता हैं किसी झूले की सवारी  पर बिठा दिया गया हैं मुझे , मन ,सर ,प्राण सब हिल रहे हैं ,मेरे अस्तित्व और अब तक के मेरे विश्वासों पे प्रश्न चिन्ह लगा रहे हैं।

प्रश्न यह नहीं की क्या हो रहा हैं ? प्रश्न यह हैं, कि मैं क्या हूँ ? आने वाली आंधी आती हैं और मेरे स्वयं के बारे में सारी धारणाओं पर प्रश्न चिन्ह लगा जाती हैं।

स्वयं को परिभाषित करना नामुमकिन हो गया हैं ?मैं कौन हूँ ?

 शायद ..  मैं बदलाव हूँ।  ठहराव या रुकाव नहीं ,सच भी नहीं झूठ भी नहीं ,नीति नियम धर्म कुछ नहीं ,मैं... मैं  शायद अनुभूति हूँ। जो हर पल स्वयं को ही नए रूप,नए विचारो  ,नए विश्वासों के साथ अनुभूत कर रही हैं। मैं कोई नाम नहीं , कोई जाती ,कोई संज्ञा नहीं,धर्म भी नहीं ।

  मैं हास्य हूँ ,कुछ अर्थो में रुदन भी , मैं भक्ति हूँ ,करुणा हूँ,क्रोध हूँ ,आनंद हूँ।  मैं चंचल हूँ ,सतत गतिमान भी।  जीवन मेरे लिए हर पल नए रूप रंग ले आता हैं ,कभी मुस्कुरा देती हूँ ,कभी गुमसुम हो जाती हूँ।

दूर पहाड़ो पर , आज भी मुझे लगता हैं की वो मेरा इंतज़ार कर रहा हैं।  शायद यहाँ तो बस ये चोला हैं ,मैं वही रहती हूँ ,उस पहाड़ पर , स्वप्नों की सप्तरंगी दुनिया में ,जहाँ वो हैं और मैं हूँ ,उसने पहने उस मोरपंख में मेरे मन में पंख पसारे सारे रंग विराजमान हैं ,शायद इसलिए वो मेरी याद में मोरपंख लगाए हैं। उसके सुरो में मेरे अंतर के सारे सुर विद्यमान हैं ,इसलिए वो बांसुरी होठो पे लगाए हैं।

उस झूले  की डोरे तो हैं पर कोई आधार नहीं , वह निरालंब झूला ही मेरा आलंब हैं। स्वप्न परबत के आंगन  में पड़े उस झूले पर राधा कृष्ण विराजमान हैं ,राधा रूप में मैं हूँ या स्वयं कान्ह रूप में मैं हूँ ? मुझे ज्ञात नहीं।
 बस मैं हूँ वही कही। इस दुनिया से मेरा शायद कोई नाता नहीं ,या कहूँ मैं यहाँ हूँ ही नहीं। मेरी आँखे उस पठार की चोटी पर जा चिपकी हैं ,शायद मेरा कान्ह उस पहाड़ से उतर मेरा हाथ थामने आ जाये।  मांगती हूँ की कही कोई दुनियां हो जहाँ सदियों से कालापानी की सजा पा रहे नारी मन को मुखरित होने की छूट हो।  जहाँ शास्त्रो और शास्त्रीयता का दिखावा न हो ,बस जीवन को जीने की इच्छा और स्वतंत्रता  मात्र हो। जहाँ अपने अस्तित्व को प्रमाणित करने के लिए , भौतिक वस्तुओ की नहीं मात्र मानवीयता की जरुरत हो।

कभी कभी लगता हैं दूर आकाश में उड़ते उस विमान के पंखो पर बैठके दूर बहुत दूर चला जाये ,इतनी दूर जहाँ से  इस भौतिक जगत का कोई वास्ता न रहे ,जहाँ सिर्फ शांति हो ,एक मधुर गीत हो ,खुली हँसी हो।  जहाँ नदियां ,पहाड़,वृक्ष ,प्राणी सभी मित्र हो और मैत्री में कोई स्वार्थ न हो। जहाँ उम्र के अंतर न हो , न नर नारी का भेद , जहाँ कलुषता न हो ,कृपणता न हो ,जहाँ जीवन का अर्थ सिर्फ सच्चा आनंद हो ,खरा सा निष्पाप सा प्रेम।

प्रेम जो कभी वृन्दावन में था ,कभी गोकुल के हर आँगन द्वार पे।

कौन कहता हैं कृष्ण चले गए हैं , वो अपने हर रूप में मेरे अंदर विद्यमान है।
कहते हैं अर्जुन को उन्होंने ही दिव्य रूप के दर्शन कराये थे ,जब अपने अंदर जब  कोटि-कोटि समुद्रों की हलचल,नदियों की झिलमिल ,पवन की गति ,बुद्ध की शांति , बालको सी शरारत वह मन्त्र मुग्ध सरल हँसी , कभी काली की शक्ति,प्रेम और भक्ति महसूस करती हूँ तो लगता हैं ,कृष्ण मेरे अंदर ही हैं ,अपने हर रूप में विराजित। कृष्ण मेरा ही रूप।

शून्य भाव से किनारे पर बैठ जब सागर को निरंतर देखती रहती हूँ तो लगता हैं मेरा मन ही सागर हैं ,जिसके अंतर में मेरी सारी स्मृतियां विराजमान हैं ,कही मोती -  रत्नों के रूप में ,तो कोई पानी में जीती मत्स्याओं के रूप में ,कोई जल में  निमग्न ज्वालामुखियों के रूप में ,कोई मस्तिष्क की कठिनतम रचना शंख के रूप में ,सागर को भी उसका अंत कहाँ पता हैं  ? वो तो केवल विस्तार हैं ,मेरा मन ...  भी तो  केवल विस्तार हैं।  भौतिक जगत के लिए वह विस्तार , लहरो के रूप में किनारे तक आता हैं। ऊँचे - ऊँचे उछाल खा सागर तट पर आती लहरे ,जैसे मेरे भाव ,कभी आनंद ,कभी रुदन ,कभी दोनों का संगम। कभी कभी कोई याद सिंपलों के रूप में तट तक चली आती हैं ,दुनिया उसे अच्छे/बुरे नाम दे देती हैं ,पर मेरे लिए हैं वो केवल मेरे मन का विस्तार !

