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Wednesday, January 31, 2018

लोग कह रहे हैं प्रेम का महीना आ गया हैं। सुबह कुछ निराली सी हैं आज ,पूर्ण चंद्र खिला था भोर तक ,अब सूरज चमकीली किरणों संग नृत्य कर रहा हैं। पुरे खिले ग़ुलाब गुच्छ की खुशबु के संग खुशियाँ मानो जीवन में शामिल होने के लिए उतावली सी हो रही हैं। लोग कह रहे हैं वसंत आ गया हैं। पर मेरे मन का वसंत , वो तो कही गया ही नहीं था ! मन की इस धरती पर प्रेम का कोई एक माह कहाँ हैं ? समय की अनंत धारा में प्रेम अविरत बहती नदियाँ सा सतत बहता जा रहा हैं , उसे सागर का पता नहीं ,पर मन का मन में विलय युगो पहले ही हुआ था शायद ,अब इस मास ,ज्यादा जोरो से धड़कता मेरा ह्रदय तुम्हारे युगपुरुष के मान से टकरा कर तुम्हारे ह्रदय में लीन हुआ जा रहा हैं। तुम और मैं जिस धरती पर बसते हैं वहां ग्रीष्म की धुप कहाँ ,वहां शीत की ठिठुरन कहाँ ? वहां तो मात्र ऋतु वसंत का सौंदर्य हैं। वहां कभी खग्रास मेरे मन चंद्र को ग्रसता नहीं ,वहां चंद्र -सूर्य अपने पूर्ण रूप में ,एक साथ ,एक ही दिशा ,एक ही समय खिले रहते हैं ,तुम्हारे सूर्य सम रूप को और मेरे नैन चंद्र को ज्योतिर्मान करते रहते हैं।सृजक हो तुम !जाने - अनजाने -चाहे -अनचाहे निरंतर सृजन कर रहे हो ,तुम्हे काल का भान कहाँ ? तुम्हारे सृजन को मर्यादा कहाँ ? समय की गति तो मात्र इस मनुष्य रूप को छलती हैं। तुमने कभी कहा नहीं की तुम राजा हो और मैं दासी। पर मैं ही स्वयं को तुम्हारे चरणों में बैठा देखती रही। तुम्हारे चरणों से अनुपम संसार में कुछ और हो ही नहीं जैसे। मेरा सारा ध्यान ,मेरी सारी इच्छाएं ,मेरा व्यर्थ अभिमान ,मेरा झूठा मान सब का सब इन चरणों में विलय पाता हो जैसे। हठी बहुत हूँ मैं , पर वो मेरा अधिकार हैं।
मेरा हठ और तुम्हारा मेरे हर हठ को प्रेम कह देना। मेरा वो बिन कारण क्रोध करना और मेरी ज्वालामुखीसम हृदयाग्नि को तुम्हारा अपनी एक निश्चल मुस्कान से गंगाजल सा शीतल कर देना। मेरा तुम्हारे प्यार को हर भौतिक सुख से जोड़ कर तौलना -नापना और तुम्हारा एक पल में अपने ह्रदय से लगाकर मेरे माप -तौल के मानदंडों को मसल कर रख देना।
प्रेम की इस कथा में तुम कभी हारे नहीं और मैं कभी जीती नहीं। तुम अनंत तुम्हारा प्रेम अनंत ! मैं सिमित मेरा अहंकार भी सिमित ,तुम्हारे प्रेम के समक्ष उसका कोई वजूद ही नहीं। वास्तविकता की धरती पर वसंत माह साल में एक बार आता हैं ,प्रेम एक बार होता हैं , रिश्ता कभी-कभार ही जुड़ता हैं ,पर मेरे - तुम्हारे भावविश्व में प्रेम हर घडी , हर प्रहर ,हर मास ,हर जुग बस एक दूजे के लिए खिलता ही रहता हैं। मेरे तुम्हारे प्रेम का आदि-अंत कहाँ ? उसकी कोई उम्र कहाँ ,वो तो हर क्षण कोटि -कोटि नए प्रेमक्षणों की रचना करता रहता हैं।
प्रेम करना भी तो तुमसे ही सीखा मैंने। बालपन से यौवन तक अपने प्रेम को कितने नए नाम दिए मैंने ,मैत्री के ,संबंधो के ,नातों के , भावों के। पर तुम्हारा मेरा नाता एक नाम में ठहर ही नहीं पाया ,एक रिश्ते की सीमा में बैठ ही नहीं पाया ! वो कभी बचपन का रिश्ता रहा ,कभी भाई -बहन के प्रेम का ,कभी दोस्ती -यारी का ,कभी मन के मीत का ,कभी भक्त और भगवान का। नाम बनते गए ,रिश्ते बिगड़ते रहे पर प्रेम जस का तस बना रहा। हमारे रिश्ते में मैं कई सारी कालरात्रि ले आयी , अपने मद में डोलती मैं ,तुम्हे संसार की कसौटियों पर घिसती चली आयी ,पर तुम पर मेरी किसी भी व्यग्रता -कुटिलता -भावहीनता का कोई असर ही न पड़ा हो जैसे ! तुम उसी अनुराग के साथ मुझे अनवरत देखते रहे ,उसी सहृदयता के साथ मेरे मन को स्पर्श देते रहे ,उसी कारुण्य भाव के साथ मेरे मन में हिलोरे लेते रहे। मैंने बहुत कोशिशे की तुमसे रूठ के बैठ जाने की ,तुम्हे स्वयं से कोसो दूर धकेलने की , अपनी हठवादिता से तुम्हे खो बैठने की। पर तुम मेरी ही बुद्धि में प्रकाश बन जगमगाते रहे ,मेरे ही अंतर् में प्रेम बन इठलाते रहे ,मेरे ही तन में संगीत बन गुनगुनाते रहे।
तुमने मेरे सम्पूर्ण अस्तित्व को अपने वश में कर लिया ! मेरे शरीर के ,आत्मन के हर कण पर अधिकार प्राप्त कर लिया। मेरा मन मेरा नहीं ,हर पल तुम्हारा ध्यान करता रहा ,मेरा मस्तिष्क मेरे अनुसार नहीं ,तुम्हारे अनुसरण में काम करने लगा , मेरा शरीर तुम्हारी अनुपम देह के बस में अपने देहभान भूल तुम होता गया।

