Monday, December 27, 2010

एक प्यार भरी पोस्ट

कभी कभी अचानक कुछ अनुभूत होता हैं ,कहीं से कुछ आवाज आती हैं और आपका दिल कह उठता हैं बस यही तो हम चाहते हैं.


किसी को समझना जितना आसान हैं उतना ही कठिन होता हैं अपने आप को समझना अपनी खोज करना ,और कभी कभी अचानक आपको पता चलता हैं की आप यही हैं तो मन ख़ुशी से झूम उठता हैं .कुछ दिन पहले की बात मेरी एक सहेली (जिसे मैं अपनी सहेली मानती हूँ )मुझे मिली ,कुछ देर बाद वह  तो चली गयी, लेकिन मेरे मन  ने कहा "उसकी बातों का  बुरा नही लगा "शायद यही प्यार हैं .प्यार .......!!!!. 


बहुत बहुत घटनाओ के बाद सिर्फ एक बाद समझ में आती हैं वह हैं " प्यार" ...........प्यार  उनसे जो हमसे प्यार करते हैं ,"प्यार" उनसे जो हमसे नफरत करते हैं ,"प्यार" उनसे जो हमारे मित्र हैं ,"प्यार" उनसे जो हमें शत्रु मानते हैं और शायद यही  प्यार हैं जिसे मैं जानती हूँ ,मैं नही जानती की "वसुधैव कुटुम्बकम "क्या होता हैं ?बड़ी बड़ी दार्शनिक किताबे मेरे दिमाग के उपर से निकल जाती हैं?उन पोथी पत्रों को समझने की अपने जीवन में उतारने की भारी भरकम कोशिशे करके थक चुकीं हूँ,संत महात्माओ के वाक्यों को लिख लिख कर उन्हें याद करकर कर हार गयी .पर एकदिन अचानक एक बात समझ आई .वह थी  "प्यार "और लगा  अगर आप सिर्फ प्यार करते हैं ,तो आप दुनिया के सबसे खुशनसीब इंसान हैं.क्योकि सारी दुनिया को प्यार की जरुरत हैं और हमारी जरुरत हैं सबको प्यार देना. "प्यार" ख़ुशी देता हैं ,शांति देता हैं ,आत्मिक संतोष देता हैं और हो सका तो प्यार भी देता हैं .जबसे मुझे प्यार यह शब्द समझ में आया हैं तबसे कुछ और समझने की जानने की इच्छा नही रही .क्योकि बड़े बड़े भारी ग्रंथो का अध्ययन कर मैं  औरो को तो पढ़ा सकती हूँ पर खुदको पढ़ाना नामुमकिन हैं . प्यार स्वार्थ से परे होता हैं ,इच्छाओं अभिलाषाओ से उपर ...हर इंसान से चाहे वह छोटा हो बड़ा हो इंसान होने के नाते प्रेम करना जीवन को सही अर्थ और दिशा देता हैं  और ढेर सारी, सच में ढेर सारी आत्मिक शांति .......
...
मैंने सोच लिया मुझे कुछ नही करना हैं इस आने वाले नए साल में ,करना हैं तो सिर्फ प्यार ,दोस्तों से ,दुश्मनों से ,साथियों से,साथ छोड़ कर जाने वालो से ,संगीत से ,ईश्वर से ,मनुष्य से ,मनुष्यता से और स्वयं से .............


आपने क्या सोचा हैं ?

Friday, September 17, 2010

मालिकायें स्वर




सोसायटी की फेंसी ड्रेस कॉम्पिटीशन  में अरु बनी सरस्वती,और उसने वीणा बजायी भी

और अभी मिली ताज़ा खबर के  अनुसार आरोही को इस प्रतियोगिता में  १ से ५ और ६ से १२ दोनों ग्रुप्स में प्रथम पुरस्कार मिला हैं .गणपति बाप्पा की जय ............
- Show quoted text -
.


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Wednesday, August 11, 2010

दुआए कबुल होती हैं ..........

