पिछले दिनों पंचगनी और महाबलेश्वर जाना हुआ,हमारे शहर से तक़रीबन १७-१८ घंटे का सफर तय करके हम वहां पहुँचे । एक तो पंचगनी में ट्रेन जाती नही और मुझे बस भाती नही ,बस देखकर ही मुझे गुस्सा आने लगता हैं ,पर फ़िर भी एसी बस में भगवान का नाम लेते हुए ,आरोही को पतिदेव को सँभालने देकर, आखें मूंद कर; सोते सोते किसी तरह सफर पुरा किया । इतने लंबे सफर के बाद लग रहा था की कहाँ से यहाँ आ गये इतनी दूर .लेकिन बस से उतरते ही जब मैंने पंचगनी का प्राकृतिक सौंदर्य देखा तो सारी थकान उतर गयी ,तीन दिन कब खत्म हो गए पता ही नही चला , दूर दूर तक फैले पहाड़ ,उन पहाडो पर बिछी वृक्षो - पौधों की हरी चादर ,कहीं कहीं पीले रंग के फूलो से ढकी पर्वत श्रृंखलाऐ ,सुंदर वादियाँ,सुनहली धुप ,कभी हल्की छाव,ठंडी हवा ,कभी पंछियों का कलरव , कल कल ,छल छल बहते झरने ,यह सब स्वपन सा सुंदर ।
हमें नही पता था की हमारी कल्पना से अधिक नैसर्गिक सौंदर्य हमें महाबलेश्वर में देखने को मिलेगा,महाबलेश्वर पर मानो शिव और शिवा की विशेष कृपा हैं ,वहाँ की नैसर्गिक सुन्दरता का वर्णन करने के लिए मेरे पास शब्द नही हैं , मुझे नही लगता की कोई कविता,कोई आलेख ,कोई चित्र उस प्राकृतिक सुंदरता का सही- सही और पुरा वर्णन कर पायेगा/पायेगी , प्रकृति के उस सुंदर रूप को मैंने अपनी आखों में बसा लिया हैं।
कहते हैं माँ सिर्फ़ वही नही होती जो जन्म देती हैं ,माँ वह होती हैं जो पालती हैं ,पोसती हैं ,संरक्षण करती हैं ,इस अर्थ से प्रकृति भी हमारी माँ ही हुई न ! वहाँ जाकर मुझे भी कुछ ऐसा ही लगा जैसे मैं अपनी माँ की गोद में सर रखकर बैठी हूँ , माँ मेरे मन को अपने प्रेम से परिपूर्ण कर रही थी ,अपनी उपस्तिथि से मुझे आत्मिक शांति और आनंद प्रदान कर रही थी ।
हम में से शायद ही कोई होगा जिसे प्राकृतिक सौंदर्य से घृणा हो ,जिसे अपने आस- पास पेड़ पौधे देखना पसंद न हो ,जिसे पेडों की छाया में खड़े रहना ,नरम घास /दूब पर चलना पसंद न हो ,जिसे फूलो की सुगंध से नफ़रत हो ।
हम सभी उन स्थानों पर घुमने जाना पसंद करते हैं ,जहाँ पेड़ पौधों से हरियाली हो,इसलिए हम अपने आस पास उद्यान (गार्डन )बनाते हैं ,सुबह शाम वहाँ घुमने जाते हैं ।
प्रकृति हमारी माँ हैं उसने हमें धुप ,गर्मी ,मौसम की मार से हमेशा संरक्षण प्रदान किया हैं ,शुद्ध हवा दी हैं ,फलफूल ,भोजन दिया हैं । फ़िर भी हमने उसके साथ क्या किया ?अपने घर बनाने के लिए ,शॉपिंग मॉल बनाने के लिए ,फेक्ट्री बनाने के लिए उसे ही खत्म किया हैं .हर बार एक घर के लिए ४ -८ वृक्ष कटते हैं ,शहरो में हरी धरती देखना किस्से कहानियो की बात हो गयी हैं , साफ हवा की तो क्या कहिये ,रात के दस -१२ बजे भी वाहनों का धुआं वातावरण में इस कदर घुला मिला रहता हैं , उस समय भी वाहनों के धुएँ वाली हवा के कारण घुटन होती रहती हैं । कभी कभी सोचती हूँ आरोही जब बड़ी होगी तो उस समय ये बची खुची प्राकृतिक सुंदरता क्या उसे या उसके बच्चो को देखना नसीब होगी ?
जब भी कभी मेरे सामने एक पेड़ कटता हैं ,मेरे मन जोर जोर से रोता हैं ,उस पेड़ काटने वालो से पूछता हैं ,निर्दय मनुष्य इस सुंदर ,निर्दोष वृक्ष ने तुम्हारा क्या बिघाडा हैं ?यह तो मात्र थोड़ा सा पानी मांगता हैं ,निस्वार्थ भाव से ,सभीको ,छाया देता हैं .कभी सुंदर फूलो से तुम्हारे घर के सामने की राह को ढक कर तुम्हारे घर को सजाता हैं ,कभी स्वादिष्ट फलो से बच्चो के हृदयों को आनंद से भर देता हैं । पर हज़ार चाहने के बाद, कोशिशों के बाद भी पेड़ कटता हैं ?हरी भरी वसुंधरा ,पत्थरों की मीनार में ,हवेली में ,बंगले में ,फेक्ट्री से निकलने वाले रसायनों से जलकर ख़त्म होकर ,मरुभूमि में बदल जाती हैं । और मैं प्रकृति माता से माफ़ी मांगती हुई उसे पुकारती रहती हूँ ,पूछती रहती हूँ माँ तुम कहाँ खो गयी ?
कहते हैं बेटी माँ की परछाई होती हैं ,वो मेरी परछाई नही ,एक दैवीय ज्योति हैं,जो जीवन को प्रकाशित करती हैं मेरा ही चेहरा,मेरी शक्ति,शांति,संगती ,गीति,आरोही ....
