Sunday, January 18, 2009

ढाई आखर प्रेम के पढ़े सो...........................

एक काफी पढ़ा लिखा लड़का,बड़ी कम्पनी का मालिक ,करोड़पति,उसकी एक मुलाकात के लिए सारे रिपोर्टर तरसते रहते हैं,उसके एक फोन से लोगो की जिंदगिया बदल जाती हैं ,वह किसी राजकुमार से कम नही,जब वह कही घुमने जाता हैं तो उसके आगे पीछे दसो गाडिया उसकी सेवा में निकलती हैं,शायद हर युवक उसके जैसा सफल और सुंदर जीवन पाना चाहे ।

एक रात एक सार्वजानिक कार्यक्रम के दौरान कर्यक्रम स्थल की कार पार्किंग में किसी का खून हो जाता हैं ,मारने वाला युवक मरने वाले को किसी डरावनी ,भुत प्रेत वाली फ़िल्म की तर्ज पर किसी भुत की तरह ही गर्दन तोड़ कर मारता हैं,वह खुनी कोई और नही वही नवयुवक हैं जिसका जिक्र मैंने अभी अभी किया ,जी हाँ वही किसी राजकुमार सा....करोड़पति ......

यह हैं फ़िल्म गजनी।

प्यार ......पनों का प्यार,परायो का प्यार , ईश्वर का प्यार , मनुष्य का प्यार,सृष्टि की गोद में पल रहे हर चेतन का प्यार.................... दुनिया प्यार में बसी हैं और पुरी दुनिया में बसा हैं प्यार, इंसान की हर छोटी सी छोटी चाहत,फितरत में बसा है प्यार प्यार जो मनुष्य की जिंदगी में रंग भरता हैं ,खुशिया देता हैं । प्यार को खो देने से ज्यादा दुःख शायद इस संसार में कोई नही । जिसके कारण हमारे प्रिय की मौत हुई ,उससे नफरत होना स्वाभाविक ही हैं ,लेकिन इस कारण खुनी बन जाना,एक नही कई खून कर देना निहायत ही ग़लत हैं ।

एक और दृश्य .......चार नव युवक ,कॉलेज में पढने वाले,जिनकी जिंदगी में कोई उद्देश्य नही ,वह दिन रात सिर्फ़ हँसते बतियाते हैं ,एक दिन अचानक किसी दुसरे देश से एक सुंदर लड़की आती हैं ,जो भारतीय सवतंत्रता संग्राम के संग्रामियों पर एक फ़िल्म बनाना चाहती हैं ,फ़िल्म में इन्हे काम मिलता हैं ,कोई भगत सिंह बनता हैं ,तो कोई दूसरा महान स्वतंत्रता सेनानी ,फ़िल्म करते करते ये नवयुवक स्वयं को महान स्वतंत्रता संग्रामी समझने लगते हैं ,जब उन्हें पता लगता हैं की उनमे से किसी का पिता और कोई नेता देश द्रोही हैं तो वह स्वयं को भगत सिंह आदि के रूप में देखने लगते हैं और बाकायदा रेडियो स्टेशन पर कब्जा कर एक एक कर उन चार : लोगो का खून कर देते हैं ,और फ़िल्म खत्म

यह थी फ़िल्म रंग दे बसंती ।

प्रेम की भावना हो या देश भक्ति की , पवित्र प्रेम का जज्बा हो हो या देश भक्ति का ,ये दोनों ही जीवन को अर्थ पूर्ण बनते हैं ,जीवन को नई दिशा देते हैं ,इंसान को इंसान बनाते हैं खुनी नही ,अपने प्रिय की म्रत्यु को जिम्मेदार व्यक्ति से बदला लेना गलत नही ,लेकिन उसका एक तरीका होना चाहिए ,मुझे समझ नही आता की गजनी में जिस करोड़पति लड़के के एक फोन से जिंदगिया बदल जाती हैं ,वह अगर गवाही देता तो आज नही तो कल उसकी प्रेयसी के खुनी को सजा नही होती? सिर्फ़ उस खुनी को मारने के लिए दसो खून करता हैं ,उसे खून करते हुए दिखाया गया हैं ,यह किस तरह की मानसिकता हैं ,माना की प्रेयसी को खो देना ,शॉर्ट टर्म मेमोरी का शिकार होजाना बहुत दुखद हैं,लेकिन इतनी हिंसा करना या दिखाया जाना कितना गलत,और नवयुवक युवतिया फ़िल्म की बड़ाई करते नही थक रहे .................................यह और भी दुखद .....पुरी तरह से फिल्मी ,स्वप्निल प्रेम की इच्छा

समाज को किन्ही चार छ: बुरे व्यक्तियों को मार कर नही सुधारा जा सकता ,नही देश को उन्नत किया जा सकता,उसके लिए कठिन संघर्ष ,तीव्र इच्छा शक्ति ,सतत प्रयत्न की आवश्यकता होती हैं । देश के स्वतंत्रता संग्रामियों ने जो हमारे देश के किया वह महज एक जोश नही था ,वह तीव्र देश भक्ति की भावना थी,देश प्रेम था ,महान त्याग था ,वह देश को स्वतंत्र करवाने के लिए लड़ते रहे ,आजीवन प्रयत्न करते रहे ,किसी फ़िल्म के जोश में आकर चार खून उन्होंने नही किए ।

अचानक किसी से प्रभावित होकर ,स्वयं को वही महसूस करने लगना ,और उसकी जोश में स्वयं को महान समझ कर किसी को मार डालना ,किसी मानसिक बीमारी का परिचायक हो सकता हैं ,देश प्रेम का नही । अगर फ़िल्म रंग दे बसंती में उन नवयुवको ने सचमुच उन स्वतंत्रता संग्रामियों के जीवन से कुछ सिखा होता तो वे इस तरह खून खच्चर नही करते ,बल्कि इसे देश द्रोहियों का अपने सत कर्मो और प्रयत्नों से समूल नाश करते ,और देश के विकास में महती भूमिका निभाते ।

संत कबीर ने कहा हैं " ढाई आखर प्रेम के पढ़े सो पंडित होय ".............पंडित होय या .......................खुनी होय ?
प्रेम इंसान को क्रोध करना सिखाता हैं,कभी कभार थोडी बहुत नफरत भी ,हो सकता हैं की प्रेम मरना-मारना भी सीखता हो पर एक साथ कई कई खून करना ,वह भी पुरी तरह से सोच विचार कर ,उतनी ही क्रूरता से ............शायद नही .

फ़िल्म बनाने वालो से तो अब अच्छी आशा करना भी व्यर्थ हैं ,लेकिन दुःख तब होता हैं जब आज के नवयुवक युवतिया ऐसी फिल्मो को देखकर वाह वाह करते नही थकते ,इन फिल्मो की तारीफों के पुल बांधते नही थकते । हो सकता हैं की कल परसों कुछ और इसी तरह की मानसिकता से ग्रस्त सिनेमा आ जाए ,प्रश्न यह हैं की हम कब तक इन्हे देखते रहेंगे और सराहते रहेंगे ?
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