कहते हैं बेटी माँ की परछाई होती हैं ,वो मेरी परछाई नही ,एक दैवीय ज्योति हैं,जो जीवन को प्रकाशित करती हैं मेरा ही चेहरा,मेरी शक्ति,शांति,संगती ,गीति,आरोही ....
Tuesday, September 12, 2017
विरक्ति....
Monday, July 17, 2017
Thursday, April 27, 2017
श्वास .......
मुझे चाहने वाले मेरी अच्छाई किसमें हैं और किसमें नहीं तय करते हैं ,वो मुझे कहते हैं दौड़ लगा , जा भाग , खींच वो सम्मान किसी और के खाते में गिर रहा हैं ,उसे उठा ,खींच कर अपने खाते में ले आ ,वो कहते हैं अरे भाग तेज़ भाग ,रुक मत , समय खत्म हुआ जा रहा हैं ,तेरी उम्र बढ़ती जा रही हैं, मृत्य की देवी तेरे करीब आ रही हैं ,रुक मत ,ठहर मत तेज़ भाग ,तेरे अकाउंट्स में पैसा भर डाल ,इतना भर -इतना भर की तेरे बच्चो के बच्चो के बच्चो को भी न कमाना पड़े !
वो कहते हैं ,अरी तू क्या मूढ़मति सी शांत बैठी हैं ,इधर फ़ोन घुमा ,उधर चिट्ठी डाल ,चाहे तेरी कला का दम क्यों न घुट जाए तू बस परफॉर्म करती जा ,चाहे तू कुछ भी बजा ,कैसे भी बजा , सुर -बेसुर कुछ भी लगा ,पर दौड़ साल के दस -बारह रिकॉर्डिंग तो निकाल ,चाहे राग की हत्या हो ,चाहे स्वरों का कत्ल फर्क नहीं पड़ता बस तू भाग इस स्टेज से उस स्टेज चढ़ जा ,कार्यक्रम चाहे कितना भी घटिया क्यों न हो अपना प्रोफाइल बढ़ा। वो कहते हैं और मैं कुछ कदम भागती हूँ ,फिर जोर से चीत्कार करती हूँ ,मुझे नहीं भागना ,सम्मान -असम्मान मुझे कुछ भी नहीं चाहिए ,मुझे मेरे सुर चाहिये मुझे उनका और तेरा साथ चाहिए स्वयंकृति प्रकृति।
वो कहते हैं। तू मुर्ख हैं ? बता अकॉउंट में पैसा कितना हैं ,तेरे घर के बहार तेरी कितनी गाड़ियां हैं ,तेरी सोशल प्रोफाइल्स में तेरे फॉलोवर की संख्या कितनी हैं ? तेरे पास कितने की प्रॉपर्टी हैं ? तेरे बाल - बच्चो का भविष्य क्या हैं ? तू बावली हैं ,तेरी उपयोगिता तेरी कमाई से हैं ,तेरी पास की हुई डिग्री से ,तुझे मिले हुए सरकारी -असरकारी प्रशस्ति पत्रों से , तूने सोशल मिडिया पर दिखाए तेरे कार्यक्रम की फोटो से हैं ,तूने बच्चो को दिलवाएं खिलौनों से हैं ,उनके लिए बनाये असेस्ट्स से हैं ,तूने रिश्तेदारों को दिलवाये गिफ्टों से हैं ,इससे कोई फर्क नहीं पड़ता की तू क्या चाहती हैं ! कोई फर्क नहीं पड़ता की तू क्या बजाती - गाती हैं ,तू कैसे सिखाती हैं ,तू कैसे संस्कार देती हैं ,तू क्या सोचती हैं एक मनुष्य के रूप में समाज और संसार को क्या और कितना देती हैं !!!
