Thursday, October 23, 2008

दिवाली: खुशी की कीमत ...............

शाम के ७ बजे का समय ॥ बाज़ार में खासी भीड़ ,सोने के दाम शिखर को छू रहे हैं ,देश की अर्थवयवस्था की कमर टूट रही हैं ,फ़िर भी सोने चांदी की दुकानों पर ग्राहकों की भीड़ ,हो भी कैसे न ?दो दिन बाद दीपावली हैं ,कल धनतेरस हैं । अक्टुम्बर महिना शुरू होते ही श्यामला ने समीर से कह दिया था इस बार पुरे 3 तोले का हार खरीदूंगी पूजा के लिए । समीर ने भी तभी से पैसे जोड़ना शुरू कर दिए थे ,पर इस महंगाई में ३ तोले का हार ?????
पति के साथ श्यामला भी बाज़ार में ....ग्राहकों की आवाजाही से दुकान पर मेले जैसा माहौल । दुकानदार बीच बीच में अपने नौकरों को आदेश दे रहा हैं,.राकेश .............मेडम को जर्दोसी वाला हार दिखा ,मुकेश साहब को हीरे की अंगूठी दिखा .... मदन तू वहां क्या कर रहा हैं ,दादी जी को चुडिया बता ।..............

तो कहिये समीर भाई हार पसंद आया ,असली सोने का हैं पुरे बाईस केरेट का ,और कैसा बारीक़ काम हैं ।
समीर धीमे स्वर में .."हाँ वो तो सही हैं ..पर दाम?
ज्यादा नही भाई साहब आपके लिए ,आप तो हमेशा ही आते हैं ,बस पचास हज़ार "।
पचास हज़ार .......... नही कोई और दिखा दीजिये अभी इतना बजट नही हैं ,"
"अरे समीर भाई कैसी बात कर रहे हैं ,अब चीज़ भी तो देखिये आप... और तो फ़िर इससे कम में कहाँ आएगा ........."
ठीक हैं कोई बात नही .......
श्यामला चुप ,पति पत्नी घर जाकर चुपचाप ....
समीर: श्यामला अगली दिवाली पर तुम्हे पक्का हीरे का हार दिलवाऊंगा ॥
श्यामला : रहने दो हर दिवाली यही कहते हो,सोने का तो दिलवा न सके ...आखों से आसूं की धारा ॥
अगली सुबह श्यामला सब्जी मार्केट में ....
भाई भिन्डी क्या भाव हैं ?
जी बेन ७० रूपये किलो ?
क्या !!!!!!!अच्छा गोभी ?
जी ९० रूपये किलो .
कद्दू ?
४० रूपये ...
दोपहर में श्यामला यह सोचकर की सोने का नही नकली ही सही फ़िर बाज़ार में .....
भाई यह मनके वाला हार कितने का ???
जी २ हज़ार का .....
२ हज़ार नकली हार के लिए ??
नही .....
दुखी श्यामला ....
समीर की सांत्वना .................: कोई बात नही ५००-६०० की कोई साडी ही खरीद लो ...
श्यामला : जो साडी मुझे पसंद हैं वो ६-७ हज़ार से कम की नही ,समीर तुमने भी नए कपड़े नही सिलवाए ...
न ! मुझे जो पसंद आया था सूट, वह ८ हज़ार का था ।
अगले दिन दिवाली के दीपक खरीदने दोनों बाज़ार में
भाई ये दीपक कितने का ??
जी साहब १२ रूपये का एक ।
१२ का एक और यह
५० के दो ...
घर आकर श्यामला का जी भर का रोना , दिवाली हैं चार कपड़े नही खरीद सकते ,सब्जी भाजी, दिए तक महंगे ................

