Tuesday, September 30, 2008

नारी :शक्ति,बुद्धि,लक्ष्मी स्वरूपा,कल आज और कल

या देवी सर्व भूतेषु शक्ति रूपेण संस्तिथा नमस्तस्यै ,नमस्तस्यै ,नमस्तस्यै नमो नम:।।
या देवी सर्व भूतेषु विद्या रूपेण संस्तिथा नमस्तस्यै ,नमस्तस्यै ,नमस्तस्यै नमो नम:।।
या देवी सर्व भूतेषु लक्ष्मी रूपेण संस्तिथा नमस्तस्यै ,नमस्तस्यै ,नमस्तस्यै नमो नम:।।
हिंदू धर्म में देवी के इसी तरह अनंत रूप माने गए हैं ,वह शांति रूपा हैं ,कला रूपा हैं ,भक्ति रूपा हैं ,प्रेम स्वरूपा हैं , वह लज्जा ,कांति,श्रद्धा,दया ,स्मृति ,मातृ रूपा हैं , वह श्रेष्ट हैं ,आदि हैं ,अनादी हैं ,सारे ब्रह्मांड की जननी हैं क्योकी वह नारी हैं । नारी शक्ति रूपिणी हैं ,दया, माया प्रेम की अदिष्ठात्री देवी हैं इसलिए वह पूज्य हैं । नवरात्री आते ही भारतीय संस्कारो में विश्वास रखने वाली सभी नारियाँ देवी पूजा में तल्लीन हो जाती हैं , माता पार्वती के अनेक रूपों की पूजा गुजरात ,बंगाल,महाराष्ट्र व देश के अन्य हिस्सों में भक्तिभाव से की जाती हैं । प्राचीन काल से भारतीय नारी स्वयं में एक उदाहरण और आदर्श रही हैं ,वह कभी सीता हुई ,कभी सावित्री ,कभी द्रौपदी,कभी मेत्रर्यी,कभी गार्गी ,कभी मीरा ,कभी भगिनी निवेदिता ,कभी शिवाजी को गढ़ने वाली जीजा बाई ,कभी अंग्रेजो से लड़ने वाली झाँसीवाली ,कभी महारानी अवंती बाई ,कभी सरोजनी नायडू ,कभी गांधीजी की अर्धांगिनी कस्तूरबा गाँधी,जिन्होंने गांधीजी को जीवन के हर कदम पर साथ दिया ,कभी सावित्री बाई फूले ,कल्पना चावला ,कभी गायिका एम्.एस .शुभलक्ष्मी ,यामिनी कृष्णमूर्ति,हीरा बाई बडोदेकर ,लता मंगेशकर ,इंदिरा गाँधी ,बेगम अख्तर ,अनीता देसाई, और कभी किरण बेदी । यह तो सिर्फ़ उदाहरण मात्र हैं ,इनके आलवा भी कितनी ही नारियों ने नारी जाती का गौरव बढाया हैं ,ईश्वर ने नारी को सदा ही अनंत गुणों का भंडार दिया हैं ,वह शारीरिक दृष्टि से भले ही कमजोर हो किंतु उसमे भरपूर आत्मिक और नैतिक बल हैं ,और इसी बल के सहारे वह आज तक स्वयं को साबित करती आई हैं । भारतीय नारी पूज्य ,हैं गौरव शालिनी हैं तो उसमे समाये भारतीय जीवन मूल्यों ,आदर्शो और गुणों के कारण,इन्ही के कारण वह औरो से अलग हैं ,श्रेष्ठ हैं ,पूज्य हैं । किंतु आजकल कुछ लड़कियों को देखती हूँ जो सिर्फ़ आधुनिकता के चलते अपने आत्मिक और नैतिक ,सात्विक गुणों को तिलांजलि दे देती हैं तो दुःख होता हैं ,दुःख होता हैं की यह विश्व की श्रद्धा धुरी माँ भारती की सुपुत्रीयां हैं । आजकल हर कोई समय से आगे भागना चाहता हैं ,समय से पहले जीतना चाहता हैं ,अपनी ही धुन पर जीवन की सुर पेटी को बजाना चाहता हैं ,भटकाव की आंधी भारतीय संस्कृति ,सभ्यता को स्वयं में छुपा रही हैं ,और इस आंधी में भटकती भारतीय संन्नारियां अपना वजूद खो रही हैं ।जीवन जीना एक कला हैं ,उसे एक उद्देश्य और अर्थ प्रदान करना कलाकारी। कोई भी कला धैर्य ,और समय मांगती हैं लगन मांगती हैं ,इसलिए उन महिलाओ से जो इस अंधी दौड़ में आँख बंद कर के भाग रही हैं ,या वे जिन्हें अपनी शक्तियों ,क्षमताओ का पूर्ण ज्ञान न होने से कठिन रास्तो पर लडखडा कर गिर रही हैं उनसे अनुरोध हैं ,की जाने की वे जिस देवी की पूजा कर रही हैं ,वो देवी किसी मन्दिर या मूर्ति में नही स्वयं उनकेआत्मा में निवास कर रही हैं ,तभी वे नारी के सही रूप को जान पाएँगी,और देवी की सही पूजा कर पाएँगी .आज भी उनके लिए प्रेरणा स्वरुप कितनी ही नारिया भारत को गर्वान्वित कर रही हैं ,और अपने जीवन को सही तरीके से जीकर सफल बना रही हैं । आख़िर स्त्रियों पर ही कल की नारियाँ और भविष्य की देवियाँ गढ़ने की जिम्मेदारी हैं मैं चाहती हूँ की आने पीढीयाँ ह्रदय से गाये "त्वं ही दुर्गा दश प्रहरण धारिणी ,कमला कमल दल विहारिनिम ,वाणीर विद्या दायिनी ,नमामि त्वं नमामि कमलां अमलां अतुलाम..........................."

