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Thursday, November 12, 2015

           " लिखीस्तवं लिखिस्त्वं त्वमेका वाणी " 


न जाने कितने दिन से मेरी उँगलियाँ कंप्यूटर के कीबोर्ड पर, मेरे ह्रदय रूपी अवनद्य वाद्य पर बजते त्रिताल की गति को थाम नृत्यमग्न होना चाहती हैं। बालपन की मस्ती में झूमती किसी  चार वर्षीय बालिका की तरह मेरी अंगुलियां दृश्य जगत का भान भुला ह्रदय के ताल को थाम उससे आठ गुनी लय में कंप्यूटर के कुंजीपटल पर थिरकने को आतुर हैं।

 कितना विचित्र हैं न यह ,जब हमारे पास कुछ लिखने का समय होता हैं तब न मन में विचारो का चक्रवात उठता हैं ,नाही आत्म प्रेरणा तूफ़ान का रूप ले ;हृदसमुद्र की भावनाओ का जल उथल-पुथल उन्हें शब्दों की नौका दे, पन्नो के किनारे दिखाती हैं। तब.......... तब एक शून्य होता हैं, उस शून्य का न तो कोई रूप होता हैं नहीं कोई भाव,  उस शून्य में विचरते हम,शायद हम ही नहीं होते।भावनाओ का शून्य ,विचारो का शून्य ,जीवन शून्य …।
और जब हमारे पास एक क्षण का भी समय नहीं होता ,हमारी आत्मा चीख-चीख कर हमें कहती हैं तू लिख ,कुछ लिख ,अभी लिख ,छोड़ बाकि सब बस लिख। अरे !! लिख -लिख पर क्या लिख ? न विचारो की कोई संगति हैं ,न भावो का कोई ठिकाना ,न शब्द युग्मों का कोई जोड़ हैं ,न लेखन सौंदर्य का कोई तराना। क्या लिख ? लिखू क्या ?
पर हठी आत्मा। . यह कभी किसी की कही मानती हैं भला !

  सुना था कभी लोग मोर पंख को स्याही में डुबो ताम्रपत्र पर लिखते थे। समय बदला लोग पेन-पेन्सिल की मदद से कागज़ पर लिखने लगे। समय कुछ और आगे बढ़ा अब लोग कंप्यूटर के कीबोर्ड पर अपने ह्रदय की बात टंकित करते हैं।  एक बात न बदली वह थी लेखन या लिखना ।

कभी कभी सोचती हूँ लेखन मेरे लिए  इतना अनिवार्य क्यों हैं ? शायद इसलिए क्योकि जब मैंने बोलकर भी बोलना नहीं सीखा था तब भी मुझे लिखकर अपनी बात कहना आता था।

गूंगा होना एक अभिशाप माना जाता हैं ,लेकिन संसार में कितने ही लोग ऐसे हैं जो बोल सकते हैं ,बोलते हैं पर बोलना उन्हें नहीं आता ,या कहे सही बोलना उन्हें नहीं आता।

सुनकर विचित्र लगता हैं किन्तु जैसे पढ़े-लिखे लोगो का अनपढ़ होना सत्य हैं वैसे ही बड़बोलों को भी बोलने की कला न आना सत्य हैं। हमें बचपन से सिखाया जाता हैं बेटा ऐसे बोलो ,ऐसे न बोलो पर कभी कोई सिखाता हैं की बेटा बोलते समय आवाज को ऐसे लगाओ। किस शब्द पर जोर दो ,किस वाक्य को बलवान बनाओ।  यहाँ न्यास दो यहाँ विराम ,अल्प विराम दो।  लिखते समय लेखक कुछ इस अंदाज़ से लिख जाता हैं की पढ़ने वाला उसके भावो - विचारो से लगभग सौ प्रतिशत सहमत हो जाता हैं ,पर क्या कोई हमें बचपन में स्वयं को वयक्त करने की कला सिखाता हैं ? नहीं न ! बोलना या कहना क्या हैं ,बोलना ,भाषण करना  यह स्वयं को प्रकट करने ,वयक्त करने की कला हैं।  हम तमाम भाषाएँ सिख लेते हैं ,व्याकरण जान लेते हैं लेकिन संवाद की आत्मा को हम नहीं जान पाते। हमें यह ज्ञात ही नहीं होता की हम कहते क्यों हैं बोलते क्यों हैं ?