बड़ी दीपावली का दिन श्यामला दुखी मन से सामने वाले बंगले की महिलाओ के ठाट बाट देखकर कुडती हुई ...
तभी समीर की आवाज "सुनंदा भाभी ने तुम्हे बुलवाया हैं "।
श्यामला भारी मन से धीमे -धीमे कदम बढाती हुई...रास्ते के दूसरी तरफ़ बनी एक छोटी सी झोपडी के बाहर एक महिला, एकदम पुरानी साडी पहने हुए ,न हाथो में सोने के कंगन ,न कानो में बाले ,फ़िर भी दियो की ज्योति को अपने मधुर हास्य से प्रकाश से भरते हुए , हंसती गाती खिलखिलाती औरो से बतियाती ..बहुत खुश ...
श्यामला ... पास जाकर.. तुम इतनी खुश क्यो हो?तुमने इस दिवाली क्या पा लिया ?तुमने क्या कीमत देकर इतनी खुशी खरीद ली ?
महिला :- खुशी की कोई कीमत नही होती ,खुशी हमारे मन में बसती हैं . दिवाली पाने का नही देने का नाम हैं ,अपनी आत्मा में संचित प्रकाश से जन जीवन आलोकित करने का नाम हैं दीपावली ।
श्यामला: तुम्हे अच्छी साडी पहनने की इच्छा नही होती ?तुम्हे नही लगता इस दिवाली तुम्हारे घर में अच्छे -अच्छे पकवान बने,घर कीमती वस्तुओ से सजे ,तुम्हारे पास बहुत सा सोना धन हो ?
महिला: क्यों नही लगता ,लगता हैं न !पर मेरे पास उससे भी बड़ा धन हैं ,सबसे बडा खजाना।
श्यामला: वह क्या?
महिला: संतोष ,आत्मिक शांति और मेरे घरवालो का प्रेम ।
इच्छाऐ अनंत हैं और वस्तुए नश्वर । हम जितना अधिक पाते हैं हर बार और अधिक पाना चाहते हैं ,मुझे भी अच्छे कपड़े, गहने पहनने की इच्छा होती हैं ,लेकिन मैं इन इच्छाओ को पुरा नही कर पाने के कारण बहुत दुखी नही होती । गहने इस शरीर की शोभा बढ़ते हैं ,मेरी आत्मा सुंदर हैं , मेरे पास मेरा परिवार हैं ,दो समय का भोजन हैं ,रहने को छप्पर हैं ,काम करने के लिए हाथ पाँव हैं ,क्या ये सब काफी नही हैं ,वो देखो वो सामने वाला बच्चा ..इसका कोई नही दो दिन से इसने भोजन नही किया ,वह देखो वह बूढी ताई .पति के मरने के बाद सारे गहने बेच कर भी घर नही बचा पाई ,वह देखो वह वृद्ध भिखारी ,दोनों हाथो पैरो से लाचार ...और किस किसको का दुःख दिखाऊ ?मैं सुखी हूँ और बहुत खुश ,मेरे पास सच्चा धन हैं ,सुकून हैं ,प्रेम हैं ।
श्यामला ....बहुत खुशी के साथ अपने घर की ओर कदम बढाती हुई . आकाश को मुट्ठी में पाकर मिलने वाली खुशी से ज्यादा खुश .आज वह बहुत खुश हैं हर दिवाली से ज्यादा खुश ।
मंच पर पटाक्षेप

8 comments:

  1. खुशी की कोई कीमत नही होती ,खुशी हमारे मन में बसती हैं . दिवाली पाने का नही देने का नाम हैं ,अपनी आत्मा में संचित प्रकाश से जन जीवन आलोकित करने का नाम हैं दीपावली ।

    वाह राधिकाजी,आपने मन मोह लिया.
    एकदम सत्य कहा.....

    संतोष से बड़ा और कोई धन नही होता और दूसरे को सुखी करने से बड़ा और कोई संतोष सुख नही होता.

