सुबह से ही मेरे घर में उत्सव जैसा वातावरण था,पतिदेव जो कभी ८ बजे से पहले सोकर नही उठते ,उस दिन सुबह ५ बजे ही उठ गए . सुबह सुबह अख़बार पढ़ना चाहे सारे विश्व की आदत हो लेकिन मैं ऐसा भूल कर भी नही करती ,आख़िर अख़बार उठाते ही खून,हिंसा अत्याचार की खबरे पढ़कर क्यों अपना मन ख़राब करू ?लेकिन उस दिन सबेरे सबेरे चारो पांचो अख़बार पढ़ लिए ,न्यूज़ भी देख ली । आख़िर वह दिन हमारी जिंदगी का बहुत महत्वपूर्ण दिन था ,हम पहली बार अपनी बेटी को स्कूल में दाखिला दिलवाने के लिए इंटरव्यू देने जा रहे थे ,बेटी ने तो इससे पहले ही दोनों इंटरव्यू सफलता पूर्वक दे दिए थे ,शहर के नामचीन और बहुत बडे विद्यालय ने उसे विद्यालय में दाखिला देने के काबिल भी घोषित कर दिया था ,अब हमारी बारी थी ,स्वयं को उसको पढाने के काबिल माता पिता सिद्ध करने की ।
वैसे तो पुरा विश्वास था हमें की हम इस इंटरव्यू को सफल बनायेंगे ,क्योकी हम दोनों ने ही उच्च शिक्षा ग्रहण की हैं ,पतिदेव भी अच्छी कंपनी में ,अच्छे ओहदे पर काम करते हैं ।
खैर नियत समय से १५ मिनिट पहले हम विद्यालय पहुँच गए ,विद्यालय की प्रिंसिपल साहिबा हमारा इंटरव्यू लेने वाली थी ,जिसे उन्होंने बडी कलात्मकता से अभिभावक परिचय समारोह का नाम दिया था ,वह किसी फोटो कार्यक्रम में वयस्त थी। हम लोग करीब १ घंटा उनका इंतजार करते रहे ,इतने समय में अभिभावकों की खासी भीड़ विद्यालय में जमा हो गई ,घंटे भर बाद एक -एक कर प्रिंसिपल साहिबा ने अभिभावकों को मिलने के लिए अपने कक्ष में आमंत्रित किया ,हर एक को ५ मिनिट के अंदर बडे प्यार से विदाई भी दे दी । हम समझ नही पा रहे थे की इतनी जल्दी प्रिंसिपल साहिबा ,अभिभावको के बारे क्या जान पा रही हैं ,खैर हमारी बारी आने पर प्रिंसिपल से मिलने उनके कक्ष में गए ,बडे प्यार से उन्होंने हमें बिठाया ,मुझे पूछा "अच्छा तो आपने अभी अभी संगीत विषय में पीएचडी की हैं" ?पतिदेव से भी इस तरह से दो तीन सवाल पूछे और हमें विदा दी ।
हम बडे खुश थे और विश्वास भी हो गया था की बस अब इस विद्यालय में हमारी बेटी का दाखिला हो जाएगा ,नियत दिवस पर विद्यालय में भरती किए गए छात्रों की सूचि देखने मैं पहुची ,चार पॉँच बार पुरी लिस्ट पढने के बाद भी आरोही का नाम कहीं नही दिखा ।
रास्ते भर सोचती रही की पतिदेव को कैसे बताऊ ,वो बहुत दुखी हो जायेंगे । खैर उन्हें बताना तो था ही बता दिया ,उस दिन से लेकर तीन दिन तक हम सोचते रहे की हमारे बोलचाल में ,वह्य्वार में ,शिक्षण में ,घर की आर्थिक वयवस्था में प्रिंसिपल साहिबा को क्या कमी दिखी की आरोही का दाखिला उस विद्यालय में नही हो पाया ,हम दोनों दुखी थे । इस कारण नही ,की उस विद्यालय में आरोही का दाखिला नही हुआ ,बल्कि इस कारण की हमारी वजह से आरोही को उस स्कूल में दाखिला नही मिला ।
अलबत्ता हम दोनों ने तय किया की प्रिंसिपल साहिबा से पूछेंगे जरुर की उन्हें हमारे शैक्षणिक स्तर ,आर्थिक स्तर में कहाँ कमी दिखी . ताकि अगले किसी विद्यालय में इस घटना की पुनरावृत्ति न हो ।
मैं अगले दिन विद्यालय पहुँची और कहा की" प्रिंसिपल से मिलना हैं "।
रिसेप्शनिस्ट ने पूछा " क्यो किसलिए "?
बच्चे के विद्यालय में दाखिले संबंध में ।
जो लिस्ट लगी हैं वह फायनल हैं ,आप प्रिंसिपल से नही मिल सकती ।
देखिये मैं उसका दाखिला नही करवाना चाहती ,बस जानना चाहती हूँ की किस कारण से दाखिला नही हुआ ?
उसका कोई कारण नही हैं ।
कुछ तो कारण होगा ।
कहा न ,कोई कारण नही हैं ।
अरे ,पर आपने भी तो विद्यालय में भरती किए जाने वाले बच्चो का चुनाव किसी आधार पर किया होगा न ?
नही कोई आधार नही ।
मैं जानना चाहती हूँ की हमारे इंटरव्यू में कहाँ कमी रह गई ?मुझे प्रिंसिपल से मिलना हैं ।
कोई कमी नही रह गई इंटरव्यू में ,बच्चा भी होशियार है ।
तो माता पिता शायद नही ?मैंने कहा ।
नही ऐसा नही हैं ?
तो फ़िर क्या कारण हैं ?
कुछ भी नही ।
बच्चो का दाखिला किस आधार पर करते हैं ?
कोई आधार तय नही हैं ,कुछ लॉटरी की तरह होता हैं ।
लॉटरी की तरह!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! ?
हाँ वैसा ही कुछ ।
मैं प्रिंसिपल से मिलना चाहती हूँ ।
आप नही मिल सकती ।
क्यो ????