मैं नीतिनियमो की कोई पुस्तक नहीं हूँ ,न पूर्व लीखित कोई विधान , सही-गलत ,उत्तर -अनुत्तर मैं कुछ भी नहीं ,
मेरा मन स्वयं को अनुभूत करने में निमग्न हैं । हर श्वास के साथ आती - जाती ,समुन्दर की तरह उछाले खाती , चट्टानों को तोड़ती ,खुद टूटती -बिखरती ,गिरती -लहराती ,आँखों को शांति देती ,मन को असीम पूर्णता का भाव देती , जीवन अनुभूति।

मैं मात्र एक अनुभूति।

डॉ. राधिका
वीणा साधिका

Thursday, December 15, 2016

कभी - कभी डर लगता हैं ,की झूठेपन और लालच से भरी इस दुनिया में हम जैसी सच की राह पर चलने वाली ,अंधी होकर समाज के नियमो को सहज स्वीकार न करने वाली ,अन्याय और अत्याचार के खिलाफ अकेले ही खड़ी हो जाने वाली लड़कियां सुरक्षित हैं ? रहेंगी ? लड़की हो डर के रहो ,सुरक्षित रहो और समाज की नज़रो में ऊँची बनी रहने के लिए चाहे तो प्राण भी दे दो ,पर चुप रहो ,सहती रहो ,प्रतिकार मत करो . सजी संवरी सी , हंसती -खेलती एक गुडिया बनी रहो ,जिसे देखते कोई कहे ,बेटी हैं ,बहूँ हैं ,नातिन हैं ,माँ हैं ,घर की इज्जत हैं ,पत्नी हैं .पर कोई यह न कहे की यही वो जो हटके हैं ,औरो से अलग अपनी राह में चलने वाली शक्ति हैं . अब आज ये सब क्यों कह रही हूँ क्योकि ,आज भरे स्टेशन पर एक नाटक हुआ ,एक और मैं थी जो सच्चाई का हाथ थामे बैठी थी ,एक और वह था जिसकी आवाज आसमान को भी फाड़ दे ,और टोन ऐसा की सभ्यता शर्मा जाये .
सुबह के ११:३० का समय ,बैंक से निकल कर स्टेशन पहुचने की जल्दी में मैंने एक ऑटो पकड़ा ,स्टेशन आते ही मैंने उसे तय २० रूपये निकाल कर दिए , मैं आजकल ट्रेन से सफ़र करती नहीं तो मेरे पास कोई पास नहीं था ,जाहिर हैं टिकट की लाइन में खड़े होकर मुझे टिकिट भी निकालना था और मैंने १२:३० बजे का अपॉइंटमेंट मेरी एक म्यूजिक थेरेपी की पेशेंट को दे रखा था .
ऑटो वाले ने २० का नोट देखते ही चिल्लाना शुरू कर दिया " मेडम ५० रूपये होते हैं " मैंने कहाँ भाई मीटर क्यों नहीं डाला ,दुरी के हिसाब से २० ही होते हैं बात भी हुई थी .,वो और गरजने लगा " अरे औकात नहीं हैं तो ऑटो में क्यों बैठते हो ,पैसा दो मेरा आदि "
मैंने कहा भाई ईमानदारी से जो होता हैं वो लो . मीटर से हज़ार रुपया भी होगा तो दूंगी ,झूठा पैसा नहीं दूंगी .
चुकीं मैं जल्दी में थी और उससे बात करने का कोई फायदा नहीं था तो टिकिट लेने चली गयी ,थोड़ी देर बाद वह वहां भी प्रकट हो गया ,मेडम पैसा दो ,औकात नहीं हैं तुम्हारी , और फालतू की बुरी बाते .
मैंने उसे कहा मैं तुम्हारी कंप्लेंट करुँगी ,ऑटो का नंबर नोट किया ,आसपास खड़े लोगो को बताया ,फिर भी उसकी हिम्मत मुझे मेरे पैसे देते हुए कहने लगा " " औकात नहीं हैं ऑटो में बैठने की ,ये रख लो पैसे जाओ वडा पाव खाओ ,मीटर से नहीं चलता ऑटो ,चलो मैं वापस लेके चलता हूँ तुम्हे ,दिखाता हूँ कितना पैसा होता हैं "
सारा स्टेशन तमाशा देख रहा था ,मैंने वापस पैसे उसे थमाये और गुस्से से आगे बढ़ दी .
वहां खड़े लोगो और सिड्को के एक सिक्यूरिटी ऑफिसर ने मुझे सलाह दी की मुझे इसकी पोलिस कंप्लेंट करनी चाहिए . मेरा पास उतना समय नहीं था .मैंने RTO क्लाम्बोली के नंबर घुमाये ,पर सारी लाइन्स व्यस्त !
JPR रेलवे हेल्प लाइन को फ़ोन किया उन्होंने कहा हम आपकी इसमें मदद नहीं कर सकते आप नजदीकी पोलिस स्टेशन जाये .
अलबत्ता !! इस बीच ऑटो वाला भाग चूका था ,मेरे पास उसका नंबर ३८८७ नोट था ,लेकिन पोलिस स्टेशन जाना यानि और २ -३ घंटे बर्बाद करना . मुझे फाउंडेशन पहुंचना जरुरी था ,सो बिना कंप्लेंट किये निकल ली .
खैर आज का मामला तो निपट गया ,मेरी जगह कोई दूसरी सीधी लड़की होती तो ऑटो वाले की चीखती आवाज उसका वो भयंकर अंदाज़ और धमकी सुनके डर के जितना मांगता दे देती ,पर मैं तो मैं हूँ ,अन्याय के सामने कभी सर न झुकाने वाली .
यह कहानी आज की नहीं ,रोज की हैं ,या तो आप अपनी कार से जाओ या कैब से क्योकि ऑटो वाले मीटर डालते नहीं ,घर के बहार जो ऑटो स्टैंड हैं ,वहां कई बार जब आपकी गाड़ी पास न हो ,कैब न मिले ,तो किसी इमानदार मीटर से जाने वाले ऑटो वाले के इंतजार में आधा घंटा भी बिताना पड़ता हैं .क्योकि स्टैंड पे खड़े ऑटो वाले जो मुंह में आये वो पैसे बोलते हैं ,जिस जगह जाने के लिए ३०-३५ रूपये लगते हैं लोगो को वहां पहुचने के लिए ऑटो वालो को ८०-१०० रुपये देने पड़ते हैं ,अगर समय रात का हो तो नाईट चार्जेज के नाम पे दुगुने से भी अधिक राशी वो लोग मांगते हैं .
कुछ लोग बोलते हैं पर ज्यादा कर लोग या तो चुप सह लेते हैं हैं या बस ,कार ,कैब से निकल लेते हैं .
पर मुद्दा यह हैं की यह सब कब तक ? RTO वाले बड़े जोश से कम करते हैं चार दिन ,पांचवे दिन से वहीँ हाल .क्या किया जाये इन ऑटो वालो और इनकी तरह के लोगो का .
शर्म आती हैं मुझे की मेरे देश में इस तरह के लोग अपना राज चलाते हैं और कोई कुछ नहीं कर सकता . उस पर आप लडकी हो तो आपको उनसे कोई भी बात कहने से पहले सौ बार सोचना पड़ता हैं क्योकि प्रश्न आपकी सुरक्षा का हैं .
न जाने वो कौनसी घडी आएगी जब लडकिया अपना स्वाभिमान संभाले सर उठाये जी पाएंगी ,हर बुरी बात का विरोध कर देश के कुछ लोगो को सुधार सकेंगी ,न जाने इस भारतीय समाज में लडकियाँ कब शक्ति बन पाएंगी ................................