कभी कभी कोई सुबह अपने स्वर्णिम रंगों के साथ एक सुखद आश्चर्य लेकर आती हैं .किसी सुबह आप जागते हैं रोज रोज का वही दिनक्रम बिताने ,किसी मशीन से यंत्रवत काम करते जाते हैं,पहाड़ सा दिन सामने होता हैं और मन सबसे उब चूका होता हैं .लेकिन तभी कोई ऐसी खबर मिलती हैं जो आपको आश्चर्य और ख़ुशी दोनों एक साथ दे जाती हैं ,ऐसा ही कुछ आज मेरे साथ हुआ.आरोही को स्कूल छोड़ कर आने के बाद जब मैंने कम्प्यूटर ऑन किया ,और आरोही ब्लॉग खोला तो देखा की आदरणीय अविनाश वाचस्पति जी का कमेन्ट आया हैं जिसमे उन्होंने बताया हैं की मेरी पोस्ट "खोये खोये से रिश्ते " http://aarohijivantarang.blogspot.com/2010/08/blog-post.html  आज दैनिक जनसत्ता में छपी हैं .बड़ा अच्छा लगता हैं जब अपने मन की भावनाए लोगो तक पहुँचती हैं ,लोग उन्हें समझते हैं .
 देखिये पेज नुम्बर 4 समांतर "खोये खोये से रिश्ते "
http://www.jansattaraipur.com/

अगर मुझे आप  सभी ब्लोगर्स का प्यार और आशीर्वाद,दुआए  नही मिलती  तो मैं कभी लिख नही पाती मैं आप सभीकी आभारी हूँ .
साथ  ही आभारी हूँ आदरणीय लावण्या जी ,रंजना दी ,अविनाश जी ,अजित दादा ,प्रवीण पाण्डेय जी,संगीता स्वरूप जी ,अभिषेक ओझा जी ,आशा जोगलेकर जी ,अनुराग जी ,डॉ.रामकुमार जी ,आशीष जी ,विनोद शुक्ल जी ,दिनेश राय द्विवेदी जी ,राज भाटिया जी ,अजय कुमार झा जी ,दीपक शुक्ल जी ,धीरू सिंह जी ,ज्ञानदत्त पाण्डेय जी ,पंकज जी ,निर्मला कपिला जी ,समीरलाल जी ,शिवकुमार मिश्र,संजय भास्कर ,अनूप शुक्ल,महेंद्र मिश्र जी  और सभी पाठको और ब्लोगर्स से जिन्होंने समय समय पर अपनी टिप्पणियाँ देकर मुझे प्रोत्साहित किया .

Friday, August 6, 2010

खोये खोये से रिश्ते ...........

मुंबई के वाशी इलाके का रघुलिला मॉल ..शाम के आठ  का समय .चम चम चमचमाती लाइट्स ,धूम धूम धमाकेदार संगीत और खरीददारी करते ,हँसते मुस्कुराते ,गाते ,बर्गर पिज्जा खाते लोग .मुंबई की शाम ....
हर शाम कुछ ऐसी ही ...और ऐसी ही एक शाम में मॉल के एक्सलेटर के पास तीसरी मंजिल पर खड़ा एक रोता हुआ छोटा बच्चा .एक बेसुरी आवाज कानो में गूंज रही हैं ,बिन तेरे बिन तेरे बिन तेरे  कोई .............आने जाने वाले सब उस बेसुरी आवाज की तारीफों के पुल बांध रहे हैं ,कुछ नौजवान ताल दे रहे हैं .पर सीढ़ियोंके पास खड़ा रोते उस दो ढाई साल के बच्चे का व्यथित सुर किसको नहीं सुनाई  दे रहा ,न वहाँ से गुजरते लोगो को न उस बच्चे की माँ को ................
शायद उनकी आँखे भी मॉल की चकाचौंध से अन्धियाँ गयी हैं जो उनके वो बच्चा दिख कर भी नहीं दिख रहा .

  कहते हैं न कलाकार भावुक होते हैं ,वहाँ से गुजरती एक ऐसी ही कलाकार जो रिश्ते में मेरी बहन लगती हैं को वह बच्चा दिखाई दिया  उसने बहुत कोशिश करती हैं की वह बच्चा अपना और अपने माता पिता का नाम ही बता दे ,पर वो अभी ठीक से बोल भी नहीं सकता ,उसे लेकर वह बिग बाज़ार के कस्टमर काउन्टर पर गयी ताकि यह घोषणा करवा सके की किसीका बच्चा खो गया हैं ,लेकिन अपनी चीजों की  लिस्ट और फ्री के ऑफर्स बताने में व्यस्त वहाँ के अधिकारीयों को यह बात बहुत ही तुच्छ जन पड़ती हैं .हार कर मेरी बहन मॉल के सुरक्षा अधिकारीयों के पास गयी  ,इंसानियत की मृत्यु शायद इसे ही कहते हैं जब वो अधिकारी यह कह देते हैं की "यह हमारा काम नहीं हैं ".बड़े प्रयत्नों के बाद मेरी बहन को एक जिम्मेदार पुलिस अधिकारी मिलता हैं जिसके पास वह उस बच्चे को सुपुर्द कर सके .