नही ।
इस बीच मेरी ही तरह प्रश्न लिए कुछ और माता पिता भी वहाँ एकत्रित हो गए . सबने मिल कर विशेष आग्रह किया ,घंटे भर इंतजार करने को भी तैयार हो गए ,तब जाकर प्रिंसिपल साहिबा मिलने को तैयार हुई ।
मैंने जाकर बडी विनम्रता से अपने सवाल दोहराए ।
मेरे आश्चर्य की सारी सीमाए समाप्त हो गई जब प्रिंसिपल साहिबा ने भी यही जवाब दिया की हम लॉटरी सिस्टम की तरह ही किसी सिस्टम से बच्चे विद्यालय में दाखिला देने के लिए चुनते हैं ।
मैंने गंभीर होकर पूछा क्यो?
जवाब मिला इतने विद्यार्थीयो के फॉर्म आते हैं ,किसे चुने किसे नही सभीके माता पिता उच्च शिक्षा प्राप्त ।५० फॉर्म चुन कर लॉटरी करते हैं । आप ही बताये ,क्या आधार रखे .आपको विद्यालय के निर्णय पर विश्वास करना चाहिए ।
मैंने कहा की फ़िर आप सौ में से ५० फॉर्म चुनने के बजाय १५ ही चुने जिन्हें आप वाकई दाखिला देने के काबिल समझते हैं । परिवार की आर्थिक स्थिति ,शिक्षण आदि बातो को अगर आप आधार नही मानते तो इतने इंटरव्यूस की क्या जरुरत हैं ?
इस बार वह निरुत्तर थी . मैं धन्यवाद कह कर वहाँ से चली आई .
मेरी एक सहेली से जो एक बडे विद्यालय में बडे ओहदे पर हैं ,पूछने पर पता चला की सिर्फ़ उसी विद्यालय में नही बल्कि अन्य नामी विद्यालयों में भी इसी तरह से बच्चो को दाखिला दिया जाता हैं .
मैं सोचने लगी की यह हमारे बच्चो के भाग्य विधाता स्वयं को "अहं ब्रह्मास्मि "कह कर हमारे बच्चो के भविष्य से खेलते हैं ,शिक्षा का कैसा स्वरुप हैं यह ? आम इंसान अपने बच्चो को ऊँची फीस देने की तैयारी रखकर भी अच्छे विद्यालय में नही पढ़वा सकता ,यह कैसी विडम्बना हैं ?
कहते हैं बेटी माँ की परछाई होती हैं ,वो मेरी परछाई नही ,एक दैवीय ज्योति हैं,जो जीवन को प्रकाशित करती हैं मेरा ही चेहरा,मेरी शक्ति,शांति,संगती ,गीति,आरोही ....
Wednesday, February 4, 2009
Tuesday, January 27, 2009
क्या शांभवी को मर जाना चाहिए ?
कभी कभी जिंदगी इतनी मायूस, उदास हो जाती हैं की जीने की जरा भी इच्छा नही रह जाती,लगता हैं जैसे संसार को हमारी कोई जरुरत ही नही ,हम जैसे इस दुनिया के लिए बने ही नही ,कोई साथ नही होता ,सहारा किसे कहे? इस दुनिया में कोई किसीका सहारा हो पाया हैं ? अथाह दुःखसागर के ह्रदय में आशा के चंद मोती
कब तक जीवन को सुंदर बनाने की असफल कोशिश करते रहे ?आज की तारीख उन सभीको शायद संतोष दे पायेगी जिन्हें मेरा अस्तित्व गवारा नही ।
एक सादे कागज़ पर लिखे, कुछ अति दुखद आखरी वाक्य ..................शांभवी की कलम से निकले अंतिम हारे हुए ,आसुंओ से भरे कुछ चुनिंदा वाक्य ...नही ..............शांभवी मरी नही ,वह जिंदा हैं . कहते हैं न मांगने से मौत भी नही मिलती , कोशिश तो यही थी भरपूर नींद की गोलिया खाकर अपनी जीवन कहानी खत्म कर दे ,पर जिस ईश्वर की इच्छा के बिना आज तक किसी पेड़ का एक पत्ता भी नही हिला ,उसकी इच्छा के बिना क्या उसका मृत्यु से मिलन सम्भव था ?
शांभवी ....बचपन से मुश्किलों और दुखो से लड़ती ही आई थी और विवाह के बाद शुभंकर का गुस्सैल स्वभाव और अहंकार उसे सहन नही हुआ और हजारो भारतीय दुखियारी,जीवन से हार मानने वाली स्त्रियों की तरह उसने भी इस जीवन से, मर जाना बेहतर समझा ?लेकिन ...............
वह आज मनोरोगियों के अस्पताल में दोनों पैरो से पंगु और मति से भ्रमित होकर बैठी हुई हैं ,जीवन तब कठिन था आज असहनीय हैं ।
रोज़ अख़बार उठाने पर एक न एक ख़बर किसी न किसी शांभवी के आत्महत्या करने के सफल या असफल प्रयास की होती हैं ,आख़िर क्यो?
आख़िर क्यो ?आज कल की लड़कियां जीवन से इतनी जल्दी हार मान जाती हैं ?क्यो वह मरने का प्रयत्न करने से पहले एक बार भी नही सोचती की मौत नही आई तो जीवन इससे भी दुखद हो सकता हैं ?क्यो वह दुसरे के बुरे वह्य्वार की सजा स्वयं को देती हैं ?
