Sunday, March 12, 2017

मन

आज फिर मन सपनो के रथ पर सवार दूर गगन की सैर करने चला हैं ,इस बार इस सुनहले रथ में कई सारे  घोड़े हैं ,कुछ सफ़ेद ,कुछ आसमानी रंग के,कुछ सूरज की किरणों से प्रकाशित हो ,सुनहले ,केसरी रंग के।
सरपट भागे जा रहे हैं ये घोड़े और सरपट भाग रहा हैं मेरा मन।

मन का भागना कुछ ऐसा ही होता हैं ,दायां -बायां ,आजु -बाजु कुछ दीखता ही नहीं।

आसपास जैसे सब कुछ धुंधला हैं ,बादल ही बादल ,पर मन बाँवरे को इस धुंधलेपन से मतलब ही क्या ,वो तो बस आगे देख रहा हैं ,सीधा -सामने ,न बाएं ,न दाएं।
आँखों के सामने कुछ अनोखी सी दुनियां हैं ,एक अनोखा प्रभात ,उगते सूर्य ने फैलाई रंग,बिरंगी रश्मियां। लगता हैं ये पूरी सृष्टि रंग खेल रही हैं ,नीले , पिले , हरे ,लाल ,गुलाबी स्वयं में मग्न मतवारे रंग और मैं इन रंगों के बीचोबीच ...  मैं ,रंगों से सराबोर।

सुना हैं आज होली हैं ,धरती पर लोग एक दूजे पर रंग फेंक रहे हैं ,अबीर -गुलाल की पिचकारियां भर -भर एक दूसरे पर रंग छिटक रहे हैं ,वहां वो रंग और यहाँ ये रंग।

मन जैसे धरती से करोडो योजन की दुरी पर पहुँच गया हैं ,कौनसा जग हैं ये ? जहाँ पैरो के निचे धरा ही नहीं ,पर फिर भी में सीधी खड़ी हूँ ,अपने पैरों पर। दूर -दूर तक सिर्फ रंग ही रंग हैं।  सप्तरंगों के बादल ,सप्तरंगों के गिरिवर ,पुष्प और पक्षी भी तो यहाँ सप्तरंगी हैं। यहाँ का जल न जाने किस पर्वत श्रृंखला से होकर धरणी पर गिरता हैं ,जल की बूंदो में रंगों के कोटि-कोटि रंगढंग और इन रंगों में पूरी तरह डूब मेरा अंतरंग।

देख पा रही हूँ रंगों के इस अनूठे विश्व में लाल रंग कुछ ज्यादा ही हैं। प्रेम का रंग , लाल रंग।  यही रंग कभी बरसाने में बिखरा था ,तब राधा ने अपने हाथो से इसे समेटा था , तब न तो बिरज की होरी थी ,न ब्रिज का वो राजकुमार। तब अकेली राधिका थी ,आसमंत ने धरती पर जो गिराया और पलाश के वृक्ष ने जिसे अपने पुष्पो में समेट लिया ,राधिका  ने उसी लाल रंग से , रात के अंधियारे में अपने हिय में बरसो से बैठी  प्रेम की मूर्ति को आकार दिया और गोकुल के उस ग्वाले को रच दिया , जिसे संसार ने परमपुरुष श्रीकृष्ण के रूप में जाना।

 राधा, कृष्ण से उम्र में बड़ी थी  और शायद वही कृष्ण की जननी थी। देवकी ने तो बस जन्म दिया ,यशोदा ने माटी के उस गोले को संभाल भर लिया। पर राधा  थी  कृष्ण की जननी ,उसीने उस मूरत को जीवन के रंगों का ज्ञान दिया , उस लाल माटी के गोले को प्रेम का ज्ञान दिया  और  जब वो लाल सूर्य  का गोला प्रेम और जीवन ज्ञान के रंगों से परिपूर्ण हुआ ,उसका रंग सम्पूर्ण गगन में बिखर गया ,प्रेम का लाल रंग अब परम ज्ञान का नीलवर्ण बन चूका था ,और वो लाल माटी  मूरत ,योगेश्वर ,परमेश्वर श्री कृष्ण। राधा ने कृष्ण को जन्म दिया ,उनको नीलवर्ण दिया ,और मेरे मन को कृष्ण नाम की सुध।

मेरे मन में जैसे कई रंगों के फव्वारे फुट रहे हैं ,हर रंग के साथ एक अनूठा आनंद ,ये आनंद  क्या हैं ? ये नंदनंदन क्या हैं ? मेरी आँखों में जैसे दिव्य शुभ्र रंग के सितारे चमक रहे हैं। मेरी आँखे और मेरा मन इस शरीर को छोड़ कर जा चूका हैं।  रंगों के इस संसार में अनंत पर मैं रंग-रंगीले चित्र बना रही हूँ , इन चित्रो में कई सारे स्वपन हैं ,नित्य -नूतन -निराले स्वप्न। मेरे पग थिरक रहे हैं ,संग मेरे थिरक रही हैं सम्पूर्ण सृष्टि।  कहींसे सुर सुनाई आ रहे हैं ,फागुन गीत के ,बसंत राग के ,कही से सुनाई दे रही हैं पखावज की गंभीर थाप। स्वर-लय -गीत और रंगों में मगन मेरा आत्मरंग।  सच कहते हैं लोग ,मैं इस दुनियाँ की हूँ ही नहीं , शरीर मात्र यहाँ हैं ,मन तो उस रंगीन सृष्टि का गोकुल ,वृन्दावन हैं। मैं बरसाने की राधा हूँ और वही कही आनंद रंग श्रीकृष्ण।


कृष्णार्पणमस्तु।।

होली की अनंत शुभकामनायें

©  डॉ.राधिका वीणा साधिका 

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