Thursday, October 16, 2008
Tuesday, October 14, 2008
नारी संरक्षण ,विकास . कैसे ?
जबसे ब्लॉग जगत में आई हूँ ,नारी के विकास के विषय में बहुत सारी चर्चा होते हुए देखी हैं ,पढ़कर बहुत अच्छा लगता हैं की,आज की नारियां नारी विकास के विषय में बहुत सगज और गंभीर साथ ही दॄढ प्रतिघ्य हैं ,यह जानकर और भी अच्छा लगता हैं की सिर्फ़ महिलाये ही नही कुछ पुरूष भी नारी विकास के विषय में सकारात्मक और अच्छा लिख रहे हैं ,हर कोई चाह रहा हैं नारी का विकास हो, उन्नति हो । हर कोई अपने नजरिये से इस प्रश्न का हल खोज रहा हैं की आज के युग में जहाँ नारी ,घर की जिम्मेदारी सँभालने के साथ , अध्ययन ,अध्यापन , अर्थ उपार्जन ,सब क्षेत्रो में काफी आगे बढ़ गई हैं , उसने जहाँ अपनी कार्यकुशलता को सिद्ध किया हैं ,उसे पुरा संरक्षण कैसे मिले और उसका विकास अधिकाधिक कैसे हो ?
मैंने भी अपने आसपास बहुत सी लड़कियों को कभी मनचाहा शिक्षण पाने के लिए ,अपने केरियर के लिए ,अपनी सुरक्षा के लिए ,अपने विवाह से संबंधित विषय पर परेशान होते ,लड़ते - झगड़ते देखा हैं । कई बार इस मुद्दे पर बहुत विचार किया हैं की ये सब क्या हो रहा हैं ?क्यों हो रहा हैं ?कब तक होता रहेगा?सिर्फ़ शारीरिक दृष्टि से दुर्बल होने का परिणाम नारी कब तक भोगती रहेगी ?
हर बार यही उत्तर मिला हैं की यह समस्या सिर्फ़ नारी की नही पुरे समाज की हैं ,क्योकि नारी और पुरूष ही समाज के घटक हैं ,इसलिए अगर समाज के किसी तत्त्व को कोई समस्या हैं तो वह सम्पूर्ण समाज की समस्या हैं ,और सम्पूर्ण समाज की मनोवृति ,या कहे सोच को बदल कर ,सामाजिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करकर ही इस समस्या का निराकरण सम्भव हैं । बात जब स्त्रियों के साथ हो रही छेड़खानी की आती हैं तो मैं बार बार कहती हूँ की इसके लिए स्त्री को ही सबसे पहले खुदको सबल और हिम्मती बनाना होगा ,जब जब स्त्रियाँ अपने साथ हुई इस छेड़खानी का सही -सही उत्तर इन ग़लत लोगो को देंगी तब तब उन्हें देखकर अन्य स्त्रियों की हिम्मत बढेगी और ऐसे मनचलों की हिम्मत घटेगी .हर लड़की को मेरे विचार से जुडो- कराटे जैसी विधाये स्वरक्षा के लिए सीखनी ही चाहिए ।साथ ही उसके संरक्ष्ण के लिए बने कानूनों का पूर्ण उपयोग करना चाहिए , अगर कोई किसी महिला से गलत व्ह्य्वार करता हैं तो इसके लिए स्त्री को ख़ुद ग्लानी महसूस करनी नही चाहिए यह उसकी नही बल्कि उस व्यक्ति की गलती हैं जिसने उसके साथ ऐसा किया हैं ,चरित्र नारी का नही उस व्यक्ति का खराब हुआ हैं ,बाकायदा हिम्मत करके उसके खिलाफ कार्यवाही करनी चाहिए ।
बात जब पुरुषों की मनोवृत्ति बदलने की आती हैं तो मैं पुनः कहूँगी सारे पुरूष गलत नही होते ,समाज में अगर बुरे लोग हैं तो अच्छे भी लोग हैं नारी का सम्मान करने वाले ,उसे माँ का दर्जा देने वाले भी कई पुरूष हैं , जो गलत हैं ,जिनकी विकृत मनोवृत्ति हैं ,उनको अगर कहें की भाई अपनी सोच बदलो तो वह नही बदलने वाले ,कुछ को दैवीय कृपा के चलते अच्छे बुरे की समझ आ जाए तो यह चमत्कार ही होगा।
नारी जननी हैं ,माँ हैं ,वह एक व्यक्ति को जन्म मात्र ही नही देती बल्कि एक व्यक्तित्व निर्माण करती हैं ,इसलिए सबसे पहले स्वयं के विकास के लिए नारी को ख़ुद की क्षमताओ और अपने गुणों को अपने दैवीय रूप को समझाना जरुरी हैं ,जब स्त्री ही स्त्री के दुःख का कारण बनती हैं तो दुःख सबसे ज्यादा होता हैं , क्यो एक माँ अपने पति का या अपने बेटे का विरोध तब ज्यादा नही कर पाती जब वह उसकी लाडली ,पढ़ी लिखी बेटी की शादी किसी वयोवृद्ध या अनपढ़ व्यक्ति के साथ सिर्फ़ इसलिए कर देता हैं की उम्र २८ की हो गई अभी तक कुँवारी बैठी हैं ? क्यो एक सास अपनी बहूँ का साथ सिर्फ़ इसलिए नही दे पाती की बेटे का साथ न देने पर समाज आलोचना करेगा ?क्यों दहेज़ की बात आने पर माँ ,सास न चाहते हुए भी अपने घर के बडो का विरोध नही कर पाती ?क्यों एक स्त्री होते हुए भी एक स्त्री के जन्म पर वही सबसे ज्यादा दुखी हो जाती हैं ?क्यों किसी लड़की के साथ गलत हो जाने पर ,कई नारियां भी उसे ही दोष देती हैं ,या उसे बिचारी कहती हैं ?