Tuesday, September 12, 2017

विरक्ति....

वो मेरा ही था जिसे मैं मेरा भूतकाल कहती हूँ ख़ुशी के दिन थे, आकाश से मन भर की हुई बातें थी ,चाँदनियां दोस्त हुआ करती थी। दर्द भी थे ,कुछ वहम भी , कुछ रचे-गढ़े बादल के टुकड़े थे जिन्हे  मैं सपने कहा करती थी . कुल मिलाकर वो मेरा बचपन था . फिर सपनो ने मुझसे आगे दौड़ना शुरू किया ,ये कौनसा लोक था जहाँ सब कुछ अपरिचित था फिर भी परिचित था। मल्हार के रंग कब रेगिस्तान की धूल हो गए पता ही नहीं चला वो वक्त था ,गुजर गया। लगा जैसे बहुत बड़ी लहर आयी मैं समुंदर की गहराई में किसी श्रीधाम में शांत लय में डोल रही थी ,क्षीरसागर में आया भूचाल कुछ तेज़ था उम्र के कुछ साल बीत गए ऊँची आसुरी लहर बहुत ऊँचा उड़ा ले गयी ,कई थपेड़े खाये ,डूबी -उछली और धड़ाम से अब जाकर सागर तट पर आ गिरी। अब जो आयी हूँ , तो समझने में ही वक्त जा रहा हैं की कहाँ हूँ ? आँखे खुल रही हैं ,मन अब भी थका हैं ,मस्तिष्क उठके झूम रहा हैं ,बावला नच रहा हैं ,कह रहा हैं नच, तू बच गयी,बढ़ ,मचल ,उछल ! 

पर अब जिंदगी के उन फेरो में पड़ना नहीं चाहती मैं, नहीं किसी फूलों से लदी डाली पर झूमना चाहती हूँ ,नहीं सावन के गीत गाकर बाबुल को बुलौवा भेजना चाहती हूँ। नहीं आँगन में लगे मधुमालती के पौधे के मीठे रस को चख उसकी मिठास से ईष्या करना चाहती हूँ। नहीं समय की साम्राज्ञी बन सब कुछ पाना चाहती हूँ ,नहीं किसी से कुछ आगे बढ़ खुद पे इठलाना चाहती हूँ।  

अब न दर्द सहने की क्षमता हैं ,नहीं वो समय जो मुझे दर्द दे सके। वो दुःख ,वो दर्द,वो स्वप्न ,वो इच्छाएं ,वो आस्थाएं ,वो आनंद सब कुछ मेरे अंदर है आज भी ,वह छूटता नहीं ,क्योकि जितना मेरा होना सत्य हैं उसका भी होना सत्य हैं ,उसे झुठला नहीं सकती ,भुला भी नहीं सकती और खुदसे लिपटा भी नही सकती ,क्योकि उसे झुठलाने से सच झूठ नहीं बन जायेगा ,उसे भुलाने से वह भूल नहीं हो जायेगा ,उसे छूटाने से वह कही भी छूट नहीं जायेगा ,मेरा भूतकाल मेरा हिस्सा हैं वो मेरे शरीर के ,मन के साथ ,आत्मा के साथ उतना ही आगे बढ़ जायेगा जितना मैं उसे भूलना चाहूंगी ,उससे छूटना चाहूंगी ,उसे दूर करना चाहूंगी। शायद इसलिए वह भूत हैं वह !

वह भूत क्यों हैं और उस भूत का अस्तित्व क्यों और कब तक हैं जानती हूँ। तब तक और वही तक जब तक मैं उससे जुडी हूँ। जुड़ने से यहाँ मतलब टूटने की ,छूटने की ,भूलने की इच्छा से जुडी हूँ। दर्द को भुलाने की इच्छा ही दर्द को जगाने की शक्ति हैं ,दर्द को समझे जाने की इच्छा दर्द की संजीवनी ,दर्द को दूर करने का प्रयत्न स्वयं से मात्र छल !