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  2. खुशी की कोई कीमत नही होती ,खुशी हमारे मन में बसती हैं . दिवाली पाने का नही देने का नाम हैं ,अपनी आत्मा में संचित प्रकाश से जन जीवन आलोकित करने का नाम हैं दीपावली ।
    श्यामला: तुम्हे अच्छी साडी पहनने की इच्छा नही होती ?तुम्हे नही लगता इस दिवाली तुम्हारे घर में बड़े बड़े पकवान बने,घर कीमती वस्तुओ से सजे ,तुम्हारे पास बहुत सा सोना धन हो ?


    bahut hi shaandaar kahani, bahut hi sahi shiksha di hai is kahani ke zariye. likhti rahiye. diwali ki hubhkamnayen.

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  3. खुशी की सचमुच कोई कीमत नहीं होती....

    या फिर शायद कुछ भी हो सकती है. पाँच मिनट का समय, जो इस पोस्ट को पढने में लगाया, अगर उसे कीमत मान लिया जाय, तो कहूँगा कि पाँच मिनट खर्च करके खुशी हासिल की जा सकती है.

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  4. bahut sunder likha appne
    regards

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  5. संतोषी सदा सुखी।
    अच्‍छी कहानी, लि‍खती रहें हमेशा।

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  6. संतोषी सदा सुखी।
    अच्‍छी कहानी, लि‍खती रहें हमेशा।

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  7. वाह क्या बात है, बहुत ही सुंदर लिखा है आप ने,काश हम सब ऎसा ही सोचते.... लेकिन हम सब तो दोड रहै है आगे निकलने के लिये... ओर यही दोड हमे सब से पीछे कर रही है हमारे अपनो से.
    धन्यवाद एक अति सुंदर लेख के लिये

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  8. दीवाली .....ये क्या करें ??
    .................दीवाली की रात बीत चली है ....दिल का उचाटपन बढ़ता ही चला जा रहा है .....सबको दीवाली की शुभकामनाएं देना चाहता हूँ....मगर वे जिनकी सामर्थ्य नहीं दीवाली मनाने की.....जो आज भी भूखे पेट बैठे ताक़ रहे हैं टुकुर-टुकुर महलों की तरफ़....वे जो बाढ़ के बाद जगह-जगह कैम्पों में अपने सूनेपन को मिटाने की कोशिश कर रहे हैं......वे जिनके रिश्तेदार देश की सीमा की रक्षा करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गए हैं .....बच्चों के छोड गए पटाखों को चुन रहे सड़कों पर कुछ काले-कलूटे बच्चे......क़र्ज़ ना चुका पाने की वजह से आत्महत्या कर चुके किसानों के बचे हुए परिवार ......दाने-दाने को मोहताज़ करोड़ों लोग.....जो ना जाने किस क्षण काल-कलवित हो जाने वाले हैं .......ठण्ड में खुले आसमान के नीचे सोने वाले छत-विहीन लोग .....ठण्ड से बिलबिलाते ...कंपकंपाते
    आसमान में फटते जोरदार पटाखों की ओर बड़ी ही हसरत से ताकते गरीब-गुर्गे ...........!!.....दीपावली .....देश का सबसे प्रमुख पर्व ........बहुसंख्यक समाज का प्रमुख पर्व .......दीवाली....लफ्ज़ के मायने संम्पन्नता का.... वैभव का प्रदर्शन ....दीवाली....मतलब अरबों-अरबों रूपये का धुंआ बनकर आसमान में क्षण भर में उड़ जाना ..... दीवाली... मतलब ...गरीबों की आंखों का फटा-का-फटा रह जाना .... उनकी हसरतों का जग जाना ...... सोचता हूँ हमें इस कदर मुकम्मल तरीके से दीवाली मनाता देख यदि इनका मन भी एक दिन मचल ही जाए तो ये क्या करेंगे .... मैं तो जो जवाब सोच रहा हूँ,सो सोच रहा हूँ.....आप ही बताये ना कि ये क्या करेंगे ?? मैं जवाब के इंतज़ार में हूँ !!!!

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