मुंबई आकर मैंने बहुत सी बाते सीखी और जानी है.लोकल की भाग दौड़ ,समय की बहुत कमी ,मॉल संस्कृति में ढलते लोग ,छम छम छम छ्मछ्माती जोरदार बारिश,पुरे दिन काम करके एक समय का खाना बमुश्किल जुटा पाते लोग ,बेसिर पैर बढती महंगाई ,बड़े बड़े हॉस्पिटल ,उससे भी बड़े अपार्टमेंट्स .........................



इतनी सारी बातों में एक बात और मैंने देखी हैं और सबसे ज्यादा महसूस की हैं ,वह हैं रिश्तो का नाममात्र शेष .जबसे यहाँ आई हूँ एक बात  मन में बार बार चुभती हैं की लोगो से भरी मुंबई नगरी में किसीको अपना नहीं मिलता   कभी कभार मॉल में मिल लेना ,अपने बारे में अत्यंत सिमित जानकारी देना ,सिमित ही जानकारी पाना.जिसे यहाँ के लोग सभ्यता की निशानी मानते हैं ,अच्छी बात हैं की किसीके व्यक्तिगत मामलो में दखल न दिया जाये.पर यहाँ बरसो बीत जाते हैं एक ही अपार्टमेन्ट में सटे हुए घरो में रहते हुए,लेकिन  पडोसी का नाम तक पता नहीं होता.

पता नहीं कैसी जिंदगी हैं  ये .और न जाने कैसी संस्कृति.इसे संस्कृति भी कहाँ जाना चाहिए या नहीं?हम इंसान हैं .कलाकार ,उच्चाधिकारी आदि आदि, सब बाद में .पर पहले हम मानव हैं ,मानवीयता के नाते ही सही एक दुसरे का ख्याल करना ,चाहना ,समय देना भी अगर मुश्किल हैं  तो क्या कहा जाये?

आप ही सोचिये अगर वह बच्चा तीसरी मंजिल पर बनी उन लोहे की सीढियों पर से गिर जाता तो क्या होता ?वहाँ खड़े कुछ इंसान दर्द से भर जाते ,कुछ चुपचाप वहाँ से निकल जाते.हाँ न्यूज़ चेनलो की चाँदी हो जाती उन्हें एक और गरमागरम न्यूज़ मिल जाती .
ज्यदा क्या कहूँ ...बस  यह सब देखकर अच्छा नहीं लगता .

Tuesday, July 6, 2010

वो ........

                      वो ........जो पूरी पागल हैं ,जो बहुत प्यारी हैं ,
                      वो.......... जो मुझे हँसाती हैं,जो मुझे रुलाती हैं .
                      जाने क्या कह जाती  हैं जाने क्या क्या सुनाती हैं ,



 माँ माँ करते,माँ माँ कहते दिन दिन भर सताती हैं .
पर रात की चांदनी जैसे जीवन में उजियारा लाती हैं 
बहती नदी सी कल कल, छल छल दिल को छल सी जाती हैं , मटक मटक कुछ फैलती आँखे ,आँखों में बस जाती हैं

. .
            सुनहली किरणों जैसी जुल्फे यहाँ वहाँ लहराती हैं ,
               आते जाते हर राही का  मन मतवाला बनाती हैं,





कभी रूठती गाल फुलाती मुझे इतना सुहाती हैं ,
सारी दुनिया उस पर वारू क्यों इतना वह भाती हैं ?







बिखेरती  जीवन में वह मेरे सुंदर स्वर्णिम हज़ार  रंग, 
उसके होने से लागे हर रंग इन्द्रधनुषी संग .




 लगता हैं कभी- कभी जैसे सासों संग मेरी वह आती जाती ,
हर धडकन  को ताल बना कर वह नाचती वह बलखाती .
हथेली पर लिए जान मेरी इधर भागती उधर दौड़ती .
गुस्सा कैसे करू मैं ?वह कहती माँ तू बहुत अच्छी हैं लगती .