क्योकि वर्षो से उसको सिर्फ़ यही सिखाया गया हैं की उसे पुरूष की अनुसरणी बनकर चलना हैं ,उसे उसकी माँ ने, माँ की माँ ने ,पिता ने ,दादा ने,नानी ने नाना ने ,यही सिखाया हैं की बेटी तू बेटी हैं तुझे सहन करना हैं ।यह सही हैं की नारी में धैर्य ,सहनशीलता ,आदि गुण ज्यादा होते हैं ,और उन्ही गुणों के होने के कारण वह अपने परिवार को संभाल पाती हैं, सहेज पाती हैं । किंतु उन गुणों का हवाला देकर अत्याचार सहन करना गलत था, गलत हैं और गलत ही होगा . हो यह रहा हैं की नारी पढने लिखने के बाद भी ख़ुद को उस सोच से बाहर नही निकाल पा रही ,वह जितना पुरूष के कारण दुखी हैं ,बंधन में हैं ,उससे कहीं ज्यादा खुदने स्वयं को उसी सोच में बाँध कर रखा हैं । आजकल सोच बदली हैं और कुछ जागरूक नारियां इस संबंध में जागृति भी फैला रही हैं .किंतु हर अच्छी चीज़ की शुरुआत घर से ही होती हैं ,जरुरत हैं की नारी स्वयं को कम न समझे,अपने बेटो को वही संस्कार दे ,नारी का सम्मान सच्चे अर्थो में करना सिखाये,अभी भी देर नही हुई हैं,कम से कम आगे आने वाली पीढी में तो ऐसे पुरूष नही होंगे जो नारी का निरादर करेंगे,और जो निरादर करके रहे हैं ,नारी के सबल होने से उसका भयपुर्वक या आदर पूर्वक सम्मान ही करेंगे ।
हाँ एक बात और ये हिन्दी सिनेमा ने नारी को अबला दिखाने में कोई कसर नही छोड़ी हैं ,अमूमन हिन्दी सिनेमा में एक लड़की को लड़के छेड़ते हैं और वह हीरो को आवाज़ देती रह जाती हैं या गुंडों से विनती करती रह जाती हैं यह दिखाया जाता रहा हैं, दिखाया जाता हैं । इसका विरोध होना ही चाहिए ,लड़की के साथ छेड़ छाड हो रही हैं ऐसे दृश्यों से पिक्चर तो चलती हैं किंतु नारी की गरिमा का अपमान होता हैं ऐसे दृश्यों पर रोक लगनी चाहिए ।
इति
मैंने भी अपने आसपास बहुत सी लड़कियों को कभी मनचाहा शिक्षण पाने के लिए ,अपने केरियर के लिए ,अपनी सुरक्षा के लिए ,अपने विवाह से संबंधित विषय पर परेशान होते ,लड़ते - झगड़ते देखा हैं । कई बार इस मुद्दे पर बहुत विचार किया हैं की ये सब क्या हो रहा हैं ?क्यों हो रहा हैं ?कब तक होता रहेगा?सिर्फ़ शारीरिक दृष्टि से दुर्बल होने का परिणाम नारी कब तक भोगती रहेगी ?
हर बार यही उत्तर मिला हैं की यह समस्या सिर्फ़ नारी की नही पुरे समाज की हैं ,क्योकि नारी और पुरूष ही समाज के घटक हैं ,इसलिए अगर समाज के किसी तत्त्व को कोई समस्या हैं तो वह सम्पूर्ण समाज की समस्या हैं ,और सम्पूर्ण समाज की मनोवृति ,या कहे सोच को बदल कर ,सामाजिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करकर ही इस समस्या का निराकरण सम्भव हैं । बात जब स्त्रियों के साथ हो रही छेड़खानी की आती हैं तो मैं बार बार कहती हूँ की इसके लिए स्त्री को ही सबसे पहले खुदको सबल और हिम्मती बनाना होगा ,जब जब स्त्रियाँ अपने साथ हुई इस छेड़खानी का सही -सही उत्तर इन ग़लत लोगो को देंगी तब तब उन्हें देखकर अन्य स्त्रियों की हिम्मत बढेगी और ऐसे मनचलों की हिम्मत घटेगी .हर लड़की को मेरे विचार से जुडो- कराटे जैसी विधाये स्वरक्षा के लिए सीखनी ही चाहिए ।साथ ही उसके संरक्ष्ण के लिए बने कानूनों का पूर्ण उपयोग करना चाहिए , अगर कोई किसी महिला से गलत व्ह्य्वार करता हैं तो इसके लिए स्त्री को ख़ुद ग्लानी महसूस करनी नही चाहिए यह उसकी नही बल्कि उस व्यक्ति की गलती हैं जिसने उसके साथ ऐसा किया हैं ,चरित्र नारी का नही उस व्यक्ति का खराब हुआ हैं ,बाकायदा हिम्मत करके उसके खिलाफ कार्यवाही करनी चाहिए ।
बात जब पुरुषों की मनोवृत्ति बदलने की आती हैं तो मैं पुनः कहूँगी सारे पुरूष गलत नही होते ,समाज में अगर बुरे लोग हैं तो अच्छे भी लोग हैं नारी का सम्मान करने वाले ,उसे माँ का दर्जा देने वाले भी कई पुरूष हैं , जो गलत हैं ,जिनकी विकृत मनोवृत्ति हैं ,उनको अगर कहें की भाई अपनी सोच बदलो तो वह नही बदलने वाले ,कुछ को दैवीय कृपा के चलते अच्छे बुरे की समझ आ जाए तो यह चमत्कार ही होगा।
