कहते हैं बेटी माँ की परछाई होती हैं ,वो मेरी परछाई नही ,एक दैवीय ज्योति हैं,जो जीवन को प्रकाशित करती हैं मेरा ही चेहरा,मेरी शक्ति,शांति,संगती ,गीति,आरोही ....
Tuesday, September 16, 2008
वायरस और टोना टोटका
यह तो हुई राम गोपाल जी की पिक्चर की बात। लेकिन वास्तविक जिन्दगी में भी कई लोग हैं जो इसमें विश्वास रखते हैं ,सिर्फ़ विश्वास ही नही रखते ऐसे भयावह प्रयत्न करते भी हैं ,मजे की बात तो यह हैं की सिर्फ़ ग्रामीण इलाको में ही नही अच्छे भले पढ़े लिखे सुसभ्य नगरो में भी इस तरह की घटनाये होती हैं और बहुत ज्यादा होती हैं ,हर दूसरे दिन सड़क के बीचों बीच टोना टोटका से सम्बंधित वस्तुएं पड़ी होती हैं । निम्बू कितना सुंदर और रसीला फल हैं उसकी इमेज की तो इस टोना टोटका ने वाट लगा दी हैं ।
लोगो की जिन्दगी में इस टोनाटोटका का खौफ कम था, की इन्टरनेट वायरस ने उनके डर में और तड़का लगा दिया। जी हाँ ये वायरस किसी टोना टोटका से कम नही ,टोना टोटका क्या मुश्किल पैदा करेगा?उससे कहीं अधिक मुश्किल यह वायरस पैदा कर देता हैं। अब मेरी बात ही लीजिये ,१५ दिन हो गए कम से कम , ब्लॉग पर ज्यादा कुछ लिख ही नही पा रही हूँ। मेरा ब्लॉग वीणापाणी तो मेरी याद में रो रो के गा रहा हैं मेरी वीणा तुम बिन रोये .दरसल हुआ यह हैं की पता नही कैसे मेरे कंप्यूटर में बहुत से वायरस ,उसके जात भाई ट्रोजन और वार्म घुस गए हैं.कंप्यूटर पहले बीमार हुआ और अब मृत्यु के कगार पर पड़ा हैं , मैं और सॉफ्टवेयेर इन्जिनियेर लगभग हार चुके हैं अब तो ईश्वर की कृपा और आपकी दुआओं का ही सहारा हैं .कृपया मेरे कम्प्यूटर की सलामती के लिए ,उसके जीवन की रक्षा के लिए prarthanaa कीजिये .अन्यथा उसको कूडे दान में में फेकने के आलावा मेरे पास कोई चारा नही रहेगा .आज और पिछली कुछ पोस्ट्स पतिदेव के लैपटॉप से लिख रही हूँ ।
इन पंद्रह दिनों में विचार कर कर के थक गई हूँ की ,इन टोना टोटका करने वालो और इन वायरस सृजनकारो को ये सब करके हासिल क्याँ होता हैं ? कोनसा सुख ,लाभ ये प्राप्त कर लेते हैं ?दूसरो का बुरा कर ख़ुद का भला करने की यह मनोवृत्ति ,विकृतवृत्ती ही कहला सकती हैं ,मेरी नज़र में यह सब करने वाले लोग मानसिक बिमारियों से ग्रसित ही कहला सकते हैं । इसके मूल में होती हैं अपने सुख की उत्कट इच्छा और दूसरो के सुख से जलन । जो दूसरो के पास हैं हमारे पास क्यों नही हैं इसका दुःख .और उसकी दुःख से उपजे अवसाद की विकृत परिणिति होती हैं टोना टोटका और वायरस निर्माण ।ये वायरस निर्माता जो अत्यधिक बुद्धि के मालिक हैं वे अपनी बुद्धि का प्रयोग अच्छे कामो और ख़ुद के विकास के लिए करे तो उनका और औरो करो कितना भला हो सकता हैं .पर ये लोग यह न करते हुए न जाने कितने ही वायरसों का निर्माण कर देते हैं और दूसरो के कम्प्यूटर की ऐसी की तेसी कर खुश हो जाते हैं ।
सच कहूँ तो यह पढ़े लिखे कम्प्यूटर वायरस निर्माता ,टोना टोटका विशेषज्ञ के ही जात बंधू हैं । टोना टोटका या ब्लैक मेजिक करने वाले जहाँ निम्बू ,गुडिया ,नारियल ,आदि आदि से अपना काम चलाते हैं ये कम्प्यूटर भाषाओ को अपना औजार बनाते हैं ।
मेरी इन दोनों प्रकार के भाई बहनों से विनती हैं ,दूसरो का बुरा सोचने और करने से पहले निस्वार्थ होकर अपना भला सोचे और फ़िर भी यदि आपकी बुद्धि आपको यह सब करने के लिए प्रेरित करती हैं तो इसके पहले की आपको मानसिक बीमारियाँ पुरी तरह से अपनी जकड में ले ले आप किसी अच्छे मनोरोग विशेषज्ञ से अपना इलाज शुरू करवा दे ।
धन्यवाद !