         
  






मैं यहाँ दिखती हूँ सबको ,पर आत्मा मेरी उसमे अब रहती .

 कोई  जान न पाता फिर भी कैसे बेटी माँ को जीवन देती .

Tuesday, April 6, 2010

क्या ये देशद्रोह नहीं ?(सभी भारतियों से एक अपील )

मुंबई का वाशी इलाका ,शाम के सात का समय.कंधे पर गिटार लिए बड़े उदास मन से मैं घर को लौट रही थी ,ऑटो में बैठ कर घर कब पहुंची कुछ पता नहीं ,पुरे समय मेरा दिमाग सोचता रहा ,कभी सारी बातो के लिए मन में दुःख हो रहा था,कभी अपने आप पर गुस्सा आ रहा था .हुआ कुछ यह था की मेरे यहाँ आने वाले शिष्यों के लिए मुझे गिटार खरीदना था ,मेरे घर से वाशी की यह दुकान सबसे पास पड़ती हैं ,सोचा यही से गिटार खरीद लेती हूँ.दुकानदार से पूछा भाई हवाइयन गिटार हैं ,उसने मुझे कुछ ऐसी नज़र से देखा जैसे मैंने कोई पुरातत्व संग्रहालय में रखी जाने वाली सातसौ साल पुरानी चीज़ मांगली हो .बोला अरे दीदी आप क्या बात कर रही हो ,आजकल ये गिटार बिकती ही कहाँ  हैं ,कोई नहीं बजाता,ये सब तो पुरानी बातें हैं ,मेरे यहाँ वेस्टर्न गिटार इलेक्ट्रोनिक गिटार सब हैं आप वह ले जाईये ,मैंने कहाँ नहीं कोई बात नहीं मुझे हवाइयन  गिटार ही चाहिए .बोला आप उसे बजा कर क्या करोगी ,बेकार हैं ,कोई नहीं सुनता ,सब तो यही म्यूजिक सुनते हैं .आप क्यों सीखना चाहती हो ?कुछ नहीं मिलेगा इंडियन म्यूजिक बजाकर सब यही वेस्टर्न ही पसंद करते हैं .

उस समय न जाने क्यों उससे कुछ बात करने का मन नहीं हुआ .लेकिन बाद में मुझे स्वयं पर ही बहुत गुस्सा आया,दुसरे दिन फिर गिटार खरीदने मैं उसी दुकान पर गयी ,स्वभावत: उस दुकानदार ने वही सब बातें बताई ,पर फिर मैंने उसे अपना परिचय दिया ,उसे बताया की मैं अपने लिए नहीं अपने शिष्यों के लिए गिटार खरीद रही हूँ ,और अगर उसे भारतीय संगीत और उससे जुडी परम्परा ,लोकप्रियता और महानता के बारे में कुछ नहीं पता तो उसे ऐसी बातें करके भारतीय संगीत का अपमान नहीं करना चाहिए .

कल मेरे एक शिष्य के साथ फिर कुछ ऐसा ही हुआ ,वह गया यहाँ के एक बड़े से मॉल में गिटार खरीदने ,गिटार चेक करने के लिए उसने उसे इंडियन स्टाइल से बजाना शुरू किया ,लेकिन दूकानदार ने कहाँ अरे ये तो गलत तरीका हैं ,यह तो सितार बजाने का तरीका हैं ,गिटार तो कभी भी ऐसे नहीं बजता ,अपना टाइम वेस्ट मत करो,वेस्टर्न म्यूजिक सीखो ,सब वही सुनते हैं .ऐसे म्यूजिक को कोई नहीं सुनता ,जबसे ये बात मेरे शिष्य ने मुझे बताई हैं ,तबसे बड़ा गुस्सा आ रहा हैं .

आप जानते हैं मेरे पास हर दिन कम से कम तीन से चार फोन आते हैं ,हर बार वही प्रश्न ,क्या आप वेस्टर्न गिटार सिखाती हैं ?हमें सीखनी हैं .हर बार जब मैं यह पूछती हूँ की आपको वेस्टर्न गिटार ही क्यों सीखनी हैं तो उत्तर मिलता हैं क्योकि सब वही बजाते हैं .