Tuesday, June 7, 2016

प्रेम




बरसो बाद मैंने उसे देखा आज ,वो जिसके साथ मैं पली बढ़ी ,जिसे देखते ही मेरे पिताजी की भौहें तन जाती और माँ के  ह्रदय की धड़कने बढ़ जाती ।  न जाने कौन गली से छुपते - छुपाते वो रोज हमारे घर आ जाता ,और उसके आते ही शुरू हो जाता उसे किसी तरह भगाने का उपक्रम । मुझे उससे प्रेम न था ,पर मैं रोज उसके नित नए रंग देखती ,उसके चलने का ढंग ,संगीत की लय पर उसके डोलने का ढंग।  वह लोगो की नज़र में ईश्वर का रूप था ,पर उसका इस तरह घर आना किसी को न सुहाता। उसका डील - डोल  ही कुछ ऐसा था की लोग उससे डर जाते। वह राजा था क्योकि उसकी मान - मनुहार कर उससे बहुत कुछ पाया  जा सकता था। पर उसके घर आते ही उसे डंडे मारके भगाया जाता।

 कितनी स्वार्थी होती हैं न ये दुनिया ! और कितनी विचित्र !!!

आज रास्ते में वह मिला ,बरसो बाद , वही चमचमाता सावला रंग , वही लचीली - शाही चाल , वही शानोशौकत।
पर यह रास्ता मेरे घर का न था।  यह रास्ता था जहाँ पर बड़ी - बड़ी बिल्डिंगस के बीचो - बिच कुछ बस्ती वाले रहते थे। 
मैंने उसे देखा , जी में आया पास लेके प्यार करू ,पर साथ मैं मेरी बेटी थी जो औरो की तरह डरी  हुई थी।  मैं जितना उस मनलुभावन के पास जाती मेरी बेटी मुझे पीछे खिचती।  मैं उसे देखती रही जी भर के ,वह मुस्कुराता रहा।  मेरे मन में विचार आया , क्या इसे आज दिन भर से कुछ खाने को मिला हैं ? भूखा होगा ये और मैं इसे दे भी क्या सकती हूँ। मेरे इस विचार पर मेरा मन जोर से हँसा।  उसने कहाँ बावरी यही प्रेम हैं। मैंने स्वयं से प्रश्न किया मैं इसे भी प्रेम करती हूँ ?? प्रेम ! हां प्रेम !

मेरी बेटी जोर से चीखी माँ सांप हैं वो काट लेगा दूर हट। मेरी तन्द्रा टूटी ,हां वह सांप ही था ,एक छोटा सा नन्हा सांप ,शायद कल का काला नाग। जिससे मुझे कभी डर नहीं लगा वरन जिस पर मुझे प्रेम ही रहा।  

प्रेम जिसे  मैंने अब जाना। 

मुझे लोग बावरा कहते ,बावरा तो बहुत छोटा शब्द होगा , सच कहूं तो मुझे लोग पागल कहते।  पूरी पागल।  क्योंकि मुझे प्रेम हो जाता हर किसी से  . मैं डाल पर लहराते हरे पत्तो से बातें करती ,आसमान से अपने दिल की कहानी कहती ,बादलों पर बैठ कर पीय  के घर जाती। हर तारे के संग नित - नव स्वपन सजाती।  मुझे प्रेम था चंपा ,जूही ,मोगरा के उन फूलों से जिन्हे मैं बागीचे से चुरा -चुरा  घर में सजाती। 

प्रेम था मुझे मेरे प्रेम से ,उन सुरों से जिनके संग बहते - बहते मैं   शिव-लोक पहुँच जाती ,उन स्वर लहरियों से जिन पर डोलती मैं यौवन पर इठलाती।  प्रेम था मुझे मेरी सितार से ,वीणा से ,रागो की रानी माँ शारदा से । 

मैं जब उसके घर से देर तक न लौटती ,मुझे याद हैं मेरे पिताजी क्रोध से लाल -पिले हो जाते और आने वाले कुछ  दिनों तक मेरा घर से निकलना बंद हो जाता। जिसे सारा संसार प्रेम करता हो उसे प्रेम करना भी मेरा अपराध था। पर मेरा मन उसके नाम की धुनि रमाएँ किसी नन्ही बालिका  सा दौड़ उसके समीप पहुँच जाता ,मेरा यह प्रेम न वृक्ष था न कोई जीव ,यह वह पुरुष था जिसके सामान न कोई हुआ न होगा। वह पुरुष जिसके नाम पर एक राजकन्या ने अपना पूर्ण जीवन होम कर दिया  ,जिसके साथ के लिए न जाने कितनी कन्याओं ने संसार भर को ठुकरा दिया ,जिसके प्रेम को पाने के लिए एक राजकुमारी ने अपना घर तक छोड़ दिया। जिसके लिए एक राज रानी ने यह तक कह दिया था की पुरुष तो केवल मेरा नाथ हैं बाकि तो सब यहाँ स्त्रियाँ ही हैं। वह पुरुष जिसे संसार ने पुरुषोत्तम कहा और मेरे मन ने ...... मेरा मन तो उसके नाम की माला जपने में कुछ इस तरह खो गया की मुझे यह तक न पता चला की सालों बीत चुके हैं ,मैं एक बेटी से एक बेटी की माँ बन चुकी हूँ पर न मेरा प्रेम बदला , न प्रेमी। बरसो से रची आस्था की मेहंदी गढ़ कर कुछ यु लाल हुई की मेरे रक्त के कण - कण में बस एक नाम बहने लगा ,श्रीकृष्ण ! श्रीकृष्ण ! श्रीकृष्ण ! 

समय बढ़ता गया ,उस पर मेरा विश्वास भी ,वह मुझे कभी मंदिर में मिलता तो कभी मेरे मन में। मैं भूल गयी थी की ये संसार हैं जिसका सार सिर्फ जीवन जीना  और पाना और बस पाते रहना हैं। 

मैंने देखा प्रेम के नाम पर लोगो को स्वार्थ की पराकाष्ठाएं लांघते हुए,स्वार्थ साधते हुए ,झूठ बोलते ,फ़साते ,रुलाते ,मारते -मरते ,दर्द से तड़पते हुए। मेरे मन ने प्रश्न किया , क्या ये प्रेम हैं ? वह प्रेम जो बस पाना चाहता हैं बस पाना। जिसे देने मैं विश्वास नहीं हैं। मैंने देना सीखा  और संसार ने फिर मेरी आस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाते मुझे मुर्ख  सिद्ध कर दिया। प्रेम जो मेरी आत्मा का विषय था ,किसी और के लिए शरीर की आसक्ति ,प्रेम जो मेरे लिए भक्ति का विषय था औरो के लिए स्वलाभ  की पूर्ति , प्रेम जो मेरे लिए जन्म -जन्म की संगती था किसी के लिए पल भर की अनुरक्ति ,प्रेम जो मेरे लिए शक्ति था औरो के लिए अहंकार की तृप्ति।  मैंने देखा प्रेम के नाम पर युवक युवतियों को मनमानी करते हुए ,सड़कों ,होटलों ,घरों में विचित्र अतिहीन  कृतियाँ करते हुए और उसे प्रेम कहते हुए। मैंने देखा प्रेम के नाम पर अनेक लोगो  को स्वार्थ के सर्पदंश करते और झेलते हुए। नीच कर्म कर उन्हें सत्य -तार्किक और उचित कहते हुए। 