जीवन किसी परिकथा सा सरल कभी नही रहा हैं ,अगर जीवन इतना ही सरल होता तो कभी कोई सीता, द्रौपदी नही हुआ करती । कोई जीवन से थका दुखो से व्यथित ,जीवन के कठिन प्रश्नों के कारण उलझा हुआ अर्जुन भी हुआ नही करता ,फ़िर कृष्ण जैसे किसी सारथी की जरुरत भी नही होती जो जीवन के रथ को, जीवन के ही समरांगण में ,जीवन युद्ध की नीतिया समझाकर जीवन को सफल ,विजयी ,आनंदमय करे ।
जो लोग जीवन में बहुत आगे बढे हैं ,जो यशस्वी हैं,विजयी हैं,वह मनस्वी और तपस्वी भी होते हैं । उनके पास सुख की खदाने नही होती ,नही सारी परिस्तिथियाँ हमेशा से उनके अनुकूल होती हैं ,पर वे ;वह लोग होते हैं जो कभी हार नही मानते ,जो कभी जीवन को कम नही आंकते ,उनके के लिए थक हार कर आत्महत्या कर लेना ,या जीवन भर युही दुखसे दुखित होकर अकेले ;गमो के अंधेरे में जीना ,खुदको कमज़ोर समझना जैसा कोई पर्याय ही नही होता ,उनके लिए जीवन भर सारी मुश्किलों के जवाब में सिर्फ़ एक ही पर्याय होता हैं जीवन को जीना ,लड़कर जीना ,बिना थके ;बिना हार माने ;अपना वजूद,अपने विचार, समाज को जता कर जीना और जी भर कर जीना ,अपने जीवन को जीवन का सही अर्थ देना ।
ईश्वर ने सभी को सामान आत्मिक शक्ति और बुद्धि दी हैं ,यह हम पर हैं की हम अपनी आत्मिक शक्ति और बुद्धि का कितना और कैसे उपयोग करते हैं । माना,सभी की परिस्तिथिया समान नही होती ,कुछ लोग अधिक भावनात्मक होते हैं ,किंतु किसी भी परिस्तिथि में आत्महत्या कर लेना या घुट घुट कर जीना कोई पर्याय नही ।
नारी को शक्ति कहा जाता हैं ,वह सिर्फ़ कहने मात्र के लिए या किसी विशेष दिन पर देवी पूजा करने के लिए नही ,वह इसलिए क्योकि उसमे परिस्तिथियों को बदलने की ,बुरे पर विजय पाने की असीम शक्ति हैं । हार को जीत में बदलने की ताकत हैं .
दुःख होता हैं की स्त्री आज भी स्वयं को इतना अशक्त समझती हैं ,की स्वयं की ही शत्रु हो जाती हैं ,यह भी एक तरह की मानसिक ,और आत्मिक दुर्बलता ही हैं न ।
मुझे शांभवी की कहानी का दुखद अंत नही देखा जाता ,आइये इस कहानी का सुखद अंत देखे ।
कहते हैं ईश्वर सबके साथ बराबर न्याय करता हैं ,एक सहेली सुधा की मदद से शांभवी पुरी तरह से ठीक हो गई ,वह शुरू से अच्छी चित्रकार थी,उसने स्वयं को सम्हाला और अपने जीवन के सुख दुःख को चित्रों में ढाला ,आज वह सफल चित्रकार हैं ,आज लोग उससे प्रेरणा लेते हैं ,उसको आदर्श मानते हैं ।
यह सुखद अंत किसी भी साधारण भारतीय महिला की कथा का हो सकता हैं ,यह आप पर हैं की आप कौनसा अंत चुनना चाहेंगी ।
कब तक जीवन को सुंदर बनाने की असफल कोशिश करते रहे ?आज की तारीख उन सभीको शायद संतोष दे पायेगी जिन्हें मेरा अस्तित्व गवारा नही ।
एक सादे कागज़ पर लिखे, कुछ अति दुखद आखरी वाक्य ..................शांभवी की कलम से निकले अंतिम हारे हुए ,आसुंओ से भरे कुछ चुनिंदा वाक्य ...नही ..............शांभवी मरी नही ,वह जिंदा हैं . कहते हैं न मांगने से मौत भी नही मिलती , कोशिश तो यही थी भरपूर नींद की गोलिया खाकर अपनी जीवन कहानी खत्म कर दे ,पर जिस ईश्वर की इच्छा के बिना आज तक किसी पेड़ का एक पत्ता भी नही हिला ,उसकी इच्छा के बिना क्या उसका मृत्यु से मिलन सम्भव था ?
शांभवी ....बचपन से मुश्किलों और दुखो से लड़ती ही आई थी और विवाह के बाद शुभंकर का गुस्सैल स्वभाव और अहंकार उसे सहन नही हुआ और हजारो भारतीय दुखियारी,जीवन से हार मानने वाली स्त्रियों की तरह उसने भी इस जीवन से, मर जाना बेहतर समझा ?लेकिन ...............
वह आज मनोरोगियों के अस्पताल में दोनों पैरो से पंगु और मति से भ्रमित होकर बैठी हुई हैं ,जीवन तब कठिन था आज असहनीय हैं ।
रोज़ अख़बार उठाने पर एक न एक ख़बर किसी न किसी शांभवी के आत्महत्या करने के सफल या असफल प्रयास की होती हैं ,आख़िर क्यो?
आख़िर क्यो ?आज कल की लड़कियां जीवन से इतनी जल्दी हार मान जाती हैं ?क्यो वह मरने का प्रयत्न करने से पहले एक बार भी नही सोचती की मौत नही आई तो जीवन इससे भी दुखद हो सकता हैं ?क्यो वह दुसरे के बुरे वह्य्वार की सजा स्वयं को देती हैं ?