ये कैसी प्रीत हैं कृष्ण ! ये कैसा प्रेम हैं विजेता ! मुझे हराकर तुमने मुझे प्राप्त कर लिया और मैं अभिमानिनी होकर भी इस हार को पहन मानिनी बन सुखी होती गयी।
सच कहूँ मुझे कोई रस नहीं तुम्हारी बनायीं इस धरती और धरती पर बसते क्षणिक प्रेम में। यहाँ प्रेम सिर्फ शब्द हैं ,नाम हैं ,उम्र हैं। मेरा मान आसक्त हैं उस प्रेम में जो राग ,अनुराग ,भ्रान्ति से ऊपर चिरस्थायी शांति हो ,जो एक युग का जाया ,दूजे युग में नश्वर हो गया ऐसा न होकेआदि अंत से परे ,काल से ऊपर ,सतत -अनवरत -निरंतर हो। जो प्रेम मेरा और मात्र तुम्हारा हो।
जरा ठहरो मन के स्वामी ! मैंने अभी तक मुक्ति नहीं पायी ,मानव देह के तीन गुण अभी मेरे रक्त में बह रहे हैं ,मुझसे बचके जाओगे कहाँ प्रिय ? मेरा क्रोध , मेरी हठवादिता ,मेरा सरल सा भाव यह सब अभी तुम्हारे लिए शेष हैं। उम्र के कई साल शेष हैं मेरे ,कई सारी शिकायते ,हठे ,मनमुटाव शेष हैं। आखिर यही तो मेरे और तुम्हारे प्रेम का सौंदर्य हैं मेरे वसंत ! यही तो राधिका -कृष्ण के प्रेम का सत्य ! द्वापर में राधिका सरला थी ,इस युग विचित्र ,द्वापर में तुम्हारी हठ विजयी हुई थी ,इस युग मेरी ,द्वापर में मुक्त कर दिया था मैंने ,ये कलयुग हैं अब किसी युग तुम्हे मुक्ति नहीं।

मैं खत्म होकर भी शेष रही हूँ कृष्ण ,आगे भी मैं ही शेष रहूंगी तुममे।
तुम्हारी हठीली,मानिनी,गौरविणी
राधिका

इस संसार के लिए
राधिका वीणासाधिका

एक प्रेम की पाती तुम्हारे नाम
©️डॉ राधिका वीणासाधिका













Thursday, January 25, 2018



आज सुबह से आपसे बात करने का बड़ा मन हैं , बड़ा मन हैं की आपसे अपने मन की बात कहूं ,पर जब आसपास देशभक्ति गीतों का शोर -शराबा हो तो कुछ भी कहना - सुनना कठिन हैं। शोर -शराबा इसलिए कह रही हूँ क्योकि आसपास की दसों इमारतों से दस दिशाओं में गूंजते दसों गीत एक साथ सुनायी दे रहे हैं और कुछ भी समझ नहीं आ रहा। लाउड स्पीकर की आवाज में मन की आवाज कुछ दब सी गयी हैं ,इसे घुटन नहीं बनाना चाहती सो लिख दे रही हूँ ,इसे खत समझें ,मेरी आवाज समझे या दर्द समझे, या जो चाहे समझे , आप पर छोड़ रही हूँ। 