कहते हैं  प्रेम करने वालो को वह किसी न किसी रूप में मिलता जरूर हैं ,मेरे बावरे प्रेम ने कृष्ण को जग भर में ढूंढा ,कभी किसी मित्र में ,प्रेयस में ,माताओ -भगिनियों -सखियों में ,पर मुझे श्रीकृष्ण कही न मिला।  

वह जब भी मिलता मंदिर में मिलता मेरे मन में मिलता और मेरे इस बाँवरे प्रेम पर जी भर के हँसता ,मेरी आत्मा आक्रांत कृंदन करती और वह मेरी इस दशा पर हँस के कहता ,राधिके मैं अब संसार में नहीं हूँ केवल तुम्हारे मन में हूँ। मुझे ढूँढना बंद करो ,मैं न मिलूंगा। मैं क्रोध से झुलस सी जाती पूछती मेरा क्या दोष तुम्हारी राजरानी लक्ष्मी का सा रूप मेरा ,मेरी वीणा में तुम्हारी बंसरी के स्वर ,मेरे नैनो में तुम्हारे दरस की आशा ,मेरे ह्रदय में तुम्हारे प्रेम की पिपासा।
 वह कहता राजरानी तुम कलजुग में पधारी हो ,यहाँ मेरा शासन नहीं सिर्फ स्वार्थ -अहंकार -लोभ का साम्राज्य हैं।  
मैं प्रतितर्क करती ,मुझे बनाने वाले भी तुम रचाने वाले भी तुम और मेरे ह्रदय को प्रेम से भरने वाले भी तुम। मेरा संबंध किसी जुग से नहीं केवल तुमसे हैं। 

एक दिवस तर्क और उत्तर के रोज के झंझटों से वह थक गया और उसने वह आशीष दे ही दिया जिसका मुझे सदीयों से इंतज़ार था ,उसने कहा " मैं तुम्हे एक दिन अवश्य मिलूंगा। पर किस रूप में अभी कह न सकूंगा। "

तबसे यह राधिका उसके आने की सुध में सबसे प्रेम किये जा रही हैं ,कभी किसी पाखी से ,लता  से ,नदियां से ,सागर से ,मोती से ,दरिया से ,बादल से ,पानी से ,आंधी से ,सावन से ,भादो से ,पूनम से ,बरखा से ,बिजुरी से ,फूलों से ,पत्तो से ,राग -ताल आलापों से ,किसी नन्हे बालक में उसे ढूंढती  यह बावरी उसे कभी किन्ही नैनो में उसे खोजती हैं ,किन्ही शब्दों में ,गीतों में ,अनुभवों में ,अगले पिछले जन्म में बस ये उसे खोज ही रही हैं और मार्ग में आती हर वस्तु - स्थिति - व्यक्ति से प्रेम किये जा रही हैं ।
 जानती नहीं की उसे पाएगी या नहीं ,पर  कुछ हैं जो इसने जाना हैं। और वह हैं प्रेम ! सिमा रहित ,स्वार्थ रहित ,नाम रहित ,स्वयं को भूल कर किया जाने वाला प्रेम।  
आज राधिका सिर्फ श्याम से नहीं उसकी निर्मित हर वस्तु से ,वयक्ति से ,सारे संसार से प्रेम करती हैं वह भी सिर्फ और सिर्फ कृष्ण मिलन की आस लिए ,उसका यह प्रेम उन तमाम कहे -सुने प्रेमो से श्रेष्ठ हैं जो स्वलाभ के लिए प्रेम जैसे पवित्र शब्द का ,संस्कारों का ,सद्विचारों का संहार करते हैं। उसका यह प्रेम सच्चे अर्थो में प्रेम हैं ,और उसने कही सुना हैं प्रेम श्रेष्ठ हैं क्योकि प्रेम ही ईश्वर हैं ,और इस राधिका के लिए ईश्वर श्रीकृष्ण।  

प्रेम ही कृष्ण हैं और कृष्ण मात्र प्रेम ........ 






Thursday, April 14, 2016

सागर किनारे दिल ये पुकारे






उतरती साँझ की  बेला थी वह ,कुछ गुनगुनाती सी। पास के बागीचे से उड़कर चिरोंजी के पत्ते और चिरोंजियाँ  हमारे आँगन में बिखरी जा रही थी।  चिरौंजिया ?    वो मावे वाली ?          नहीं ! माँ कहती थी इन्हे मत खाओ ये जहर हैं ! पर हम मानते ही नहीं थे ,चुन -चुन चिरोंजी जैसी दिखने वाली उन हमशक्ल चिरोंजियों को छुप- छुप खाते और खुश होते। बचपन था वो आखिर !! 

उनका घर में न होना ,हमारी स्वतंत्रता का बिगुल होता ,उन्हें जो भी नापसंद था और माँ को जिससे विशेष आपत्ति नहीं थी वैसा सब हम उनके घर में ना होने  पर किया करते। जैसे चददरो  से टेंट बनना और सब संगियों के साथ उस टेंट के अंदर खिलौने खेलना। पाकगृह से नमक,मिर्च ,चावल उठाकर झूठा - झूठा खाना बनाना   पीछे मैदान में पड़ी रेत से टीले बनाना उन टीलों पर चढ़कर खुद को राजा विक्रमादित्य समझना , पीछले आँगन में रखें टैंक  में से  बाल्टी डुबो पानी निकलना और एक दूसरे पर भर - भर फेंकना।  पिताजी की नज़रो में यह सब समय की बर्बादी था ,किताबें और स्वर-वाद्य इतना ही  और बस इतना ही उनकी नज़रों में समझदारी था।

अलबत्ता पिताजी घर पर न होने के समय हम जो कुछ भी किया करते , उस करने में मेरा  कुछ  सुनना भी शामिल था। फिल्म  का  एक गीत, उस उम्र में भी वह गीत मुझे भाता ,उस गीत के माने नहीं जानती थी मैं ,पर जानती थी सागर और सागर का किनारा। उत्तुंग विशाल सिमाविहीन सागर  ..

माँ कहती थी जब कुछ साल भर की थी तब दिन - दिन  भर नीला आसमान यह गाना सुनती  और जैसे ही यह गीत खत्म होता मेरा रोना - धोना शुरू अब सोचती हूँ क्यों सुनती थी मैं ये गीत ? शब्द और सुरों का ज्ञान कहाँ था तब ? तब तो शायद 'माँ खाना दो ' यह वाक्य भी बोलना संभव नही था मुझे।  फिर क्यों ?



