Saturday, September 13, 2008

कौन हैं आतंकवादी ?

कुछ महीनों से लगातार आ रही बम विस्फोट की खबरे सुनने के बाद भी ख़ुद को शांत बनाये रखा था ,न आंसुओ को ढलकने दिया ,न इस विषय पर लेखनी को चलने दिया ,पर आज जब सुना की फ़िर से एक बार दिल्ली में बम विस्फोट हो गए हैं,मेरी आँखों की श्रावणी नदी का बाँध टूट गया । बहुत रोई मैं,आंसुओ की जलधाराओं में नींद की कब हिम्मत बनी हैं आँखों में टिक पाने की ?

लेखन और लेखनी ईश्वर के वरदान ही हैं ,अंतर्मन में प्रश्नों के सवालों की जब सुनामी उठती हैं तब सिर्फ़ और सिर्फ़ लेखनी ही प्रिय सखी सी आपका दुःख कम करती हैं। तक़रीबन ८ बजे से सोच रही हूँ,यह क्या हो रहा हैं ?कहाँ जा रहा हैं इन्सान का जीवन ? आज विस्फोट ,कल दंगे,परसों खून ,चक्काजाम । यह सब क्या हैं ?और क्यों हैं ?पिछले कुछ सालों में इन सब गतिविधियों में आश्चर्यजनक रूप से वृद्धि हुई हैं । पिछले तीन चार महीनों से होने वाले इन विस्फोटो ने न जाने कितनो की जानें ली हैं ,न जाने कितनो के घर बर्बाद किए हैं। कुछ सालो पहले तक हम रोते थे कभी कही किसी के यहाँ किसी की मौत हो जाने पर ,ज्यादा रोते थे किसी अल्पवय के व्यक्ति की किसी दुर्घटना में मृत्यु हो जाने पर । पर आज तो हर कहीं मौत हैं। हर रोज़ मौत हैं । छोटा ,बड़ा, अच्छा ,बुरा हर कोई मर रहा हैं ,जैसे इन्सान नही दिए रूपी पृथ्वी के पास मंडराने वाले पतंगे हो ,जिनकी नियति कुछ पल में मर जाना ही होती हैं । और यह सब क्यों ? इन सब का जिम्मेदार कौन ?इन्सान। वही इन्सान जिसने धरती पर जीवन का रंगमंच सजाया ?जिसने आशा के पंखो पर आसमंती रंगों की रंगावली बनाकर जीवन की रंगोली को स्वप्निल रंगों से सजाया ?वह इन्सान जिसके ह्रदय गान के मधुर स्वरों ने समूचे ब्रह्माण्ड को प्रेम गीत से गुंजारित किया ?वह इन्सान यह सब कर रहा हैं ?आख़िर क्यो ?हम कहते हैं दंगाइयो ने ऐसा किया । आतंकवादियों ने ऐसा किया । पर यह कहते हुए भूल जाते हैं की वह दंगाई ,वह आतंकवादी भी इन्सान ही हैं ,तो यह सब इन्सान ही कर रहा हैं ,इन्सान ही इन्सान को मार रहा हैं । हम कभी धर्म के नाम पर लड़ते हैं ,कभी मजहब के नाम पर कभी बस यूँही लड़ने के लिए लड़ते हैं ,हम ही मारते हैं ,हम ही मरते हैं ,पर फ़िर भी लड़ते हैं । हमें मारने वाले भी इन्सान ही तो हैं ,जब ये पैदा हुए होंगे तो ऐसे तो न होंगे ,किस बात ने इन्हे इतना भावनाहीन बना दिया की ये मानव होकर भी दानव बन गए । पिछले कुछ वर्षो से जीवन शैली में आमूलचुल परिवर्तन आया हैं ,परिवर्तन आया हैं विचार शैली में ,जीवन जीने की रीती में ।चलती भीड़ में हर कोई एकाकी हैं ,रिश्तो में वह बात नही रही ,वह प्यार नही रहा ,वह जीने का अंदाज़ नही रहा .भटकाव और निराशा का चक्र्व्ह्यु हर किसीको आसानी से अपनी चपेट में ले रहा हैं .इसी दौर में कुछ भटके हुए ,थके हुए और मानिसक रूप से अस्वस्थ हुए मनुष्य बन गए हैं आतंकवादी ।ये हमें मार रहे हैं ,हम रो रहे हैं ,और ये खुश हो रहे हैं ,पर सच तो यह हैं की हम नही,ये ही मर रहे हैं ,जितनी बार बम विस्फोट होते हैं ,मरने वाले मरते हैं उनके लिए रोने वाले उनकी आत्मा को शान्ति पहुचाने के लिए जी भर के प्रयत्न करते हैं,वह शरीर खोते हैं पर साथ अपनों का प्यार ले जाते हैं ,अगर पुनर्जन्म के सिद्धांत को माने तो वह दूसरा जन्म भी लेते हैं । पर हर बार इन आतंकवादियों की आत्मा मरती हैं ,इनके जस्बात सूखते हैं ,इनकी भावनाए मुर्दा हो जाती हैं ,हमसे अधिक कष्ट इन्हे होता हैं ,कौन इन्सान भावनाहीन,संवेदनाहीन होकर जीवन को जी पाया हैं ?यह जीवन नही जी पाते ,प्रेम ,सुख आत्मानंद सब ,सब से ये कोसो कोसो दूर हैं । इनके दिमाग को शायद कभी वह शान्ति महसूस ही नही हुई हैं , ये जी नही रहे ,यह हर एक क्षण मर रहे हैं ।(कहने वाले कहते हैं की इनकी आत्मा नही होती ,भावनाए नही होती,पर कहीं इन्सान भी ऐसा होता हैं जिसकी भावनाए नही हो ,जिसको कभी किसी बात का दर्द नही होता हो ?अन्तर यह हैं की इन्होने अपने दर्द को अपनी आत्मा को अपनी भावनाओ को दबा दिया हैं ,उन्हें कभी खून ,हत्या ,मार धाड़ ,दुष्टता से उपर आने ही नही दिया ।)