जो अकेला बोलता हो  उसे पागल इस अलंकरण से हम सुशोभित करते हैं पर हम क्या करते हैं ,हम बोलते हैं ,सुनाते हैं ,लोग सुनते हैं ,सुनकर भूल जाते हैं ,समझ नहीं पाते की हम क्या कह रहे हैं ,क्यों कह रहे हैं।  क्योकि संवाद की कला को हम नहीं जानते। हमारी अवस्था उस पंगु वयक्ति की तरह होती हैं जिसके हाथ पैर तो हैं पर वह उनका इस्तेमाल ही नहीं जानता।

न्यूज़ चैनल लगाओ तो सुनाई देता हैं अमके नेता ने तमके नेता को अमुक शब्द कहे ,अमुक देश ने तमुक देश को ये कहा ,अमकी अदाकारा ने तमकि अदाकारा को ऐसा कहा और फिर शुरू हो जाते हैं दंगे,विषाद ,विवाद।

बोलना या कहना इतना आसान नहीं हैं। क्योकि कहने से पहले सुनना जरुरी हैं ,बोलने से पहले समझना जरुरी हैं। भाषा का विज्ञान समझ लेना बस नहीं हैं ,भाषा का प्राण ,संवाद की आत्मा ,सुसंवाद की कला जिसने सीखी वह विजयी।

हम जैसे संवाद शिक्षार्थियों के लिए लेखन ही शायद परम मित्र हैं। संवाद की कला में निपुणता आने तक   ....
" लिखीस्तवं लिखिस्त्वं त्वमेका वाणी "



Thursday, July 23, 2015

ख़ुशी का पता ...................???

ख़ुशी .............एक ऐसा शब्द जिसे हर कोई कहना चाहता हैं ,हर कोई पाना चाहता हैं ,हर कोई जीना चाहता हैं,हर कोई महसूस करना चाहता हैं ,ये आती हैं तो जीवन कुछ महकने सा लगता हैं ,चाँद तारे सब हमारे दोस्त मालूम पड़ते हैं ,घर के आँगन में (अब आँगन नही तो बालकनी में और वह भी नही तो जहाँ से आकाश दिखना नसीब हो )उतर आये हैं.हम उनके बीच उन्ही की तरह चमक रहे हैं ,कभी जीवन दिए की ज्योति सा जगमग ,कभी आकाश से बड़ा  हमारा भाग्य और व्यक्तित्व  लगने लगता हैं .फूलो का तो क्या कहिये वो तो जीवन के हर रस्ते में बिखरने लगते हैं, गुलाब आपसे मुस्कुरा कर बातें  करता हैं तो कभी चम्पा हँस कर कानों में कुछ कह जाता हैं .सोनचाफे की खुशबु मन मस्तिष्क में भर सी जाती हैं .जीवन फूलो से  भरा बगीचा बन जाता हैं .

कहते हैं गले से सुर तब तक नही निकलते जब तक सुरसुती की कृपा न हो,लेकिन ख़ुशी ..उसके आने पर सुर हर राग और हर रागिनी में उतने ही ममत्व उतने ही प्रेम से साज और आवाज दोनों में निकलते हैं जैसे आप सुरों के युगों युगों के साथी हो ,सुर आप के बिना अधूरे हो और आप सुरों के बिना .गीत भी बन जाते हैं कवितायेँ भी ,शब्द भी गुनगुनाते हैं और अक्षर माला में गूँथ जाते हैं.
जो करते हैं ख़ुशी और बढ़ बढ़ कर मन में मयूरी सी उछलती हैं .उसकी फर्लांगे जीवन के आनंद को द्विगुणित कर देती हैं.जीवन कल कल सा झरना ,संगीत ,सुंदरता,प्रेम ,सबका मानो पर्याय बन जाता हैं .

आज शायद इतनी ही खुश हूँ मैं  ,डरती हूँ इस ख़ुशी को कही  नज़र न लगे मेरी ,पर कहते हैं न, दुःख छिपा सकता हैं इंसान पर प्यार और ख़ुशी छिपाए नही छिपती.