कभी-कभी सोचती हूँ कैसे कहूं ? क्या आपमें से कोई मेरे मन की बात समझेगा ? हमारे देश में जहाँ लड़कियों  के लिए जीवन का अर्थ मौन हैं ,सहनशीलता हैं ,निति -नियम-परम्पराएं -समाज - मान्यताएं हैं ,जहाँ दिल की कहने -सुनंने से पहले उन्हें हज़ारों बार सोचना पड़ता हैं ,जहाँ लड़कियों के लिए मन नाम की कोई वस्तु ही नहीं हैं ,उनके लिए स्वतंत्रता के मायने ही कुछ निराले हैं ऐसे में एक लड़की का बिंदास्त किसी सोशल मिडिया प्लेटफार्म पर दिल खोल कर अपनी बात कहना कहाँ तक लोगो को स्वीकार्य होगा ? 

मुझे मेरे विचारो  पर किसी का सिक्का - मोहर  नहीं चाहिए ,नहीं कोई आग्रह हैं। आप सब जानते तो हैं मुझे !अलग सी हूँ मैं !  पर चाहती हूँ की आप जरा सोचे मैं क्या कह रही हूँ ,क्यों कह रही हूँ। 

जरा सोचिये यह सृष्टि क्या चाहती हैं हमसे ? कोई अपेक्षाएं ही नहीं हैं उसकी , सिवाए इसके की हम शांत भाव से अपने काम करे और आनंद से जिए !

पर घर से बाहर कदम निकलते ही दीखते हैं कुढ़े -कचरे के ढेर , जगह -जगह थूके हुए पान के निशान , धरती पर बिछी हुई आधी खत्म सिगरेटों के टुकड़े , धुँआ उड़ाते ट्रक ,आसमान को फोड़ते लाउड-स्पीकर्स ,अधकटे - सूखे ह्रदय फाड कर रोते पुराने वट-वृक्ष , सूखती नदियां , विमान की तरह जमीनी वाहनों को उड़ाते पशु , मातृ रुपेण संस्थिता कहकर पूजते , घर में बंदिशों -पहरों में रखते ,सड़क पर दुर्व्यहवार करते भारत के वीर नर। बड़ी -बड़ी बातें करते ,पुल -पुलियाँ और सपने बंधवाते और एक ही पल में सब -कुछ दंगे -फसाद -धोखों -घोटालों की आड़ में ढहा देते वो महान नेता गण।  किसी के पास विषय हैं ,किसी के पास धर्म हैं ,किसी के पास मूर्तियां हैं ,इतिहास हैं ,शान,मान ,अभिमान हैं और सबकी आड़ में छुपी राजनीती हैं।  

ये सब देखती हूँ तो लगता हैं हमारा घर भला ! पर घर वाकई भला हैं ? यहाँ राजनीती क्या कम हैं ? एक दूसरे से जलन , धोखा ,स्वार्थ ,घृणा ,बिन सर-पैर की बात पर लड़ाइयाँ ,अपने पड़ोसी को निचा दिखलाने की होड़ , अपना बैंक बैलेंस बढ़ाने की होड़ , अपने बच्चो को ब्रिलियंट बतलाने की होड़ ,अपना सोफा पड़ोसी के सोफ़े से अच्छा ,अपने कपडे सहेली के कपड़ो से ब्रांडेड ,अपना छत पीओपी की डिजाइनर छत बतलाने की होड़ !

क्या हो रहा हैं ये ? और क्या ढूंढ रही हूँ मैं ? जानती हूँ की आज भी हर मन के अंदर एक छुपे हुए कोने में सच्चे प्यार की आस हैं ,हर इंसान को अखंडित विश्वास की चाह हैं ,यहाँ हर कोई शांति -सुख -प्रेम और आनंद की तलाश में हैं। पर फिर क्या हैं जो हमें रोक रहा हैं ? क्या हैं जो हमें शांत -सुखी -समृद्ध -आनंदित नहीं होने दे रहा ? क्यों हम आज भी भटक रहे हैं ? तरस  रहे हैं ? तड़प रहे हैं ?  लड़ रहे हैं ? सहन कर रहे हैं ? सर पर वजन ढो -ढो कर हॉस्पिटल्स को अमीर कर- कर जी रहे हैं ,बिन आधार का ,बिन उद्देश्य का ,छोटे और स्वार्थी उद्देश्यों से भरा  एक खोखला -आधा -अधूरा जीवन जी रहे हैं ? 