जीवन किसी परिकथा सा सरल कभी नही रहा हैं ,अगर जीवन इतना ही सरल होता तो कभी कोई सीता, द्रौपदी नही हुआ करती । कोई जीवन से थका दुखो से व्यथित ,जीवन के कठिन प्रश्नों के कारण उलझा हुआ अर्जुन भी हुआ नही करता ,फ़िर कृष्ण जैसे किसी सारथी की जरुरत भी नही होती जो जीवन के रथ को, जीवन के ही समरांगण में ,जीवन युद्ध की नीतिया समझाकर जीवन को सफल ,विजयी ,आनंदमय करे ।
जो लोग जीवन में बहुत आगे बढे हैं ,जो यशस्वी हैं,विजयी हैं,वह मनस्वी और तपस्वी भी होते हैं । उनके पास सुख की खदाने नही होती ,नही सारी परिस्तिथियाँ हमेशा से उनके अनुकूल होती हैं ,पर वे ;वह लोग होते हैं जो कभी हार नही मानते ,जो कभी जीवन को कम नही आंकते ,उनके के लिए थक हार कर आत्महत्या कर लेना ,या जीवन भर युही दुखसे दुखित होकर अकेले ;गमो के अंधेरे में जीना ,खुदको कमज़ोर समझना जैसा कोई पर्याय ही नही होता ,उनके लिए जीवन भर सारी मुश्किलों के जवाब में सिर्फ़ एक ही पर्याय होता हैं जीवन को जीना ,लड़कर जीना ,बिना थके ;बिना हार माने ;अपना वजूद,अपने विचार, समाज को जता कर जीना और जी भर कर जीना ,अपने जीवन को जीवन का सही अर्थ देना ।
ईश्वर ने सभी को सामान आत्मिक शक्ति और बुद्धि दी हैं ,यह हम पर हैं की हम अपनी आत्मिक शक्ति और बुद्धि का कितना और कैसे उपयोग करते हैं । माना,सभी की परिस्तिथिया समान नही होती ,कुछ लोग अधिक भावनात्मक होते हैं ,किंतु किसी भी परिस्तिथि में आत्महत्या कर लेना या घुट घुट कर जीना कोई पर्याय नही ।
नारी को शक्ति कहा जाता हैं ,वह सिर्फ़ कहने मात्र के लिए या किसी विशेष दिन पर देवी पूजा करने के लिए नही ,वह इसलिए क्योकि उसमे परिस्तिथियों को बदलने की ,बुरे पर विजय पाने की असीम शक्ति हैं । हार को जीत में बदलने की ताकत हैं .
दुःख होता हैं की स्त्री आज भी स्वयं को इतना अशक्त समझती हैं ,की स्वयं की ही शत्रु हो जाती हैं ,यह भी एक तरह की मानसिक ,और आत्मिक दुर्बलता ही हैं न ।
मुझे शांभवी की कहानी का दुखद अंत नही देखा जाता ,आइये इस कहानी का सुखद अंत देखे ।
कहते हैं ईश्वर सबके साथ बराबर न्याय करता हैं ,एक सहेली सुधा की मदद से शांभवी पुरी तरह से ठीक हो गई ,वह शुरू से अच्छी चित्रकार थी,उसने स्वयं को सम्हाला और अपने जीवन के सुख दुःख को चित्रों में ढाला ,आज वह सफल चित्रकार हैं ,आज लोग उससे प्रेरणा लेते हैं ,उसको आदर्श मानते हैं ।
यह सुखद अंत किसी भी साधारण भारतीय महिला की कथा का हो सकता हैं ,यह आप पर हैं की आप कौनसा अंत चुनना चाहेंगी ।
Friday, January 23, 2009
कैसे समझाए ?(व्यंग)
ये दुनिया भी कितनी अजीब हैं न ,तरह तरह के लोग रहते हैं यहाँ । कुछ सुखी ,कुछ दुखी ,कुछ स्वांत सुखी ,कुछ स्वांत दुखी ,कुछ चिंतनशील, गंभीर ,कुछ जिनको चिंतन,मनन आदि शब्द हमेशा ही कुनैन की गोली से कड़वे लगते हैं ,कुछ होते हैं जो जीवन को संग्राम समझते हैं उन्हें कृष्ण कहीं नज़र नही आता पर खुदको वे अर्जुन समझते हैं . कुछ ...... उनके लिए जीवन जीवन नही होता आनंदोंउत्सव होता हैं ,वे कभी सड़क पर गुनगुनाते निकलते हैं ,कभी दोस्तों पर हँसते-हँसाते . कुछ बडे मेहनती होते हैं उन्हें पढने -लिखने का भुत सवार होता हैं ,चश्मे में आँखे छुपाये दिन रात किताबो में नज़रे गडाये रहते हैं ,किताबे ही उनके लिए संसार की सबसे अनमोल वस्तु होती हैं , कुछ ? उन्हें किताबे ..........यानि सिरदर्द लगता हैं .उनकी प्रिय सखी होती हैं किताबो में लगने वाली घुन । कुछ ........जीवन में बडे बडे सपने देखते हैं , बडे -बडे सपने ,कभी कभार तो इतने बडे की जीवन खत्म होने लगता लेकिन सपना हैं की ख़त्म होने का नाम ही नही लेता।
कुछ .........सपने देखना बडा भारी जुर्म समझते हैं ,सपने वपने देखने से अच्छा जो हैं ,जैसा हैं जीवन , उसी में संतुष्ट रहना धर्म समझते हैं । कुछ दिन रात ईश्वर के नाम से रोते रहते हैं ,रे रे रे रे ब हु हु हु हु भगवान !ऐसा क्यो हुआ ?और हमें अचानक हिन्दी धारावाहिकों की याद आ जाती हैं । कुछ ....भगवान के भी भगवान होते हैं उसकी सत्ता को ही खारिज कर देते हैं ..काहे का भगवान . कुछ भगवान वगवान नही होता सब मन के भरम हैं । कुछ....के जीवन में कोई उद्देश्य ही नही होता ,बस पंथहीन दिशाहीन जीते जाते हैं ,कुछ अपनी पुरी उम्र बस अपने लक्ष्य को पाने में लगा देते हैं और जब लक्ष्य मिलता हैं तो उनके फोटो पर हार टंगा हुआ नज़र आता हैं । कुछ नई विचारधारा के प्रणेता होते हैं ,हाथो में बगावत का झंडा लिए वे खुदको विद्रोह के जुलुस में सबसे आगे खडा रखते हैं ,तो कुछ संस्कृति और संस्कारो के युगंधर होते हैं ,उनके लिए जीवन वहीं हैं जो उनको उनके बुजुर्गो ने समझाया हैं ,ऐसे लोगो से आज की पीढी के नवयुवक और युवतिया कुछ ऐसे दूर भागते हैं जैसे जंगल में शेर आने पर बिचारे सारे निर्दोष प्राणी भागते हैं ।
सच ! कितनी अजीब हैं न दुनिया ,न जाने कितने रंग भरे हैं ईश्वर ने, इस संसार रूपी चित्र में और हर रंग की अपनी एक खासियत हैं ।हम चाहते हैं, जैसा हम सोचते हैं ,वैसा कोई और भी सोचे तो जीवन कितना सुंदर हो जाए ,पर ऐसा कभी नही होता ,हम समझाते रह जाते हैं ,लोग समझते ही नही ,फ़िर लोग हमें अपनी बात समझाते हैं और हम समझते नही ,ताउम्र समझने -समझाने का कार्यक्रम वर्तमान टीवी धारावाहिकों की तरह अनवरत चलता ही रहता हैं ,चलता ही रहता हैं । उधर भगवान उलटी गिनती का कार्यक्रम भी शुरू कर देता हैं १०-९-८-७-६-५-४-३-२--------------------------इधर हम कहते -सुनाते ही रह जाते हैं ,और फ़िर पूछते हैं क्या टाइम खत्म ? जल्दी ?अभी तो कितना कुछ समझना -समझाना था,दुनिया को बतलाना था । उधर भगवान फरमान जारी कर देता हैं ,लो भाई अब इस जनम इन्हे चिडिया बनाओ ,गधा बनाओ । हम चीखते हैं .........अन्याय, अन्याय, घोर अन्याय इतने पुण्य करने के बाद चिडिया या गधे का जनम ?जिंदगी भर दूसरो की इतनी चिंता की,जग भर की सोची ,इतना समझाया उसके प्रतिफल में गधे का जन्म । नही .........