मुद्दा यह नहीं हैं की लोग वेस्टर्न म्यूजिक सीख रहे हैं,उससे भी बढ़कर मुद्दे की बात यह हैं की वो क्यों सीख रहे हैं ?क्या भारतीय संगीत इतना बेकार रहा हैं ,या उसे सीखना वाकई बोरिंग और अत्यंत कठिन हैं ,या उसे सिखने में वाकई इतना ज्यादा समय देना पड़ता हैं जो आजकल देना संभव नहीं हैं .

सच यह हैं की नयी पीढ़ी को भारतीय संगीत क्या हैं यह पता ही नहीं हैं ,बॉलीवुड सिनेमा में पहले जो गाने रागों पर आधारित होते थे,अब गानों में हीरो वेस्टर्न गिटार हाथ में ले कोई इंडियन गाना गाते हैं .मॉल्स में जहाँ तह वेस्टर्न म्यूजिक बजता हैं ,वही दुकानों में बिकता हैं .पहले प्लेनेटेम में जहाँ भारतीय संगीत का विभाग सुंदर केसेट्स और सिड़ीस से भरा रहता था ,वहाँ अब एक दो चुनिंदा सिड़ीस ही नज़र आती हैं .

हम भारतीय हैं ,बड़े आनंद से भारत में रहते हैं ,देश की चुनाव प्रक्रिया में वोट दे दिया तो दिया.कभी देश की दुर्वय्वस्था पर बड़ा सा लेक्चर झाड देते हैं .लेकिन अपने देश की संस्कृति की रक्षा के लिए हम कितने सजग हैं .हम सुबह उठते हैं ,काम पर जाते हैं खाते पीते सो जाते हैं.जो लोग भारतीय संगीत की हानी परोक्ष अपरोक्ष रूप से कर रहे हैं ,उनका विरोध क्या हम कर रहे हैं ?जो लोग भारतीय संगीत के बारे में ऐसी भ्रांतियां फैला रहे हैं ,जो लोग मिडिया और अन्य संचार माध्यमो के द्वारा संभव होकर भी भारतीय संगीत के लिए कुछ नहीं करके वेस्टर्न की धुन बजा बजा कर हमारे युवाओ को भ्रमित कर रहे हैं उनके बारे में हमने क्या सोचा हैं ?क्या ये देश द्रोह नहीं हैं ?हमारे संगीत मुनिजनो ने संगीत के प्रचार प्रसार के लिए अपनी सारी उम्र लगा दी और हम ?

अगर आपको लगता हैं की यह गलत हैं ,आप भारतीय संगीत को पसंद करते हैं ,जाने अनजाने गुनगुनाते हैं ,फिर वह लोक संगीत हो या उपशास्त्रीय ,ग़ज़ल भजन,गीत ,शास्त्रीय कुछ भी ,तो आप वीणापाणी की भारतीय संगीत के प्रचार की  मुहीम का हिस्सा बन सकते हैं.अपना प्रिय संगीत ,आपके आसपास कितने लोग भारतीय संगीत सीख रहे हैं ,इसकी जानकारी ,जो सीख नहीं रहे वो क्यों नहीं सीख रहे इसकी जानकारी ,अगर आपका बच्चा स्कूल में सीख रहा हैं तो वह कौनसा संगीत सीख रहा हैं ,आपके आसपास कौन कौनसी संगीत संस्थाएं संगीत शिक्षा दे रही हैं ,और वह किस तरीके से और क्या सीख रही हैं ,यह सब बातें मुझे लिखकर भेज सकते हैं ,आपके नाम के साथ वह में अपने ब्लॉग पर प्रकाशित करुँगी ,वीणापाणी का एक उद्देश्य हैं भारतीय संगीत का प्रचार .मुझे उसके लिए हर भारतीय की मदद चाहिए .एक भारतीय होने के नाते मैं भारतीय संगीत को नयी पीढ़ी से दूर होते हुए नहीं देख सकती .भरोसा हैं की आप सब भी नहीं देख सकते .इसलिए मुझे अपने विचार लिख भेजिए .अपने बच्चो को भारतीय संगीत के बारे में जानकारी दे.अगर आप पत्रकार हैं तो कृपया अपने लेख का विषय इस समस्या को बनाये .आप सभी श्रेष्ट ब्लोगर हैं कृपया ब्लॉग जगत में इस गंभीर विषय में चिंतन करे इस पर लिखे . 