Sunday, March 12, 2017
मन
सरपट भागे जा रहे हैं ये घोड़े और सरपट भाग रहा हैं मेरा मन।
मन का भागना कुछ ऐसा ही होता हैं ,दायां -बायां ,आजु -बाजु कुछ दीखता ही नहीं।
आसपास जैसे सब कुछ धुंधला हैं ,बादल ही बादल ,पर मन बाँवरे को इस धुंधलेपन से मतलब ही क्या ,वो तो बस आगे देख रहा हैं ,सीधा -सामने ,न बाएं ,न दाएं।
आँखों के सामने कुछ अनोखी सी दुनियां हैं ,एक अनोखा प्रभात ,उगते सूर्य ने फैलाई रंग,बिरंगी रश्मियां। लगता हैं ये पूरी सृष्टि रंग खेल रही हैं ,नीले , पिले , हरे ,लाल ,गुलाबी स्वयं में मग्न मतवारे रंग और मैं इन रंगों के बीचोबीच ... मैं ,रंगों से सराबोर।
सुना हैं आज होली हैं ,धरती पर लोग एक दूजे पर रंग फेंक रहे हैं ,अबीर -गुलाल की पिचकारियां भर -भर एक दूसरे पर रंग छिटक रहे हैं ,वहां वो रंग और यहाँ ये रंग।
मन जैसे धरती से करोडो योजन की दुरी पर पहुँच गया हैं ,कौनसा जग हैं ये ? जहाँ पैरो के निचे धरा ही नहीं ,पर फिर भी में सीधी खड़ी हूँ ,अपने पैरों पर। दूर -दूर तक सिर्फ रंग ही रंग हैं। सप्तरंगों के बादल ,सप्तरंगों के गिरिवर ,पुष्प और पक्षी भी तो यहाँ सप्तरंगी हैं। यहाँ का जल न जाने किस पर्वत श्रृंखला से होकर धरणी पर गिरता हैं ,जल की बूंदो में रंगों के कोटि-कोटि रंगढंग और इन रंगों में पूरी तरह डूब मेरा अंतरंग।
देख पा रही हूँ रंगों के इस अनूठे विश्व में लाल रंग कुछ ज्यादा ही हैं। प्रेम का रंग , लाल रंग। यही रंग कभी बरसाने में बिखरा था ,तब राधा ने अपने हाथो से इसे समेटा था , तब न तो बिरज की होरी थी ,न ब्रिज का वो राजकुमार। तब अकेली राधिका थी ,आसमंत ने धरती पर जो गिराया और पलाश के वृक्ष ने जिसे अपने पुष्पो में समेट लिया ,राधिका ने उसी लाल रंग से , रात के अंधियारे में अपने हिय में बरसो से बैठी प्रेम की मूर्ति को आकार दिया और गोकुल के उस ग्वाले को रच दिया , जिसे संसार ने परमपुरुष श्रीकृष्ण के रूप में जाना।
राधा, कृष्ण से उम्र में बड़ी थी और शायद वही कृष्ण की जननी थी। देवकी ने तो बस जन्म दिया ,यशोदा ने माटी के उस गोले को संभाल भर लिया। पर राधा थी कृष्ण की जननी ,उसीने उस मूरत को जीवन के रंगों का ज्ञान दिया , उस लाल माटी के गोले को प्रेम का ज्ञान दिया और जब वो लाल सूर्य का गोला प्रेम और जीवन ज्ञान के रंगों से परिपूर्ण हुआ ,उसका रंग सम्पूर्ण गगन में बिखर गया ,प्रेम का लाल रंग अब परम ज्ञान का नीलवर्ण बन चूका था ,और वो लाल माटी मूरत ,योगेश्वर ,परमेश्वर श्री कृष्ण। राधा ने कृष्ण को जन्म दिया ,उनको नीलवर्ण दिया ,और मेरे मन को कृष्ण नाम की सुध।
मेरे मन में जैसे कई रंगों के फव्वारे फुट रहे हैं ,हर रंग के साथ एक अनूठा आनंद ,ये आनंद क्या हैं ? ये नंदनंदन क्या हैं ? मेरी आँखों में जैसे दिव्य शुभ्र रंग के सितारे चमक रहे हैं। मेरी आँखे और मेरा मन इस शरीर को छोड़ कर जा चूका हैं। रंगों के इस संसार में अनंत पर मैं रंग-रंगीले चित्र बना रही हूँ , इन चित्रो में कई सारे स्वपन हैं ,नित्य -नूतन -निराले स्वप्न। मेरे पग थिरक रहे हैं ,संग मेरे थिरक रही हैं सम्पूर्ण सृष्टि। कहींसे सुर सुनाई आ रहे हैं ,फागुन गीत के ,बसंत राग के ,कही से सुनाई दे रही हैं पखावज की गंभीर थाप। स्वर-लय -गीत और रंगों में मगन मेरा आत्मरंग। सच कहते हैं लोग ,मैं इस दुनियाँ की हूँ ही नहीं , शरीर मात्र यहाँ हैं ,मन तो उस रंगीन सृष्टि का गोकुल ,वृन्दावन हैं। मैं बरसाने की राधा हूँ और वही कही आनंद रंग श्रीकृष्ण।
