Friday, July 13, 2012

मैत्री ..दोस्ती और मैत्री !!!

सफ़र लम्बा था ...बहुत लम्बा ,उतना ही कठिन ...सूर्य देवता मानो सर पर विराजमान थे ..मंजिल का कोई अता -पता  न था..पैरो के निचे जलती रेत  ..मस्तिष्क शून्य , मन... वो तो शायद संग था ही नहीं ....जाना किस ओर हैं किस रस्ते कुछ भी पता  न था , वही उस मरुस्थल में थककर आँखे मुंद ली ..ह्रदय में  एक प्रार्थना गूंजी ...अब और नहीं ...बस अब और नहीं ...

न जाने कहाँ से एक  ठंडी हवा का झोंका आया ..आँखे खुली देखा मेरे पावों के निचे हरी-हरी दुब हैं ..कुछ क्षणों पहले जहाँ रेगिस्तान था ,वहां दूर दूर तक फूलों से महकते वृक्ष हैं ...माँ गंगा आँखों के सामने छलछलाती हुई  अश्रु नर्मदा से लय  मिलाती बह रही हैं ,छम छम छम छम बरखा की बुँदे मेघ के स्वरों को तालबद्ध कर मल्हार बरसा रही हैं ...

न... यथार्थ में कुछ भी नहीं बदला था सब कुछ वही था..वही अनंत तक विस्तृत लक्ष्य से अपरिचित रास्ते,कठिनाइयों से तप्त दीर्घ अनुत्तरित जीवन ....

कुछ बदला था कुछ जुडा था तो बस किसी का साथ ...साथ एक मित्र का ..
जब हम कुछ कहते हैं और कोई समझ जाता हैं तो कितना अच्छा लगता हैं ..हैं न !लेकिन कुछ कहे बिना अगर कोई हमारे मन की बात समझ जाये तो ? शब्द - शब्द हो वही जो हमें कहना हैं लेकिन कोई और ही कह जाये तो ?
दोस्ती -दोस्ती -दोस्ती उससे जुडी बड़ी -बड़ी बातें हमेशा सुनी थी ..पर सच कहूँ सुनने से बहुत अच्छा  होता हैं दोस्ती का अनुभव ...जब अपनी परेशानियों का बोरा हम किसी ओर के सर डाल सके ,रोते हम हैं लेकिन मुस्कान किसी ओर से चुरा सके ,रात दिन ,समय बंधन ,नाते रिश्ते किसी- किसी की परवाह न कर अपने सारे दुःख दर्द ,मुसीबतों का राग बिन मोल हम किसी को सुना सके ,हमारी एक मुस्कराहट के लिए जब कोई अपनी समस्याएँ भूल बस हमें हँसाने की  कोशिश करे ..हम खुश रहे इसके लिए न जाने क्या क्या सहे ...जिसके साथ होना ही सारी समस्याओं का हल बन जाये ..हमारी गलतियों पर बड़ी जोरो से  गुस्सा कर  हमें डरा सके ...कभी कभी हमारा शिव तांडव (नृत्य नहीं :-) क्रोध ) उतनी ही शांति से सह सके .
बदले में हम भी जिसके साथ  बिलकुल  यही कर सके   तो उसे कहते हैं दोस्त और जीवन के इस सबसे सुंदर  अनुभव का नाम हैं दोस्ती ...मित्रता ..मैत्री ..

अर्जुन हो या कृष्ण ,कर्ण हो या द्रौपदी ,राधा हो या पार्वती मैत्री के बिना इनकी कहानी शायद आगे ही न बढती .सारे रिश्ते,सारे नाते समय के साथ पुराने हो जाते हैं ,कुछ टूट जाते हैं कुछ नीरस हो जाते हैं ...लेकिन दोस्ती का रिश्ता मन में अपना आसन जमाये दुसरे रिश्तों को चिढ़ाता "मेरी कुर्सी छीन कर दिखाओ " हमेशा ह्रदय में सिंहासनारुढ ही रहता हैं ...आज ही कहीं पढ़ा दोस्ती का रिश्ता दो समानांतर रेखायें  हैं ..एक दुसरे से ना भी मिले तो भी हमेशा साथ चलने वाली ..संग रहने वाली ...

दोस्त ..कोई भी हो सकता हैं यह दोस्त ..किसी के दादाजी ,किसी का भाई ,किसीकी माँ ,किसी की बेटी ,पत्नी पति , जीवन की प्रथम देहरी पर पांव रखने वाले कॉलेज स्टुडेंट्स के लिए साथ में पढने वाला या पढने वाली कोई साथी ...या किसी नाम रिश्ते नाते से परे सिर्फ एक दोस्त ...


उसने कहा " तू ऐसे हँसते खुसते मुस्कुराते हुए बहुत अच्छी लगती हैं "  तो ध्यान आया मेरी दोस्त आगयी स्कूल से बिना पढ़े लिखे कांधो  पर ज़माने भर की पढाई का बोझ उठाती मेरी नन्ही दोस्त ...अभी  कहेगी माँ मैं भी तो तेरी दोस्त हूँ न !

ईश्वर के होने में विश्वास का,जीवन जीने की इच्छा का ,जिंदगी  में हमेशा आगे बढ़ते  रहने का ,मुश्किलों से कभी न हारने का  एक और कारण हैं मेरे लिए ...वह हैं दोस्ती ...

आज फ्रेंडशिप डे नहीं ..हो भी नहीं सकता ..मुझे लगता हैं मित्रता का कोई एक दिवस नहीं होता ..सालो साल चलने वाली ..एक दिन भी साथ न छोड़ने वाली मित्रता को सिर्फ एक दिवस देना कुछ सही नहीं हैं न ! इसलिए आज बिना किसी पर्व त्यौहार के बस ऐसे ही ..सच्ची दोस्ती की तरह बस ऐसे ही ...मित्रता के नाम मेरे सारे  दोस्तों के नाम मेरी यह पोस्ट ...


राधिका ...



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