मैं उस दर्द को अपनाना चाहती हूँ ,पुरे भाव से। अगर मेरा भूतकाल कभी आनंद था ,कभी दुःख तो वो दुःख ,वो आनंद सब कुछ मेरा ही तो था ,वो दर्द इसलिए हुआ क्योकि मैंने अपनी खुशियों को ,अपने अस्तित्व को ,अपने आप को उससे पूरी तरह जोड़ लिया। यह भूल ही गयी की यह क्षण, मेरे अस्तित्व से बढ़कर नहीं ! यह भी भूल गयी की यह पल ,यह समय ,यह भावनाएं ,यह नाते-रिश्ते ,यह लोग, यह सब मैं नहीं !जुड़ाव क्षणिक सुख देता हैं और बहुत दुःख। तो अब मैं जुड़ना नहीं चाहती। मैं बैराग धारण नहीं कर रही ,नहीं मैं कही दूर जा रही ,न मैंने यह भौतिक जीवन तज ,दिया न रिश्तो नातों से मुख मोड़ लिया। सन्यास कोरा भरम हैं ,स्वयं से किया गया छल हैं  ,अपने आप से बोला गया झूठ हैं। ऐसी विरक्ति जो सन्यासी बना दे आत्मा से उठती हैं और संत बना देती हैं। युगो तक फिर इस दुनियाँ में आना नहीं होता। मैं संत नहीं बनना चाहती ,मेरी विरक्ति मुझे किसी से भी तोडना नहीं चाहती ,कुछ भी छोड़कर निकलवा लेना  नहीं चाहती। 

मैं अब बस शांत हो जाना चाहती हूँ ,शांति बन जाना चाहती हूँ ."Above from all attachments" मैं इसी जीवन में मुक्त हो जाना चाहती हूँ।  
मैं किनारो से जुड़ के बहना चाहती हूँ ,मैं अपनी गति में विचारना चाहती हूँ ,मैं आनंद मेघ संग नृत्य करना चाहती हूँ पर मात्र एक नदियां की तरह ,प्रतिपल -प्रतिक्ष्ण बहती सरिता की तरह ! नदियाँ जो उगम से प्रारम्भ होती हैं ,पर उगम को छोड़ विस्तारित होती हैं ,उसे उगम से बिछुड़ने का दुःख नहीं होता वो बस अपने पथ पर बढ़ी चली जाती हैं , मंद -शांत -अविरत ! मार्ग में वृक्षवल्ली आती हैं उस पर फूल बिखराती हैं वो आनंद मग्न होती हैं ,उन पुष्पों को एक बार आलिंगन में लेती हैं उनके संग आगे बढ़ जाती हैं ,पुष्प कुछ देर संग चलते हैं फिर अंतर में कही खो जाते हैं पर वह बिना किसी शोक के बहती जाती हैं ,आगे पहाड़ आते है ,ऊंचाइयां आती हैं ,कठिन आड़े-टेड़े रास्ते आते हैं  ,पर वह स्थिर भाव से उन्हें भी पार कर जाती हैं। एक ऐसा मोड़ आता हैं जहाँ बड़ी ऊंचाइयों से वह धड़धङाकर वह निचे गिर पड़ती हैं ,क्षण मात्र में निचे गिरने का दुःख बिसर वह उन नन्हे -नन्हे पथ्तर के टुकड़ो को देखती हैं जो सूर्य किरणों से मिलती उसकी चमक को देख खुद भी आँखे चमकाने लगते हैं। उसे क्षणिक मोह हो उठता हैं ,यही थम जाने का मन करता हैं ,वह कुछ और तेज़ी से आँखे चमका तुरंत वहां से आगे बढ़ जाती हैं। राह में कोई तीर्थ आता हैं लोग उसे गंगा ,जमुना कह पुकारते हैं ,कोई आरती सुनाता हैं ,कोई दिए बहाता हैं ,उसके पास जो भी हैं वह इन अबोध बालको को निछावर कर वह पुनः आगे बढ़ जाती हैं बिना एक क्षण का भी विलम्ब किये ,शांत भाव से बिना रुके -बिना थमे -बिना थके वह अमृतवर्षिणी बहती जाती हैं ,बढ़ती जाती हैं और फिर उसी शांत भाव से सागर में मिल जाती हैं। अस्तित्व  को खोकर सागर बन जाती हैं। कौन जानता हैं सागर में मिली नदियां फिर कभी कही से कोई धारा बन के फिर किसी नदी का सृजन न करती हो ! खारा पानी ,खूब अंदर जाकर किसी मीठे पानी का झरना और फिर किसी माँ कावेरी का हिस्सा न बनता हो ! इसलिए ही आदि ही अंत हैं और अंत ही प्रारम्भ ! जीवन प्रतिक्षण भूतकाल हैं और भूतकाल ही वर्तमान ! सो अब इस आदि - अंत के खेल को बिना किसी जुड़ाव के सहज भाव से खेलना चाहती हूँ। अब बस एक नदियां बनके बहना चाहती हूँ। 

विरक्ति के रंग में रसरंग हो जाना चाहती हूँ। 

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