Friday, October 17, 2008

वो स्कूली बच्चे !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!


मेरे घर के पास , बिल्कुल पास एक गली में स्कूल हैं ,लगभग दुपहर के इसी समय विद्यालय शुरू होता हैं .मेरा स्कूल के रास्ते से अनेको बार आना जाना होता हैं ,स्लेटी -सफ़ेद रंग का गणवेश (युनिफोर्म )पहने बच्चे साईकिल पर , कुछ चलते हुए ,कुछ भागते -गिरते हुए,हँसते-हँसाते हुए,कुछ हाथो में हाथ डाल ,झूमते -घूमते बतियाते विद्यालय प्रांगण में प्रवेश करते हैं ,इस विद्यालय के प्रांगण को प्रांगण कहना कहाँ तक उचित हैं यह मैं नही जानती ,दरअसल एक छोटी सी ईमारत; कुल मिलाकर दो कमरों की एक ईमारत को विद्यालय में परिवर्तित किया गया हैं, उन्ही दो कमरों में सारा विद्यालय ,सारी कक्षाएँ चलती हैं ,एक कमरे से दुसरे कमरे तक और हाँ बालकनी तक बच्चे पंक्तिबद्ध होकर खड़े होते हैं और तब प्रारम्भ की ईश प्रार्थना होती हैं ,६-से ८ अध्यापक और अधिकतर अध्यापिकाएं ही हैं जो इतने से विद्यालय के दो कमरों में चार से ८ कक्षाएँ संचालित कर लेते हैं ,बच्चों के पास खेलने के लिए न कोई प्रांगण हैं न गेम्स रूम । जब भोजनावकाश होता हैं तो सारे बच्चे जिनमें ३-४ बरस के बच्चे भी शामिल होते हैं सड़क पर खेलने आ जाते हैं ,उस गली में शहर का नामी और बहुत बड़ा अस्पताल हैं,साथ ही कई अच्छी दुकाने भी ,इस लिए आने जाने वालो की भीड़ हमेशा रहती हैं ,मुझे कई बार डर लगता हैं की कहीं कोई बच्चा गाड़ी के नीचें न आ जाए । कहीं कोई बच्चा खो न जाए ।

आजकल विद्यालयों में इतनी सुरक्षा ,सुविधाएँ होती हैं ,जिनकी कुछ वर्ष पूर्व कल्पना भी नही की जा सकती थी, हर एक्टिविटी के लिए अलग कक्ष ,अलग अध्यापिका ,अलग पुस्तक ,पुस्तिका । हर बच्चे की सुरक्षा का पूर्ण ध्यान ।
न जाने कितने विषय ,कितनी भाषायें,खेलों के कितने प्रकार ,संगीत की कक्षाएँ , हस्तकला ,सिलाई,बुनाई ,चित्रकला सभी के कालखंड ,विद्यालय का समय सुबह सात से शाम ४ ,घर आने के बाद होमवर्क का बोझ ,गणित अंग्रेजी की ट्यूशन ,बच्चा विद्यालय की पैसा बनाओ ,पालक लुभाओ तंत्र का एक मोहरा मात्र ।

हम भी स्कूल जाते थे,खेलते थे ,पढ़ते थे ,आगे बढ़ते थे ,पर कभी ट्यूशन नही गए ,अच्छा हैं स्कूल सब सिखा रहे हैं ,पर सिखाने और दिमाग में ठुसने में अंतर होना चाहिए न ,उनकी उम्र से अधिक ज्ञान ,उनके खेल कूद को भी अध्ययन का रूप ................................!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

जानते हैं शहर की मेरिट लिस्ट में उसी विद्यालय जिसका जिक्र मैंने पहले किया के दो बच्चे अव्वल आए हैं ,मैं यह नही कहती बच्चों को हमेशा ऐसे स्कूल में पढ़ना चाहिए जो दो कमरों का हो ,जहाँ बच्चों की सुरक्षा का कोई ख्याल न हो ,पर इससे एक बात तो साफ हैं सीखना एक आत्मिक -मानसिक क्रिया हैं ,बच्चे तब ही सीख पाते हैं जब वह इसमे अपना मन लगते हैं ,अपनी आत्मा डुबोते हैं ।

हम बोनसाई करके पेडो से छोटे से रूप में फल फुल तो प्राप्त कर लेते हैं पर उनका सही और असली रूप पनपने नही देते ,बच्चे भी इन हँसते खेलते पौधों की तरह होते हैं ,समय समय पर उनकी काट - छाट होना जरुरी हैं पर खुली हवा में ,धुप में छाव में ,उनका बढ़ना भी जरुरी हैं । वो नदिया का पानी हैं ,जो अपनी दिशा ख़ुद ही तय कर लेता हैं ,वो सुगंधी हवाएं हैं जिन्हें जब और जहाँ बहाना हैं तब और वहीं बहती हैं ,उन्हें पनपने का मौका देना ही चाहिए ,तभी हम एक बच्चे से एक महान व्यक्तित्व तैयार होने की आशा कर सकते हैं ,अन्यथा सिर्फ़ पुस्तकी कीडा ।

9 comments:

  1. bahut hi vicharniya lekh.. shayad jab mere bachhe ho to main kuch badal pau..

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  2. u empower the toughts in u r style
    great work
    regards

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  3. बहुत ही सुन्दर लेख, आज कल तो बच्चे सच मे किताबी कीडा बन गये है या बना दिये गये है( भारत मे ही सिर्फ़)
    धन्यवाद

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  4. बच्चोँ के पूर्ण विकास के लिये जो ना करेँ , कम है -अच्छा लेख -
    - लावण्या

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  5. रािधका जी ,
    बहुत अच्छा और सही िलखा है आपने । बच्चों को एेसा खुला और उन्मुक्त आकाश चािहए जहां वह अपनी कल्पनाओं को सजा संवारकर उसमें जीवन के इंद्रधनुषी रंग भर सकें । उनकी प्रितभा का इस तरह िवकास हो िक उसकी चमक से दूसरे भी प्कािशत हो जाएं । मां-बाप और अध्यापकों के प्रयास से ही बच्चों के जीवन में खुिशयां लाई जा सकती हैं ।

    http://www.ashokvichar.blogspot.com

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  6. राधिका जी,

    बच्चों के प्रति संवेदनायुक्त आपका आलेख पढकर कुमार विनोद की पंक्तयाँ याद आ रही है-

    कल कल करता हर पल बहता, दरिया की जलधारा बच्चा।
    दुनियाँ के इन तूफानों में, लगता मुझे किनारा बच्चा।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    मुश्किलों से भागने की अपनी फितरत है नहीं।
    कोशिशें गर दिल से हो तो जल उठेगी खुद शमां।।
    www.manoramsuman.blogspot.com

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  7. बहुत ही सुन्दर लेख

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  8. दीपावली की हार्दिक शुभ कामनाएं /दीवाली आपको मंगलमय हो /सुख समृद्धि की बृद्धि हो /आपके साहित्य सृजन को देश -विदेश के साहित्यकारों द्वारा सराहा जावे /आप साहित्य सृजन की तपश्चर्या कर सरस्वत्याराधन करते रहें /आपकी रचनाएं जन मानस के अन्तकरण को झंकृत करती रहे और उनके अंतर्मन में स्थान बनाती रहें /आपकी काव्य संरचना बहुजन हिताय ,बहुजन सुखाय हो ,लोक कल्याण व राष्ट्रहित में हो यही प्रार्थना में ईश्वर से करता हूँ ""पढने लायक कुछ लिख जाओ या लिखने लायक कुछ कर जाओ ""

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