आज, सुबह- सुबह कॉफी बनाते वक्त कही पास से एक श्रुति मधुर आवाज सुनाई दी ,वह स्वरमधुरा किसी डाल पर बैठी कुक रही थी ,कान शरीर का साथ छोड़ उस अंजान कोकिला के पास डाल पर विराजित हो गए ,उन्हें धर - पकड़ वापस ले आई। 

स्टेशन पर सैकड़ो मानव शरीरधारियों की भीड़ थी ,गाडी संख्या दो -दो-पांच-पांच की घोषणा बड़े जोरो पर थी ,लोग आवश्यक -अनावश्यक न जाने किन - किन विषयों पर स्टेशन पर ही खड़े हो चर्चा सत्र कर रहे थे ,मानो रेलवे स्थानक नहीं संसद हो। पर  मेरे दोनों कानो ने फिर कहीं और का रास्ता पकड़ लिया ,आँखों ने देखा ,स्टेशन की छत के निचे की ओर  दो चिड़िया  आपस में कुछ कह-सुन रही थी ,मुझे लगा जैसे एक ने दूजी से कहा ,बच्चा कहा गया ? अकेले कहा उड़ा ? मुझे अपने विचार पर हंसी आई।

गाडी में बैठी ,आँखे बंद की ,मन बरसो का सफर पल -पल में तय करने लगा ,अच्छा -बुरा ,ऊँचा - निचा ,कहा -सुना ,देखा -भला सब -सब देखने सुनने लगा मन। उस  सफर में चाँद को घंटो देखता मेरा बालक मन था तो दर्शनशास्त्रियों के शास्त्र लिखान पे टिका करता मेरा मस्तिष्क।  कही धुप थी कही छाँव। कभी आंसू थे ,कभी मनमुटाव ,कभी हँसना -खिलखिलाना, तो कभी संग था सपने सजाना और सब कुछ भूल जाना।  खारघर स्टेशन से पनवेल स्टेशन
का सफर होता ही कितना हैं ,चंद मिनटों का ! मानसरोवर आते - आते रोज देखती हूँ दूर तक फैली हरियाली ,उस पार फैले कुछ पर्वत - पहाड़।
एक विचित्र पेड़ भी देखती हूँ हर रोज, जिसकी डाली  पर पत्ते नहीं बस फूल ही फूल हैं !

जब कॉलेज ख़त्म हुआ लगा , अब पढाई पूरी हो गयी ,फिर जब डॉक्टरेट कर ली तो लगा , अब पढाई पूरी हो गयी ,जब संगीत में अवार्ड लिए लगा ,लगा  संगीत आ गया ,जब लिखने पर वाहवाही मिली सोचा लिखना आ गया। बहुत कुछ आ गया था मुझे !! सोचा दुनिया  जान ली मैंने ,आखिर विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी डिग्री मेरे हाथ थी ,इतना ही नहीं तो कुछ बड़े मान - सम्मान चिन्ह मेरे साथ थे ,कोई भी विषय ऐसा न था जो सीखा -समझा न था। लगा यह संसार मेरा हैं ,जान लिया हैं मैंने इसे  ,खुदको पहचान लिया हैं मैंने।

  पर.....  फिर  बारी आई जीवन जीने की  ,यु तो सब कुछ आता था ,किन्तु कही लगने लगा , कक्षा में सबसे ज्यादा नापास होने वाली ,सबसे बुद्धिहीन बालिका हूँ मैं। जिन किताबो को मैंने घोट के पिया था उनमे मेरे प्रश्नों के उत्तर नहीं थे ,जिन विषयों पर अधिकार सा पा लिया था वह जीवन की परीक्षा के विषय ही नहीं थे ,पढ़ा - पढ़ाया ,लिखा -सिखाया सब वयर्थ लगने लगा ,शास्त्र -दर्शन - विज्ञान कुछ भी काम नहीं आ रहे थे। जिन विषयों में मैंने विद्यालय- विश्वविद्यालय  में सबसे ऊँचा क्रमांक पाया था उनका तो यहाँ कोई उल्लेख  ही नहीं था। किताबों का लिखा -पढ़ा यहाँ तक की गुरु से पाई शिक्षा सब निष्काम हो गयी।  
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अनुत्तरित प्रश्न -निरुत्तर मैं दूर तक फैले विशाल सागर को देख रहे थे, पारावार नहीं था जिसका वह उदधि ,वह अर्णव ,वह समुद्र।

मेरी भावनाएं ,मेरे प्रश्न उस सागर की गहराइयों में उतरते जा रहे थे।

  मैंने पूछा सागर से " तुम तो आपार हो ,विस्तार हो तुम भी क्या मेरे प्रश्नों पर निरुत्तरित रहोगे  ? शांत ,निश्चिन्त ,निष्चल , बने रहोगे ?

उसने कहा मैं जल हूँ ,खारा जल ,नदियां ,चट्टान ,जलधारा,सिप ,मोती हूँ मैं हूँ ,मेरे समक्ष कोई प्रश्न नहीं क्योकि सीमाएं नहीं हैं मेरी। 

मुझे सागर के दर्प पर बड़ा क्रोध आया। मैंने पूछा " मैंने कौनसी सीमाएं बाँधी रे " ?

उसने कहा " विषयों की सीमाएं ,शब्दों की सीमाएं गणितो ,तर्क -वितर्कों की सीमाएं ।  सीमाएं बांधी ज्ञान की ,मान की  ,जश - गान की।
जीवन वह नहीं होता जो सीमाओं से बंधा हो ,किसी विषय का आसरा लिए ,मुख्य धारा से बचते- बचाते  पगडंडी पर चलता जीवन ,जीवन नहीं होता । जीवन वह नहीं होता जो अभ्यास की पुस्तक -पुस्तिकाओं में छपा हो ,किसी गुरु ज्ञानी ने कहा हो। जीवन तो प्रबल झंझावात में असीम विश्वास -शक्ति और  स्वगुणो के संग कूद पड़ना हैं। जीवन विद्या और विषयों को रट्टा  मारके पी जाना नहीं ,नहीं रटे -रटाये प्रशन -उत्तरो को जस का तस लिख मारना हैं।  जीवन तो असीम हैं ,अगाध हैं ,अपरिमित हैं ,यह कोई शब्द -अर्थ ,मात्र एक प्रसंग , एक लहर ,एक उमंग नहीं ,यह संतुलन हैं ,शांति हैं ,अनुभव हैं। यह मात्र ज्ञान नहीं ,विज्ञान नहीं ,सद्ज्ञान नहीं ,यह पुराण या धर्मग्रन्थ नहीं ,यह लिखी - लिखाई ,बरसो से चली आई ,सुनी -सुनाई कोई कथा -कहानी नहीं ,यह एक  कला हैं ,संपूर्ण कला ,बाकि सब कलाएँ और विषय जीवन -कला का अंग मात्र हैं। किताबो और ज्ञान की गुणवत्ता अकाट्य हैं किन्तु सिमित हैं।

