Thursday, January 8, 2009

हर काश पर खत्म होता एक आकाश !

वो हवा के घोडे पर बैठा जीवन के असीम आकश में सरपट भाग रहा हैं, कितनी बार चाहा की उसे रोक लू ,जैसे अल्लाउद्दीन के चिराग में जिन्न बंद रहता हैं ,वैसे ही किसी चिराग में उसे भी बंद कर लू ,वो मेरी मुठ्ठी में हो , मेरे बस में । पर वो किसी के रोकने से रुका हैं ?वो तो मनमौजी हैं ,अपनी ही चाल से चलता हैं ,अपने ही रीत से दुनिया को चलाता हैं ,शायद इसलिए ही उसे समय कहा जाता हैं ,हर बार वह यु ही हाथो से फिसल कर कही दूर ,बहुत दूर भाग जाता हैं और हम कहते रह जाते हैं............ काश.............समय हमारा होता ,काश.......... हमने उसे जी लिया होता . कभी कभी तो वह इतना याद आता हैं की जीवन की छोटी बड़ी खुशिया भी उसके ही साथ कहीं खो जाती हैं। हम फ़िर कहते हैं ,काश...........

काश.........की किताबो को अलमारी में नही दिल में कहीं कैद कर लिया होता . काश...........चांदनियो का यह शुभ्र धवल प्रकाश यु ही धरती पर हर रात फैला होता , युगों तक इसी प्राकृतिक प्रकाश का स्नेहिल सानिद्य हमें मिला होता और हम कह पाते वो देखो टूटता तारा ......काश .................किताबों में रटा रटाया कोर्स पढाने के बजाय हम बच्चो को जिन्दगी का हर रंग , किसी जादू की छड़ी से नीले आसमान में छिटक कर दिखा पाते ,उनसे कह पाते ,छु लो यह रंग,जान लो इसे अपना सा, न जाने कब यह तुम्हारे जीवन को अपने रंग में रंग जाए । काश........... टूटे हुए दिल के मोती बटोर कर एक सुंदर माला बना पाते ,काश .............आज से कुछ साल पहले हम और अधिक जिम्मेदार ,समझदार इन्सान बन पाते,काश ........... किसी जादूगरनी की तरह एक जादुई लट्टू हमारे पास होता और आने वाले हर दुःख से हम पहले ही सावधान हो जाते । काश...........खुशियों का भी बरस में एक बार मेला लगता और हम जैसे घरो में पुरे साल के गेहू ,चावल भरते हैं न, उसी तरह ही घरो में साल भर की खुशिया भर पाते । काश......... की पंछी भी बोले होते ,और उनके साथ सुर मिला कर हम जीवन गीत गाते ,जब हमारे अपने जिन्दगी की वय्स्त्ताओ में जिन्दगी को ही कहीं खोते जा रहे हैं । काश....की कभी किसी को नौकरी ही नही करनी पड़ती ,हर कोई राजा होता ,कोई रानी होती ,और छोटी राजकुमारी पेडो पर लगे रूपये तोड़ कर माँ बापू को बस खिलौना लाने की जिम्मेदारी सौपती । काश.... सपने सोती हुई आँखों में रात भर यु ही मंडराते,जब सुबह हम उन्हें पुकारा करते तो बिल्कुल हमारी माँ की तरह हमारे लिए दौडे चले आते । काश ..........की इतनी बड़ी धरती पर हर इंसान को रहने के लिए एक छोटा सा कोना मिला होता ,और हम वहां अपने सपनो का आशियाँ सजाते . ..............काश ...........जिन कृष्ण - कहनैया को हम छप्पन भोग लगाते हैं,उन्ही के छोटे- छोटे कई सारे , भूख से बिलखते रूपों को हम दो समय का पुरा खाना दे पाते । काश.....हम इतना पढ़ लिख जाने के बाद,अपनी पुरी उम्र ख़त्म होने तक ही, सच्चे ह्रदय से औरो से प्रेम करना सीख जाते ,न कोई आतंक होता न कोई अत्याचार ,दुनिया को बस बच्चो सा भोला और निर्मल बना पाते. काश .......काश....काश ..........न जाने और कितने काश..हमें जिंदगी में कभी कहने ही नही पड़ते ,इन काशो के कहने से ही तो हम जिन्दगी के कितने आकश कभी आत्नीय प्रेम का ,कभी हमारे सपनो से जुडा,कभी जिन्दगी को जिन्दगी की तरह जीने का ,अपने ही हाथो से ख़त्म कर देते हैं । जब हम काश..कह कर एक लम्बी श्वास भरते हैं तो सम्भावना के द्वार बंद हो जाते हैं और सपनो ,इच्छाओं ,आशाओं का विस्तृत ,अनंत आकाश ख़त्म हो जाता हैं । और हम कहते रह जाते हैं काश...............
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