नारी जननी हैं ,माँ हैं ,वह एक व्यक्ति को जन्म मात्र ही नही देती बल्कि एक व्यक्तित्व निर्माण करती हैं ,इसलिए सबसे पहले स्वयं के विकास के लिए नारी को ख़ुद की क्षमताओ और अपने गुणों को अपने दैवीय रूप को समझाना जरुरी हैं ,जब स्त्री ही स्त्री के दुःख का कारण बनती हैं तो दुःख सबसे ज्यादा होता हैं , क्यो एक माँ अपने पति का या अपने बेटे का विरोध तब ज्यादा नही कर पाती जब वह उसकी लाडली ,पढ़ी लिखी बेटी की शादी किसी वयोवृद्ध या अनपढ़ व्यक्ति के साथ सिर्फ़ इसलिए कर देता हैं की उम्र २८ की हो गई अभी तक कुँवारी बैठी हैं ? क्यो एक सास अपनी बहूँ का साथ सिर्फ़ इसलिए नही दे पाती की बेटे का साथ न देने पर समाज आलोचना करेगा ?क्यों दहेज़ की बात आने पर माँ ,सास न चाहते हुए भी अपने घर के बडो का विरोध नही कर पाती ?क्यों एक स्त्री होते हुए भी एक स्त्री के जन्म पर वही सबसे ज्यादा दुखी हो जाती हैं ?क्यों किसी लड़की के साथ गलत हो जाने पर ,कई नारियां भी उसे ही दोष देती हैं ,या उसे बिचारी कहती हैं ?क्योकि वर्षो से उसको सिर्फ़ यही सिखाया गया हैं की उसे पुरूष की अनुसरणी बनकर चलना हैं ,उसे उसकी माँ ने, माँ की माँ ने ,पिता ने ,दादा ने,नानी ने नाना ने ,यही सिखाया हैं की बेटी तू बेटी हैं तुझे सहन करना हैं ।यह सही हैं की नारी में धैर्य ,सहनशीलता ,आदि गुण ज्यादा होते हैं ,और उन्ही गुणों के होने के कारण वह अपने परिवार को संभाल पाती हैं, सहेज पाती हैं । किंतु उन गुणों का हवाला देकर अत्याचार सहन करना गलत था, गलत हैं और गलत ही होगा . हो यह रहा हैं की नारी पढने लिखने के बाद भी ख़ुद को उस सोच से बाहर नही निकाल पा रही ,वह जितना पुरूष के कारण दुखी हैं ,बंधन में हैं ,उससे कहीं ज्यादा खुदने स्वयं को उसी सोच में बाँध कर रखा हैं । आजकल सोच बदली हैं और कुछ जागरूक नारियां इस संबंध में जागृति भी फैला रही हैं .किंतु हर अच्छी चीज़ की शुरुआत घर से ही होती हैं ,जरुरत हैं की नारी स्वयं को कम न समझे,अपने बेटो को वही संस्कार दे ,नारी का सम्मान सच्चे अर्थो में करना सिखाये,अभी भी देर नही हुई हैं,कम से कम आगे आने वाली पीढी में तो ऐसे पुरूष नही होंगे जो नारी का निरादर करेंगे,और जो निरादर करके रहे हैं ,नारी के सबल होने से उसका भयपुर्वक या आदर पूर्वक सम्मान ही करेंगे ।
हाँ एक बात और ये हिन्दी सिनेमा ने नारी को अबला दिखाने में कोई कसर नही छोड़ी हैं ,अमूमन हिन्दी सिनेमा में एक लड़की को लड़के छेड़ते हैं और वह हीरो को आवाज़ देती रह जाती हैं या गुंडों से विनती करती रह जाती हैं यह दिखाया जाता रहा हैं, दिखाया जाता हैं । इसका विरोध होना ही चाहिए ,लड़की के साथ छेड़ छाड हो रही हैं ऐसे दृश्यों से पिक्चर तो चलती हैं किंतु नारी की गरिमा का अपमान होता हैं ऐसे दृश्यों पर रोक लगनी चाहिए ।
इति
Monday, October 6, 2008
जिम्मेदार कौन?
कल कुछ काम से बाहर जाना था ,बेटी के साथ ऑटो में बैठी ,दुपहर का समय फ़िर भी रास्तो पर भीड़,चारो तरफ़ वाहनों का कोलाहल सब कुछ बडा बुरा लग रहा था , तभी ऑटो के सामने की तरफ़ छोटे छोटे अक्षरों में लिखे एक वाक्य पर नज़र गई ,वाक्य था "तूच तुझ्या जीवनाचा शिल्पकार "अर्थात तू स्वत: ही तेरे जीवन का शिल्पकार हैं ,अक्सर ऑटो पर कभी कोई शायरी ,कोई गीत लिखा होता हैं , पहली बार मैंने किसी ऑटो में इतना सुंदर और सच्चा वाक्य लिखा हुआ देखा ।
हम अक्सर सोचते हैं ?ऐसा हमारे साथ क्यों हुआ ?हमारी जिन्दगी में वह खुशियाँ क्यों नही हैं जो दूसरो के जीवन में हैं ?हम उससे अधिक काबिल हैं फ़िर भी उसे जो मान सम्मान मिला हैं ,हमारे पास क्यों नही ?उसके पास ये हैं ,वो हैं ,हमारे पास क्यों नही ?क्यों आख़िर हम हर क्षेत्र में उससे ज्यादा बुद्धिमान ,विद्वान होकर भी उससे काफी पीछे हैं ?गीता में कहा हैं जैसा कर्म करोगे वैसा फल मिलेगा । हमारा कर्म तो काफी अच्छा था ,तो हमें वैसा फल क्यो नही मिला ?आदि आदि आदि ............... और यह सब सोच कर कभी हम निराश हो जाते हैं ,कभी उदास ,परेशान और हताश । जीवन भर सोचने के बाद हमें जब इस प्रश्न का उत्तर नही मिलता तो एक सीधा सरल उपाय हम अपना लेते हैं ,आशावादी ,हताशावादी होने के बाद हम भाग्यवादी हो जाते हैं ।" क्या करे यह हमारे भाग्य में ही नही था ",ये वाक्य अकर्मण्यता और अपराध बोध को छुपाने वाला एकमात्र आदर्श वाक्य हैं । इसे कहने के बाद कहने और सुनने वाले के पास दूसरा कुछ कहने और सुनने के लिए नही रह जाता ।