सागर ने फिर कहा " तुम सुनती थी गीत वह ,क्योकि तुम्हे असीमितता में विश्वास था ,तुम्हारी आत्मा को विशालता का  आभास था तुम्हारे मन को ज्ञात था संगीत की तरह ही जीवन वृहत है।  स्वर और ताल को कोई  बंधनो में बाँध सका हैं ? वह संसार  में बसने वाले ,हर धर्म ,सम्प्रदाय ,जाती ,राष्ट्र,राज्य ,यहाँ तक की वृक्ष ,पर्वत ,पवन ,जल ,आकाश ,धरणी सभी में प्रस्फुटित हैं बिलकुल जीवन की तरह।  तुम जानती  थी जीवन आदि हैं ,अनन्त हैं ,कुछ सौ बरसो नहीं ,नहीं किसी नाम से जुड़ा हैं जीवन ।आसमान सागर सब असीमित ,विश्व ,संसार  असीमित। फिर जीवन जीने के लिए सिमित विषयों का ज्ञान क्यों ? मेरे किनारें खड़े रह तुम सबसे अनमोल रत्न नहीं पा सकती ,उसे पाने के लिए तुम्हे मेरे अंदर खो जाना होगा ,मेरे अंतर में पलते वृक्ष ,जीव सभी से नाता जोड़ना होगा।   यह आकाश देख रही हो तुम ? रोज न जाने कितने पंछी उड़ते हैं ,कितने सहस्त्र तारांगण इसके आँगन में खिलते हैं ,तुम  क्या मानती हो ? तुम्हारी आँखों की सीमा तक दिखने वाला गगन ही केवल सत्य हैं ? तुम्हारी बुद्धि ,और नयनो की मर्यादा तक सिमित नील नभ ही केवल अस्तित्व में हैं ? एक बार सृष्टि की  विशालता तो देखो. ,अपने आस -पास पलने - जीने वाली हर वास्तु ,हर प्राणी ,हर किट -कंटक ,हर मनुष्य और समस्त विश्व को अपना गुरु बना जीवन के गुर तो सीखो। ."

मैं शांत भाव से समुद्र को सुन रही थी।

पास ही लहरों से खेलता नन्हा सा बचपन दिखाई दिया ,बचपन जिसे यह ज्ञात भी नहीं था की कोई ज्ञान का मानी उसकी बहती नाक और मुंह पे चिपटी रेती देख कर हँस रहा हैं।  मुझे अचानक याद आया ,  मेरा घर और घर में बैठा मेरा बचपन ,बचपन जिसे  अब मैं अपनी बेटी कहा करती हूँ और जो मुझे माँ कहता हैं। असीम शक्ति हैं  उस बचपन में , आठ बरस की उम्र में मुंबई के रहीसी जीवन में झूलता मेरा नया बचपन ,बड़े स्कूल में बड़ा  सा बस्ता लिए ,बड़ी बड़ी बातें करता मेरा नया बचपन। मुझे याद आया कल ही इस बचपन पर क्रोध किया हैं क्योकि उसने किताबो में लिखे बर्ह्म वाक्य को रटना स्वीकार न कर ,टेरिस गार्डन में लगे फूल और फूलों पे बैठी तितलियों को पकड़ना चाहा था।  मैंने खुदको धिक्कारा और स्वयं  को वचन दिया ,किताबों में लिखे सत्य का ज्ञान जरूर करवाउंगी मैं बेटी को ,हर परीक्षा में बिठाउँगी ,सब विषय पढ़ाऊंगी, पर आँगन में जाकर पौधों की गीली  माटी से खेलना ,बादलों के पीछे गिरते ओलो को समेट बूंदों के साथ हठखेलियां करना ,जीवन के हर रूप को समझ उसकी हर  परीक्षा उत्तीर्ण होना जरूर सिखाऊंगी मैं।  मुझे उसे  बड़ी बड़ी डिग्रियां   दिलाके, बड़े से बड़े ओहदे पे बिठा के ,बड़ा -बड़ा पैसा कमवाके ,जीवन के छोटे से छोटे प्रश्न पर अनुत्तरित होते हुए नहीं  देखना ,प्रतिस्पर्धाओं  में जीतते और  यथार्थ में हारते हुए नहीं देखना ,वह वो बनेगी जो वह बनना चाहे ,वह सब सीखेगी जो सीखना चाहे ,वहां जरूर पहुंचेगी जहाँ पहुंचना चाहे।  मेरी इच्छाओं ,इच्छाओं की पराकाष्ठाओं में ,पुस्तकों ,नौकरियों ,डिग्रियों के बंधन में उसे नहीं बांधना ,उसे जीवन देना हैं ,स्वतंत्र ,समृद्ध ,सशक्त जीवन,सचकह और सच्चा और संपूर्ण जीवन। 

बरसो बाद ही सही  आज समझ आया मुझे ,मैं वह गीत क्यों  सुनती  थी !!!!

मैंने सागर की ओर देखा और आनंद मग्न  भाव से किसी सखी की तरह उसके लिए गाने लगी " सागर किनारे दिल ये पुकारे  तू जो नहीं तो मेरा कोई नहीं हैं ".......


Friday, January 29, 2016

जैसे भाव तिहारे


कहते हैं ये संपूर्ण जगत  भाव मात्र हैं ,भाव से बना ,भाव से रचा ,भावों से सजा ,भाव निर्मित भाव -विश्व ।
सूर्य की रौशनी हो ,चाँद और चांदनी हो ,अमावस की कालिमा हो या भादो की पूर्णिमा हो सब कुछ मात्र भाव !
भाव मन ,भाव तन ,भाव ही धन।
नाना रत्नो ,विल्व पत्रो ,पायस से पूर्ण सुवर्ण घट ,मृदंग -वीणा  का वादन , हीरे रत्नो से मंडित सोने के छत्र  यह सब मैं तुम्हे अपने भाव से अर्पण करती हूँ , माना की मेरे हाथ में तुम्हे चढ़ाने के लिए एक गेंदे का पुष्प मात्र ही हैं किन्तु मेरा भाव वृहत हैं। .....
 सुना हैं  मानस पूजा का पुण्य उतना ही हैं जितना इस प्रपंच के साथ की गयी वास्तविक पूजा का।  कलश के मुख में विष्णु ,कंठ में रूद्र और मूल में ब्रह्मा जी का वास हैं इस कलश में निवास करने हेतु सातों पवित्र नदियों का जल आमंत्रित हैं।
मस्तिष्क तर्क करता हैं.......   मस्तिष्क तर्क करता हैं कि  मात्र मन में भाव रख मूर्ति पर सुवर्ण पुष्प चढ़ाने से क्या सच में सुवर्ण पुष्प ईश्वर पर चढ़ जाया करते हैं ? क्या भोजन से भरी थाली सामने रख पानी के छीटों के साथ मन्त्र बुदबुदाते हुए हाथ हिलाने से भगवान  भोग खाया करते हैं ?  हवा में हाथ हिलाने से और  कहने से की रोगी को हमने हीलिंग दी हैं क्या रोगी का रोग दूर हो सकता हैं ? क्या सूर्य की किरणों को भाव मात्र से पकड़कर बीमार शरीर पर फेर देने से क्लीनिंग हो जाया करती हैं ?
कहते हैं प्रार्थना में बड़ी शक्ति हैं पर प्रार्थना करनी किसकी हैं ,जिसे देखा नहीं फकत मन में  भाव धर लिया उसकी ? मन के भाव ने जो छवि मान ली उसकी ?