इस सबका कारण सिर्फ एक हैं।  हमारे अपने झूठे विश्वास ,हमारी अपनी बनायीं हुई झूठी लक्ष्मण रेखाएं ,हमारी अपनी संकुचित सोच ,हमारे अपने तक ,अपने  झूठे चित्र तक सिमित विचार ! 

कितना आसान हो जीवन अगर हम स्वयं से शुरुवात करे , पैसा -धन -मान चाहे छोटा मिले या बड़ा ,ह्रदय में संतुष्टि का भाव बड़ा हो ! जीवन सिर्फ मैं तक सिमित न हो ,जीवन, "हम " हो जाएँ ,जीवन सिर्फ एक धर्म ,परंपरा ,जाती ,नाता न हो , जीवन ब्रह्माण्ड बन जाएँ। धरती को टुकड़ो में,देशों में ,प्रदेशों में ,नगरों में ,घरों में बाटने वाले हम हैं ,क्यों न घर -नगर -प्रदेश -देश फिर जगत बन जाएँ। ये पानी जो नदियों में बह रहा हैं किसी एक धर्म ,जाती ,सम्प्रदाय ,आस्था ,देश का नहीं ,ये आक्सीजन जो बिन मोल हमें मिल रही हैं किसी एक श्वास की बपौती नहीं ,यह जो पहाड़ो के अंदर खजाना भरा पड़ा हैं किसी मजहब किसी एक राष्ट्र मात्र का नहीं ,इस पर सबका सामान -संतुलित अधिकार हैं। 

लड़ाइयां सिर्फ इसलिए हैं क्योकि हर कोई श्रेष्ठत्व चाहता हैं ,हर कोई अधिक चाहता हैं ,हर कोई संपूर्णत्व चाहता हैं। लेकिन हर कोई भूल रहा हैं ,संपूर्णत्व ,श्रेष्ठत्व भिन्नत्व में नहीं ,एकत्व में हैं।  जरा सी बात हैं ,हमें स्वयं से ऊपर उठकर सोचना हैं ,जीवन सिर्फ घर की चारदीवारी में नहीं ,अपने हिस्से का पानी ,अपने देश का तेल , अपनी अलग मान्यताएं  में नहीं , जीवन अपने सम्पूर्ण विकास में हैं। विकास किसी को निचा दिखा कर ,किसी को छोटा बतला कर ,किसी से होड़ कर नहीं होता ,विकास होता हैं अपने काम पर पूरा फोकस करके ,पूरा ध्यान अपने आप से खींच कर , स्वयं से उठकर,स्वयं को भूल कर , संसार  हो जाने में ,वो कार्य  हो जाने में।  

हर कोई यही सोचता हैं मेरा अकेले का काम थोड़ा हैं ,सब मजे कर रहे हैं मैं क्यों अकेला भोगु ? माता -  पिता बच्चो को पूर्व निर्धारित सांचे में ढाल रहे हैं। सब के सर पर सील -सिक्के ठुके हैं ,ये बहन हैं ,ये बेटी हैं ,ये बहुं हैं, ये सास हैं ,ये पिता हैं ,ये दोस्त हैं ,ये आदमी हैं ,ये औरत हैं ,ये गवर्मेंट एम्प्लोयी हैं ,ये बिज़नेस वीमेन हैं ,ये आर्टिस्ट हैं ,ये घरवाले हैं ,ये बाहरवाले हैं ,ये नेता हैं ,ये प्रजा हैं ,ये गरीब हैं ,ये अमीर हैं ,ये ईसाई हैं ,ये हिन्दू हैं ,ये मुस्लिम हैं ,ये नास्तिक हैं ,ये आस्तिक हैं ,ये बूढ़ा हैं ,ये जवान हैं ,ये भक्त हैं ,ये अमका -ढिमका -तमका हैं। 
मुझे नहीं पता ये सब क्या हैं।  
दुःख इस बात का हैं मुझे इन सब रूपों को मानते -सँभालते जीना पड रहा हैं। मुझे मानव की खोज हैं ,मुझे इंसान की तलाश हैं।,मुझे उन कुछ व्यक्तियों की आस हैं जो ,मानव-मन के छोटे -मोटे झगड़ो से ऊपर हो ,जो माता- पिता -भाई -बहन -दोस्त ,धर्म मात्र न हो, जो हो तो सिर्फ मनुष्य ,एक मनुष्य मात्र।  जो अपना -अपना धर्म माने ,अपने -अपने कर्म को जाने ,अपनी परम्पराएं भी निभाले पर सबसे ऊपर मनुष्यत्व को जाने , सहृदयता ,प्रेम शांति और कर्तृत्व को जाने। जिनके लिए सबसे बड़ा कर्म अपने हिस्से का कार्य कर जाना हो ,अपने भाग का ऋण चूका जाना हो। जो भिन्न - भिन्न होकर भी एक हो , जो स्वयं के फायदे -नुकसान से ऊपर आत्मशांति -आत्मशक्ति और समग्र विकास को ध्येय बनावे। जो रक्षक हो ,संरक्षक हो ,प्रबंधक हो। जिनका मंदिर -मस्जिद -गुरुद्वारा केवल माटी - पत्थरों की दीवारे नहीं उनका आत्मतत्व हो । जो जीवन का अर्थ आत्मशांति ,आत्मविकास ,आत्मोद्धार को जाने।