Sunday, September 21, 2008

क्या बारात निकालना सही हैं ?



भारतीय विवाह परम्परा में बारात का अपना महत्व हैं ,बारात का आगमन विवाह के कार्यक्रम की पहली सीढ़ी होता हैं,जैसे ही बारात आती हैं,विवाह स्थल पर खुशी की एक लहर दौड़ जाती हैं ,दुल्हन पक्ष के बड़े,बुजुर्ग ,बच्चे ,युवक युवतियाँ सब के सब बारात देखने को उमड़ पड़ते हैं। एक अलग ही उल्लास बारात से जुडा होता हैं ।बाराती बनके जाना यानि ठाठ ही ठाठ । फ़िर उस दिन के लिए हर कोई राजा ,हर कोई रानी ,हर बच्चा राजकुमार ,राजकुमारी । दुल्हन पक्ष के लोग बारात की आवभगत में कोई कसर नही छोड़ते,बारातियों की हर इच्छा को सर आँखों पर लिया जाता हैं । बारात का महत्व इस कदर हैं की वह विज्ञापन"बारातियों का स्वागत पान पराग से " बहुत लोकप्रिय हुआ था ,शायद बच्चे बच्चे को पता चल गया था पान पराग, पान मसाला होता हैं । न जाने कितने हिन्दी फिल्मी गीत बारात को लेकर हैं ।

आज भी बारात जाती हैं कही बस से कही ट्रेन से ,कही विमान से ,हमेशा खुशियों की बारात लेके । पर कहीं- कहीं ये बारात मुसीबत की बारात भी बन जाती हैं । बारात विवाह स्थल तक पहुँचे सभी चाहते हैं ,और इसलिए ईश्वर से दुआ भी करते हैं । लेकिन शादी की रस्मो के पहले बेंड बाजे के साथ बारात जो गली -गली, सड़क -सड़क घुमाई जाती हैं , वह सब लोगो के लिए मुश्किल का कारण बन जाती हैं । अब कुछ ही दिनों में फ़िर से विवाह शुरू होने वाले हैं ,फ़िर देखियेगा शहर की सारी सड़के बारातो से भरी- भरी नज़र आएँगी । सड़के ,सड़के नही बारात मेला लगेंगी ।

बारात की परम्परा इतनी पुरानी हैं की शिव जी भी पार्वती माँ के घर बारात लेकर गए थे,उनकी
गणों ,कंकालो ,आदि से भरी पुरी बारात देखकर पार्वती माँ की माँ को चक्कर आया था और वे बेहताशा डर गई थी। लेकिन सब पुरानी बातें सभी युगों में उसी तरह ग्राह्य होती हैं ऐसा नही हैं न। जो पुराने समय में होता था.उस समय ,उस बात के लिए अनुकूल एक समाज व्यवस्था,लोगो की सोच,उनका समय,गाँवो का रूप आदि बातें थी .उस समय छोटे छोटे गाँवो से बारात निकलती थी तो सारे गाँव के बच्चे बूढे, बारात में शामिल होकर बारातियों और घरातियों की खुशी में शामिल हो जाते थे । उस समय लोगो का आपस में उतना अधिक मेलजोल भी था और उनके पास समय भी होता था। आज के समय की तरह बाइक ,स्कूटर ,कार आदि की भीड़ नही हुआ करती थी रास्ते पर ।

पर आज हम कितने ही आगे आगए हैं ,एक तरफ़ समय की कमी हैं ,दूसरी तरफ़ सड़क पर वाहनों की लम्बी श्रृंखला हैं ,कहीं सड़के सही नही हैं ,तो कहीं मौसम की खराबी हैं ,किसीको ऑफिस जाना हैं ,किसीको स्कूल भागने की जल्दी हैं ,किसीको मीटिंग अटेंड करनी हैं ,तो किसीको किसी प्रोग्राम का लाइव कवरेज देना हैं। जिन्दगी की इस रफ्तार में किसीकी बारात देखने का उसके साथ नाचने का समय किसी के पास नही हैं । उस बारात में किसीको दिलचस्पी नही हैं । बल्की सडको पर जब बारात निकलती हैं तो लोगो की चिड चिड और परेशानी बढ़ जाती हैं । सबसे बुरा आलम तो तब होता हैं जब बारातो के कारण ट्रेफिक जाम हो जाता हैं ,जहाँ लोगो को गंतव्य तक पहुँचने की जल्दी होती हैं ,एक एक क्षण कीमती होता हैं ,वहाँ बिना वजह से हो रही यह देर, लोगो के मुंह से इस शादी के लिए आशीष नही निकलवाती , बल्की उनकी नाराज़गी का कारण बनती हैं । सोचिये किसी युवक को उसके इंटरव्यू के लिए पहुँचना हैं ,सब कुछ सही होते हुए भी अगर वह समय से सिर्फ़ इस बारात के कारण नही पहुँच पाता तो उसका कितना बड़ा नुकसान होता हैं ।