वह कहता हैं ..मैंने तुझे मनुष्य बनाया तू जीवन समझता और समझाता ही रहा जीवन भर ,जीवन को जिया ही नही अब शायद चिडिया या गधा बनके जीवन को जीना सीख जाए ।
हम निरुत्तर हो जाते हैं ........................कुछ पलो की शान्ति के बाद हम फ़िर सोचते हैं वृक्ष की उस डाल पर बैठी उस नन्ही सी चिडिया को कौनसा जीवन पाठ समझाया जा सकता हैं????????????????????????????????????????????
कुछ .........सपने देखना बडा भारी जुर्म समझते हैं ,सपने वपने देखने से अच्छा जो हैं ,जैसा हैं जीवन , उसी में संतुष्ट रहना धर्म समझते हैं । कुछ दिन रात ईश्वर के नाम से रोते रहते हैं ,रे रे रे रे ब हु हु हु हु भगवान !ऐसा क्यो हुआ ?और हमें अचानक हिन्दी धारावाहिकों की याद आ जाती हैं । कुछ ....भगवान के भी भगवान होते हैं उसकी सत्ता को ही खारिज कर देते हैं ..काहे का भगवान . कुछ भगवान वगवान नही होता सब मन के भरम हैं । कुछ....के जीवन में कोई उद्देश्य ही नही होता ,बस पंथहीन दिशाहीन जीते जाते हैं ,कुछ अपनी पुरी उम्र बस अपने लक्ष्य को पाने में लगा देते हैं और जब लक्ष्य मिलता हैं तो उनके फोटो पर हार टंगा हुआ नज़र आता हैं । कुछ नई विचारधारा के प्रणेता होते हैं ,हाथो में बगावत का झंडा लिए वे खुदको विद्रोह के जुलुस में सबसे आगे खडा रखते हैं ,तो कुछ संस्कृति और संस्कारो के युगंधर होते हैं ,उनके लिए जीवन वहीं हैं जो उनको उनके बुजुर्गो ने समझाया हैं ,ऐसे लोगो से आज की पीढी के नवयुवक और युवतिया कुछ ऐसे दूर भागते हैं जैसे जंगल में शेर आने पर बिचारे सारे निर्दोष प्राणी भागते हैं ।
सच ! कितनी अजीब हैं न दुनिया ,न जाने कितने रंग भरे हैं ईश्वर ने, इस संसार रूपी चित्र में और हर रंग की अपनी एक खासियत हैं ।हम चाहते हैं, जैसा हम सोचते हैं ,वैसा कोई और भी सोचे तो जीवन कितना सुंदर हो जाए ,पर ऐसा कभी नही होता ,हम समझाते रह जाते हैं ,लोग समझते ही नही ,फ़िर लोग हमें अपनी बात समझाते हैं और हम समझते नही ,ताउम्र समझने -समझाने का कार्यक्रम वर्तमान टीवी धारावाहिकों की तरह अनवरत चलता ही रहता हैं ,चलता ही रहता हैं । उधर भगवान उलटी गिनती का कार्यक्रम भी शुरू कर देता हैं १०-९-८-७-६-५-४-३-२--------------------------इधर हम कहते -सुनाते ही रह जाते हैं ,और फ़िर पूछते हैं क्या टाइम खत्म ? जल्दी ?अभी तो कितना कुछ समझना -समझाना था,दुनिया को बतलाना था । उधर भगवान फरमान जारी कर देता हैं ,लो भाई अब इस जनम इन्हे चिडिया बनाओ ,गधा बनाओ । हम चीखते हैं .........अन्याय, अन्याय, घोर अन्याय इतने पुण्य करने के बाद चिडिया या गधे का जनम ?जिंदगी भर दूसरो की इतनी चिंता की,जग भर की सोची ,इतना समझाया उसके प्रतिफल में गधे का जन्म । नही .........
वह कहता हैं ..मैंने तुझे मनुष्य बनाया तू जीवन समझता और समझाता ही रहा जीवन भर ,जीवन को जिया ही नही अब शायद चिडिया या गधा बनके जीवन को जीना सीख जाए ।
हम निरुत्तर हो जाते हैं ........................कुछ पलो की शान्ति के बाद हम फ़िर सोचते हैं वृक्ष की उस डाल पर बैठी उस नन्ही सी चिडिया को कौनसा जीवन पाठ समझाया जा सकता हैं????????????????????????????????????????????
Wednesday, January 21, 2009
अंतर! ..........................