मैं मानती हूँ बहुत से लोग हैं जो ऐसा मानते-जानते और करते हैं।  पर मुझे सिर्फ उन चार- आठ -दस -सौ -हज़ार लोगो की तलाश नहीं हैं  ,मुझे हर व्यक्ति के रूप में ऐसा सोचने-मानने -जानने वालो की आस हैं। मुझे हर इंसान को भ्रम से ऊँचा उठते हुए ,हर समाज को कुछ नया गढ़ते हुए ,हर किसी को लघु स्वार्थो से ऊपर जीते हुए देखना हैं। 

पागल कहते हैं कुछ लोग मुझे ! क्योकि मैं साधारण -सरल जीवन को दरकिनार करते हुए एक प्रबल ,सक्षम ,नविन जीवन की आशा रखती हूँ। मैं मानती हूँ सब कुछ संभव हैं , मैं मानती हूँ बदलाव सिर्फ एक क्षण का  खेल हैं मात्र हमारे निर्णय भर कर लेने इतनी देर का ,मैं मानती हूँ सच्चा -सरल पर उतना ही प्रबल -झंझावात सा ,उठान सा ,पराक्रम सा जीवन जिया जाना संभव हैं। वक्त सिर्फ कल - आज और कल में नहीं ,समय सदैव गतिमान हैं ,उस गति के साथ हमें आगे बढ़ना हैं ,एक उम्र ,एक पल ,एक  जीवन से ऊपर उठ कर सोचना हैं। 

  मेरे विश्वास अलग  हैं ,मैं अलग हूँ पर शायद मैं गलत नहीं हूँ। 


पहले भी पूछ चुकीं हूँ आज भी पूछ रही हूँ ,इस अकेली -अनोखी -विचित्र लड़की का साथ देंगे ? क्या इस गणतंत्र दिवस पर इस निराली कन्या को एकत्व की भेंट देंगे ?


एक अखंड विश्वास के साथ 
शुभ गणतंत्र दिवस 

वीणा साधिका डॉ राधिका 

' मन के इस लिखे पर कौन बावला कॉपीराइट डालेगा ? मेरे मन की सबके मन की बन जावे तो मेरा जीवन धन्य हो जाये।'






