Thursday, November 12, 2015

भंवरा बावरा -बावरा

 आज भोर मन कुछ गुनगुनाते हुए  जागा। ठंडी पुरवाई ने  रिमझिम के  संग जैसे शब्द भी अनंत पर बिखेर दिए हो।
कुछ क्षण यु ही बीते ,फिर बरबस ही वह शब्द सुरों का संग ले मेरी गायत्री वीणा से मुखरित हो घर में मधु वर्षा करने लगे ,दीवारो  प्रतिध्वनित होते हुए उन्हें मैंने सुना, रोज रोज डाली - डाली क्या लिख जाये भंवरा बावरा - बावरा . मैं मुग्ध ह्रदय बर्तनो की खड़खड़ से ताल दे गीत की वाक्य रचना को वाह -वाही देने लगी ,भंवरा बावरा -बावरा। … वाह -वाह.

बड़ी सुन्दर प्रात :बेला थी ,सप्तरंगी इंद्र-धनुष आसमान पर आसन लगा मुझे अपने रंगो में डूब जाने को विवश कर रहा था ,सामने शिव मंदिर  लगे वृक्ष उनके प्रेम-पत्र  पवन के झोके से ;पुष्पों की चुनरी संग बहा उनकी प्रिया अर्थात मुझ तक पंहुचा रहे थे।  वह विविध रंग फूल सप्तरंगो से सजे इद्रधनुषी हिंडोले पे विराजित हो ' जीवन सौंदर्य स्वरूप ' यह सन्देश इस जीवनकथ्य नायिका को बतला रहे थे।

  मैंने अपने ओठो पर  कॉफ़ी का मग लगाया ,मेरे ओष्टो ने गीत गुनगुनाना बंद किया ,पन मन भ्र्मर अद्यपि गुनगुना रहा था। …बावरा -बावरा।

अखबार के प्रथम पृष्ठ पर नज़र डालते ही समाचार दिखा "Death,Destruction in Neighborhood" ..
भारत के तीन पडोसी देशो में अनेक प्राकृतिक आपदाओ के चलते लाखो लोगो ने प्राण गवाए।  धप से  समाचार पत्र का मुंह बंद किया।  सुन्दर समाचार की आशा में मराठी समाचार पत्र को तरेरा . " मालनीवर माटी ओतुन सम्पूर्ण ओळख पुसनार ! यह खबर थी महाराष्ट्र के मालिन गांव में  धरती धसने के कारण पूरा गांव माटी में गड के नष्ट हो जाने की।
मेरा मन अभी भी जीवन का सुन्दर  स्वप्न  मुझे सुना रहा था और मेरी आँखे जीवन का सत्य ,जीवन की विभीषिका दिखला रही थी।

प्रकृति कोप ,मृत्यु ,जीवन का सर्वनाश…
 जीव हत्या ,प्रिय बिछोह ,अन्न -जल त्रासदी…
लज़्ज़ा -हरण ,भीत - वदन ,ह्रदय -खंडन ……

 त्राहिमाम् ....... त्राहिमाम् ....... त्राहिमाम् ....... 

मैं चिल्ला उठी ,लड़खड़ाते -गिरते - कँपकँपाते घर के देवालय की और भागी।
सामने माँ त्रिभुवन सुंदरी की मूर्ति के सामने गिरकर विव्हल कंठ से भयनाद करने लगी ,त्राहिमाम् शरणागतम।
माँ त्राहिमाम् शरणागतम।

मेरी मुंदी हुई आँखों से अश्रुधारा बहती रहती ,समय सम्राज्ञी अपनी धीर गति में मेरे अश्रुओ को आबादित कर चंचल - विचल बहती रही।

आँखे खुली, बरखा रानी बादलो के संग कदाचित मेरे मित के देश ,मेरी व्यथा का गान सुनाने जा पहुंची थी।  बड़बोली कही की  …  अब हर बात पी को सुनना आवश्यक तो नहीं।

अंतर्मन भ्र्मर सत्य बाणों से छिद्रित लहुमय होने के उपरांत अब शांत हो चूका था। न प्रभाती का गीत था ,न जीवन की वेदना।  मैंने  शांत भाव से माँ मातंगी को देखा ,उसके श्याम वर्ण पर करुणा की रक्तिम आभा छलक रही थी।

मन की गति और भी धीमी हुई ,मानो कोई धड़धड़ाती हुई लौहपथ गामिनी तय गंतव्य स्थान तक पहुँचने के मद में गज -गति से झूमती -झूलती चल रही हो।

समाचार पत्रो पर पुनः नज़र डाली।

कुछ असह्य क्रंदन करते चेहरों के चित्र दिखे ,कुछ ;यहाँ सब कुछ था -अब कुछ नहीं की विवशता को बखानते सन्देश।

एक चित्र में चीन की एक महिला अपनी शहर के मलबे पर बैठी थी ,उस मलबे में दबे थे उसके परिजन ,उसके घर गृहस्थी का सामान ,उसके सुन्दर स्वप्न।

मैं स्वयं से कहने लगी ,इस स्त्री के पास कल तक सब कुछ था  आज उसका नाम: शेष ,फिर भी संयत !
यह इसके जीवन का अंत हैं या प्रारम्भ ?