कल यूनिवर्सिटी जाने के लिए ऑटो चालक ने हमेशा से अलग रास्ता चुना । पुराने शहर के इलाके में आने वाली इस सड़क के दोनों तरफ़ गरीब परिवारों के घर हैं ,घर क्या हैं! छप्पर हैं ,कुछ पुरानी त्रिपाल से बनी हुई झुग्गिया ,उसमे रहने वाले गरीब लोग ,कहीं बर्तन मांजती ,कपड़े धोती ,चूल्हे पर खाना पकाती स्त्रिया,कुछ चुना परचूनी की दुकाने ,किराने के सामान की दुकाने,जहाँ का आधा सामान शायद बरसो पहले अपनी एक्स्प्यारी डेट पार कर चुका होगा . मैले कुचेले कपड़े पहने कुछ बच्चे थे ,जो एक दुसरे के पीछे चूहे बिल्ली की तरह भाग रहे थे ,कुछ माँ के साथ बैठ कर बर्तनों को लगाने वाली राख को पावडर समझ कर सज सवर रहे थे . मेरे साथ बैठी आरोही उन बच्चो को देखकर जोर जोर से हँस रही थी । कुछ आगे जाने पार मैंने देखा ,काफी लोग एक वृत्त बनाकर खड़े हैं ,वृत्त के बीचो बीच एक ८-१० साल का बच्चा ढोल बजा रहा हैं ,और उसकी ढोल की ताल से ताल मिलाकर तक़रीबन २साल, हाँ इतनी ही उम्र का बच्चा नाच रहा हैं ,न जाने क्यो यह देखकर मेरा मन भर आया और आँखों से आंसुओ की दो बुँदे अनायास ही छलक गई । मैंने सोचा ऐसा क्यो ?जब मेरी पौने दो साल की आरोही ख़ुद ही टीवी, रेडियो या म्यूजिक प्लेयर ऑन करके फिल्मी , कई बार मुझे कर्कश लगने वाले गानों पर नाचती हैं तो मेरा मन झूम उठता हैं ,उसको इस तरह नाचते देखने पर मुझे असीम सुख मीलता हैं ,आँखे तब भी इसी तरह छलछला जाती हैं ,फ़िर अभी जो आँखे छलछला आई, तो अंतर क्या हैं ?अंतर ............................................
अंतर तो सिर्फ़ इतना ही हैं की जब आरोही नाचती हैं तो वह स्वांत सुखाय नाचती हैं ,अपनी खुशी से ,अपनी मन से ,अपनी मर्जी से और यह जो बच्चा नाच रहा हैं वह नाच रहा हैं अपनी गरीबी से ,अपनी मज़बूरी से ,अपनी रोजी रोटी के लिए । अंतर तो सिर्फ़ इतना ही हैं की आरोही जब नाचती हैं तब मैं और पतिदेव इतने खुश होते हैं की कह नही सकते ,और जब यह बच्चा नाच रहा हैं तब इसके माँ पिता अपनी गरीबी पर शायद दुखी हो रहे होंगे , नृत्य करते इसके पैरो की थिरकन पर उनके ह्रदय जलते होंगे । अंतरसिर्फ़ इतना ही हैं की जब आरोही नाचती हैं तो मेरी आँखे खुशी से छलछला जाती हैं और आज इस बच्चे की मज़बूरी देखकर दुःख से छलछला आई हैं ,अंतर सिर्फ़ इतना हैं की आरोही एक समृद्ध घर की बेटी हैं और वह बच्चा एक गरीब घर का बेटा हैं ,जिसे भारत जैसे विकासशील देश में भी लगभग दो साल की उम्र से ही अपना पेट पालने की जद्दोजहद से गुजरना पड़ता हैं,दो समय के भोजन के लिए दिन में कई कई बार नाचना पड़ता हैं । दोनों बच्चे हैं ,दोनों एक ही उम्र के हैं लेकिन एक इतना सा अंतर कितना बडा और दुखद हैं न !....................
अंतर तो सिर्फ़ इतना ही हैं की जब आरोही नाचती हैं तो वह स्वांत सुखाय नाचती हैं ,अपनी खुशी से ,अपनी मन से ,अपनी मर्जी से और यह जो बच्चा नाच रहा हैं वह नाच रहा हैं अपनी गरीबी से ,अपनी मज़बूरी से ,अपनी रोजी रोटी के लिए । अंतर तो सिर्फ़ इतना ही हैं की आरोही जब नाचती हैं तब मैं और पतिदेव इतने खुश होते हैं की कह नही सकते ,और जब यह बच्चा नाच रहा हैं तब इसके माँ पिता अपनी गरीबी पर शायद दुखी हो रहे होंगे , नृत्य करते इसके पैरो की थिरकन पर उनके ह्रदय जलते होंगे । अंतरसिर्फ़ इतना ही हैं की जब आरोही नाचती हैं तो मेरी आँखे खुशी से छलछला जाती हैं और आज इस बच्चे की मज़बूरी देखकर दुःख से छलछला आई हैं ,अंतर सिर्फ़ इतना हैं की आरोही एक समृद्ध घर की बेटी हैं और वह बच्चा एक गरीब घर का बेटा हैं ,जिसे भारत जैसे विकासशील देश में भी लगभग दो साल की उम्र से ही अपना पेट पालने की जद्दोजहद से गुजरना पड़ता हैं,दो समय के भोजन के लिए दिन में कई कई बार नाचना पड़ता हैं । दोनों बच्चे हैं ,दोनों एक ही उम्र के हैं लेकिन एक इतना सा अंतर कितना बडा और दुखद हैं न !....................
Sunday, January 18, 2009
ढाई आखर प्रेम के पढ़े सो...........................
एक काफी पढ़ा लिखा लड़का,बड़ी कम्पनी का मालिक ,करोड़पति,उसकी एक मुलाकात के लिए सारे रिपोर्टर तरसते रहते हैं,उसके एक फोन से लोगो की जिंदगिया बदल जाती हैं ,वह किसी राजकुमार से कम नही,जब वह कही घुमने जाता हैं तो उसके आगे पीछे दसो गाडिया उसकी सेवा में निकलती हैं,शायद हर युवक उसके जैसा सफल और सुंदर जीवन पाना चाहे ।
एक रात एक सार्वजानिक कार्यक्रम के दौरान कर्यक्रम स्थल की कार पार्किंग में किसी का खून हो जाता हैं ,मारने वाला युवक मरने वाले को किसी डरावनी ,भुत प्रेत वाली फ़िल्म की तर्ज पर किसी भुत की तरह ही गर्दन तोड़ कर मारता हैं,वह खुनी कोई और नही वही नवयुवक हैं जिसका जिक्र मैंने अभी अभी किया ,जी हाँ वही किसी राजकुमार सा....करोड़पति ......