जरुरत हैं सुधार की,जो भी, जहाँ भी बच्चों का, युवकों का ब्रेनवाश करके उन्हें इस तरह बनाया जा रहा हैं उसे रोकने की। जरुरत हैं ,आने वाली पीढियों को प्यार का मंत्र सिखाने की ,हर मुसीबत से लड़ने की हिम्मत दी जाने की , हर व्यक्ति में इंसानियत जगाने की । जरुरत हैं बच्चों को पढ़ाई लिखाई के साथ जीवन का अर्थ बतलाने की ,बुराई से लड़ने की,बल्कि उसे जीतने की शिक्षा दी जाने की ,नही तो आतंकवादी रोज़ जन्मते रहेंगे ,कभी यहाँ कभी वहां बनते रहेंगे ।

9 comments:

  1. सही कहा-सहमत हूँ. उम्दा लेखन!!

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  2. प्रेम एक सहज अनुभूति है और नफरत भी उसी का एक प्रतिउत्‍पाद. नफरत से द्वेष और हिंसा का जन्‍म होता है. यदि इंसान प्रेम के आवेग को प्रबल कर ले तो नफरत नहीं बचेगी.... और तब हिंसा की भी कोई पनाह न होगी. दहशतगर्दी एक सामाजिक विकार है और इस हिंसा का जवाब अंत में समाज को ही देना होगा. आपने एक संवेदनशील विष‍य पर अच्‍दे विचार रखे. धन्‍यवाद

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  3. मैं आपकी बात से सहमत हूँ. पर एक बात कहूँगा कि आज नफरत का व्यापार करने वालों की संख्या बहुत बढ़ गई है. कोई यह व्यापार सत्ता के लिए करता है, कोई धन के लिए. जब तक यह व्यापार बंद नहीं होगा कुछ नहीं बदलेगा इस समाज में, इस देश में.

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  4. जी, मैं आपकी बातों की बातों से बिल्कुल सहमत नहीं हूं.
    मेरा मानना है कि
    सच पूछो तो शर में ही बसती दीप्ति विनय की
    संधि वचन संपूज्य उसी का जिसमें शक्ति विजय की.
    सहनशीलता क्षमा दया को तभी पूजता जग है
    बल के दर्प चमकता जिसके पीछे जगमग है.

    आतंकवादी ईमेल भेज कर हमले कर रहे हैं. कहते हैं कि रोकना हो तो रोक लो, इतनी आतंकवादी घटनाएं हो रही है. क्या एक व्यक्ति को पकड़कर कभी सजा दी गई. ये लोग आपके कानून- आपकी व्यवस्था से बिल्कुल नहीं डर रहे हैं. आप उन्हें प्रेम सिखाएंगी. मगर आपसे ज्यादा नफरत सिखाने वाले लोग उनके चारो ओर हैं, जो दिन-रात उनके जीवन में जहर घोलते हैं.

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  5. सत्याजित प्रकाश जी आपके विचार भी कुछ हद तक सही हैं ,पर जरा सोचिये ये पकडे नही जाते,पकड़े गए तो भी छुट जाते हैं,और हमने इनमे से कुछ को मार गिराया तो भी हम एक को मारेंगे सतरा नए aatankvadi banenge . किस किसको और कब तक मारेंगे हम?आने वाली पीढीयां हर एक क्षण सिर्फ़ इनसे ही जूझने में बिता देंगी . इसलिए ही जरुरत हैं ,प्रेम और सहानुभूति और मानवीय गुणों के बीज नन्हे मुन्नों ke ह्रदय में डालने की,जीवन की सही दिशा और मायने बताने की, धर्म और आस्था के सही मतलब बतलाने की,यह सब मानसिक बिमारियों से ग्रस्त हैं,और शायद हम में से कोई नही चाहेगा की यह बीमारी हमारे देश के भविष्य को पुरी तरह अपना ग्रास बना ले, संहार का अपना महत्व हैं लेकिन हम उसके कारण मानवीय guno के सृजन के महत्व को नही नकार सकते . यह सब हो रहा हैं ,प्रेम और शान्ति की कमी के कारण,उन संस्कारो की कमी के कारण जो मानव को मानव बनाते हैं. जरुरत हैं बहुत बहुत विचार कर इस समस्या से निपटने की ,गंभीर प्रयत्न किए जाने की . धन्यवाद .

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  6. काश इंसान समझ पाए... प्रेम का भाव प्रबल हो जाए तो शायद दुनिया का अलग ही रूप हो...
    संवेदनशील लेख

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  7. उम्दा लेखन, धन्यवाद। लेकिन ईन विस्फोटो से नुकसान किसका हो रहा है। पहला नुक्सान हिन्दुओ का क्योकी वे मारे जा रहा है। मुसल्मान भाईयो की छवि को भी कम नुक्सान नही हो रहा है। लोग सोचते है की क्यो कुरान को ही पढ कर लाग आतंकी बन रहे है? एक समय आएगा जब कुरान को लोग आतंकवादीयो का ग्रंथ कहना शुरु कर देगें।

    लेकिन मै सोचने पर विवश हो जाता हुं की कही कोई तीसरा तो नही जो इन वारदातो के पीछे है। क्योकी तीसरा बेहद ताकतवर है। भारत के सत्ता के शीर्ष पर उसकी गहरी पकड है। सोचने मे हर्ज क्या है?

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