मस्तिष्क ने कहा अंत ,ह्रदय ने कहा प्रारम्भ ! 

चीन की वह महिला ही क्यों ,न जाने कितने लोग रोज जीवन को इस दशा में पाते है जब सारा संसार उनके सब कुछ के अंत पर शोक मनाता हैं। उनके सामने कुछ नहीं होता ,अब तक जिए उनके इतने साल ,उनके संगी ,उनके प्रियकर ,उनकी उपलब्धिया ,उनके पारितोषिक ,उनके विश्वास ,उनकी सुख  - सम्पत्ति सब के सब किसी न किसी रूप में माटीमोल हो जाते हैं। शेष रहती हैं तो केवल जिजीविषा ,आत्मविश्वास और जीवन पर श्रद्धा।

मैंने स्वयं से कहा ,मैं किस -किस से घबराती हूँ ? मैं ही क्यों हम सब ही समय-असमय  न जाने किन -किन से घबराते हैं।  कभी संपत्ति खो जाने का भय ,कभी नाम -बदनाम होने का भय ,कभी अपनों से बिछुड़ने का भय। कपोल - कल्पित यद्यपि अघटित अनजानी  का भय ,सदा सर्व हमारे अंतर्मनो में समाहित -विराजित -स्थापित ,अनाम भय।

कुछ इन्ही विचारो में खोयी थी की बालकनी में सजे  पुष्पवाड़े में कही से अचानक एक भ्र्मर आकर स्थित हो गया।  पुष्पों से रस - गंध लेता वह मेरे शयन कक्ष में लगी ट्यूबलाइट पर जा बैठा ,शायद उसे तीव्र गर्मी महसूस हुई।,अधजले पंखो से उड़ता वह पुनः पर्णकुटिका में पहुंच हरित पर्ण पर विश्राम करने लगा।

मैंने स्वयं से कहा मैं क्यों डरती हूँ ? जीवन रूपी पुष्प वाटिका में मधु हैं ,रंग हैं ,रस हैं ,गंध हैं  तो कंटक  हैं ,किटक हैं ,कटुरस हैं ,काली माटी हैं और फिर कैवल्य भी हैं।

आत्मन रूपी भ्र्मर न जाने कितने शरीर ले हर जन्म में इस डाली से उस डाली बैठ जीव - लीलाये करता हैं ,कभी जीवनरस पिता हैं ,कभी कंटक-कुसुमावली  में फंस छिन्न-विछिन्न हो जाता हैं ,पुनः मधु रस पी मधुर-सुमधुर हो जाता हैं।  शरीर न बदले तो हो तब भी एक ही शरीर में रह कितनी बार मृत्यु का वरण कर, कितनी ही बार नवजीवन का प्रारम्भ करता है ,अंत और आरम्भ से लिखे इस प्रारब्ध से ही जीवभ्र्मर जीवन का इतिहास लिखता हैं।

शंका -कुशंका ,शोक -दुःख ,भय -त्रास के बादल अब छट चुके थे ,सुवर्णरवि अपनी स्वर्णकिरणो से मेरे मेरे ह्रदय को आरोग्य दे रहा था। मन पर स्वर्णरश्मियाँ कुछ कुरेद रही थी मैंने वह शब्द पढ़े, शांत उच्छ्वास छोड़ ,पुनः पूर्ववत मुस्कुरा मैं उन शब्द को गुनगुनाने लगी .... रोज -रोज डाली -डाली क्या लिख जाए भंवरा बावरा -बावरा।

           " लिखीस्तवं लिखिस्त्वं त्वमेका वाणी " 


न जाने कितने दिन से मेरी उँगलियाँ कंप्यूटर के कीबोर्ड पर, मेरे ह्रदय रूपी अवनद्य वाद्य पर बजते त्रिताल की गति को थाम नृत्यमग्न होना चाहती हैं। बालपन की मस्ती में झूमती किसी  चार वर्षीय बालिका की तरह मेरी अंगुलियां दृश्य जगत का भान भुला ह्रदय के ताल को थाम उससे आठ गुनी लय में कंप्यूटर के कुंजीपटल पर थिरकने को आतुर हैं।