यह हैं फ़िल्म गजनी।
प्यार ......अपनों का प्यार,परायो का प्यार , ईश्वर का प्यार , मनुष्य का प्यार,सृष्टि की गोद में पल रहे हर चेतन का प्यार.................... दुनिया प्यार में बसी हैं और पुरी दुनिया में बसा हैं प्यार, इंसान की हर छोटी सी छोटी चाहत,फितरत में बसा है प्यार। प्यार जो मनुष्य की जिंदगी में रंग भरता हैं ,खुशिया देता हैं । प्यार को खो देने से ज्यादा दुःख शायद इस संसार में कोई नही । जिसके कारण हमारे प्रिय की मौत हुई ,उससे नफरत होना स्वाभाविक ही हैं ,लेकिन इस कारण खुनी बन जाना,एक नही कई खून कर देना निहायत ही ग़लत हैं ।
एक और दृश्य .......चार नव युवक ,कॉलेज में पढने वाले,जिनकी जिंदगी में कोई उद्देश्य नही ,वह दिन रात सिर्फ़ हँसते बतियाते हैं ,एक दिन अचानक किसी दुसरे देश से एक सुंदर लड़की आती हैं ,जो भारतीय सवतंत्रता संग्राम के संग्रामियों पर एक फ़िल्म बनाना चाहती हैं ,फ़िल्म में इन्हे काम मिलता हैं ,कोई भगत सिंह बनता हैं ,तो कोई दूसरा महान स्वतंत्रता सेनानी ,फ़िल्म करते करते ये नवयुवक स्वयं को महान स्वतंत्रता संग्रामी समझने लगते हैं ,जब उन्हें पता लगता हैं की उनमे से किसी का पिता और कोई नेता देश द्रोही हैं तो वह स्वयं को भगत सिंह आदि के रूप में देखने लगते हैं और बाकायदा रेडियो स्टेशन पर कब्जा कर एक एक कर उन चार छ: लोगो का खून कर देते हैं ,और फ़िल्म खत्म ।
यह थी फ़िल्म रंग दे बसंती ।
प्रेम की भावना हो या देश भक्ति की , पवित्र प्रेम का जज्बा हो हो या देश भक्ति का ,ये दोनों ही जीवन को अर्थ पूर्ण बनते हैं ,जीवन को नई दिशा देते हैं ,इंसान को इंसान बनाते हैं खुनी नही ,अपने प्रिय की म्रत्यु को जिम्मेदार व्यक्ति से बदला लेना गलत नही ,लेकिन उसका एक तरीका होना चाहिए ,मुझे समझ नही आता की गजनी में जिस करोड़पति लड़के के एक फोन से जिंदगिया बदल जाती हैं ,वह अगर गवाही देता तो आज नही तो कल उसकी प्रेयसी के खुनी को सजा नही होती? सिर्फ़ उस खुनी को मारने के लिए दसो खून करता हैं ,उसे खून करते हुए दिखाया गया हैं ,यह किस तरह की मानसिकता हैं ,माना की प्रेयसी को खो देना ,शॉर्ट टर्म मेमोरी का शिकार होजाना बहुत दुखद हैं,लेकिन इतनी हिंसा करना या दिखाया जाना कितना गलत,और नवयुवक युवतिया फ़िल्म की बड़ाई करते नही थक रहे .................................यह और भी दुखद .....पुरी तरह से फिल्मी ,स्वप्निल प्रेम की इच्छा ।
समाज को किन्ही चार छ: बुरे व्यक्तियों को मार कर नही सुधारा जा सकता ,नही देश को उन्नत किया जा सकता,उसके लिए कठिन संघर्ष ,तीव्र इच्छा शक्ति ,सतत प्रयत्न की आवश्यकता होती हैं । देश के स्वतंत्रता संग्रामियों ने जो हमारे देश के किया वह महज एक जोश नही था ,वह तीव्र देश भक्ति की भावना थी,देश प्रेम था ,महान त्याग था ,वह देश को स्वतंत्र करवाने के लिए लड़ते रहे ,आजीवन प्रयत्न करते रहे ,किसी फ़िल्म के जोश में आकर चार खून उन्होंने नही किए ।
अचानक किसी से प्रभावित होकर ,स्वयं को वही महसूस करने लगना ,और उसकी जोश में स्वयं को महान समझ कर किसी को मार डालना ,किसी मानसिक बीमारी का परिचायक हो सकता हैं ,देश प्रेम का नही । अगर फ़िल्म रंग दे बसंती में उन नवयुवको ने सचमुच उन स्वतंत्रता संग्रामियों के जीवन से कुछ सिखा होता तो वे इस तरह खून खच्चर नही करते ,बल्कि इसे देश द्रोहियों का अपने सत कर्मो और प्रयत्नों से समूल नाश करते ,और देश के विकास में महती भूमिका निभाते ।
संत कबीर ने कहा हैं " ढाई आखर प्रेम के पढ़े सो पंडित होय ".............पंडित होय या .......................खुनी होय ?
प्रेम इंसान को क्रोध करना सिखाता हैं,कभी कभार थोडी बहुत नफरत भी ,हो सकता हैं की प्रेम मरना-मारना भी सीखता हो पर एक साथ कई कई खून करना ,वह भी पुरी तरह से सोच विचार कर ,उतनी ही क्रूरता से ............शायद नही .
फ़िल्म बनाने वालो से तो अब अच्छी आशा करना भी व्यर्थ हैं ,लेकिन दुःख तब होता हैं जब आज के नवयुवक युवतिया ऐसी फिल्मो को देखकर वाह वाह करते नही थकते ,इन फिल्मो की तारीफों के पुल बांधते नही थकते । हो सकता हैं की कल परसों कुछ और इसी तरह की मानसिकता से ग्रस्त सिनेमा आ जाए ,प्रश्न यह हैं की हम कब तक इन्हे देखते रहेंगे और सराहते रहेंगे ?
एक रात एक सार्वजानिक कार्यक्रम के दौरान कर्यक्रम स्थल की कार पार्किंग में किसी का खून हो जाता हैं ,मारने वाला युवक मरने वाले को किसी डरावनी ,भुत प्रेत वाली फ़िल्म की तर्ज पर किसी भुत की तरह ही गर्दन तोड़ कर मारता हैं,वह खुनी कोई और नही वही नवयुवक हैं जिसका जिक्र मैंने अभी अभी किया ,जी हाँ वही किसी राजकुमार सा....करोड़पति ......