डर लगता हैं उस खंडहर में जाते हुए , कहते हैं वहां भुत हैं।   माँ कहती हैं भुत -वुत कुछ नहीं होता तुम्हारे मन का भाव हैं बस !  पिताजी कहते हैं  "भित्र्या पाठी ब्रह्मराक्षस " अर्थात जिसके मन में डर का भाव बैठ गया हैं उसके साथ ब्रह्मराक्षस। ये क्या हैं भई ! अगर सब कुछ बस  भाव हैं तो हम क्या हैं ? आप क्या हैं ? वास्तविक दिखने वाला , शरीर धारण करने वाला , हँसने - बोलने वाला सारा जग क्या हैं ?

सुना हैं की मंगोलिया में एक २०० वर्ष के संत मिले  हैं ध्यान में लीन। २०० वर्ष ध्यान में लीन ?  यह ध्यान का कैसा भाव हैं की २०० वर्ष बीत गए  और उन्हें खबर भी नहीं !
शंकराचार्य कह गए ब्रह्मं सत्य जगन मिथ्या।  भाव - विश्व  के लोग कहते हैं भाव सत्य जगन मिथ्या , तर्कशास्त्री कहते हैं प्रत्यक्ष सत्य इतरत्र मिथ्या।
इस सत्य - मिथ्या के झमेले में  हम जैसे मूढ़मतियों का क्या ? किसे माने सत्य और कहे किसे मिथ्या ?

माना की इंसानी मस्तिष्क बहुत चतुर और ज्ञानी हैं ,विज्ञान पर उसकी श्रद्धा और वह हर रूप में विज्ञानी हैं।  किन्तु मस्तिष्क के ऊपर , उससे भी अधिक सयाना और सज्ञान एक तत्व हैं  और वह हैं आत्मतत्व।
सारे जग में अगर कुछ सत्य हैं तो वह हैं आत्मतत्व ,यह आत्मतत्व  जीवधारियों में हैं अजीवधारियों में हैं ,स्थूल में हैं ,सूक्ष्म में  हैं ,शरीरधारियों में हैं ,अशरीरधारियों में हैं  , विस्तार में हैं ,अंतराल में हैं ,अगम -निर्गम -दुर्गम  पर्वत प्रस्तार में हैं। इस आत्मतत्व का कोई रूप नहीं ,गंध नहीं , दर्शन नहीं ,धर्म- सम्प्रदाय ,अनास्था नहीं। यह आत्मतत्व हर एक में विद्यमान , कण में कण विराजमान ,सर्वशक्तिवान और अखंड सत्तावान हैं। क्योकि इसका कोई रंग-रूप- गंध नहीं इसलिए सृष्टि  में जहाँ - जहाँ जो कुछ भी दृशय -अदृश्य ,सहनीय -असहनीय हैं वह सब आत्मतत्व हैं आत्मा हैं , चैतन्य हैं।  यही आत्म तत्व ,जीवआत्म,परमात्म ,ब्रह्मात्म हैं। अब चूँकि इसे देखा-सुना -मिला-कहा -धोया -सुखाया -काटा -पिटा-लटकाया -उलटाया -भड़काया -सुलझाया नहीं जा सकता इसलिए एकमात्र भाव ही  हैं जिससे इसे समझा जा सकता है ,देखा -सुना -सहलाया -बतलाया जा सकता हैं।   इसलिए हम जहाँ कही भी जिस भी भाव के साथ आते -जाते- गुनते -गाते -कहते-रोते -हँसते -बतियाते हैं वही जीवन का सत्य बन जाता हैं ,हम जो भी करते हैं -भोगते हैं -पाते और खोते हैं उसके पीछे युगों -युगो से संजोया हमारा भाव होता हैं। यही भाव हमें मनुष्य बनाता हैं ,जीवन से मोह लगाता हैं ,जीवन से वितृष्णा करवाता हैं और यही भाव आत्मतत्व में लीन हो भवतम हो जाता हैं। भव सागर  भाव - सागर हैं  और भावमय आत्म भवात्म। इसलिए ही शायद संत कबीर कह गए हैं "मन चंगा तो कटौती में गंगा " .
भावों में बहकर प्रेम किया जाता हैं ,भावों में बहकर ही संगीत रचा जाता हैं ,भावों के बंधन में बंधे भावमय ह्रदय से ही जीवन जिया जाता हैं। तभी तो भावों से चढ़ाया अमृत सत्य हैं तो भाव से की गयी किसी की हत्या भी उतनी ही सत्य।

" कारी मूरत में पा गए श्याम नटनागर न्यारे ,मूरत कारी चाहे रही साँचे भाव हमारे " ..........


 डॉ. राधिका 



                                                                                                                           

Tuesday, January 5, 2016

लुका छिपी जिंदगी की 

  
  सुबह का सुंदर समय सड़क के दोनों ओर बहती खारे पानी की नदी और सड़क पर अंधाधुंध बहते वाहन।  गत्यात्मकता ,प्रवाह ,गति। मुंबई नगरी में बसे एक छोटे से शहर की रोज की कहानी और कहानी एक ठहराव की ,वह ठहराव जो हर मुंबईकर को रोज कुछ समय के लिए देवी अहिल्या की तरह पत्थर सा जमा देता हैं।  यह नगरी कभी रूकती ही तो नहीं  ,रूकती नहीं किसी की ख़ुशी में शामिल होने के होने के लिए ,किसी के दुःख में रोने के लिए, अरे ! यह नगरी तो तब  भी नहीं रूकती जब भागती ट्रैन में दौड़कर चढ़ते हुए कोई गिर जाता हैं ,उसकी सांसे सदैव के लिए रुक जाती हैं। पर यहाँ बसने  वाले प्रत्येक को एक बार अवश्य रुकना पड़ता हैं। रुकना पड़ता हैं उस अबोले ,निर्हृदयी ,अपंग के आदेश पर।  वह पंगु हाथ पैर से रहित , जिव्हा रहित ,वाणी रहित ,शब्द रहित होकर भी कुछ क्षणों  के लिए सर्वशक्तिमान ,सर्व सत्तावान बन जाता हैं ,कालचक्र और जीवन की गति वह निशब्द बिना किसी शब्द के कुछ समय के लिए रोक लेता हैं और हर मुंबईकर उसका दास हो थम जाता हैं ,जम जाता हैं।