Thursday, November 16, 2017

आज कितने बरस हुए उसे पुकार रही हूँ।न जाने किस घने अंधकार में खोया - सोया हैं।कई बार कोशिश की हाथ पकड़ कर लौटा ले आऊं।पर उसे मुझसे ज्यादा फ़िक्र हैं मेरे सम्मान की, बिन वज़ह बढ़ते मेरे अभिमान की ।
डरता हैं वो की अगर उसके साथ मुझे किसीने देख लिया तो समाज क्या कहेगा ? मेरे बारे में हर इंसान क्या सोचेगा !
उसे कई बार समझाया मैंने मुझे लोगो की चिंता नही।
खुश तो वह भी होता हैं मेरा साथ पाकर, पर जब भी खिलखिलाने लगती हूँ, उसकी नज़र पड़ती हैं समाज के किसी नायक - पुरोधा पर ,वो झट से छोड़ देता हैं हाथ मेरा और मैं सारी खुशी भूल बन जाती हूँ वो, जो बनाना चाहता है मुझे समाज !
कई सपने देखे थे हम दोनों ने साथ साथ !  पहुँच तो गयी सपनो के आंगन तक उसके बिना, पर एक भी सपना जी नही पायी जी भरकर....
वो दिन...जब हम साथ थे।
बादल, बरखा,चाँद -सितारें मुट्ठी में ले घूमते हम।आँखों की चमक कुछ यूं हुआ करती थी कि चाँदनियाँ भी शरमा जाएं, इतना हँसते - गाते -गुनगुनाते की देव - गंधर्व भी संगीत छोड़ हमारा प्रेम गीत सुनने आ जाते।
खुशियों की खरीद नही करनी पड़ी कभी हमें।
पत्थर-पानी-हवा-फूल सब हमारी ख़ुशियों के साथी बन जाते।
दो वक्त का आधा-अधूरा खाना, मैले -कुचैले कपड़ो का ओढ़ना,न कोई बयूटी प्रोडक्ट न कोई गाड़ी- कार। बस धूल माटी को चंदन बना चेहरे को सजा लेते,जहां जाना हो,दुखते- दर्द करते पैरों से दौड़ते पहुँच जाते।
कभी जरूरत ही नही लगती किसी कार की,किसी पार्लर की,सौंदर्य बढ़ाने के किसी सामान की !
तब बैंक बैलेंस नही था,नही कोई इन्वेस्टमेंट प्लान खरीदा था हमने,न ख़रीदा था करोड़ो का लाइफ इंश्योरेंस प्लान पर कभी डर नही लगा न जिंदगी जीने-खत्म होने का , न किसी ख़तरे से खेलने का।हम ख़तरों को खेलते नही थे शायद ! ख़तरा ही जीवन था हमारा ,पर कोई ख़तरा न हमारा जीवन छीन पाया न हमें डरा पाया।
वातानुकूलित यंत्रो से कोई वास्ता नही था हमारा। पैरों में चप्पल डाले बिन युहीं कड़कती धूप में चल देते हम दोनों, न सर पे छाता न ac वाली कार। न चेहरे की परतें ढांकता मख़मली सुंदर रुमाल।
मुझे तब भी था ज्वेलरी पहनने का शौक़ ,वो भी खरीद के लाता रोज़ रोज़ । सड़क के किनारे ज़मीन पर बैठी दादी ने बेची,उसने मेरे लिए तोहफ़े में लायी वो दो- पांच रुपये की कांच की हरी-नीली-पीली चुड़ी, कांच के टुकड़ों से सजे प्लास्टिक के कंगन और कर्णफूल । आज तनिष्क ,कल्याण ज्वेलर्स के अलंकार भी फ़िके लगते हैं मुझे!
हम कभी बड़े होटल्स में नही गए संग,हम खाते सायकिल पर सवार अंकल ने बेचा चूरण, खट्टी इमली,घर मे जरा से घी में बनी शक्कर रोटी ,पर हम दोनों का साथ ही कुछ ऐसा था कि वो शक्कर रोटी किसी केक या फाइव स्टार में मिलती स्वीट रवॉइली विथ लाछा रबड़ी से कई-कई ज्यादा स्वादिष्ट और मीठी लगती।
कभी कोई डाइट प्लान नही फॉलो किया हम दोनों ने न फिटनेस मन्त्रा जपा।बस दोनो यूँही निकल पड़ते सुबह से सैर पर।कभी भागा-भागी कभी पकड़ा-पकड़ी । अंत मे दोनो एक दूसरे से लिपट सो रहते घँटों ,अलार्म और समाज दोनों से बेफिक्र !

सच तुमसे दूर होकर बिल्कुल भी खुश नही हूँ , तुम्हें अपने अंदर जिंदा रखने की बहुत कोशिशें करके थक चुकी हूं।तुम्हारा साथ पाकर फिर जी उठूंगी और हाँ इस बार नही सुनूँगी एक भी बात तुम्हारी। मैं आ रही हूँ तुम्हें लौटा लाने ,अब मैं तुम फिर साथ होंगे।घर पर, ऑफ़िस में,लोगों के सामने ,समाज के सामने सर उठाकर साथ चलेंगे।
बहुत जी ली धीमी मौत तुम्हारे बिन मेरे साथी।
अब तुम और मैं सदा साथ होंगे मेरे "बचपन" ।
बचपन ......हाँ तुम , मेरे बचपन ...
 जिसको खोने के बाद सब पाकर खुदको खो दिया मैंने, सब कुछ पाया ,कितना जिया पर सब बेकार ही जिया मैंने।
आज बच्चो का दिवस हैं, और मुझे याद आ रहा हैं आकाशवाणी में हम दोनों ने  सफ़ेद फ्रॉक पहन गुलाब लगा कार्यक्रम में गाया एक गीत " फूल गुलाबों के मुस्काये नेहरू चाचा तुम याद आये"।
उन गुलाबों की कसम ,चाचा की कसम अब जिऊंगी तो बस तुम्हारे संग मेरे बचपन।

*जो मेरी तरह बचपन को मिस कर रहे हैं और जो फिर से एक बार बचपन के साथ जीना चाहते हैं,उन्हें बच्चों के दिन की शुभकामनाएं*😊
© राधिका वीणासाधिका

*कुछ पोस्ट्स में ये कॉपीराइट लगाना भी बचपने को नागवार सा लगता हैं😊

Tuesday, September 12, 2017

विरक्ति....