आजकल बेंड वालो के संगीत का वाकई बुरा हाल हैं ,इतना बेसुरा बजाते हैं की सुनकर लगता हैं ,अपने कान फोड़ लिए जाए ,आत्महत्या कर ली जाए। चलिए बेसुरा तो बजाते ही हैं , उस पर लोग नाचते हैं अब बताये बारात आ रही हैं ,उस दूल्हा दुल्हन की जिन्दगी में खुशियाँ आ रही हैं,और गाना चल रहा हैं "शिर्डी वाले साईं बाबा आया है तेरे दर पे सवाली लब पे दुआएं आखों मैं आँसू, दिल मैं उमीदें पर झोली खाली "बाराती नाच भी रह रहे हैं इस पर ,फ़िर दूसरा गाना चलता हैं ऐ मेरे वतन के लोगो जरा आंख में भर लो पानी जो शहीद हुए हैं इनकी जरा याद करो कुर्बानी ।फ़िर गाना बजता हैं ,दिल के अरमान आसुओं में बह गए ।
किसी पास वाले घर में कोई नन्हा मुन्ना बच्चा सो रहा हैं,वह इस शोर गुल से जाग जाता हैं और जोर जोर से रोना शुरू कर देता हैं,यह बात दूसरी हैं की उसका रोना इनके गाने से ज्यादा सुर में लगता हैं ।
कहीं बूढे दादाजी बीमार हैं डॉक्टर ने शान्ति से आराम करने को कहा हैं पर वो सिर्फ़ इसलिए नही सो पा रहे क्योकी बारात का शोर उन्हें असहनीय हो रहा हैं। कल से 12th की परीक्षाएं शुरू हैं। बच्चे पढ़ना चाहते हैं पर पढ़ नही पा रहे क्योकी उनको लगातार यह गाने सुने दे रहे हैं ।
मुझे समझ नही आता सड़कों पर इस तरह नाचने का औचित्य । हम जीवन में कोई भी काम क्यों कर रहे हैं ?इसके करने से क्या फायदा हैं ?क्या नुकसान हैं?क्या हमारा ये काम वाकई दूसरो को खुशी दे रहा हैं,क्या ये वाकई हमें खुश कर रहा हैं ?ये खुशी हैं या सिर्फ़ खुशी का दिखावा?इन सब प्रश्नों का उत्तर हमारे पास होना चाहिए जब हम कोई काम कर रहे हैं.कोई भी कम हमें खुशी दे पर कम से कम वो दूसरो दुःख न पहुचाये इसका ख्याल रखा जाना चाहिए ।
बारात निकलने का औचित्य क्या हैं ,क्या इसे निकलना जरुरी हैं ,या पीढियों से चली आरही रूढ़ी का सिर्फ़ पालन । इस बात पर विचार किया जाना जरुरी हैं । विवाह खुशी का अवसर जरुर हैं,नृत्य खुशी के इजहार का सशक्त साधन , वह होना चाहिए ,पर उसके लिए विवाह स्थल दूल्हा दुल्हन का घर काफी हैं ,इस तरह सड़कों पर नृत्य करना न तो हमारी संस्कृति का अंग हैं न ही संस्कारो का दर्पण ।
इति ।