भारतीय संगीत साधिका 
डॉ. राधिका 

Sunday, February 28, 2010

पात्र बदल गए हैं ,नाटक तो वहीँ हैं .


सुबह का समय,मैं बादल की किसी टुकड़े पर सवार पूरी दुनिया देख रही हूँ ,सुबह सुबह मेरे घर के चारो तरफ कोहरा छाया रहता हैं,इतना कोहरा की आसपास के घर भी ठीक से नज़र नहीं आते.लगता हैं मेरा घर किसी परी की  कहानी की तरह बादलो के बीच बना हुआ हैं.ठीक नानी की परी की कहानी जैसे ,वहाँ होता था एक राजा एक रानी और एक राजकुमारी.उस राजकुमारी का महल भी तो यूँही आसमान में एक बादल पर होता था .आसमान में देखा कुछ रंग बिखरे हुए थे ,रंग ...............................

राधिका ..................................अचानक माँ की आवाज आई .चल अता खूब झाल होली खेलन  (चलो अब बहुत होली खेलली ).
होली का पहला दिन ,भारतीय संस्कृति में बुरे पर अच्छाई की जीत का एक और दिन .शाम के यहीं कुछ ८-८:३० का समय .होलिका जल रही हैं और हम बच्चे उसके पास नाच रहे हैं .धुलहंडी  कल  हैं पर आज  रंग हमारी मुठ्ठियों में बंद रह ही नहीं रह पा रहे .माँ आज तो सिर्फ गुलाल ही खेलेंगे न!  खेलने दो न! वहाँ होली जल रही हैं ,माँ और आस पास की काकू ,आत्या ,आजी मिल कर उसकी पूजा कर रही हैं .हम उत्साह से दुने हो रही हैं .

बाबा ...........बाबा आज नहीं न बजाओ सितार ,चलो न रंग(color) लायेंगे.बाबा मुझे खूब सारा नीला रंग खरीदना हैं ,नहीं बाबा ताई को कुछ नहीं लेकर दोगे तुम ,ताई मुझे हरा रंग चाहिए ,ये बहुत अपनी अपनी चलाती  हैं .बाबा में सबसे छोटी हूँ मेरी पसंद का कलर नहीं लाया तो मैं कुट्टी ,मुझे ओरेंज रंग खरीदना हैं ,बस .बाबा ,चलो न चलो न बाज़ार जायेंगे .ऐ आई बाबा ला म्हण न ,वो फिर से सितार बजने में लग गए . बाबा हमेशा लाल रंग खरीद लाते .कहते बहुत पक्का रंग हैं छूटेगा ही नहीं . 


मुझे याद हैं बाबा को चुटकी भर रंग लगाने के लिए भी उनको मानना पड़ता था ,और हम पर होली का भुत सवार रहता था .
किरण आंटी दरवाजा खोलो न ...............हमेशा की तरह हम बच्चो की टोली उनके दरवाजे पर और उनका दरवाजा होली के दिन बंद .फिर आपस मैं हम बच्चो की  कुछ महान चर्चा ,मिशन आंटी को रंगना .और इस मिशन की लीडर मैं . आंटी देखो सब बच्चे गए . मैं हूँ राधिका ,कोई नहीं हैं अब .आंटी आई ने तुम्हारे लिए करंजी ,मठरी भेजी हैं .दरवाजा खोलो न .सच राधिका ??सच बोल रही हैं तू .तुझे पता हैं मुझे होली नहीं अच्छी लगाती .खर म्हणते आंटी .बिचारी आंटी वो क्या जाने उन्हें फसाया जा रहा हैं ,दरवाजे के खुलने के साथ ही  आंटी पर रंगों की बौछार .....................होली हैं ............लाल काला ,गुलाबी  जिसके हाथ में जो रंग वह सारा आंटी के सुंदर चेहरे पर ,पास खड़े अंकल जोरजोर से हंस रहे हैं .हम बच्चे मिशन नेक्स्ट पर............