उसकी बिल्ली की तरह बंद आँखे जो लुका छुपी के खेल में उसके खुदके छुपने की शाश्वती होती हैं ,मुझे जोर से हंसने पर मजबूर कर देती हैं,मटककली की तरह मटक मटक के कियां हुआ नृत्य मेरे पैरो को भी चलायमान कर देता हैं ,उनमे चलते रहने की एक अजीब सी ताकत देता हैं ,उसकी मुस्कान मुझे एकदम लाचार बना देती हैं ,मैं खुदको रोंक नही पाती कसकर उसके गलों की पप्पी लिए बिना .उसके धरा और दिशा विहीन सुर मेरे सुरों को सुर बनाते हैं ,उनमे जान भरते हैं ,मेरी वीणा उन सुरों का अनुगमन कर ही बजती हैं,आजकल में जी भर कर मुस्कुरा रही हूँ बिना बात हँस रही हूँ .कभी सड़क चलते उसके संग जोर जोर से कोई गीत गुनगुना रही हूँ ,कभी रसोई में कुछ नया पका कर अपनी पाककला पर खुद ही मुग्ध हो रही हूँ ,जीवन जैसे स्वरसिद्धि  पाया हुआ सुरताज़ हो गया हैं ,ह्रदय में इतना प्रेम ,इतना वात्सल्य ,इतना आनंद कभी न था .

कह क्या सकती हूँ उसे ?????सिर्फ इतना शुक्रियाँ आरोही ,शुक्रियाँ मेरे जीवन में आने के लिए ,मेरी बेटी के रूप में आने के लिए.
ख़ुशी का पता न जाने सबके लिए क्या होता हैं पर मेरे लिए सिर्फ तुम हो .शायद हर माँ के लिए उसका बच्चा ..

शुक्रियाँ  ...................................

Thursday, May 7, 2015

Summer Workshop By Veena Venu Art Foundation







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Monday, June 23, 2014

पूर्णविराम । एक अधूरी पोस्ट पर .....


 अधूरी इसलिए क्योकि अभी पूरी नहीं हुई  पूरी होने में शायद कई पोस्ट्स लिख जाये।  पर मैं लिखती रहूंगी अधूरी पोस्ट पर पूर्णविराम लगाते हुए। शायद महीनो शायद बरसो शायद कभी लेखन पूरा हो भी जाये पर ये यादे पूरी न होंगी। . सागर से मोती की तरह  पुरानी किन्तु  नयी निकलती ही रहेंगी।


तो पढ़िए

पूर्णविराम एक अधूरी पोस्ट पर 

भाग १ 




ये बाबा भी न न जाने क्यों मेरे पीछे पड़े रहते हैं.. दूध पी दूध पी। . कितना गन्दा स्वाद !!! मैं भी  चुप चाप पी ही लेती हूँ न जब आई बॉर्नवीटा डाल के देती हैं ,अब जब आज बॉर्नवीटा खत्म हो गया हैं तो कैसे पी सकती हूँ ? कभी कभी सोचती हूँ आज के २० साल बाद भी बाजार में बॉर्नवीटा मिलेगा न ? नहीं तो मैं दूध ही नहीं पी पाऊँगी।


अरे बाप रे आज तो गणित के टेस्ट का रिजल्ट हैं,टेस्ट कॉपी में पिछले दो बार से ५ में से २, ५ में से ३ मार्क्स ही हैं ,लास्ट टेस्ट में तो ५ में से ०० आ गए थे ,कितना कुछ नहीं कहा था शुरूकर आचार्य जी ने सारी क्लास के सामने। पता नहीं इस बार क्या होगा।


ओ-हो सात बज के ३३ मिनट !!!         भागो।


आई वेणी घाल न। यार ये आई भी क्या बेसन पोइ रख देती हैं डिब्बे में ,कोई नहीं लाता  ,कुछ बोलो तो कहती हैं कालवण खात जा। अरे हाँ आज प्रणिता आलू की सब्जी पूरी के  साथ एक्स्ट्रा आचार लाने वाली हैं ,उसका अचार मेरे यहाँ के अचार से ज्यादा मसाले वाला रहता हैं ,मस्त।

वैसे तो अनघा ने भी कहा था अचार लाएगी ,पर वो तो सिर्फ मुझे ही देगी किसी और को नहीं। उसकी लम्बी लम्बी दो चोटियाँ। …… आते ही खड़ी  हो जाती हैं टेबल के सामने और चॉक  लेकर बोर्ड पर सब बात करने वालो के नाम लिखने लगती हैं ,सबको डाॅटती हैं ,बस मुझे चुप करते हुए हंस देती हैं,ही - ही करते समय उसके सामने वाले दाँत भी नाचते हैं ख़ुशी से।


पता नहीं यार स्वाति के गणित में इतने नंबर कैसे आते हैं ? जरा सी छोटी सी, सांवली सी ,पर बहुत प्यारी हैं ,बहुत मीठी सी ,कक्षा में हमेशा फर्स्ट आती हैं पर सबसे कितने अच्छे से बात करती हैं। .


