Thursday, February 12, 2009

प्यार को प्यार ही रहने दो ....


प्रेम .....यह शब्द मन मस्तिष्क में आते ही जो सबसे पहला नाम याद आता हैं वह उनका ही,उनके प्रेम की जयकारे सभी करते हैं ,युवक युवतियों से लेकर दादी नानी तक उनके प्रेम का यशोगान करती हैं ,प्रेमी प्रेमिका का वह आदर्श हैं ।

न........ नही, मैं न हीर राँझा के प्रेम की बात कर रही हूँ न सलीम अनारकली के । मैं बात कर रही हूँ युगों युगों से सभी प्रेमियों के ह्रदय में विराजमान कृष्ण राधा के प्रेम की । राधा कृष्ण का प्रेम.............. जिसकी महिमा में संत कवियों ने बडे बडे महाकाव्य रच दिए ,ग्रन्थ लिख दिए ,गीत कह दिए ।

लेकिन जब कृष्ण राधा को साथ देखती हूँ तो मन में हमेशा यह प्रश्न उठता हैं की कृष्ण राधा का प्रेम क्या वास्तव में वही हैं जो हमने अब तक समझा हैं ,कहानी कविताओ में पढ़ा हैं ,गीतों में सुना हैं । मन कभी यह मानने को ही तैयार नही हुआ की कृष्ण और राधा प्रेमी और प्रेमिका थे ।

वास्तव में राधा की छवि भारतीय जनमानस के मन में इतनी गहरी बैठ गई हैं की उसे सिरे से खारिज करना बहुत कठिन हैं ,लेकिन सच यह हैं की श्रीमदभागवत,महाभारत ,हरिवंशपुराण ,ब्रह्मवैवर्त जैसे किसी भी ग्रन्थ में राधा नाम की किसी स्त्री का कोंई नामोउल्ल्लेख भी नही हैं । दरअसल पंद्रहवे शतक में जयदेव कृत गीतगोविंद में
प्रथम बार राधा का आगमन हुआ । गीतगोविंद की लोकप्रियता को देखते हुए अन्य कवियों न राधा कृष्ण के प्रेम कि कविताये रच दी और श्री कृष्ण और राधा प्रेमी प्रेमिका के रूप में भारतीय जनमानस में अवतरित हुए ।
इसी प्रेमी प्रेमिका की कविता के चलते भगवान श्रीकृष्ण की छवि किसी रसियाँ छलिया नायक की तरह हुई ,राधा तो उनकी प्रियतमा बना ही दी गई और अन्य गोपियो के साथ भी वह रास रचाते ,छलिक प्रेमी की तरह दर्शाए गाये ।
राधा का शब्दश:अर्थ कहे तो रा याने प्राप्ति और धा याने मोक्ष ,राधा अर्थात मोक्ष के लिए लालायित जीव ,कृष्ण अर्थात परमात्मा जो उस जीव को जीवन मृत्यु के चक्र से मुक्ति या मोक्ष दे सके । इस तरह देखे तो गोकुल की हर गोपिका जो कृष्ण से अत्यधिक प्रेम करती थी वह राधा हुई ।(संदर्भ :युगंधर )

वह प्रेम किसी नायक नायिका का प्रेम नही था बल्कि कहानी ,कथा और कविताओ से परे ,जो शब्दों में नही ढाला जा सकता वह अत्यन्त ऊँचा और पवित्र प्रेम था ,जब कृष्ण गोकुल में थे तो महज कुछ साल की उम्र थी उनकी ,और गोपिया जो नटखट कान्हा के प्रेम में पागल हो रही थी,काफी बड़ी थी उनसे ,अत:उनका प्रेम वात्सल्य ,ममत्व ,बंधुत्व ,सखत्व लिए श्रेष्ठ प्रेम था .जिसे कोंई भी नाम नही दिया जा सकता ।

हम अक्सर प्रेम को कोई नाम देना चाहते हैं ,वह या तो माँ पुत्र का हो ,भाई बहन का हो ,पिता पुत्री का हो ,पति पत्नी का हो या कोंई और नाता हो । जबकि प्रेम, प्रेम हैं. वह रिश्ते नाते भी निभाता हैं और कभी कभी उससे उपर उठ कर भक्ति का स्वरूप भी ले लेता हैं ,प्रेम वह भी होता हैं जो एक मनुष्य दुसरे मनुष्य से करता हैं ,प्रेम वह भी होता हैं जो व्यक्ति अपने आदर्श से करता हैं , प्रेम वह भी होता हैं जो स्रष्टि के हर जड़ चेतन से किया जाता हैं ।

हमें दुःख होना चाहिए की हमने अपने ही आदर्श कृष्ण के प्रेम के साथ उसकी प्रतिमा को भी बदनाम किया .जरुरत हैं की हम प्रेम के सही अर्थ को समझे । संत कबीर न युहीं नही कहा " ढाई आखर प्रेम के पढ़े सो पंडित होय

14 comments:

  1. सही कहा आपने प्रेम तो प्रेम होता है ....प्रेम किसी रिश्ते का मोहताज़ नही होता ...प्रेम की प्राप्ति तो कहीं से भी हो सकती है

    मेरी कलम - मेरी अभिव्यक्ति

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  2. पसंद पर क्लिक कर चुका हूँ मुझे बहुत पसंद आया आपका लेख

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  3. राधिका, आपने शब्दशः मेरे मन की कह दी....
    एक पुस्तक है " अभिज्ञान " नरेन्द्र कोहली जी ने लिखी है....यदि न पढ़ी हो तो अवश्य अवश्य padhiyega....इसी सन्दर्भ में इतनी सुंदर विवेचना है कि मन प्रसन्न हो जाएगा.....

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  4. बहुत सुन्दर पोस्ट लिखी है आपने।बधाई।

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  5. Radhika jee

    Radha bhaav hee PREM hai.
    Radha shabd ko ulat do tub Dhara - hota hai
    Wahi DHARA , Sri Krishna tk le jatee hai --
    Sunder bhaav hain ...

    Sneh,
    - Lavanya

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  6. बिल्कुल सत्य वचन-प्यार को प्यार ही रहने दो..

    उम्दा आलेख.

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  7. सही संदर्भ, सही विवेचन।
    बधाई। वेलेंटाइन डे की :)

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  8. बहुत अच्छी विवेचना
    वाकई नाम देने भर से रिश्ते बंध जाते हैं बिना नाम के उनमें उन्मुक्तता होती है

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  9. jo hai wo bas PYAAR hi hai..aur kuch nahi !

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