मुझे याद नहीं होली की पहली रात मैं कभी भी सोयी हूँ.आई कहती अरे सोजा ,कल  होली खेलनी हैं न .पर मैं पूरी पूरी रात जागकर सोचती रहती ,फलां काकू को कैसे रंगाया जाए ,फला के आई बाबा पर कैसे रंग डाला जाये .हम १०-१५ बच्चो की टोली .आई चिल्लाती रहती अरे घर नका घानेरड़ करू ,(घर मत गंदा करो ).ऐ अग़ राधिका .बघ मामा आलाऐ तेला नमस्कार कर .नमस्कार मामा ,मामा के चरणों में जैसे तैसे नमस्कार रखकर फिर भागे हम सब मिशन होली पर ............दोपहर के दो बज जाते,उस पर अगर बुआ और उनकी बेटियाँ आजाती तो फिर कहना ही क्या .घर की छत आँगन सब रंगमय हो चुके होते और बारी आती बुआ के घर की .

आईने में देखकर पता ही नहीं चल रहा था की हम तीनो में से कौन राधिका हैं कौन गीतिका और कौन याशिका.फिर शुरू होती चेहरा साफ करने की विधि ,दो दो घंटे कभी बेसन कभी तेल कभी क्रीम लगा लगा कर रगड़ रगड़ कर चेहरा साफ़ ,हद तो तब होती जब रंगों वाले हाथो से ही हम खाना भी खा लेते और आई की बनायीं हुई मठरी,करंजी,पपड़ी भी .

मम्मा ...............मम्मा ..........कलर कहाँ गए .....मुझे खेलना हैं न !तुम आज मत कम्प्यूटर पर लिखो और वीणा भी नहीं बजाना हैं न .चलो न होली खेलते हैं .इस एक आवाज से मैं बरसो आगे बढ़ आई .अरु न जाने क्या -  क्या कह रही हैं ,ये रंग वो रंग.मैं हतप्रभ सी उसे देख रही हूँ .समय कितना बदल गया हैं न .न जाने कितने साल बाद इस साल मैं होली खेलूंगी वह भी अपनी बेटी के साथ ,उसने तीन  पिचकारीयां  खरीदी हैं ,बिलकुल मेरी ही तरह उसे भी कल सारे बाज़ार में बिक रहे रंग खरीदने थी मजे की बात तो यह हैं मेरे पापा की तरह उसके पापा  को भी होली बिलकुल पसंद नहीं पर मैं बेफिक्र हूँ उन्हें रंगने के लिए आरोही जो हैं .

कितनी लम्बी हो गयी न ये पोस्ट ....बचपन की यादे होती ही कुछ ऐसी हैं.आप सभी को होली की बहुत सी शुभकामनाये .ईश्वर करे होली के रंग आपके जीवन को खुशियों के रंग से भर जाये .

Sunday, February 21, 2010

1411 -"मिल जाये तो मिटटी हैं खो जाये तो सोना हैं"शाश्वत सत्य

 कितनी सुंदर सुबह थी वह . अजी नहीं !  मौसम बड़ा खुबसूरत नहीं था ,न तो ठंडी हवा चल रही थी, न रिमझिम बारिश हो रही थी.न वासंती फुल खिले थे ,न हल्की- हल्की धुप बादलो से झांककर मुस्कुरा रही थी .
 बड़ा ही खराब मौसम था ,चिलचिलाती धुप थी,भरी गर्मीयो का मौसम था सुबह के दस बजे नहीं तब तक जोरदार लू भी चलने लगी थी फिर भी वह सुबह कुछ खास थी ,कुछ अनोखी,कुछ निराली . कितने खुश थे हम उस सुबह . दो दिन पूर्व ही समाचार पत्र में आया था की जू (चिड़ियाघर) में नया बाघ आया हैं .पापा ने वादा किया था आज हम सब उसे देखने जायेंगे . इसलिए वह मई की बोर सुबह भी सुंदर बन गयी थी.



मुझे याद हैं जब भी बाघ को देखते आश्चर्य ,डर ,कौतुहल ,आनंद की भावनाए एक साथ मन में आती .
'बाबा............ कितना बड़ा हैं न यह बाघ  ....छि ....कैसे मांस  खा रहा हैं .कितनी ऊँची पहाड़ी जैसी बनायीं हैं इसके लिए ,निचे छोटा सी लेक ताकि वो हम तक आसानी से न पहुँच  सके .






वाह पापा! इसके बच्चे कितने सुंदर हैं ,मन करता हैं गोदी में लेकर खेले इनसे.कितने क्यूट ..........पापा यह मांस क्यों खाता हैं ?




पापा .....  उस वाले बाघ के लिए इतना सुंदर घर और इस बिचारे के लिए इतना गन्दा पिंजरा???छि .....कितनी गंदी बदबू हैं यहाँ ,पानी  भी कितना गंदा हो रहा हैं इसके पीने का .पापा... ये बाघ...    प्रश्न, प्रश्न, प्रश्न ...