वो मेरा ही था जिसे मैं मेरा भूतकाल कहती हूँ ख़ुशी के दिन थे, आकाश से मन भर की हुई बातें थी ,चाँदनियां दोस्त हुआ करती थी। दर्द भी थे ,कुछ वहम भी , कुछ रचे-गढ़े बादल के टुकड़े थे जिन्हे  मैं सपने कहा करती थी . कुल मिलाकर वो मेरा बचपन था . फिर सपनो ने मुझसे आगे दौड़ना शुरू किया ,ये कौनसा लोक था जहाँ सब कुछ अपरिचित था फिर भी परिचित था। मल्हार के रंग कब रेगिस्तान की धूल हो गए पता ही नहीं चला वो वक्त था ,गुजर गया। लगा जैसे बहुत बड़ी लहर आयी मैं समुंदर की गहराई में किसी श्रीधाम में शांत लय में डोल रही थी ,क्षीरसागर में आया भूचाल कुछ तेज़ था उम्र के कुछ साल बीत गए ऊँची आसुरी लहर बहुत ऊँचा उड़ा ले गयी ,कई थपेड़े खाये ,डूबी -उछली और धड़ाम से अब जाकर सागर तट पर आ गिरी। अब जो आयी हूँ , तो समझने में ही वक्त जा रहा हैं की कहाँ हूँ ? आँखे खुल रही हैं ,मन अब भी थका हैं ,मस्तिष्क उठके झूम रहा हैं ,बावला नच रहा हैं ,कह रहा हैं नच, तू बच गयी,बढ़ ,मचल ,उछल ! 

पर अब जिंदगी के उन फेरो में पड़ना नहीं चाहती मैं, नहीं किसी फूलों से लदी डाली पर झूमना चाहती हूँ ,नहीं सावन के गीत गाकर बाबुल को बुलौवा भेजना चाहती हूँ। नहीं आँगन में लगे मधुमालती के पौधे के मीठे रस को चख उसकी मिठास से ईष्या करना चाहती हूँ। नहीं समय की साम्राज्ञी बन सब कुछ पाना चाहती हूँ ,नहीं किसी से कुछ आगे बढ़ खुद पे इठलाना चाहती हूँ।  

अब न दर्द सहने की क्षमता हैं ,नहीं वो समय जो मुझे दर्द दे सके। वो दुःख ,वो दर्द,वो स्वप्न ,वो इच्छाएं ,वो आस्थाएं ,वो आनंद सब कुछ मेरे अंदर है आज भी ,वह छूटता नहीं ,क्योकि जितना मेरा होना सत्य हैं उसका भी होना सत्य हैं ,उसे झुठला नहीं सकती ,भुला भी नहीं सकती और खुदसे लिपटा भी नही सकती ,क्योकि उसे झुठलाने से सच झूठ नहीं बन जायेगा ,उसे भुलाने से वह भूल नहीं हो जायेगा ,उसे छूटाने से वह कही भी छूट नहीं जायेगा ,मेरा भूतकाल मेरा हिस्सा हैं वो मेरे शरीर के ,मन के साथ ,आत्मा के साथ उतना ही आगे बढ़ जायेगा जितना मैं उसे भूलना चाहूंगी ,उससे छूटना चाहूंगी ,उसे दूर करना चाहूंगी। शायद इसलिए वह भूत हैं वह !

वह भूत क्यों हैं और उस भूत का अस्तित्व क्यों और कब तक हैं जानती हूँ। तब तक और वही तक जब तक मैं उससे जुडी हूँ। जुड़ने से यहाँ मतलब टूटने की ,छूटने की ,भूलने की इच्छा से जुडी हूँ। दर्द को भुलाने की इच्छा ही दर्द को जगाने की शक्ति हैं ,दर्द को समझे जाने की इच्छा दर्द की संजीवनी ,दर्द को दूर करने का प्रयत्न स्वयं से मात्र छल !

