Friday, January 23, 2009

कैसे समझाए ?(व्यंग)

ये दुनिया भी कितनी अजीब हैं न ,तरह तरह के लोग रहते हैं यहाँ । कुछ सुखी ,कुछ दुखी ,कुछ स्वांत सुखी ,कुछ स्वांत दुखी ,कुछ चिंतनशील, गंभीर ,कुछ जिनको चिंतन,मनन आदि शब्द हमेशा ही कुनैन की गोली से कड़वे लगते हैं ,कुछ होते हैं जो जीवन को संग्राम समझते हैं उन्हें कृष्ण कहीं नज़र नही आता पर खुदको वे अर्जुन समझते हैं . कुछ ...... उनके लिए जीवन जीवन नही होता आनंदोंउत्सव होता हैं ,वे कभी सड़क पर गुनगुनाते निकलते हैं ,कभी दोस्तों पर हँसते-हँसाते . कुछ बडे मेहनती होते हैं उन्हें पढने -लिखने का भुत सवार होता हैं ,चश्मे में आँखे छुपाये दिन रात किताबो में नज़रे गडाये रहते हैं ,किताबे ही उनके लिए संसार की सबसे अनमोल वस्तु होती हैं , कुछ ? उन्हें किताबे ..........यानि सिरदर्द लगता हैं .उनकी प्रिय सखी होती हैं किताबो में लगने वाली घुन । कुछ ........जीवन में बडे बडे सपने देखते हैं , बडे -बडे सपने ,कभी कभार तो इतने बडे की जीवन खत्म होने लगता लेकिन सपना हैं की ख़त्म होने का नाम ही नही लेता।

कुछ .........सपने देखना बडा भारी जुर्म समझते हैं ,सपने वपने देखने से अच्छा जो हैं ,जैसा हैं जीवन , उसी में संतुष्ट रहना धर्म समझते हैं । कुछ दिन रात ईश्वर के नाम से रोते रहते हैं ,रे रे रे रे ब हु हु हु हु भगवान !ऐसा क्यो हुआ ?और हमें अचानक हिन्दी धारावाहिकों की याद आ जाती हैं । कुछ ....भगवान के भी भगवान होते हैं उसकी सत्ता को ही खारिज कर देते हैं ..काहे का भगवान . कुछ भगवान वगवान नही होता सब मन के भरम हैं । कुछ....के जीवन में कोई उद्देश्य ही नही होता ,बस पंथहीन दिशाहीन जीते जाते हैं ,कुछ अपनी पुरी उम्र बस अपने लक्ष्य को पाने में लगा देते हैं और जब लक्ष्य मिलता हैं तो उनके फोटो पर हार टंगा हुआ नज़र आता हैं । कुछ नई विचारधारा के प्रणेता होते हैं ,हाथो में बगावत का झंडा लिए वे खुदको विद्रोह के जुलुस में सबसे आगे खडा रखते हैं ,तो कुछ संस्कृति और संस्कारो के युगंधर होते हैं ,उनके लिए जीवन वहीं हैं जो उनको उनके बुजुर्गो ने समझाया हैं ,ऐसे लोगो से आज की पीढी के नवयुवक और युवतिया कुछ ऐसे दूर भागते हैं जैसे जंगल में शेर आने पर बिचारे सारे निर्दोष प्राणी भागते हैं ।


सच ! कितनी अजीब हैं न दुनिया ,न जाने कितने रंग भरे हैं ईश्वर ने, इस संसार रूपी चित्र में और हर रंग की अपनी एक खासियत हैं ।हम चाहते हैं, जैसा हम सोचते हैं ,वैसा कोई और भी सोचे तो जीवन कितना सुंदर हो जाए ,पर ऐसा कभी नही होता ,हम समझाते रह जाते हैं ,लोग समझते ही नही ,फ़िर लोग हमें अपनी बात समझाते हैं और हम समझते नही ,ताउम्र समझने -समझाने का कार्यक्रम वर्तमान टीवी धारावाहिकों की तरह अनवरत चलता ही रहता हैं ,चलता ही रहता हैं । उधर भगवान उलटी गिनती का कार्यक्रम भी शुरू कर देता हैं १०-९-८-७-६-५-४-३-२--------------------------इधर हम कहते -सुनाते ही रह जाते हैं ,और फ़िर पूछते हैं क्या टाइम खत्म ? जल्दी ?अभी तो कितना कुछ समझना -समझाना था,दुनिया को बतलाना था । उधर भगवान फरमान जारी कर देता हैं ,लो भाई अब इस जनम इन्हे चिडिया बनाओ ,गधा बनाओ । हम चीखते हैं .........अन्याय, अन्याय, घोर अन्याय इतने पुण्य करने के बाद चिडिया या गधे का जनम ?जिंदगी भर दूसरो की इतनी चिंता की,जग भर की सोची ,इतना समझाया उसके प्रतिफल में गधे का जन्म । नही .........


वह कहता हैं ..मैंने तुझे मनुष्य बनाया तू जीवन समझता और समझाता ही रहा जीवन भर ,जीवन को जिया ही नही अब शायद चिडिया या गधा बनके जीवन को जीना सीख जाए ।
हम निरुत्तर हो जाते हैं ........................कुछ पलो की शान्ति के बाद हम फ़िर सोचते हैं वृक्ष की उस डाल पर बैठी उस नन्ही सी चिडिया को कौनसा जीवन पाठ समझाया जा सकता हैं????????????????????????????????????????????
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