,

शादी या बर्बादी

शादी .......एक ऐसा शब्द जिससे जुड़ी होती हैं न जाने कितनी जिंदगियाँ ,नए पुराने रिश्ते ,प्यार और विश्वास । शादी...............जब बच्चे यह शब्द सुनते हैं तो उनके नज़रो के सामने होता हैं अच्छा सा खाना ,धूम धडाका ।मौज मस्ती ,और अपने हमउम्र भाई बहिनों से खेलने का एक सुंदर मौका ,जहाँ कोई पढ़ाई की बात तक नही करता ।
शादी.............जब युवतियाँ यह शब्द सुनती हैं तो कल्पना की दुनियाँ में खो जाती हैं ,जहाँ होता हैं उनके सपनो का राजकुमार ,सात जन्मो का प्यारा सा बंधन,मंगलसूत्र का विश्वास ,और सात वचनों का साथ ।
जब माँ, दादी ,काका ,ताया यह शब्द सुनते हैं तो उन्हें उनके साथ होती हैं कुछ यादें,बेटी की विदाई से ढलकने वाले आंसू और बहूँ के आगमन से मिली खुशी ।
शादी ....समाज व्यवस्था की सबसे सुंदर परम्परा । जो देती हैं दो जिंदगियों को जीने की नई दिशा , एक साथी ,एक सहारा ।एक मित्र ,और कोई अपना ।भारत में कई हजारो वर्षो से यह परम्परा अस्तित्व में हैं , हमारे यहाँ माता पिता की इच्छा अनुसार विवाह हुए , बेटियो ने स्वयं की इच्छा से भी विवाह किए ,पार्वती माँ के विवाह गाथा और कृष्ण रुक्मणी के प्रेम विवाह की कथा से कौन अपरिचित हैं ।पर कभी कभी सोचती हूँ की यह विवाह प्रथा जब शुरू हुई तब इसमे जो पवित्रता ,सादगी और सच्चाई होगी वह आजकल के विवाह में देखने को नही मिलती । हमारे देश में जहाँ सीता और सावित्री जैसी सतियाँ हुई हैं ,जहाँ शिव और विष्णु जैसे पति हुए हैं,जहाँ विवाह को जन्मों का साथ समझा जाता रहा हैं ,वहाँ विवाह, हल्की सी आंधी और छोटे से तूफान से बिखरकर टूट रहे हैं । मैं यह नही कहती की स्त्री की गलती हैं या पुरूष की गलती हैं , दोनों ग़लत हो सकते हैं ,और कभी कभी जिन्दगी में फ़िर से सुख शांति लाने के लिए ऐसा करना जरुरी भी हो जाता हैं .लेकिन यह बात सच हैं की कहीं न कहीं एक दुसरे के विचारों के साथ तालमेल बिठाने की इच्छा में कमी आई हैं ,एक दुसरे को समझने की कोशिश में कमी आई हैं । एक दुसरे के विचारो को ,सोच को मान सन्मान देने में कमी आई हैं इसलिए धडाधड तलाक़ हो रहे हैं .किसी भी रिश्ते में तालमेल बिठाना किसी एक पक्ष का काम नही हैं यह दोनों पक्षों की तीव्र इच्छा शक्ति , प्रेम और विश्वास के द्वारा ही सम्भव हैं ,वरना रिश्ते युहीं खत्म होने लगते हैं ।