www.blogvarta.com

Tuesday, January 5, 2016

लुका छिपी जिंदगी की 

  
  सुबह का सुंदर समय सड़क के दोनों ओर बहती खारे पानी की नदी और सड़क पर अंधाधुंध बहते वाहन।  गत्यात्मकता ,प्रवाह ,गति। मुंबई नगरी में बसे एक छोटे से शहर की रोज की कहानी और कहानी एक ठहराव की ,वह ठहराव जो हर मुंबईकर को रोज कुछ समय के लिए देवी अहिल्या की तरह पत्थर सा जमा देता हैं।  यह नगरी कभी रूकती ही तो नहीं  ,रूकती नहीं किसी की ख़ुशी में शामिल होने के होने के लिए ,किसी के दुःख में रोने के लिए, अरे ! यह नगरी तो तब  भी नहीं रूकती जब भागती ट्रैन में दौड़कर चढ़ते हुए कोई गिर जाता हैं ,उसकी सांसे सदैव के लिए रुक जाती हैं। पर यहाँ बसने  वाले प्रत्येक को एक बार अवश्य रुकना पड़ता हैं। रुकना पड़ता हैं उस अबोले ,निर्हृदयी ,अपंग के आदेश पर।  वह पंगु हाथ पैर से रहित , जिव्हा रहित ,वाणी रहित ,शब्द रहित होकर भी कुछ क्षणों  के लिए सर्वशक्तिमान ,सर्व सत्तावान बन जाता हैं ,कालचक्र और जीवन की गति वह निशब्द बिना किसी शब्द के कुछ समय के लिए रोक लेता हैं और हर मुंबईकर उसका दास हो थम जाता हैं ,जम जाता हैं।

आज जब कार में सवार मैं मुंबई की गति के ताल में ताल मिलाते अचानक ही रुक गयी तब समझ आया सामने वह हैं ,वह समय संरक्षक ,नियमो का निर्धारक, अविरत गति का संहारक।  वह जिसे लोग यहाँ कहते हैं ट्रैफिक सिग्नल।
मैं मन ही मन कुन्नाई ,बड़बड़ाई ,गुस्साई पर रुकना तो था ही। सो क्षण मात्र में शांत भी हुई ,दाई तरफ मुंह फेर के देखा तो सड़क के उस ओर बड़े - बड़े तम्बू लगे थे पास में बोर्ड था बॉम्बे सर्कस।  
हम्म तो यहाँ  लगा हैं बॉम्बे सर्कस ,रोज पेपर  में चाहे -अनचाहे विज्ञापन देख रही हूँ। मैंने खुद से ही कहा।  
मेरी बेटी रोज पीछे पड़ी हुई हैं ,माँ देखते हैं न और मैं उसे रोज दुहरा रही हूँ बेटा अभी ४ महीने पहले ही तो एक सर्कस  देखा था ,बिलकुल वैसा ही होगा और याद है न माँ कितनी बोर हुई थी। पर वो सुन नहीं रही और मैं उसका मन रखने  के लिए कह दे रही हूँ जायेंगे बेटा जायेंगे। 
आज अनायास जब सिग्नल पर रुकने से सर्कस पर नज़र पड़ी तो मन बोला ,अंदर कौन होगा ? शायद सब कलाकार होंगे ,क्या कर रहे होंगे ? शायद अगले शो की रिहर्सल..... 

कभी सुना था सर्कस वालो की जिंदगी बहुत कठिन होती हों ,मन हुआ कार पार्क करवा सीधा सर्कस के तम्बू के अंदर चली जाऊ और उन लोगो से कहु मैं आपके बारे में जानना चाहती हूँ ,कुछ लिखना चाहती हूँ। पर कम्बख़त सिग्नल ने  तभी आगे बढ़ने का इशारा किया और मैं आगे बढ़ गयी। समझ नहीं आ रहा था की सिग्नल महाशय को धन्यवाद दू या कोसु। 

कार आगे बढ़ी ,ड्राइवर ने स्पीड बढ़ाई और मैंने आँखे बंद कर ली ,स्मृति के किसी कक्ष से एक छवि बाहर आई, उसे देखते ही मन को असीम शांति मिली ,उस छवि के समक्ष रखी सुवासों की सुवास से मन प्रफुल्ल हो गया , वह छवि जिस गृह में विराजित थी वहां गूंजते विविध स्वर -शब्दों से  कान तृप्त हो गए।  मैंने आखे खोली। मन को न जाने कबसे इन्तजार था ऐसे कुछ दिनों का जब मेरा प्रभात उस मनमोहिनी छवि के आलिंगन में हो , उन तेजस्वी नैनों के हवन कुण्ड में ,मैं अपने नयनो का हविष दे दू , उस परम विशाल के हृदयाचल को निहारती मैं लाल गुलाब पुष्प उस पर निछावरती रहु ,उन चरणो पर मैं अपना समय और जीवन वारती रहु ,पर जीवन में आज तक ऐसा एक पूरा दिन मुझे उसके साह्य में नहीं मिला ,जब मैं सारा जग भूल के बस उस आदि जगदंबा के किसी मंदिर में उसका सिर्फ उसीका ध्यान करती रहू। 