कृष्णार्पणमस्तु।।
होली की अनंत शुभकामनायें
© डॉ.राधिका वीणा साधिका
Tuesday, January 17, 2017
एक छोटी सी कहानी
एक छोटी सी कहानी
उसने आँखे खोली और वो नदारत।
शायद था ही नही कभी वहां।
पर वो जानती थी वो वहां हैं। वो जिससे वह अभी-अभी बातें कर रही थी।
बातें क्या अपना मन परत दर परत खोल रही थी,कह रही थी " ऐसे नही जीना उसे,बाहरी तौर पर।"
"उसके लिए जीवन, यथार्थ ,भौतिक, दृश्य जगत नही,उसके लिए जीवन आत्मानंद हैं,उसके ह्रदय में प्रज्वलित जो अग्नि हैं उसका नाम जीवन हैं।"
कह रही थी " न जाने कबसे कहना था तुम्हें की तुम और कोई नही मेरा विश्वास हो।"
"विश्वास जिसका कोई नाम नही,धर्म नही,उम्र नही,जिसका कोई भौतिक रूप भी नही।
यही विश्वास उसने कभी मंदिर की मूर्ति में पाया था,आज जीवंत रूप में पाया हैं।"
कह रही थी," तुमसे कोई लोभ नही, तुमसे मोह हैं पर तुम मोह भी नही,तुम मुक्ति हो मेरे लिए ।"
इंसान जब पहली बार आँखे खोलता हैं तो महसूस होता हैं,जीवन कितना विकट हैं ।
आसपास भटकती, अपेक्षाओं के कवच से पूरी तरह लदी,जीवित शरीर ढोती मृतआत्माएं , मस्तिष्क की नसों ने एक क्षण में भेजे करोडों-अरबो संदेशो के जाल में उलझी, उस जाल को जीवन समझती, जर्जर मन से झीनी , सदैव अतृप्त आत्माएं ।
समाज की रीति,नीति,नियमो को स्वसंचालित पद्धति से कार्यान्वित करते अंदर ही अंदर खोखले देह। उन शरीरो के अंदर पैदा होती, मरती असंख्य मृर्गमारिचकाए। इन सब में मृतप्राय:आत्मन की गगनभेदी रुदन चीत्कारों में आनंदित होने का दिखावा करता जीवन।
सच जीवन कितना विकट हैं।
और इस विकटता को नष्ट करने का एक ही उपाय....विश्वास।
उसे उससे कुछ नही चाहिये था,कुछ पाने की अभिलाषा भी नही जागी शायद, जागती तो यह रिश्ता भी उसी भयंकर भौतिक- भ्रम , जग-जाल में फंस जाता और नष्ट हो जाता।
उसके लिए इतना ही काफी था की वो हैं।
वह उसकी माँ नही थी,बेटी नहीं थी, बहन, दोस्त नही थी, शायद कुछ भी नही थी, और यह "कुछ भी नही" ही शायद सब कुछ था।
ईश्वर के मंदिर में याचनाओं की फेरहिस्त ले जाने वाले उस परमेश्वर को कहाँ पाते हैं !!
जो सच्चे दिल से जाते हैं, उसको मूरत को देखकर ,उससे मिलकर ही सब कुछ पा जाते हैं, ईश्वर के समक्ष उनका खड़े हो पाना ही सब पा जाना होता हैं।
इस रिश्ते का भी कुछ ऐसा ही था,उसका होना ही काफी था, " वह हैं , बस यही काफी हैं , बस यहीं सब कुछ था।"
उस रिश्ते का कोई नाम नही था,उस रिश्ते में कोई स्वार्थ नही था,कोई आशा,अभिलाषा,इच्छा कुछ भी नही।"
'जग के किसी कोने में वह रहता हैं, वह हैं, और मुझे याद कर लेता हैं ,इतना ही और बस इतना ही सब कुछ था।"
उसने फिर आँखे बंद की,कहने लगी "शायद युगों में पाया वह एकमात्र रिश्ता हो तुम ,जो हर बंधन - अभिलाषा , इच्छा से परे हो।माँ,बहन,सखी कुछ नही हूँ तुम्हारी, कुछ होने की इच्छा से परे मेरे लिए तुम्हारा होना हैं, तुम्हारे होने का विश्वास ही जीवन हैं।और यही बस हैं।"
अब भय नही था कि आँखे खोलते ही वह खो जायेगा,शायद सारे भय समाप्त हो गए थे।
उसने आँखे खोली ,देखा वह बैठा मैस्कुरा रहा था,सशरीर नही सआत्मन,वह अब उसके साथ था,ह्रदय में जीवन का विश्वास बन।
इस रिश्ते का कोई नाम नही था,रूप नही था। बस विश्वास था,संसार की भयंकरता में अच्छाई और सच्चाई होने का,किसी के होने का विश्वास।।
©डॉ. राधिका वीणा साधिका