यह हैं फ़िल्म गजनी।
प्यार ......अपनों का प्यार,परायो का प्यार , ईश्वर का प्यार , मनुष्य का प्यार,सृष्टि की गोद में पल रहे हर चेतन का प्यार.................... दुनिया प्यार में बसी हैं और पुरी दुनिया में बसा हैं प्यार, इंसान की हर छोटी सी छोटी चाहत,फितरत में बसा है प्यार। प्यार जो मनुष्य की जिंदगी में रंग भरता हैं ,खुशिया देता हैं । प्यार को खो देने से ज्यादा दुःख शायद इस संसार में कोई नही । जिसके कारण हमारे प्रिय की मौत हुई ,उससे नफरत होना स्वाभाविक ही हैं ,लेकिन इस कारण खुनी बन जाना,एक नही कई खून कर देना निहायत ही ग़लत हैं ।
एक और दृश्य .......चार नव युवक ,कॉलेज में पढने वाले,जिनकी जिंदगी में कोई उद्देश्य नही ,वह दिन रात सिर्फ़ हँसते बतियाते हैं ,एक दिन अचानक किसी दुसरे देश से एक सुंदर लड़की आती हैं ,जो भारतीय सवतंत्रता संग्राम के संग्रामियों पर एक फ़िल्म बनाना चाहती हैं ,फ़िल्म में इन्हे काम मिलता हैं ,कोई भगत सिंह बनता हैं ,तो कोई दूसरा महान स्वतंत्रता सेनानी ,फ़िल्म करते करते ये नवयुवक स्वयं को महान स्वतंत्रता संग्रामी समझने लगते हैं ,जब उन्हें पता लगता हैं की उनमे से किसी का पिता और कोई नेता देश द्रोही हैं तो वह स्वयं को भगत सिंह आदि के रूप में देखने लगते हैं और बाकायदा रेडियो स्टेशन पर कब्जा कर एक एक कर उन चार छ: लोगो का खून कर देते हैं ,और फ़िल्म खत्म ।
यह थी फ़िल्म रंग दे बसंती ।
प्रेम की भावना हो या देश भक्ति की , पवित्र प्रेम का जज्बा हो हो या देश भक्ति का ,ये दोनों ही जीवन को अर्थ पूर्ण बनते हैं ,जीवन को नई दिशा देते हैं ,इंसान को इंसान बनाते हैं खुनी नही ,अपने प्रिय की म्रत्यु को जिम्मेदार व्यक्ति से बदला लेना गलत नही ,लेकिन उसका एक तरीका होना चाहिए ,मुझे समझ नही आता की गजनी में जिस करोड़पति लड़के के एक फोन से जिंदगिया बदल जाती हैं ,वह अगर गवाही देता तो आज नही तो कल उसकी प्रेयसी के खुनी को सजा नही होती? सिर्फ़ उस खुनी को मारने के लिए दसो खून करता हैं ,उसे खून करते हुए दिखाया गया हैं ,यह किस तरह की मानसिकता हैं ,माना की प्रेयसी को खो देना ,शॉर्ट टर्म मेमोरी का शिकार होजाना बहुत दुखद हैं,लेकिन इतनी हिंसा करना या दिखाया जाना कितना गलत,और नवयुवक युवतिया फ़िल्म की बड़ाई करते नही थक रहे .................................यह और भी दुखद .....पुरी तरह से फिल्मी ,स्वप्निल प्रेम की इच्छा ।
समाज को किन्ही चार छ: बुरे व्यक्तियों को मार कर नही सुधारा जा सकता ,नही देश को उन्नत किया जा सकता,उसके लिए कठिन संघर्ष ,तीव्र इच्छा शक्ति ,सतत प्रयत्न की आवश्यकता होती हैं । देश के स्वतंत्रता संग्रामियों ने जो हमारे देश के किया वह महज एक जोश नही था ,वह तीव्र देश भक्ति की भावना थी,देश प्रेम था ,महान त्याग था ,वह देश को स्वतंत्र करवाने के लिए लड़ते रहे ,आजीवन प्रयत्न करते रहे ,किसी फ़िल्म के जोश में आकर चार खून उन्होंने नही किए ।
अचानक किसी से प्रभावित होकर ,स्वयं को वही महसूस करने लगना ,और उसकी जोश में स्वयं को महान समझ कर किसी को मार डालना ,किसी मानसिक बीमारी का परिचायक हो सकता हैं ,देश प्रेम का नही । अगर फ़िल्म रंग दे बसंती में उन नवयुवको ने सचमुच उन स्वतंत्रता संग्रामियों के जीवन से कुछ सिखा होता तो वे इस तरह खून खच्चर नही करते ,बल्कि इसे देश द्रोहियों का अपने सत कर्मो और प्रयत्नों से समूल नाश करते ,और देश के विकास में महती भूमिका निभाते ।
संत कबीर ने कहा हैं " ढाई आखर प्रेम के पढ़े सो पंडित होय ".............पंडित होय या .......................खुनी होय ?
प्रेम इंसान को क्रोध करना सिखाता हैं,कभी कभार थोडी बहुत नफरत भी ,हो सकता हैं की प्रेम मरना-मारना भी सीखता हो पर एक साथ कई कई खून करना ,वह भी पुरी तरह से सोच विचार कर ,उतनी ही क्रूरता से ............शायद नही .
फ़िल्म बनाने वालो से तो अब अच्छी आशा करना भी व्यर्थ हैं ,लेकिन दुःख तब होता हैं जब आज के नवयुवक युवतिया ऐसी फिल्मो को देखकर वाह वाह करते नही थकते ,इन फिल्मो की तारीफों के पुल बांधते नही थकते । हो सकता हैं की कल परसों कुछ और इसी तरह की मानसिकता से ग्रस्त सिनेमा आ जाए ,प्रश्न यह हैं की हम कब तक इन्हे देखते रहेंगे और सराहते रहेंगे ?
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