 मैंने एक निश्वास छोड़ आँखे खोली ,कार आगे बढ़ी ,प्रसाद स्वीट्स की दूकान पर बहुत से लोगो का जमाव दिखा ,सुबह - सुबह दुकान पर खड़े वे सब समोसा ,कचौरी का लुफ्त उठा रहे थे। घर से आते समय नाश्ते में खाया गाजर का पराठा मुझे उस समोसे की हरी चटनी के स्वाद के आगे निस्वाद मालूम हुआ ,मन उड़ता सा तेरह साल पहले के ग्वालियर में जा पंहुचा ,सुबह के आठ बजे का समय था ,मैं संगीत कक्ष में रियाज़ कर रही थी ,माँ चाय बना रही थी ,भाई -बहन आँगन में खेल  रहे थे, पिताजी कही बाहर  गए थे ।  अचानक पिताजी तेजी से घर में घुसे उन्होंने एक ही बार में हम सबको तेज आवाज दी जल्दी आओ,जल्दी आओ मैं समोसे कचौरी ,जलेबी लाया हूँ। माँ ने सबको थाली में गरमागरम समोसे हरी ,लाल चटनी के साथ परोसे। उन जलेबियों के पाक की मिठास आज तक मैं नहीं भूली ,लेकिन इतने सालो में आज तक ग्वालियर के उन समोसे ,जलेबी ,चटनी को चखने का अवसर भी न मिला। मैं और आरोही जब भी मुंबई की किसी चाट दुकान में चाट खाते हैं मैं हर बार आरोही से कहती हूँ ,आरोही ग्वालियर की चाट के आगे यह चाट पानी हैं। 

अलबत्ता ! कार के पास कुछ धड़कने की आवाज से मैं वर्तमान में आ पहुंची।  हम फिर ट्रैफिक सिग्नल में अटक गए थे ,बाजु में खड़े  स्कूटर पर एक छह  माह का गोरा -गोरा बच्चा मुझे देख कर मुस्कुरा रहा था मानों कुछ कह रहा हो ,उसके पास पांच साल का एक काला - पीला बच्चा एक नाक बहते ,उससे भी अधिक काले ,धूल माटी से भरे छह माह के बच्चे को गोद में लिए खड़ा उस सुंदर गोरे बच्चे की माँ से भीख मांग रहा था।  मन में आया कार से उतरु उन दोनों काले -पीले बच्चो को खीच के कार में डालु ,घर ले जाकर बाथरूम में  रगड़ - रगड़ कर नहलाऊ ,ठीक - ठाक  कपडे पहनाऊ , ढंग का नाश्ता करवाऊ और बड़े को किताबें छोटे को खिलौने दे बिठलाऊ। मेरे मन ने याद दिलाया  की मैं कबसे बच्चो के लिए कुछ ऐसा करना चाहती हूँ  जो इनका जीवन संवार सके। 

मैं आगे बढ़ गयी बिलकुल मुंबई की जिंदगी की तरह पर कुछ छोटी बड़ी इच्छाए मन  में दबी रह गयी।  सिर्फ मेरे ही मन में नहीं ,हम सबके मन में ऐसी कुछ छोटी - बड़ी इच्छाए हैं ,जो जिंदगी को जिंदगी बनाती हैं।  हम सब कुछ करते हैं ,बड़ी -बड़ी बाते,बड़े -बड़े वादे ,बड़े -बड़े काम पर कुछ बाते जिनका नाम जिंदगी हैं ,जो जीवन का उत्साह हैं उन्हें करना हम भूल जाते  हैं वो छूट ही जाती हैं।  और ,कभी ऐसे ही किन्ही बाहनों का सहारा ले लुका - छीपी करती जिंदगी हमारे सामने आती हैं और कहती हैं बस कुछ पल के लिए मुझे भी जी लो। मैंने तो तय कर लिया हैं मैं इस लुका छिपी का खेल इस साल जीत के रहूंगी ,कुछ पल के लिए ही सही जिंदगी जी के रहूंगी।  

आपने क्या सोचा हैं ?

2 comments:

  1. Looking to publish Online Books, in Ebook and paperback version, publish book with best
    Publish Online Books|Ebook Publishing company in India

    ReplyDelete
  2. Genesis: A Complete Collection (2018) - YouTube
    It's the last part of my playthrough and it's my one stop place for making Sega Genesis classics youtube converter on my May 26, 2018 · Uploaded by SegaAmerica

    ReplyDelete

आपकी टिप्पणिया मेरे लिए अनमोल हैं

"आरोही" की नयी पोस्ट पाए अपने ईमेल पर please Enter your email address

Delivered by FeedBurner