कुछ १५ -२० दिन पहले ही पुणे के स्नेक पार्क में जाना हुआ.बाघ के लिए बड़ा पिंजरा था ,अंदर बाघ नहीं था .पर एक बड़ी सी पाटी  पिंजरे की जाली पर लगी थी ,लिखा था अब यहाँ कोई बाघ नहीं बचा ,बाघों की संख्या न के बराबर रह गयी हैं .वह ख़त्म हो रहे हैं .मैं धक् से रह गयी .सोचा था आरोही को बाघ दिखाउंगी फिर एक तस्वीर दिखा दी बाघ की . 


सिर्फ एक शतक पहले बाघों की आठ उप जातिया जीवित थी ,अब सिर्फ पाँच हैं .

अब मजे की बात हैं ,कभी हम चिल्लाते हैं सेव वाटर (सेव water),सेव पेट्रोल,सेव गर्ल चाइल्ड(Girl) ,सेव अर्थ(Earth) ,सेव ये सेव वो सेव ,सेव, सेव.  दुनिया की वह हालत कर दी हैं हमने की हम सब कुछ सिर्फ बचाने में लगे हैं .कभी कुछ संगीतकार कुछ वाद्य(instrument) बचाने में लगे हैं,तो जिन्हें पर्यावरण की समझ हैं वह पर्यावरण बचाने में ,जिन्हें संस्कृति(culture) से प्रेम हैं वह उसके संरक्षक बन रहे हैं .हर कोई दौड़ रहा हैं कोशिश कर रहा हैं कुछ बचाने की सँभालने की सहेजने की फिर से उसी पहले वाले रूप में उसे पहुँचाने  की .लेकिन कोशिश सिर्फ कोशिश ही रह जाती हैं ,और वह चीज़ खो जाती हैं ,फिर हम उसका विकल्प ढूंढते हैं ,दुखी होते हैं ,परेशान होते हैं ,ईश्वर से प्रार्थना करते हैं . पर हासिल शून्य ..................

हम कलाकार हैं ,विचारक हैं ,राजनेता हैं,डॉक्टर हैं ,कृषक हैं,बिल्डर हैं ,वैज्ञानिक हैं .हम ये हैं, वो हैं ,वोहैं, वो हैं .हम सब कुछ हैं .पहले हम राजा थे . फिर प्रजा हुए और अब आम आदमी .पर प्रश्न यह हैं की हम मनुष्य कब बनेंगे ?मनुष्य जो प्रकृति का एक हिस्सा हैं उतना ही स्वाभाविक और सरल सा हिस्सा जितने चिड़िया ,कौवे,बाघ व अन्य जीव जंतु और पशु पक्षी .हम कब समझेंगे की हमें भी इन सबकी ,सृष्टि से जुड़े हर तत्त्व की जरुरत हैं .अचानक से नींद खुली देखा अरे! ये अभी तो यही था अब कहीं नहीं हैं और लगे चिल्लाने ये बचाओ ,वो बचाओ .बचाओ- बचाओ -बचाओ .क्यों ?क्यों हम इस प्रकृति का मासूम सा हिस्सा बनकर उसी भाव से नहीं रह सकते जिस भाव से अन्य प्राणी  रहते हैं ,हम विशिष्ट हैं लेकिन अपने घर में विशिष्टता  ?? 


एक सत्य यह हैं की हमें मनुष्य बन कर रहना होगा जो प्रकृति प्रेमी हैं सृष्टि का एक अंग हैं ,हमें कोशिश करनी हैं ,जो खो रहा हैं उसे बचाने की ,सवारने की ,पुन: पाने की लेकिन मनुष्य बनकर ,जीवन के हर क्षेत्र में .नहीं तो हम कुछ कुछ बचायेंगे और बहुत कुछ खो जायेगा .फिर रोयेंगे,पछतायेंगे,तड़पेंगे.जब हम इस दुःख के भवर से बाहर निकलेंगे ,कुछ शांत हो जायेंगे तो कही से सुनाई देगा एक शाश्वत सत्य,"दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना हैं मिल जाये तो मिटटी हैं खो जाये तो सोना हैं"  .


इति  

वीणा साधिका 
डॉ.राधिका 
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