वस्तुत: हम अपने जीवन से जुड़ी सभी घटनाओ की, परिस्तिथियों की जिम्मेदारी लेना ही नही चाहते ,हम जानकर भी नही जानना चाहते की हमने अपने जीवन में जो भी असफलताएँ पाई हैं उनके मूल कारण कहीं न कहीं हम स्वयम ही हैं ,हम अगर गहरे से विचार करे ,चिंतन करे तो हम आसानी से जान सकते हैं की हम औरो से ज्यादा बुद्धिमान ,मेहनती ,कर्तव्य निष्ठ होकर भी आज उससे हारे हुए क्यों हैं ?सिर्फ़ मंथन पुरी सच्चाई से किया जाना जरुरी हैं ,उसमे स्वयं से स्वयं की असफलता छुपा लेने वाला भाव नही होना चाहिए ।
हम कभी दोष देते हैं अपने माता पिता को,रिश्तेदारों को ,भाई -बहनों को,संस्कृति,संस्कारो को ,समाज को, देश को ,गरीबी को ,अमीरी को पर हमारी हार में दोष सिर्फ़ हमारा होता हैं ।
उदहारण स्वरुप हमने एक अच्छा अभिनेता/अभिनेत्री होने की ठानी ,पर हम नही बन सके ,जबकि हम जानते हैं की हम औरो से अच्छे अभिनेता या अभिनेत्री बन सकते थे ,वह भी अपनी शर्तो पर । अब जब हम सोचते हैं हम अभिनेता क्यों नही बन सके . तो विचारो का क्रम कुछ इस प्रकार शुरू होता हैं , हमारे माता पिता को हमारा अभिनय करना पसंद नही था .................. माता पिता की तो मनाही नही थी पर दादा दादी को पसंद नही था ,..........हमारे चाचा की बड़ी इच्छा थी की हम लेखक /लेखिका बने , ...............घर की आर्थिक परिस्तिथी अच्छी नही थी ,............ आसपास कोई अच्छा अभिनय विद्यालय नही था , ..............हमारे घर के लोगो की टीवी चेनल्स में जान पहचान नही थी ,हम छ: भाई- बहन थे ,मैं बड़ा भाई था /बहन थी । और अंत में वही सुंदर सा वाक्य शायद मेरे भाग्य में ही नही था ।
जबकि विचारो का क्रम ऐसा होना चाहिए ,मैं अपने माता पिता ,दादा-दादी ,को अपनी बात समझा नही सका /सकी ,मैंने अपने चाचा की इच्छा का सम्मान करते हुए अपनी इच्छा का सम्मान नही किया ,जबकि दोनों की इच्छा को न्याय दिया जा सकता था , मैं चाहता /चाहती तो इस सब पर कोई न कोई उपाय जरुर निकला जा सकता था। और अंत में मैंने कहीं न कहीं अपने जीवन को गुण ,ज्ञान और सफलता के शिखर पर ले जाने में कोई कमी की हैं और इसी कारण से आज मैं पीछे हूँ,हारा हुआ /हुई हूँ ।
यह सत्य हैं की मानव जीवन कठिनाइयों से भरा हुआ हैं ,अपने सपनो को सच करना कभी आसन नही था, नही होगा पर अगर वास्तव में अपने सपनो को सच करना हैं तो मन में पुरा विश्वास ,प्रबल इच्छा शक्ति के साथ इस बात का भी एहसास होना चाहिए की कोई और नही हमारे जीवन के शिल्पकार हम स्वयं हैं ,यह किसी ओर का जीवन नही और हमारी सफलताओ -असफलताओ की जिम्मेदारी किसी ओर की नही हमारी स्वयं की हैं ,जब हम ये सत्य मान लेते हैं तो अपने सफलता के मार्ग में बैठे हुए अपने स्वयं के डरपोक और भाग्यवादी रूप को हटा देते हैं और वही से शुरू होता हैं हमारी सफलता का सफर ।
सधन्यवाद ।
हम अक्सर सोचते हैं ?ऐसा हमारे साथ क्यों हुआ ?हमारी जिन्दगी में वह खुशियाँ क्यों नही हैं जो दूसरो के जीवन में हैं ?हम उससे अधिक काबिल हैं फ़िर भी उसे जो मान सम्मान मिला हैं ,हमारे पास क्यों नही ?उसके पास ये हैं ,वो हैं ,हमारे पास क्यों नही ?क्यों आख़िर हम हर क्षेत्र में उससे ज्यादा बुद्धिमान ,विद्वान होकर भी उससे काफी पीछे हैं ?गीता में कहा हैं जैसा कर्म करोगे वैसा फल मिलेगा । हमारा कर्म तो काफी अच्छा था ,तो हमें वैसा फल क्यो नही मिला ?आदि आदि आदि ............... और यह सब सोच कर कभी हम निराश हो जाते हैं ,कभी उदास ,परेशान और हताश । जीवन भर सोचने के बाद हमें जब इस प्रश्न का उत्तर नही मिलता तो एक सीधा सरल उपाय हम अपना लेते हैं ,आशावादी ,हताशावादी होने के बाद हम भाग्यवादी हो जाते हैं ।" क्या करे यह हमारे भाग्य में ही नही था ",ये वाक्य अकर्मण्यता और अपराध बोध को छुपाने वाला एकमात्र आदर्श वाक्य हैं । इसे कहने के बाद कहने और सुनने वाले के पास दूसरा कुछ कहने और सुनने के लिए नही रह जाता ।