यह तो हुई शादी निभाने की बात ,दूसरा महत्वपूर्ण मुद्दा शादी के सही अर्थ को लेकर हैं ,यहाँ मैं शादी के शाब्दिक अर्थ की बात नही कर रही ,शादी होती हैं दो दिलो का बंधन ,दो परिवारों का जुडाव ,दो जिंदगियों का एक नवीन जीवन में पदार्पण,पर कुछ लोग इसे पैसे देने लेने का खेल समझते हैं। दहेज़ प्रथा के विरुद्ध न जाने कितनी कोशिशे हुई,कानून बने ,पर यह प्रथा आज भी हमारे समाज को घुन की तरह खायी जा रही हैं,रिश्तो के इस बाज़ार में रिश्तो के दाम लगाये जाते हैं ,लड़का डॉक्टर हुआ तो २० लाख दहेज़ ,इंजिनियर हुआ तो २२ लाख ,बिजनेस करता हो तो ५० लाख आदि आदि। मैंने अपनी कई सुंदर और होशियार सहेलियों को सिर्फ़ इसलिए अच्छी उम्र तक कुंवारी बैठे देखा हैं क्योंकि उनके पापा के पास इतने पैसे नही हैं ,बताए पैसो से तोले गए इस रिश्ते में कभी वो प्यार ,विश्वासकी भावना सम्भव हैं ?शादी आजकल पर्याय बन गई हैं लाखो रूपये खर्चने का ,बड़े बड़े होटलों में शादियाँ हो रही हैं ,न जाने कितने प्रकार के भोजन बन रहे हैं ,न जाने किन किन रिश्तेदारों को जिन्हें शायद दूल्हा ,दुल्हन भी ठीक से नही पहचानते,कपड़े और उपहार दिए जा रहे हैं । न जाने कितने ताम झाम किए जा रहे हैं ,हजारो रूपये के मनोरंजन कार्यक्रमों का आयोजन हो रहा हैं । और इस दिखावे में तमाम खाना फेका जा रहा हैं । न जाने कितने पैसो का दुर्वय्य हो रहा हैं । माता पिता की कमर टूट रही हैं ।आजकल नया चलन चला हैं ,कुछ लोगो को शादी में किसी विशेष व्यक्तिमत्व का रूप देकर सजाया जाता हैं,जैसे राम, कृष्ण ,गांधीजी,वकील,नेता आदि और घंटो बिना हिले डुले खड़ा कर दिया जाता हैं,वे लोग पलक तक नही झपकते इतने घंटो,उन्हें देखकर बच्चे तालियाँ बजाते हैं,बड़े खुश होते हैं ,और आयोजक अपने गरिमामय आयोजन से गर्वान्वित अनुभव करते हैं .पर इन सब पैसो के खेल में इंसानियत मर जाती हैं ,पैसे की आवश्यकता इन्सान से कोई भी काम करवाती हैं,पर पैसे वालो को सोचना चाहिए की वे क्या काम करवा रहे हैं ।मुझे लगता हैं की शादी को अविस्मरणीय बनाने के लिए रिश्तो में समझ की, प्रेम की,सादगी की, सरलता की जरुरत होती हैं ,न की पैसा फुकने की ,दिखावे की ,क्योंकि दिखावे के आधार पर बने रिश्तो की ईमारत ज्यादा नही टिकती,फ़िर भी पैसे खर्च करने हैं तो जरुर करे पर उसका अप्वय्य न हो इसका ख्याल रखा जाना चाहिए । नही तो शादी ,शादी कम बर्बादी ज्यादा लगती हैं ।
सधन्यवाद ।