 कितना विचित्र हैं न यह ,जब हमारे पास कुछ लिखने का समय होता हैं तब न मन में विचारो का चक्रवात उठता हैं ,नाही आत्म प्रेरणा तूफ़ान का रूप ले ;हृदसमुद्र की भावनाओ का जल उथल-पुथल उन्हें शब्दों की नौका दे, पन्नो के किनारे दिखाती हैं। तब.......... तब एक शून्य होता हैं, उस शून्य का न तो कोई रूप होता हैं नहीं कोई भाव,  उस शून्य में विचरते हम,शायद हम ही नहीं होते।भावनाओ का शून्य ,विचारो का शून्य ,जीवन शून्य …।
और जब हमारे पास एक क्षण का भी समय नहीं होता ,हमारी आत्मा चीख-चीख कर हमें कहती हैं तू लिख ,कुछ लिख ,अभी लिख ,छोड़ बाकि सब बस लिख। अरे !! लिख -लिख पर क्या लिख ? न विचारो की कोई संगति हैं ,न भावो का कोई ठिकाना ,न शब्द युग्मों का कोई जोड़ हैं ,न लेखन सौंदर्य का कोई तराना। क्या लिख ? लिखू क्या ?
पर हठी आत्मा। . यह कभी किसी की कही मानती हैं भला !

  सुना था कभी लोग मोर पंख को स्याही में डुबो ताम्रपत्र पर लिखते थे। समय बदला लोग पेन-पेन्सिल की मदद से कागज़ पर लिखने लगे। समय कुछ और आगे बढ़ा अब लोग कंप्यूटर के कीबोर्ड पर अपने ह्रदय की बात टंकित करते हैं।  एक बात न बदली वह थी लेखन या लिखना ।

कभी कभी सोचती हूँ लेखन मेरे लिए  इतना अनिवार्य क्यों हैं ? शायद इसलिए क्योकि जब मैंने बोलकर भी बोलना नहीं सीखा था तब भी मुझे लिखकर अपनी बात कहना आता था।

गूंगा होना एक अभिशाप माना जाता हैं ,लेकिन संसार में कितने ही लोग ऐसे हैं जो बोल सकते हैं ,बोलते हैं पर बोलना उन्हें नहीं आता ,या कहे सही बोलना उन्हें नहीं आता।

सुनकर विचित्र लगता हैं किन्तु जैसे पढ़े-लिखे लोगो का अनपढ़ होना सत्य हैं वैसे ही बड़बोलों को भी बोलने की कला न आना सत्य हैं। हमें बचपन से सिखाया जाता हैं बेटा ऐसे बोलो ,ऐसे न बोलो पर कभी कोई सिखाता हैं की बेटा बोलते समय आवाज को ऐसे लगाओ। किस शब्द पर जोर दो ,किस वाक्य को बलवान बनाओ।  यहाँ न्यास दो यहाँ विराम ,अल्प विराम दो।  लिखते समय लेखक कुछ इस अंदाज़ से लिख जाता हैं की पढ़ने वाला उसके भावो - विचारो से लगभग सौ प्रतिशत सहमत हो जाता हैं ,पर क्या कोई हमें बचपन में स्वयं को वयक्त करने की कला सिखाता हैं ? नहीं न ! बोलना या कहना क्या हैं ,बोलना ,भाषण करना  यह स्वयं को प्रकट करने ,वयक्त करने की कला हैं।  हम तमाम भाषाएँ सिख लेते हैं ,व्याकरण जान लेते हैं लेकिन संवाद की आत्मा को हम नहीं जान पाते। हमें यह ज्ञात ही नहीं होता की हम कहते क्यों हैं बोलते क्यों हैं ?

जो अकेला बोलता हो  उसे पागल इस अलंकरण से हम सुशोभित करते हैं पर हम क्या करते हैं ,हम बोलते हैं ,सुनाते हैं ,लोग सुनते हैं ,सुनकर भूल जाते हैं ,समझ नहीं पाते की हम क्या कह रहे हैं ,क्यों कह रहे हैं।  क्योकि संवाद की कला को हम नहीं जानते। हमारी अवस्था उस पंगु वयक्ति की तरह होती हैं जिसके हाथ पैर तो हैं पर वह उनका इस्तेमाल ही नहीं जानता।

न्यूज़ चैनल लगाओ तो सुनाई देता हैं अमके नेता ने तमके नेता को अमुक शब्द कहे ,अमुक देश ने तमुक देश को ये कहा ,अमकी अदाकारा ने तमकि अदाकारा को ऐसा कहा और फिर शुरू हो जाते हैं दंगे,विषाद ,विवाद।

बोलना या कहना इतना आसान नहीं हैं। क्योकि कहने से पहले सुनना जरुरी हैं ,बोलने से पहले समझना जरुरी हैं। भाषा का विज्ञान समझ लेना बस नहीं हैं ,भाषा का प्राण ,संवाद की आत्मा ,सुसंवाद की कला जिसने सीखी वह विजयी।

हम जैसे संवाद शिक्षार्थियों के लिए लेखन ही शायद परम मित्र हैं। संवाद की कला में निपुणता आने तक   ....
" लिखीस्तवं लिखिस्त्वं त्वमेका वाणी "



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