मैं उस दर्द को अपनाना चाहती हूँ ,पुरे भाव से। अगर मेरा भूतकाल कभी आनंद था ,कभी दुःख तो वो दुःख ,वो आनंद सब कुछ मेरा ही तो था ,वो दर्द इसलिए हुआ क्योकि मैंने अपनी खुशियों को ,अपने अस्तित्व को ,अपने आप को उससे पूरी तरह जोड़ लिया। यह भूल ही गयी की यह क्षण, मेरे अस्तित्व से बढ़कर नहीं ! यह भी भूल गयी की यह पल ,यह समय ,यह भावनाएं ,यह नाते-रिश्ते ,यह लोग, यह सब मैं नहीं !जुड़ाव क्षणिक सुख देता हैं और बहुत दुःख। तो अब मैं जुड़ना नहीं चाहती। मैं बैराग धारण नहीं कर रही ,नहीं मैं कही दूर जा रही ,न मैंने यह भौतिक जीवन तज ,दिया न रिश्तो नातों से मुख मोड़ लिया। सन्यास कोरा भरम हैं ,स्वयं से किया गया छल हैं  ,अपने आप से बोला गया झूठ हैं। ऐसी विरक्ति जो सन्यासी बना दे आत्मा से उठती हैं और संत बना देती हैं। युगो तक फिर इस दुनियाँ में आना नहीं होता। मैं संत नहीं बनना चाहती ,मेरी विरक्ति मुझे किसी से भी तोडना नहीं चाहती ,कुछ भी छोड़कर निकलवा लेना  नहीं चाहती। 

मैं अब बस शांत हो जाना चाहती हूँ ,शांति बन जाना चाहती हूँ ."Above from all attachments" मैं इसी जीवन में मुक्त हो जाना चाहती हूँ।  
मैं किनारो से जुड़ के बहना चाहती हूँ ,मैं अपनी गति में विचारना चाहती हूँ ,मैं आनंद मेघ संग नृत्य करना चाहती हूँ पर मात्र एक नदियां की तरह ,प्रतिपल -प्रतिक्ष्ण बहती सरिता की तरह ! नदियाँ जो उगम से प्रारम्भ होती हैं ,पर उगम को छोड़ विस्तारित होती हैं ,उसे उगम से बिछुड़ने का दुःख नहीं होता वो बस अपने पथ पर बढ़ी चली जाती हैं , मंद -शांत -अविरत ! मार्ग में वृक्षवल्ली आती हैं उस पर फूल बिखराती हैं वो आनंद मग्न होती हैं ,उन पुष्पों को एक बार आलिंगन में लेती हैं उनके संग आगे बढ़ जाती हैं ,पुष्प कुछ देर संग चलते हैं फिर अंतर में कही खो जाते हैं पर वह बिना किसी शोक के बहती जाती हैं ,आगे पहाड़ आते है ,ऊंचाइयां आती हैं ,कठिन आड़े-टेड़े रास्ते आते हैं  ,पर वह स्थिर भाव से उन्हें भी पार कर जाती हैं। एक ऐसा मोड़ आता हैं जहाँ बड़ी ऊंचाइयों से वह धड़धङाकर वह निचे गिर पड़ती हैं ,क्षण मात्र में निचे गिरने का दुःख बिसर वह उन नन्हे -नन्हे पथ्तर के टुकड़ो को देखती हैं जो सूर्य किरणों से मिलती उसकी चमक को देख खुद भी आँखे चमकाने लगते हैं। उसे क्षणिक मोह हो उठता हैं ,यही थम जाने का मन करता हैं ,वह कुछ और तेज़ी से आँखे चमका तुरंत वहां से आगे बढ़ जाती हैं। राह में कोई तीर्थ आता हैं लोग उसे गंगा ,जमुना कह पुकारते हैं ,कोई आरती सुनाता हैं ,कोई दिए बहाता हैं ,उसके पास जो भी हैं वह इन अबोध बालको को निछावर कर वह पुनः आगे बढ़ जाती हैं बिना एक क्षण का भी विलम्ब किये ,शांत भाव से बिना रुके -बिना थमे -बिना थके वह अमृतवर्षिणी बहती जाती हैं ,बढ़ती जाती हैं और फिर उसी शांत भाव से सागर में मिल जाती हैं। अस्तित्व  को खोकर सागर बन जाती हैं। कौन जानता हैं सागर में मिली नदियां फिर कभी कही से कोई धारा बन के फिर किसी नदी का सृजन न करती हो ! खारा पानी ,खूब अंदर जाकर किसी मीठे पानी का झरना और फिर किसी माँ कावेरी का हिस्सा न बनता हो ! इसलिए ही आदि ही अंत हैं और अंत ही प्रारम्भ ! जीवन प्रतिक्षण भूतकाल हैं और भूतकाल ही वर्तमान ! सो अब इस आदि - अंत के खेल को बिना किसी जुड़ाव के सहज भाव से खेलना चाहती हूँ। अब बस एक नदियां बनके बहना चाहती हूँ। 

विरक्ति के रंग में रसरंग हो जाना चाहती हूँ। 

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