Tuesday, September 16, 2008

वायरस और टोना टोटका

वायरस और टोना टोटका इन शब्दों से आज भारतीय जनसँख्या का ८०% हिस्सा परिचित हैं ,भारतीय ही क्यों?विश्व भर की जनसभ्यता इन तीन शब्दों से डरती, सहमती हैं। हाँ हैं कुछ कर्मनिष्ठ,अविश्वासी प्राणी जो इन दो विषयो को सिरे से खारिज करते हैं ,उन्हें विश्वास होता हैं तो सिर्फ़ अपने कर्मो पर । राम गोपाल वर्मा साहब की सिनेमा सृजनात्मकता के चलते हमें भूत प्रेत ,टोना टोटका के बारे में थोड़ा बहुत तो ज्ञान हो ही गया हैं .पता नही उन्हें इतनी भूत प्रेत और टोना युक्त पिक्चर बनाने की अतुल्य बुद्धि कहाँ से आती हैं?हर पिक्चर में कुछ नया और अनोखा होता हैं ,अब "डरना मना हैं " को ही लीजिये ,मैंने अपनी जिन्दगी में कल्पनाशीलता की इतनी पराकाष्टा नही देखी । वर्मा साहब को सेवफल में भी भूत नज़र आता हैं । इतने सस्ते सेव मैंने अपने जीवन में नही देखे। यहाँ तो सेव फल १२० -१५० रुपये से कम नही मिलते वहां सिनेमा में १० रूपये किलो और साथ में भूत या बुरी आत्मा एकदम फ्री फ्री फ्री..... अब फूंक को ही देख लीजिये ,जिन बातो के बारे में घर परिवार में बच्चो के सामने बात तक नही होती वहां इस फ़िल्म में बच्चो को कहानी का मुख्य पात्र बनाकर टोना टोटका विषयक सारी बातें दर्शको को सविस्तार समझाई जाती हैं ।इस फूँक को देखकर अब बांसुरी को फूकने वाले कलाकारों से भी डर लगने लगा हैं । :-)
यह तो हुई राम गोपाल जी की पिक्चर की बात। लेकिन वास्तविक जिन्दगी में भी कई लोग हैं जो इसमें विश्वास रखते हैं ,सिर्फ़ विश्वास ही नही रखते ऐसे भयावह प्रयत्न करते भी हैं ,मजे की बात तो यह हैं की सिर्फ़ ग्रामीण इलाको में ही नही अच्छे भले पढ़े लिखे सुसभ्य नगरो में भी इस तरह की घटनाये होती हैं और बहुत ज्यादा होती हैं ,हर दूसरे दिन सड़क के बीचों बीच टोना टोटका से सम्बंधित वस्तुएं पड़ी होती हैं । निम्बू कितना सुंदर और रसीला फल हैं उसकी इमेज की तो इस टोना टोटका ने वाट लगा दी हैं ।
लोगो की जिन्दगी में इस टोनाटोटका का खौफ कम था, की इन्टरनेट वायरस ने उनके डर में और तड़का लगा दिया। जी हाँ ये वायरस किसी टोना टोटका से कम नही ,टोना टोटका क्या मुश्किल पैदा करेगा?उससे कहीं अधिक मुश्किल यह वायरस पैदा कर देता हैं। अब मेरी बात ही लीजिये ,१५ दिन हो गए कम से कम , ब्लॉग पर ज्यादा कुछ लिख ही नही पा रही हूँ। मेरा ब्लॉग वीणापाणी तो मेरी याद में रो रो के गा रहा हैं मेरी वीणा तुम बिन रोये .दरसल हुआ यह हैं की पता नही कैसे मेरे कंप्यूटर में बहुत से वायरस ,उसके जात भाई ट्रोजन और वार्म घुस गए हैं.कंप्यूटर पहले बीमार हुआ और अब मृत्यु के कगार पर पड़ा हैं , मैं और सॉफ्टवेयेर इन्जिनियेर लगभग हार चुके हैं अब तो ईश्वर की कृपा और आपकी दुआओं का ही सहारा हैं .कृपया मेरे कम्प्यूटर की सलामती के लिए ,उसके जीवन की रक्षा के लिए prarthanaa कीजिये .अन्यथा उसको कूडे दान में में फेकने के आलावा मेरे पास कोई चारा नही रहेगा .आज और पिछली कुछ पोस्ट्स पतिदेव के लैपटॉप से लिख रही हूँ ।
इन पंद्रह दिनों में विचार कर कर के थक गई हूँ की ,इन टोना टोटका करने वालो और इन वायरस सृजनकारो को ये सब करके हासिल क्याँ होता हैं ? कोनसा सुख ,लाभ ये प्राप्त कर लेते हैं ?दूसरो का बुरा कर ख़ुद का भला करने की यह मनोवृत्ति ,विकृतवृत्ती ही कहला सकती हैं ,मेरी नज़र में यह सब करने वाले लोग मानसिक बिमारियों से ग्रसित ही कहला सकते हैं । इसके मूल में होती हैं अपने सुख की उत्कट इच्छा और दूसरो के सुख से जलन । जो दूसरो के पास हैं हमारे पास क्यों नही हैं इसका दुःख .और उसकी दुःख से उपजे अवसाद की विकृत परिणिति होती हैं टोना टोटका और वायरस निर्माण ।ये वायरस निर्माता जो अत्यधिक बुद्धि के मालिक हैं वे अपनी बुद्धि का प्रयोग अच्छे कामो और ख़ुद के विकास के लिए करे तो उनका और औरो करो कितना भला हो सकता हैं .पर ये लोग यह न करते हुए न जाने कितने ही वायरसों का निर्माण कर देते हैं और दूसरो के कम्प्यूटर की ऐसी की तेसी कर खुश हो जाते हैं ।
सच कहूँ तो यह पढ़े लिखे कम्प्यूटर वायरस निर्माता ,टोना टोटका विशेषज्ञ के ही जात बंधू हैं । टोना टोटका या ब्लैक मेजिक करने वाले जहाँ निम्बू ,गुडिया ,नारियल ,आदि आदि से अपना काम चलाते हैं ये कम्प्यूटर भाषाओ को अपना औजार बनाते हैं ।
मेरी इन दोनों प्रकार के भाई बहनों से विनती हैं ,दूसरो का बुरा सोचने और करने से पहले निस्वार्थ होकर अपना भला सोचे और फ़िर भी यदि आपकी बुद्धि आपको यह सब करने के लिए प्रेरित करती हैं तो इसके पहले की आपको मानसिक बीमारियाँ पुरी तरह से अपनी जकड में ले ले आप किसी अच्छे मनोरोग विशेषज्ञ से अपना इलाज शुरू करवा दे ।
धन्यवाद !