वस्तुत: हम अपने जीवन से जुड़ी सभी घटनाओ की, परिस्तिथियों की जिम्मेदारी लेना ही नही चाहते ,हम जानकर भी नही जानना चाहते की हमने अपने जीवन में जो भी असफलताएँ पाई हैं उनके मूल कारण कहीं न कहीं हम स्वयम ही हैं ,हम अगर गहरे से विचार करे ,चिंतन करे तो हम आसानी से जान सकते हैं की हम औरो से ज्यादा बुद्धिमान ,मेहनती ,कर्तव्य निष्ठ होकर भी आज उससे हारे हुए क्यों हैं ?सिर्फ़ मंथन पुरी सच्चाई से किया जाना जरुरी हैं ,उसमे स्वयं से स्वयं की असफलता छुपा लेने वाला भाव नही होना चाहिए ।
हम कभी दोष देते हैं अपने माता पिता को,रिश्तेदारों को ,भाई -बहनों को,संस्कृति,संस्कारो को ,समाज को, देश को ,गरीबी को ,अमीरी को पर हमारी हार में दोष सिर्फ़ हमारा होता हैं ।
उदहारण स्वरुप हमने एक अच्छा अभिनेता/अभिनेत्री होने की ठानी ,पर हम नही बन सके ,जबकि हम जानते हैं की हम औरो से अच्छे अभिनेता या अभिनेत्री बन सकते थे ,वह भी अपनी शर्तो पर । अब जब हम सोचते हैं हम अभिनेता क्यों नही बन सके . तो विचारो का क्रम कुछ इस प्रकार शुरू होता हैं , हमारे माता पिता को हमारा अभिनय करना पसंद नही था .................. माता पिता की तो मनाही नही थी पर दादा दादी को पसंद नही था ,..........हमारे चाचा की बड़ी इच्छा थी की हम लेखक /लेखिका बने , ...............घर की आर्थिक परिस्तिथी अच्छी नही थी ,............ आसपास कोई अच्छा अभिनय विद्यालय नही था , ..............हमारे घर के लोगो की टीवी चेनल्स में जान पहचान नही थी ,हम छ: भाई- बहन थे ,मैं बड़ा भाई था /बहन थी । और अंत में वही सुंदर सा वाक्य शायद मेरे भाग्य में ही नही था ।
जबकि विचारो का क्रम ऐसा होना चाहिए ,मैं अपने माता पिता ,दादा-दादी ,को अपनी बात समझा नही सका /सकी ,मैंने अपने चाचा की इच्छा का सम्मान करते हुए अपनी इच्छा का सम्मान नही किया ,जबकि दोनों की इच्छा को न्याय दिया जा सकता था , मैं चाहता /चाहती तो इस सब पर कोई न कोई उपाय जरुर निकला जा सकता था। और अंत में मैंने कहीं न कहीं अपने जीवन को गुण ,ज्ञान और सफलता के शिखर पर ले जाने में कोई कमी की हैं और इसी कारण से आज मैं पीछे हूँ,हारा हुआ /हुई हूँ ।
यह सत्य हैं की मानव जीवन कठिनाइयों से भरा हुआ हैं ,अपने सपनो को सच करना कभी आसन नही था, नही होगा पर अगर वास्तव में अपने सपनो को सच करना हैं तो मन में पुरा विश्वास ,प्रबल इच्छा शक्ति के साथ इस बात का भी एहसास होना चाहिए की कोई और नही हमारे जीवन के शिल्पकार हम स्वयं हैं ,यह किसी ओर का जीवन नही और हमारी सफलताओ -असफलताओ की जिम्मेदारी किसी ओर की नही हमारी स्वयं की हैं ,जब हम ये सत्य मान लेते हैं तो अपने सफलता के मार्ग में बैठे हुए अपने स्वयं के डरपोक और भाग्यवादी रूप को हटा देते हैं और वही से शुरू होता हैं हमारी सफलता का सफर ।
सधन्यवाद ।
Thursday, October 2, 2008
जब मैं हारी ...............एक चिड़िया से !(और मन में कहा काश मैं एक पंछी होती . )
सुबह के यही कोई छ: बजे होंगे,उदित होते सूरज की सुनहली किरणों से आकाश स्वर्णिम आभा से शोभायमान हो रहा था ,रजनीगंधा के फूलो की महक अभी हवा से पुरी तरह विलुप्त नही हुई थी ,साथ ही पारिजात ,चम्पा ,चमेली ,गुलाब के फूलो की सुगंध मद्धिम हवा में आलिप्त हो वातावरण को सुरभित कर रही थी। आस पास के सभी लोग अभी जागे नही थे ,कही किसी के घर देवी स्तुति का सस्वर पठन हो रहा था ,इस दिव्य वातावरण में ,लग रहा था मानों मैं स्वर्ग में आगई हूँ । मेरी बालकनी के पास लगे असो पल्लव अर्थात अशोक के वृक्षो पर कुछ पंछी फुदक फुदक कर प्रकृति की इस मनोरम बेला के मधुमय संगीत पर ताल देते हुए मानों समूह नृत्य कर रहे थे ।
मैं यही सब देखकर खुश हो रही थी कि बालकनी से सट कर लगी मधुमालती की बेल पर एक नन्ही सी चिड़िया कहीं से उछलते कूदते आयीं । छोटी सी, प्यारी नन्ही सी चिड़िया। मुझे उसे देखकर बहुत अच्छा लगा ,उसे संबोधित करते हुए मैं बोली ,नन्ही कैसी हो ?उसने अपनी छोटी छोटी आँखों से मुझे देखा ,फ़िर आँखों ही आँखों में कुछ कहते हुए अपनी नाजुक सी गर्दन दूसरी और घुमा ली । मुझे उसका यह मान बहुत अच्छा लगा,एक बार फ़िर कहा नन्ही सुना नही कैसी हो?उसने फ़िर अपनी आँखों के जुगनू टिमटिमाते हुए मुझे देखा ,और फ़िर दूसरी और देखने लगी .मुझे उसका कौतुक लगा । मैंने फ़िर कहा चिऊ कैसी हो ?नाराज़ हो क्या?बात नही करनी ?
