Sunday, September 6, 2009

५० % की छूट .जिंदगी पर ...................................


वह भागी जा रही हैं ,बस,ऑटो ट्रेन पकड़कर ....भाग रही हैं । उसे बस भागना हैं ,भाग कर पहुँचना हैं ,वहां जहाँ जिंदगी पर पुरे ५०% की छूट हैं । आज सुबह ही उसने अखबार में विज्ञापन पढ़ा शहर के सबसे बड़े मॉल में जिंदगी पर पुरे ५०% की छूट ,जिंदगी जो खुशियों से भरी ,सफलताओ से सजी ,हँसती- मुस्काती .....

जबसे उसने यह विज्ञापन पढ़ा तबसे वह बैचैन हैं ,बाकी सारे महत्वपूर्ण काम धाम छोड़ कर वह भागी जा रही हैं ,उस और जहाँ जिंदगी.....न नही ....जिसे वह जिंदगी कहती हैं ,वही खुशियों से भरी भरी मुस्कुराती सी जिंदगी ,पुरे ५०%की छूट पर बिक रही हैं । वह नही चाहती की उससे पहले लोग पहुँच कर जिंदगी खरीद ले । कुल जमा कुछ १०-१२ लाख रुपये होंगे उसके अकाउंट में ,इतने में तो वह इतनी भारी छूट पर मॉल में बिकती लगभग सारी जिंदगी खरीद सकती हैं। कम से कम इस जनम तो वह खुशियों वाली सुंदर जिंदगी जी लेगी ।

आखिरकार वह मॉल में पहुँच गई ,चारो तरफ़ लोगो का समुद्र हैं ,हर कोई मानो खुशियों भरी जिंदगी खरीद लेना चाहता हैं । सामने एक बोर्ड पर लिखा हैं बेबी किंगडम ५०% सेल ,दुसरे बोर्ड पर लिखा हैं भारतीय परिधान ४०%सेल ,तीसरे पर फ़ूड मार्केट ६०%सेल , रसोई घर ८०%सेल ,इंडियन आर्ट & क्राफ्ट्स ३०% सेल ......................... वह मॉल के उपरी माले पर जाती हैं वहां भी कुछ ऐसी ही दुकाने ,वह पुरा मॉल छान मारती हैं पर जिंदगी पर ५०% छूट कही नही दिखाई देती .वह फ़िर अखबार देखती है ,पता तो यही हैं । एक दूकानदार से पूछती हैं भाई साहब वो "जिंदगी पर पुरे ५० % की छूट" शॉप कहा हैं? दूकानदार उसे कुछ अजीब नज़रो से देखता हैं । पास खडे लोग हँसतें हैं ,वो जिस जिस से पूछती हैं वो सब उसे पागल समझते हैं ,कहते हैं यही तो हैं जिंदगी ......................

तो क्या यह हैं जिंदगी? इसी जिंदगी को तो वो कई बार खरीद के घर में भर चुकी हैं ,जब जब वह डिप्रेस होती हैं वह यही सब तो खरीदती हैं । लेकिन उसके सपनो में आने वाली ,खुशियों से भरी जिंदगी ,जहाँ होठो पर मुस्कान ,दिल में प्यार ,मानसिक शांति हो उसे नही मिलती ।

जिंदगी.....कहाँ हैं जिंदगी ? वह जिंदगी जो वह पाना चाहती हैं वो कहाँ हैं ? आँखों में आसूं आते हैं । कुछ देर सिर निचे किए वह रोती हैं । अचानक उसके मन में कुछ ख्याल आता हैं । वह फ़िर भागना शुरू करती हैं ....बस ,ऑटो ,ट्रेन पकड़ कर भागती हैं । अपने घर पहुँचती हैं । बंगले में काम करने वाली सक्कु बाई को अदंर बुलाती हैं और मॉल में से खरीदी हुई सारी जिंदगी (जो कभी उसने जिंदगी समझ खरीदी थी )उसे दे देती हैं । एक संदूक में बंद कुछ पन्नो को निकालती हैं उन पर कुछ लिख कर पोस्ट करती हैं । वर्षो से धुल खाते तानपुरे को मिला कुछ सुर लगाती हैं । ५ वर्षीय बेटें के साथ एक बाग में घुमने जाती हैं ,चने खरीद कर खाती हैं,उसको कितनी ही कहानिया सुनाती हैं । पतिदेव आने पर उन्हें सारे दिन का चिठ्ठा कह सुनाती हैं , तीनो साथ खाना खाते हैं ,बाते करते हैं ,हँसते खिलखिलाते हैं । दो दिन बाद एक पत्र आता हैं ..उसके लिखे हुए पन्नो को उपन्यास का स्वरुप दिया जा रहा हैं । वह मुस्कुराती हैं, जान जाती हैं यहाँ हैं जिंदगी ..उसके अपने हाथ में ..उसकी चाह में ,उसके प्रयत्नों में । अब वह दुःख से थकती नही ,डिप्रेस होकर मॉल में जिंदगी खरीदने नही जाती । जब जब वो ज्यादा दुखी होती हैं और ज्यादा मुस्कुराकर दूसरो जीवन में रंग भरती हैं .उन्हें हँसना सिखाती हैं । आज वह सुखी हैं ,संतुष्ट हैं । जिंदगी से पूर्ण हैं ।उसने जिंदगी पाई हैं वह भी पुरी ९०% छूट।वह भी सिर्फ़ एक विचार के बाद, एक बार दौड़ कर ,यह जानकर जिंदगी पाई जा सकती हैं ,सिर्फ़ अतुलित इच्छा शक्ति ,आत्म विश्वास और सही दिशा में प्रयत्न के साथ .......................................



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