Saturday, September 13, 2008

कौन हैं आतंकवादी ?

कुछ महीनों से लगातार आ रही बम विस्फोट की खबरे सुनने के बाद भी ख़ुद को शांत बनाये रखा था ,न आंसुओ को ढलकने दिया ,न इस विषय पर लेखनी को चलने दिया ,पर आज जब सुना की फ़िर से एक बार दिल्ली में बम विस्फोट हो गए हैं,मेरी आँखों की श्रावणी नदी का बाँध टूट गया । बहुत रोई मैं,आंसुओ की जलधाराओं में नींद की कब हिम्मत बनी हैं आँखों में टिक पाने की ?

लेखन और लेखनी ईश्वर के वरदान ही हैं ,अंतर्मन में प्रश्नों के सवालों की जब सुनामी उठती हैं तब सिर्फ़ और सिर्फ़ लेखनी ही प्रिय सखी सी आपका दुःख कम करती हैं। तक़रीबन ८ बजे से सोच रही हूँ,यह क्या हो रहा हैं ?कहाँ जा रहा हैं इन्सान का जीवन ? आज विस्फोट ,कल दंगे,परसों खून ,चक्काजाम । यह सब क्या हैं ?और क्यों हैं ?पिछले कुछ सालों में इन सब गतिविधियों में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि हुई हैं । पिछले तीन चार महीनों से होने वाले इन विस्फोटो ने न जाने कितनो की जानें ली हैं ,न जाने कितनो के घर बर्बाद किए हैं। कुछ सालो पहले तक हम रोते थे कभी कही किसी के यहाँ किसी की मौत हो जाने पर ,ज्यादा रोते थे किसी अल्पवय के व्यक्ति की किसी दुर्घटना में मृत्यु हो जाने पर । पर आज तो हर कहीं मौत हैं। हर रोज़ मौत हैं । छोटा ,बड़ा, अच्छा ,बुरा हर कोई मर रहा हैं ,जैसे इन्सान नही दिए रूपी पृथ्वी के पास मंडराने वाले पतंगे हो ,जिनकी नियति कुछ पल में मर जाना ही होती हैं । और यह सब क्यों ? इन सब का जिम्मेदार कौन ?इन्सान। वही इन्सान जिसने धरती पर जीवन का रंगमंच सजाया ?जिसने आशा के पंखो पर आसमंती रंगों की रंगावली बनाकर जीवन की रंगोली को स्वप्निल रंगों से सजाया ?वह इन्सान जिसके ह्रदय गान के मधुर स्वरों ने समूचे ब्रह्माण्ड को प्रेम गीत से गुंजारित किया ?वह इन्सान यह सब कर रहा हैं ?आख़िर क्यो ?हम कहते हैं दंगाइयो ने ऐसा किया । आतंकवादियों ने ऐसा किया । पर यह कहते हुए भूल जाते हैं की वह दंगाई ,वह आतंकवादी भी इन्सान ही हैं ,तो यह सब इन्सान ही कर रहा हैं ,इन्सान ही इन्सान को मार रहा हैं । हम कभी धर्म के नाम पर लड़ते हैं ,कभी मजहब के नाम पर कभी बस यूँही लड़ने के लिए लड़ते हैं ,हम ही मारते हैं ,हम ही मरते हैं ,पर फ़िर भी लड़ते हैं । हमें मारने वाले भी इन्सान ही तो हैं ,जब ये पैदा हुए होंगे तो ऐसे तो न होंगे ,किस बात ने इन्हे इतना भावनाहीन बना दिया की ये मानव होकर भी दानव बन गए । पिछले कुछ वर्षो से जीवन शैली में आमूलचुल परिवर्तन आया हैं ,परिवर्तन आया हैं विचार शैली में ,जीवन जीने की रीती में ।चलती भीड़ में हर कोई एकाकी हैं ,रिश्तो में वह बात नही रही ,वह प्यार नही रहा ,वह जीने का अंदाज़ नही रहा .भटकाव और निराशा का चक्र्व्ह्यु हर किसीको आसानी से अपनी चपेट में ले रहा हैं .इसी दौर में कुछ भटके हुए ,थके हुए और मानिसक रूप से अस्वस्थ हुए मनुष्य बन गए हैं आतंकवादी ।ये हमें मार रहे हैं ,हम रो रहे हैं ,और ये खुश हो रहे हैं ,पर सच तो यह हैं की हम नही,ये ही मर रहे हैं ,जितनी बार बम विस्फोट होते हैं ,मरने वाले मरते हैं उनके लिए रोने वाले उनकी आत्मा को शान्ति पहुचाने के लिए जी भर के प्रयत्न करते हैं,वह शरीर खोते हैं पर साथ अपनों का प्यार ले जाते हैं ,अगर पुनर्जन्म के सिद्धांत को माने तो वह दूसरा जन्म भी लेते हैं । पर हर बार इन आतंकवादियों की आत्मा मरती हैं ,इनके जस्बात सूखते हैं ,इनकी भावनाए मुर्दा हो जाती हैं ,हमसे अधिक कष्ट इन्हे होता हैं ,कौन इन्सान भावनाहीन,संवेदनाहीन होकर जीवन को जी पाया हैं ?यह जीवन नही जी पाते ,प्रेम ,सुख आत्मानंद सब ,सब से ये कोसो कोसो दूर हैं । इनके दिमाग को शायद कभी वह शान्ति महसूस ही नही हुई हैं , ये जी नही रहे ,यह हर एक क्षण मर रहे हैं ।(कहने वाले कहते हैं की इनकी आत्मा नही होती ,भावनाए नही होती,पर कहीं इन्सान भी ऐसा होता हैं जिसकी भावनाए नही हो ,जिसको कभी किसी बात का दर्द नही होता हो ?अन्तर यह हैं की इन्होने अपने दर्द को अपनी आत्मा को अपनी भावनाओ को दबा दिया हैं ,उन्हें कभी खून ,हत्या ,मार धाड़ ,दुष्टता से उपर आने ही नही दिया ।)

जरुरत हैं सुधार की,जो भी, जहाँ भी बच्चों का, युवकों का ब्रेनवाश करके उन्हें इस तरह बनाया जा रहा हैं उसे रोकने की। जरुरत हैं ,आने वाली पीढियों को प्यार का मंत्र सिखाने की ,हर मुसीबत से लड़ने की हिम्मत दी जाने की , हर व्यक्ति में इंसानियत जगाने की । जरुरत हैं बच्चों को पढ़ाई लिखाई के साथ जीवन का अर्थ बतलाने की ,बुराई से लड़ने की,बल्कि उसे जीतने की शिक्षा दी जाने की ,नही तो आतंकवादी रोज़ जन्मते रहेंगे ,कभी यहाँ कभी वहां बनते रहेंगे ।

Thursday, September 11, 2008

नारी :आख़िर संघर्ष किससे ?