इस बार उसने अपने छोटे -छोटे, गोल -गोल नयनों को विस्तारित कर उपहासात्मक शैली में कहा ...न... नही करनी बात ,मानवी ..... मैंने मन ही मन कहा .नन्ही चिड़िया होकर इतना गुरुर ॥ प्रत्यक्ष में कहा"ठीक हैं नही करनी तो मत करो बात ,पर ये इस तरह उपहासात्मक शैली में मानवी क्यों कह रही हो मुझे .उसने तीक्ष्ण स्वर में अपनी पतली आवाज़ को मोटा करते हुए कहा" अब हो ही मानवी ...हुह.. तो और क्या कहूँ ?मेरे जैसी भाग्यशालिनी चिड़िया कहा हो तुम ?जो तुम्हे मान दू ।" इस बार मेरे अंदर की मानिनी जाग उठी ,मैंने भी आवाज़ को थोड़ा चढ़ा कर कहा" क्यो मैं सबसे भाग्य शालिनी हूँ, मानवी जो हूँ,मनुष्य सब प्राणियो में सबसे बुद्धिमान, श्रेष्ट जो हैं,तुम क्या हो मात्र एक नन्ही सी चिड़िया ?"
इस पर वह तुनककर बोली "यही तो बात हैं मानव होने का इतना अंहकार हैं तुम मानवो को ,की अपने खोखले गर्व में चूर होकर अपनी वास्तविक स्थिति जानते हुए भी, अंधे हो अपनी श्रेष्ठता का बखान करते रहते हो "। अब मुझे बडा गुस्सा आया ,मैंने कहा "खोखला गर्व ?हम हैं ही गर्व करने के काबिल ,सक्षम ,सबल,सम्पूर्ण । वह बोली"नही अक्षम ,दुर्बल और अपूर्ण । मैंने कहा ज्यादा चिक चिक की न तो अभी पकड़ कर पिंजरे में डाल दूंगी .वह बोली"डाल दो ,तुम मनुष्य और कर भी क्या सकते हो। मेरा गुस्सा अपनी चरम सीमा को छूने लगा । मैंने कहा अहंकारी चिड़िया क्यो सुबह सुबह चिक चिक कर रही हो ?मनुष्य कि शक्ति से अपरिचित हो?जो उससे उलझ रही हो ?ऐसा क्या हैं तुममे ?वह बोली "मानव इस संसार का सबसे अशक्त प्राणी हैं ,और मैं सच कह रही हूँ,मेरे पास वह सब कुछ हैं जो तुम मानवों के पास नही हैं ..और गुनगुनाने लगी बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर पंछी को छाया नही फल लगे अति दूर "मैंने गुस्से में उफनते हुए कहा "दुष्ट चिडिया तेरी ये हिम्मत "अब बोल ही दे कि तेरे पास ऐसा क्या हैं जो हम मानवों को अब भी अप्राप्य हैं । वह इठलाती हुई बोली एक हो तो बोलू . मैंने कहा बोल फ़िर भी। वह बोली "हम पंछियों के पास आज़ादी हैं । मैंने कहा हम भी आजाद हैं । वह बोली" कैसी आज़ादी ?मुझे देखो जहाँ चाहे ,जब चाहे उड़ सकती हूँ" . मैंने हँसकर कहा,बस इतना ही । मनुष्य ने अपनी शक्ति से हवाई जहाज़ बना लिए हैं पता नही तूझे। वह और सर ऊँचा करती हुई बोली तो क्या ?वो हवाई जहाज़ जिनकी कीमतें आसमान को छूती हैं ,आम आदमी पूरी उम्र उसमें बैठने को तरसता हैं ,या वह हवाई जहाज़ जिनकी कीमते कम होती हैं और यात्रियों को अपनी जान की कीमत देकर उनकी कीमत चुकानी पड़ती हैं ,या वह हवाई जहाज़ जो फ्यूल के दाम बढ़ने से एअरपोर्ट के बाहर ही नही निकल पाते । बोलो ...बोलो ... मैंने कहा ,तो क्या हुआ ?हमारे पास और भी बहुत सी गाडियां हैं जब चाहे जहाँ चाहे घूम सकते हैं . वह बोली अच्छा सच?सुबह सुबह ऑफिस जाना हो तो एक घंटा ट्रेफिक से उलझना पड़ता हैं तुम्हे ,धुल धुआँ तुम्हारी आँखों नाक और फेफडो में भर जाता हैं , हमें कम से कम ट्रेफिक जाम से तो नही उलझना पड़ता ,तुमने अपने साथ हमें भी शुद्ध हवा से वंचित कर दिया हैं । मैं चुप,वह फ़िर बोली "और हमारे पास संगठन की शक्ति हैं ,हम एक दुसरे के साथ उड़ते हैं ,साथ रहते हैं एक दुसरे के सुख दुःख में सहभागी बनते हैं ,और तुम मनुष्य ?मैंने कहा "तुमने कैसे सोच लिया की हम एक दुसरे के साथ नही रहते इतना बड़ा देश हैं फ़िर भी सब साथ साथ हैं .वह बोली तभी तो आज यहाँ ,कल वहां दंगे होते हैं ,भाई भाई को मारता हैं ,माँ बेटो को छोड़ कर चली जाती हैं ,बच्चे माँ पिता का सम्मान नही करते । हम कभी एक दुसरे से अलग नही होते.तुम्हारे यहाँ एक गिरता हैं दूसरा उसे नज़रंदाज़ कर चला जाता हैं .हमारे यहाँ एक ने आवाज़ लगाई की सारे दुसरे पंछी उसकी जान बचाने उड़ते चले आते हैं । मैं शांत .वह फ़िर बोली हमें किन्ही आतंकवादी हमलो का भी डर नही .बड़ी शांत दुनिया हैं हमारी । मुझे कुछ सूझा ..मैंने कहा ..दिन भर इधर उधर खाना ढूंढ़ते फिरते हो तुम ,ऐसे ही जीवन कट जाता हैं तुम्हारा ,हमें देखो कितना पैसा कमा लेते हैं हम, सुख से खाते हैं रोज़ नई नई चीजे । वह बोली "अच्छा ऐसा क्या?