यार ये स्कूल का रास्ता कितना लम्बा हैं दौड़ते दौड़ते मेरे पैर दुःख जाते हैं ,घंटी बजने से पहले नहीं पहुंची तो खड़ा कर देंगे। उस दिन खंडारकर दीदी ने कहा था की राधिका प्रार्थना तुम लोगी।  कितना अच्छा लगा था। मैं सबके सामने स्टेज पर जा कर बैठी। हंस वाहिनी ज्ञान दायिनी अम्ब विमल मति दे। पूरा गीता अध्याय याद हो गया हैं मुझे ,कोई नींद में से उठकर सुनाने को कहे तो भी पन्द्रहवां अध्याय सुना दू।


उफ़ ये चना गरम करने वालो की दुकाने। सारा कीचड़ हो गया हैं बरसात में। कल रात को  १ बजे तक सितार बजायी  थी , नींद भी आ रही हैं।


दो दिन पहले घोषणा  हुई थी।   रस्सी कूद प्रतियोगिता हैं ३ तारीख को। इस बार तो मैं ही फर्स्ट आउंगी , पिछले  साल स्वाति प्रथम आई थी मैं द्वितीय और विजयलक्ष्मी तृतीय। कितनी लम्बी हैं न विजयलक्ष्मी ,उसके खाने का स्वाद एकदम अलग ही रहता हैं।  पढ़ने में भी बुरी तो  नहीं। .


आज पांचवे कालखण्ड में राखी बनाओ स्पर्धा हैं ,आई ने सिखाई हैं राखी बनाना मुझे और इस बार में सुन्दर गुलाबी रंग का रेशम लेकर आई हूँ ,सुन्दर राखी बनाउंगी।


दो दिन बाद राखी उत्सव हैं,  मैं श्रीनिवास को राखी बांधती हूँ  हैं लेकिन  समझ नहीं आता की सारी  बहनो की एक पंक्ति बनाकर  सारे भाइयों को एक पंक्ती में बिठाकर  जो जिसके  सामने बैठ गया उसे राखी बांध देने का क्या मतलब हैं ? नाम तक पूछो और अगले साल नया भाई ,फिर उसका नाम पूछो यह भी याद नहीं की पुराने वाले का नाम क्या था।


आज शाम को राशि का बर्थडे हैं ,उसके बाबा आई की कितनी लाड़ली हैं वह ,उस दिन कैसे रो रही थी!!! उसकी आई ने उसके लिए इतने अच्छे क्रीम बिस्किट्स लाये  थे पर उसे बेकरी वाले ही खाने थे ,उसकी आई ने एक बार भी नहीं डाटा ,कितने प्यार से समझाती  रही फिर पूछने लगी शोना मैगी करूँन  देऊ का ? शिरा खाशील का ? बाबा संध्याकाळी दूसरे बिस्किट्स घेऊन येतील।  ऋषि दादा कैसे चिड़ा था ,हो आई , तू बस तिझेस लाड़ कर आम्हाला वीचारु नको। कितनी लकी हैं न  दो भाइयों में एक बहन ,  बाबा उसे गाना गाके उठाते हैं। … मेरे बाबा मुझे उठते ही गाना गाने को बिठाते है ,आई ही कुछ खाने को लाके देती हैं। नहीं तो भूखे पेट गाना पड़े।


अरे वाह मैं पहुँच गयी स्कूल ,अभी तक तो कोई आया भी नहीं हैं ,मेरी घडी पुरे २० मिनट आगे थी ,बाबा भी न ! अरे ये लो मेघा आ गयी पीछे पीछे स्वाति भी।