Saturday, September 13, 2008
कौन हैं आतंकवादी ?
कुछ महीनों से लगातार आ रही बम विस्फोट की खबरे सुनने के बाद भी ख़ुद को शांत बनाये रखा था ,न आंसुओ को ढलकने दिया ,न इस विषय पर लेखनी को चलने दिया ,पर आज जब सुना की फ़िर से एक बार दिल्ली में बम विस्फोट हो गए हैं,मेरी आँखों की श्रावणी नदी का बाँध टूट गया । बहुत रोई मैं,आंसुओ की जलधाराओं में नींद की कब हिम्मत बनी हैं आँखों में टिक पाने की ?
लेखन और लेखनी ईश्वर के वरदान ही हैं ,अंतर्मन में प्रश्नों के सवालों की जब सुनामी उठती हैं तब सिर्फ़ और सिर्फ़ लेखनी ही प्रिय सखी सी आपका दुःख कम करती हैं। तक़रीबन ८ बजे से सोच रही हूँ,यह क्या हो रहा हैं ?कहाँ जा रहा हैं इन्सान का जीवन ? आज विस्फोट ,कल दंगे,परसों खून ,चक्काजाम । यह सब क्या हैं ?और क्यों हैं ?पिछले कुछ सालों में इन सब गतिविधियों में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि हुई हैं । पिछले तीन चार महीनों से होने वाले इन विस्फोटो ने न जाने कितनो की जानें ली हैं ,न जाने कितनो के घर बर्बाद किए हैं। कुछ सालो पहले तक हम रोते थे कभी कही किसी के यहाँ किसी की मौत हो जाने पर ,ज्यादा रोते थे किसी अल्पवय के व्यक्ति की किसी दुर्घटना में मृत्यु हो जाने पर । पर आज तो हर कहीं मौत हैं। हर रोज़ मौत हैं । छोटा ,बड़ा, अच्छा ,बुरा हर कोई मर रहा हैं ,जैसे इन्सान नही दिए रूपी पृथ्वी के पास मंडराने वाले पतंगे हो ,जिनकी नियति कुछ पल में मर जाना ही होती हैं । और यह सब क्यों ? इन सब का जिम्मेदार कौन ?इन्सान। वही इन्सान जिसने धरती पर जीवन का रंगमंच सजाया ?जिसने आशा के पंखो पर आसमंती रंगों की रंगावली बनाकर जीवन की रंगोली को स्वप्निल रंगों से सजाया ?वह इन्सान जिसके ह्रदय गान के मधुर स्वरों ने समूचे ब्रह्माण्ड को प्रेम गीत से गुंजारित किया ?वह इन्सान यह सब कर रहा हैं ?आख़िर क्यो ?हम कहते हैं दंगाइयो ने ऐसा किया । आतंकवादियों ने ऐसा किया । पर यह कहते हुए भूल जाते हैं की वह दंगाई ,वह आतंकवादी भी इन्सान ही हैं ,तो यह सब इन्सान ही कर रहा हैं ,इन्सान ही इन्सान को मार रहा हैं । हम कभी धर्म के नाम पर लड़ते हैं ,कभी मजहब के नाम पर कभी बस यूँही लड़ने के लिए लड़ते हैं ,हम ही मारते हैं ,हम ही मरते हैं ,पर फ़िर भी लड़ते हैं । हमें मारने वाले भी इन्सान ही तो हैं ,जब ये पैदा हुए होंगे तो ऐसे तो न होंगे ,किस बात ने इन्हे इतना भावनाहीन बना दिया की ये मानव होकर भी दानव बन गए । पिछले कुछ वर्षो से जीवन शैली में आमूलचुल परिवर्तन आया हैं ,परिवर्तन आया हैं विचार शैली में ,जीवन जीने की रीती में ।