आज जब कार में सवार मैं मुंबई की गति के ताल में ताल मिलाते अचानक ही रुक गयी तब समझ आया सामने वह हैं ,वह समय संरक्षक ,नियमो का निर्धारक, अविरत गति का संहारक।  वह जिसे लोग यहाँ कहते हैं ट्रैफिक सिग्नल।
मैं मन ही मन कुन्नाई ,बड़बड़ाई ,गुस्साई पर रुकना तो था ही। सो क्षण मात्र में शांत भी हुई ,दाई तरफ मुंह फेर के देखा तो सड़क के उस ओर बड़े - बड़े तम्बू लगे थे पास में बोर्ड था बॉम्बे सर्कस।  
हम्म तो यहाँ  लगा हैं बॉम्बे सर्कस ,रोज पेपर  में चाहे -अनचाहे विज्ञापन देख रही हूँ। मैंने खुद से ही कहा।  
मेरी बेटी रोज पीछे पड़ी हुई हैं ,माँ देखते हैं न और मैं उसे रोज दुहरा रही हूँ बेटा अभी ४ महीने पहले ही तो एक सर्कस  देखा था ,बिलकुल वैसा ही होगा और याद है न माँ कितनी बोर हुई थी। पर वो सुन नहीं रही और मैं उसका मन रखने  के लिए कह दे रही हूँ जायेंगे बेटा जायेंगे। 
आज अनायास जब सिग्नल पर रुकने से सर्कस पर नज़र पड़ी तो मन बोला ,अंदर कौन होगा ? शायद सब कलाकार होंगे ,क्या कर रहे होंगे ? शायद अगले शो की रिहर्सल..... 

कभी सुना था सर्कस वालो की जिंदगी बहुत कठिन होती हों ,मन हुआ कार पार्क करवा सीधा सर्कस के तम्बू के अंदर चली जाऊ और उन लोगो से कहु मैं आपके बारे में जानना चाहती हूँ ,कुछ लिखना चाहती हूँ। पर कम्बख़त सिग्नल ने  तभी आगे बढ़ने का इशारा किया और मैं आगे बढ़ गयी। समझ नहीं आ रहा था की सिग्नल महाशय को धन्यवाद दू या कोसु। 

कार आगे बढ़ी ,ड्राइवर ने स्पीड बढ़ाई और मैंने आँखे बंद कर ली ,स्मृति के किसी कक्ष से एक छवि बाहर आई, उसे देखते ही मन को असीम शांति मिली ,उस छवि के समक्ष रखी सुवासों की सुवास से मन प्रफुल्ल हो गया , वह छवि जिस गृह में विराजित थी वहां गूंजते विविध स्वर -शब्दों से  कान तृप्त हो गए।  मैंने आखे खोली। मन को न जाने कबसे इन्तजार था ऐसे कुछ दिनों का जब मेरा प्रभात उस मनमोहिनी छवि के आलिंगन में हो , उन तेजस्वी नैनों के हवन कुण्ड में ,मैं अपने नयनो का हविष दे दू , उस परम विशाल के हृदयाचल को निहारती मैं लाल गुलाब पुष्प उस पर निछावरती रहु ,उन चरणो पर मैं अपना समय और जीवन वारती रहु ,पर जीवन में आज तक ऐसा एक पूरा दिन मुझे उसके साह्य में नहीं मिला ,जब मैं सारा जग भूल के बस उस आदि जगदंबा के किसी मंदिर में उसका सिर्फ उसीका ध्यान करती रहू। 

 मैंने एक निश्वास छोड़ आँखे खोली ,कार आगे बढ़ी ,प्रसाद स्वीट्स की दूकान पर बहुत से लोगो का जमाव दिखा ,सुबह - सुबह दुकान पर खड़े वे सब समोसा ,कचौरी का लुफ्त उठा रहे थे। घर से आते समय नाश्ते में खाया गाजर का पराठा मुझे उस समोसे की हरी चटनी के स्वाद के आगे निस्वाद मालूम हुआ ,मन उड़ता सा तेरह साल पहले के ग्वालियर में जा पंहुचा ,सुबह के आठ बजे का समय था ,मैं संगीत कक्ष में रियाज़ कर रही थी ,माँ चाय बना रही थी ,भाई -बहन आँगन में खेल  रहे थे, पिताजी कही बाहर  गए थे ।  अचानक पिताजी तेजी से घर में घुसे उन्होंने एक ही बार में हम सबको तेज आवाज दी जल्दी आओ,जल्दी आओ मैं समोसे कचौरी ,जलेबी लाया हूँ। माँ ने सबको थाली में गरमागरम समोसे हरी ,लाल चटनी के साथ परोसे। उन जलेबियों के पाक की मिठास आज तक मैं नहीं भूली ,लेकिन इतने सालो में आज तक ग्वालियर के उन समोसे ,जलेबी ,चटनी को चखने का अवसर भी न मिला। मैं और आरोही जब भी मुंबई की किसी चाट दुकान में चाट खाते हैं मैं हर बार आरोही से कहती हूँ ,आरोही ग्वालियर की चाट के आगे यह चाट पानी हैं। 

अलबत्ता ! कार के पास कुछ धड़कने की आवाज से मैं वर्तमान में आ पहुंची।  हम फिर ट्रैफिक सिग्नल में अटक गए थे ,बाजु में खड़े  स्कूटर पर एक छह  माह का गोरा -गोरा बच्चा मुझे देख कर मुस्कुरा रहा था मानों कुछ कह रहा हो ,उसके पास पांच साल का एक काला - पीला बच्चा एक नाक बहते ,उससे भी अधिक काले ,धूल माटी से भरे छह माह के बच्चे को गोद में लिए खड़ा उस सुंदर गोरे बच्चे की माँ से भीख मांग रहा था।  मन में आया कार से उतरु उन दोनों काले -पीले बच्चो को खीच के कार में डालु ,घर ले जाकर बाथरूम में  रगड़ - रगड़ कर नहलाऊ ,ठीक - ठाक  कपडे पहनाऊ , ढंग का नाश्ता करवाऊ और बड़े को किताबें छोटे को खिलौने दे बिठलाऊ। मेरे मन ने याद दिलाया  की मैं कबसे बच्चो के लिए कुछ ऐसा करना चाहती हूँ  जो इनका जीवन संवार सके। 

मैं आगे बढ़ गयी बिलकुल मुंबई की जिंदगी की तरह पर कुछ छोटी बड़ी इच्छाए मन  में दबी रह गयी।  सिर्फ मेरे ही मन में नहीं ,हम सबके मन में ऐसी कुछ छोटी - बड़ी इच्छाए हैं ,जो जिंदगी को जिंदगी बनाती हैं।  हम सब कुछ करते हैं ,बड़ी -बड़ी बाते,बड़े -बड़े वादे ,बड़े -बड़े काम पर कुछ बाते जिनका नाम जिंदगी हैं ,जो जीवन का उत्साह हैं उन्हें करना हम भूल जाते  हैं वो छूट ही जाती हैं।  और ,कभी ऐसे ही किन्ही बाहनों का सहारा ले लुका - छीपी करती जिंदगी हमारे सामने आती हैं और कहती हैं बस कुछ पल के लिए मुझे भी जी लो। मैंने तो तय कर लिया हैं मैं इस लुका छिपी का खेल इस साल जीत के रहूंगी ,कुछ पल के लिए ही सही जिंदगी जी के रहूंगी।  

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