आजकल सब जगह नारी स्वतंत्रता की बात हो रही हैं२१ वीं सदीं में जीवन के हर क्षेत्र में नारी ने स्वयं को सिद्ध कर दिखाया हैंउसने यह साबित कर दिखाया हैं की वह भी उन्नति के रथ पर आरूढ़ होकर सफलता के शिखर पर अपनी गौरव ध्वजा फहरा सकती हैंफ़िर भी नारी संघर्ष अभी जारी हैं और आने वाले कुछ वर्षो तक जारी रहेगापरन्तु संप्रति हो रही नारी चर्चा सुनकर ऐसा लग रहा हैं की नारी शायद भूल रही हैं की उसका संघर्ष किससे हैं ?
पुरूष और नारी समाज के दो आवश्यक घटक हैं ,अगर कहे की नारी और पुरूष से मिलकर ही समाज का निर्माण हुआ हैं तो ग़लत होगाऐसे में,जब कहा जाता हैं की नारी को पुरुषों से संघर्ष करना हैं या उनके विरुध्द खडें रह कर आगे बढ़ना हैंऐसे ही जब पुरुषों पर बात आती हैं तो वह स्त्री विरोधी अभियान के प्रमुख सेनानी बन जाते हैं . यह सब देखकर लगने लगता हैं की हम कहाँ जा रहे हैं ? मन सोचने पर मजबूर हो जाता हैं की क्या नारी ,पुरूष की प्रतियोगी हैं ? या पुरूष,नारी का प्रतियोगी हैं ?
नारी जहाँ पुरूष की माता हैं ,बहन हैं,सखी हैं ,पत्नी हैं , वही पुरूष भी स्त्री का भाई हैं ,सखा हैं ,पति हैं ,पिता हैंनारी और पुरूष संसार रूपी नाटक के वह पात्र हैं जिनके बिना संसार नाट्य की प्रस्तुति असंभव हैंअगर पुरुषों द्वारा नारी पर अत्याचार हुए हैं तो नारी भी नारी दुःख में कम सहभागी नही हैं

कुछ दिनों पहले कहीं सुना की नारी जब पुरुषों के विरुध्द खडी हो सकती हैं तो वह ईश्वर की सत्ता को चुनौती क्यों नही दे सकती ?संसार का हर धर्म और ईश्वर नारी की प्रगति के खिलाफ हैंमन बहुत दुखी हो गया . सोचा, क्या नारी केवल विरोधी बनकर रह गई हैं ?आधुनिकता के मायने पुराने संस्कारो और विश्वास को छोड़ देना तो नही हैंसंस्कार इन्सान को इन्सान बनाते हैं ,वही धर्म शब्द की व्याख्या इस प्रकार की गई हैं "ध्रु धातु धारणायत धर्म इत्याहु :"एवं -धारयति :धर्म:" अर्थात वह नियम जो संसार को सँभालते हैं ,जिनके आधार पर संसार टिका हुआ हैं वह धर्म हैंइस प्रकार धर्म शब्द का अर्थ व्यापक हैं ,हमारे पवित्र धर्मग्रन्थ गीता में भी कही नारी की प्रगति को रोकने के फार्मूले नही दिए गएही कही किसी धर्म में नारी पर अत्याचार करने की बात कही गई हैंहाँ मध्यकाल में कुछ बाते कुछ स्वार्थी लोगो द्वारा विशिष्ट उद्देश्यों से धर्म के साथ जोड़ दी गई ,नारी को सिर्फ़ उन बातो का विरोध करना हैं,साथ ही यह भी है की कुछ बाते जो वैज्ञानिक रूप से सही हैं उन्हें भी धर्म के माध्यम से नारी को बताया गया ताकि वो उनका पालन करे ,यह हमारे उपर हैं की हम किस बात को मानते हैं पर अधार्मिक हो जाने से नारी प्रगतिमान हो जायेगी यह बात मुझे नही रुचतीईश्वर के मानने वालो के लिए वह प्रेम ,शान्ति और शक्ति का केन्द्र हैं और जाने कितने देवी रूप हैं जो प्राचीन काल से हर नारी का आदर्श रहे हैइसलिए ईश्वर और धर्म का विरोध करके नारी यह जंग जीत जायेगी ऐसा नही हैं
दरसल नारी का संघर्ष पुरूष से हैं, नारी से, नही ईश्वर और धर्म सेनारी का संघर्ष हैं तो सिर्फ़ उन बुराइयों से जो नारी को अपना श्रेष्ठत्व सिद्ध करने से रोकती हैंउन रुढियों से हैं जो नारी को सदियों से छलती आई हैंअपनी प्रगति के लिए नारी को आधुनिकता के नए अर्थ खोजने की या पुरुषों के विरुध्द खडे रहने की कोई आवश्यकता नही हैंनारी स्वयं एक शक्ति हैं, प्रेरणा हैं,ज्योति हैं, जीवन हैं और जीत हैंइसलिए अगर आवश्यकता हैं तो सिर्फ़ अपनी पुरी ताकत बटोरके अपने उचित उद्देश्य के पथ पर आगे बढ़ने कीआत्म शक्ति और दृढ़ इच्छा शक्ति के बल पर दुनिया की कठिनतम वस्तुए भी प्राप्त की जा सकती हैंअपनी निर्णय क्षमता पर भरोसा हैं तो मुझ पर विश्वास कर सारे विरोध त्याग कर प्रेम से मन लगा कर ,अपनी मंजिल पाने की कोशिश करे ,दुनिया की कोई भी ताकत आपको नही रोक सकतीइसी प्रकार पुरूष भी नारी को उसके दुःख को दूर करने में सहायक बने ,उसके जीवन लक्ष्य को पाने में सहभागी बनेतभी एक सुखी,समृद्ध,स्वस्थ समाज का निर्माण हो सकता हैं
इति
"आरोही" की नयी पोस्ट पाए अपने ईमेल पर please Enter your email address

Delivered by FeedBurner