चलती भीड़ में हर कोई एकाकी हैं ,रिश्तो में वह बात नही रही ,वह प्यार नही रहा ,वह जीने का अंदाज़ नही रहा .भटकाव और निराशा का चक्र्व्ह्यु हर किसीको आसानी से अपनी चपेट में ले रहा हैं .इसी दौर में कुछ भटके हुए ,थके हुए और मानिसक रूप से अस्वस्थ हुए मनुष्य बन गए हैं आतंकवादी ।ये हमें मार रहे हैं ,हम रो रहे हैं ,और ये खुश हो रहे हैं ,पर सच तो यह हैं की हम नही,ये ही मर रहे हैं ,जितनी बार बम विस्फोट होते हैं ,मरने वाले मरते हैं उनके लिए रोने वाले उनकी आत्मा को शान्ति पहुचाने के लिए जी भर के प्रयत्न करते हैं,वह शरीर खोते हैं पर साथ अपनों का प्यार ले जाते हैं ,अगर पुनर्जन्म के सिद्धांत को माने तो वह दूसरा जन्म भी लेते हैं । पर हर बार इन आतंकवादियों की आत्मा मरती हैं ,इनके जस्बात सूखते हैं ,इनकी भावनाए मुर्दा हो जाती हैं ,हमसे अधिक कष्ट इन्हे होता हैं ,कौन इन्सान भावनाहीन,संवेदनाहीन होकर जीवन को जी पाया हैं ?यह जीवन नही जी पाते ,प्रेम ,सुख आत्मानंद सब ,सब से ये कोसो कोसो दूर हैं । इनके दिमाग को शायद कभी वह शान्ति महसूस ही नही हुई हैं , ये जी नही रहे ,यह हर एक क्षण मर रहे हैं ।(कहने वाले कहते हैं की इनकी आत्मा नही होती ,भावनाए नही होती,पर कहीं इन्सान भी ऐसा होता हैं जिसकी भावनाए नही हो ,जिसको कभी किसी बात का दर्द नही होता हो ?अन्तर यह हैं की इन्होने अपने दर्द को अपनी आत्मा को अपनी भावनाओ को दबा दिया हैं ,उन्हें कभी खून ,हत्या ,मार धाड़ ,दुष्टता से उपर आने ही नही दिया ।)
जरुरत हैं सुधार की,जो भी, जहाँ भी बच्चों का, युवकों का ब्रेनवाश करके उन्हें इस तरह बनाया जा रहा हैं उसे रोकने की। जरुरत हैं ,आने वाली पीढियों को प्यार का मंत्र सिखाने की ,हर मुसीबत से लड़ने की हिम्मत दी जाने की , हर व्यक्ति में इंसानियत जगाने की । जरुरत हैं बच्चों को पढ़ाई लिखाई के साथ जीवन का अर्थ बतलाने की ,बुराई से लड़ने की,बल्कि उसे जीतने की शिक्षा दी जाने की ,नही तो आतंकवादी रोज़ जन्मते रहेंगे ,कभी यहाँ कभी वहां बनते रहेंगे ।
Thursday, September 11, 2008
नारी :आख़िर संघर्ष किससे ?
पुरूष और नारी समाज के दो आवश्यक घटक हैं ,अगर कहे की नारी और पुरूष से मिलकर ही समाज का निर्माण हुआ हैं तो ग़लत न होगा । ऐसे में,जब कहा जाता हैं की नारी को पुरुषों से संघर्ष करना हैं या उनके विरुध्द खडें रह कर आगे बढ़ना हैं। ऐसे ही जब पुरुषों पर बात आती हैं तो वह स्त्री विरोधी अभियान के प्रमुख सेनानी बन जाते हैं . यह सब देखकर लगने लगता हैं की हम कहाँ जा रहे हैं ? मन सोचने पर मजबूर हो जाता हैं की क्या नारी ,पुरूष की प्रतियोगी हैं ? या पुरूष,नारी का प्रतियोगी हैं ?
