Wednesday, April 22, 2009

वो जिंदगी से कभी जाती नही ....

ईश्वर के हर रूप ने हमें मोह से बचने का उपदेश दिया ,यह जग का पसारा मोह माया मिथ्या हैं ...लेकिन मानव मन की क्या कहिये ! उसे तो इस मोह माया में उलझे रहना ही परम श्रेष्ठ कर्म लगता हैं । यह मोह माया में फ़सा मानव मन कभी किसी इंसान से मोह कर बैठता हैं कभी कुछ चीजो से .

कुछ ऐसी चीजे जो घर में बरसो सिर्फ़ रखी रहती हैं,उनका कोई उपयोग नही होता लेकिन उनका मोह भी नही छूटता ।

कुछ आधे अधूरे शब्द लिखे कागज़ ,कुछ सूखे हुए फुल ,कुछ सालो पुराने गहने ,कुछ फटी किताबे और न जाने कितनी अनुपयोगी वस्तुए । बड़े शहरो में इंसानों के रहने के लिए घर नही,चार चार लोग एक कमरे के घर में जैसे तैसे अपना जीवन गुजारते हैं ,ऐसे में इन सब चीजों को सम्हाल कर रखना ......!!लेकिन कभी कभी इंसानों से ज्यादा प्यारी कुछ चीजे होती हैं न ।

बचपन में सोचती थी माँ घर में बने मालों में कितना सामान ठूस कर रखती हैं,इस सामान को मैंने बरसो वही का वही रख देखा,फेकती क्यो नही माँ ये फालतू पसारा ................

फ़िर एक दिन माँ की अनुपस्तिथि में घर साफ करने की धुन में आकर मालों पर से कुछ सामान निकाल कर कचरे में फेक दिया और माँ के आने पर जम कर डाट खायी .क्या था उस सामान में ऐसा ?
नानाजी की पुरानी लाठी , बरसो पुरानी साडी जो दादीजी ने माँ को पहली बार मिलने पर दी थी ! मेरा बचपन का पालना ,कुछ पीतल के बर्तन जो समय के साथ अपनी चमक और रूप दोनों खो चुके थे पर शादी के समय माँ को नानी ने दिए थे । एक पुरानी फोटो जिसका रंग उड़ गया था ,फ्रेम उखड़ गया था । फ़िर माँ ने इतना क्यो डाटा ?

आज समझ में आता हैं जब अपने ही घर में रखे कुछ सामान ,जो बेवजह जगह घेरे हैं ,फेकने का मन नही करता ,हर बार फेकते समय हाथ रुक जाते हैं ,आँखे गीली हो जाती हैं ,मन कहता हैं इसे मत फेक ।

हम सब के जीवन में कुछ इसी चीजे होती हैं जो कितनी भी पुरानी हो जाए ,उनका महत्व कम नही होता ,वह हमारे जीवन से,मन से ,आत्मा से कुछ इस कदर जुड़ी होती हैं की उन्हें फेकने का जी ही नही करता ।

मेरे घर में भी हैं ऐसी कुछ चीजे ....आरोही के पुराने कपड़े ,कुछ टूटे फूटे खिलौने जिनके हाथ पैर भी सलामत नही ,कुछ आधी लिखी कविताओं से भरे पन्ने ,कुछ सालो पुरानी मेरी कॉपियां ,कुछ पतिदेव ने सम्हाले १0-१५ साल पुराने बिल ,जब उन्होंने पहली बार अपने पैसो से साडी खरीदी थी अपनी माँ के लिए ,एक घड़ी का डिब्बा उस घड़ी का जो उनके सबसे अच्छे दोस्त ने उन्हें उनकी कमियाबी पर दी थी ,घड़ी तो खो गई वह पुठ्ठे का डिब्बा आज भी सलामत हैं । एक पेकिंग पेपर जिसमे उनकी दीदी ने उन्हें पहला केल्ग्युलेटर तोहफे में दिया था ।

कभी कभी चीढ जाती हूँ ,सोचती हूँ आज इस कचरा पट्टी को उठा कर फेक ही दूंगी ,पर तभी नज़र आती हैं मेरे अलमारी का पुरा एक खाना घेरे इठलाती मेरी सहेलियों की चिठ्ठिया ,मेरी बेटी ने पहली बार पहनी मालाये ,मेरे भाई ने पहली बार भेजे कुछ तोहफे ,कुछ चीजे जो मेरे कभी काम नही आती । लेकिन उनका होना मेरे मन को बडा सुकून देता हैं ,जब भी कभी मन उदास होता हैं उनको देखकर फ़िर कुछ भूली बिसरी खुशिया याद आती हैं ,आँखे फ़िर सजल हो जाती हैं ,चेहरे पर मुस्कान लौट आती हैं ,हर बार उन्हें कचरा समझ कर मैं फेकना चाहती हूँ और हर बार बडे प्रेम से जतन से उन्हें सम्हाल कर रख देती हूँ । बरसो बीत जाते हैं ,घर बदल जाते हैं,जिंदगी आगे बढ़ जाती हैं ,लेकिन इन चीजों का मोह जाता नही हैं ,ये चीजे जिंदगी से दूर जाती नही हैं ।
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