रूपाली तू आ गयी ? कैसी हैं। ये रूपाली कितनी अलग हैं हम सबसे ,सुन्दर हैं ,इंग्लिश कितनी अच्छी पढ़ती हैं यह।  लो ये चश्मा लगा कर प्रतीक भी आ गया। आज इससे भूगोल की कॉपी मांग लुंगी , चार दिन पहले का काम बाकि हैं।  ये मुझे कभी मना नहीं करता ,कितना अच्छा हैं। इसके पास हर साल नया कम्पोसबॉक्स रहता हैं ,सारी चीज़े नयी। बाबा बता  रहे थे इसके बाबा पार्क में आते हैं वो संघ में हैं ,उस दिन शाम को छत पर खड़ी थी सामने पार्क में देखा तो यह भी खाकी कपडे पहन कर व्यायाम कर रहा था ,वैसे भी पीछे मुङो तो इसके घर की  छत दिखाई देती हैं ,ठंड के दिनों में इसकी आई और पूरा परिवार छत पर आता हैं अभी अभी छत भी ठीक करायी हैं इन लोगो ने।  प्रशांत के साथ ये छत पर आता हैं ,उस दिन मुंडेर को टेबल बना उसपे कॉपी रख कर लिख रहा था ये ,मुझे इतनी हंसी आई।

लो ये आ गयी रश्मि ,हंसती खेलती रहती हैं यह। सुनैना से इसकी भी ज्यादा दोस्ती नहीं ,सुनैना से पता नहीं किसीकी मेरे इतनी दोस्ती ही नहीं!!!


हुह मुझे आशुतोष से कोई बात नहीं करनी कल मेरी ही कॉपी  दे नहीं  रहा था ,नीता दीदी ने आकर बीच बचाव  नहीं किया होता तो बहुत ही झगड़ा हुआ होता हमारा। आशुतोष उपाध्याय से कभी झगड़ा नहीं हुआ मेरा। 

शैलेन्द्र और विशाल की जोड़ी हैं ,दोनों साथ में रहते हैं हमेशा ,मेरा बहुत मजाक बनाते हैं  पर जब मैं रोने को होती हूँ मुझे मना  भी लेते हैं ,ज्यादा करके शैलेन्द्र चिढ़ाता भी हैं मनाता भी हैं ,विशाल तो हँसता ही जाता हैं मुझे पर।

कविता तू आगयी ,आज अभी तक प्रार्थना के लिए घंटी क्यों नहीं बजी ,तेरे यहाँ बहुत मज़ा आया हमें  ,मेघा भी कह रही थी तेरा घर बहुत बड़ा है ,नया घर बनाया हैं न इसलिए बहुत अच्छा भी लग रहा हैं ,तुझे कितना मज़ा आता होगा न। क्या कहा ? कल मुझे फ़ोन करना चाहती थी।  तो किया क्यों नहीं ? उस दिन नंबर तो लिखकर दिया था न।


ये देखो आ गये रोहित जी अपना भारी  बस्ता लेकर ,उस दिन कैसे महेंद्र और रोहित को पटवर्धन दीदी ने डाटा था ,महेंद्र बिचारा बहुत सीधा लड़का हैं ,रोहित नहीं बोलता तो उस दिन बात शायद बड़े आचार्य जी तक पहुँच जाती।


आज पहला कालखण्ड संस्कृत का हैं ,अनघा किती मजेदार नक़ल उतारती हैं गुर्जर आचार्य जी की। पुस्तकस्था विद्या। रिसेस होने में अभी २ कालखंडों का अवकाश हैं ,कितनी भूक लग रही हैं ,छतरी के मंदिर में आज बहुत लोग दर्शनों के लिए आये हैं ,कल भोग था यहाँ ,खाने की खुशबु अभी तक महक रही हैं। मेरा मन बिलकुल नहीं लग रहा ,वैसे भी आज छटे कालखण्ड में शोले दीदी खो-खो खिलवाने वाली हैं वो कहती हैं मैं भागने में बहुत तेज़ हूँ।  दीपा आठले गाना  बहुत अच्छा गाती हैं ,पिछले बरस दीपा लघाटे ने छतरी मैदान में अज्ञान के अंधेरो से कितना सुन्दर गाया था।

मैं तो गाना ही छोड़ दूंगी वैसे भी जब मैं गाती हूँ सब चिड़ाते हैं तू गाती हैं या रोती हैं ? बाबा ही  राघवत होते। मैंने कितने मन से गाया था यही गाना। पर बाबा बोले दीपा ने ही अच्छा गाया।

मेरा ध्यान किधर हैं। क्या क्या सोच रही हूँ मैं ,चौथा कालखण्ड शुरू हो गया ,अरे आज जटार दीदी आई हैं कक्षा में।


बहुत हो गया बस ध्यान देना चाहिए। शायद कोई उद्गोषणा होने वाली हैं।


विचार बंद।  अभ्यास शुरू।







































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