नारी जहाँ पुरूष की माता हैं ,बहन हैं,सखी हैं ,पत्नी हैं , वही पुरूष भी स्त्री का भाई हैं ,सखा हैं ,पति हैं ,पिता हैं । नारी और पुरूष संसार रूपी नाटक के वह पात्र हैं जिनके बिना संसार नाट्य की प्रस्तुति असंभव हैं । अगर पुरुषों द्वारा नारी पर अत्याचार हुए हैं तो नारी भी नारी दुःख में कम सहभागी नही हैं ।
कुछ दिनों पहले कहीं सुना की नारी जब पुरुषों के विरुध्द खडी हो सकती हैं तो वह ईश्वर की सत्ता को चुनौती क्यों नही दे सकती ?संसार का हर धर्म और ईश्वर नारी की प्रगति के खिलाफ हैं । मन बहुत दुखी हो गया . सोचा, क्या नारी केवल विरोधी बनकर रह गई हैं ?आधुनिकता के मायने पुराने संस्कारो और विश्वास को छोड़ देना तो नही हैं । संस्कार इन्सान को इन्सान बनाते हैं ,वही धर्म शब्द की व्याख्या इस प्रकार की गई हैं "ध्रु धातु धारणायत धर्म इत्याहु :"एवं -धारयति स:धर्म:" अर्थात वह नियम जो संसार को सँभालते हैं ,जिनके आधार पर संसार टिका हुआ हैं वह धर्म हैं । इस प्रकार धर्म शब्द का अर्थ व्यापक हैं ,हमारे पवित्र धर्मग्रन्थ गीता में भी कही नारी की प्रगति को रोकने के फार्मूले नही दिए गए । नही कही किसी धर्म में नारी पर अत्याचार करने की बात कही गई हैं। हाँ मध्यकाल में कुछ बाते कुछ स्वार्थी लोगो द्वारा विशिष्ट उद्देश्यों से धर्म के साथ जोड़ दी गई ,नारी को सिर्फ़ उन बातो का विरोध करना हैं,साथ ही यह भी है की कुछ बाते जो वैज्ञानिक रूप से सही हैं उन्हें भी धर्म के माध्यम से नारी को बताया गया ताकि वो उनका पालन करे ,यह हमारे उपर हैं की हम किस बात को मानते हैं पर अधार्मिक हो जाने से नारी प्रगतिमान हो जायेगी यह बात मुझे नही रुचती । ईश्वर के मानने वालो के लिए वह प्रेम ,शान्ति और शक्ति का केन्द्र हैं और न जाने कितने देवी रूप हैं जो प्राचीन काल से हर नारी का आदर्श रहे है ।इसलिए ईश्वर और धर्म का विरोध करके नारी यह जंग जीत जायेगी ऐसा नही हैं ।
दरसल नारी का संघर्ष न पुरूष से हैं,न नारी से, नही ईश्वर और धर्म से। नारी का संघर्ष हैं तो सिर्फ़ उन बुराइयों से जो नारी को अपना श्रेष्ठत्व सिद्ध करने से रोकती हैं । उन रुढियों से हैं जो नारी को सदियों से छलती आई हैं । अपनी प्रगति के लिए नारी को आधुनिकता के नए अर्थ खोजने की या पुरुषों के विरुध्द खडे रहने की कोई आवश्यकता नही हैं । नारी स्वयं एक शक्ति हैं, प्रेरणा हैं,ज्योति हैं, जीवन हैं और जीत हैं । इसलिए अगर आवश्यकता हैं तो सिर्फ़ अपनी पुरी ताकत बटोरके अपने उचित उद्देश्य के पथ पर आगे बढ़ने की । आत्म शक्ति और दृढ़ इच्छा शक्ति के बल पर दुनिया की कठिनतम वस्तुए भी प्राप्त की जा सकती हैं । अपनी निर्णय क्षमता पर भरोसा हैं तो मुझ पर विश्वास कर सारे विरोध त्याग कर प्रेम से मन लगा कर ,अपनी मंजिल पाने की कोशिश करे ,दुनिया की कोई भी ताकत आपको नही रोक सकती । इसी प्रकार पुरूष भी नारी को उसके दुःख को दूर करने में सहायक बने ,उसके जीवन लक्ष्य को पाने में सहभागी बने । तभी एक सुखी,समृद्ध,स्वस्थ समाज का निर्माण हो सकता हैं ।
इति ।