मुझे तो दिख रहे हैं न जाने कितने भूखे बच्चे ,अन्न के दाने दाने के लिए तरसते लोग,दिन भर मेहनत करके भी दो समय की दाल रोटी को तड़पते लोग,इन सबके बीच औरो की परवाह न कर खूब खा- खा कर अपना मोटापा बढाते,भारी भरकम बिमारियों से ग्रस्त लोग । मैं हिम्मत कैसे हारती? बोली,रहते हो इतने से घोसलों में जरा तेज़ आंधी बारिश आई तो घर टूट जाते हैं तुम्हारे ,वह व्यंगात्मक शैली में बोली,हाय रे तुम्हारे बंगले !आलिशान फ्लेट्स! फ़िर बोली "हमारे घोसले तो फ़िर भी तिनका तिनका जोड़ कर ख़ुद ही बनते हैं हम उसके लिए प्रकृति की किसी संपदा का नुकसान नही करते ,पर तुमने न जाने कितने वृक्ष कट डाले दुष्ट मानव ,अपने फायदे के लिए हमारा घर उजाड़ डाला ,फ़िर भी, वो उपर वाला बैठा हैं न सारा न्याय करता हैं ,हमें तो फ़िर भी कही कोई टहनी मिल जाती हैं आसरे के लिए, तुम तो एक छोटा सा घर खरीदने के लिए जिन्दगी भर पैसे कमा कमा कर थक जाते हो फ़िर भी पूरी कीमत नही निकाल पाते ,निकाल भी ली,तो धोखे से बिल्डर ने सीमेंट की जगह रेती से बिठाये मजबूत घरो की बुनियाद एक ही भूकंप में हिल जाती हैं और तुम्हारी मल्टी स्टोरी बिल्डिंगे धराशायी हो जाती हैं । तुम भी मरते हो और तुम्हारे सपने भी । मानव होने की बातें करते हो ,श्रेष्ठ्त्व की बातें करते हो ,इतना भी नही जानते की बड़ा वह होता हैं जो अपनों से ज्यादा दूसरो का सुख जाने ,उसके दुःख को दूर करना जाने ,प्रेम दया शान्ति, करुणा ,सादगी जैसे गुणों से विभूषित किया था ईश्वर ने तुम्हें और साथ ही दी थी बुद्धि कितने विश्वास के साथ,पतितो तुमने वह विश्वास तोड़ दिया .मानव कहते हो खुदको ,कहाँ हैं मानवता तुममे ?बोलो कहाँ हैं मनुष्यता ?किस बात का दंभ करते हो? इन इमारतो का ?इन वाहनों का ?इस पैसे का?इस रूप का ?इन कपड़ो का?इन डिग्रीयों का ?किस बात का?जिसमे नैतिक गुण ही नही ,जो मानवीय मूल्यों को ही भूल गया हैं वह कैसा मानव । वह री मानवता ! मैं निरुत्तर ,हतबल,हतप्रभ । मुझे इस अवस्था में देख वह हँसी और फुर्र से उड़ती हुई दूर अपने दल के साथ मिल गई । मैं आसमान में न जाने कितनी देर तक देखती विचारों में खोयी रही ,दुहराती रही उसका कहा एक एक शब्द ,वह री मानवता ....आज मैं हार गई ,जीवन में पहली बार ,वह भी एक चिड़िया से ।
इस बार उसने अपने छोटे -छोटे, गोल -गोल नयनों को विस्तारित कर उपहासात्मक शैली में कहा ...न... नही करनी बात ,मानवी ..... मैंने मन ही मन कहा .नन्ही चिड़िया होकर इतना गुरुर ॥ प्रत्यक्ष में कहा"ठीक हैं नही करनी तो मत करो बात ,पर ये इस तरह उपहासात्मक शैली में मानवी क्यों कह रही हो मुझे .उसने तीक्ष्ण स्वर में अपनी पतली आवाज़ को मोटा करते हुए कहा" अब हो ही मानवी ...हुह.. तो और क्या कहूँ ?मेरे जैसी भाग्यशालिनी चिड़िया कहा हो तुम ?जो तुम्हे मान दू ।" इस बार मेरे अंदर की मानिनी जाग उठी ,मैंने भी आवाज़ को थोड़ा चढ़ा कर कहा" क्यो मैं सबसे भाग्य शालिनी हूँ, मानवी जो हूँ,मनुष्य सब प्राणियो में सबसे बुद्धिमान, श्रेष्ट जो हैं,तुम क्या हो मात्र एक नन्ही सी चिड़िया ?"
इस पर वह तुनककर बोली "यही तो बात हैं मानव होने का इतना अंहकार हैं तुम मानवो को ,की अपने खोखले गर्व में चूर होकर अपनी वास्तविक स्थिति जानते हुए भी, अंधे हो अपनी श्रेष्ठता का बखान करते रहते हो "। अब मुझे बडा गुस्सा आया ,मैंने कहा "खोखला गर्व ?हम हैं ही गर्व करने के काबिल ,सक्षम ,सबल,सम्पूर्ण । वह बोली"नही अक्षम ,दुर्बल और अपूर्ण । मैंने कहा ज्यादा चिक चिक की न तो अभी पकड़ कर पिंजरे में डाल दूंगी .वह बोली"डाल दो ,तुम मनुष्य और कर भी क्या सकते हो। मेरा गुस्सा अपनी चरम सीमा को छूने लगा । मैंने कहा अहंकारी चिड़िया क्यो सुबह सुबह चिक चिक कर रही हो ?मनुष्य कि शक्ति से अपरिचित हो?जो उससे उलझ रही हो ?ऐसा क्या हैं तुममे ?वह बोली "मानव इस संसार का सबसे अशक्त प्राणी हैं ,और मैं सच कह रही हूँ,मेरे पास वह सब कुछ हैं जो तुम मानवों के पास नही हैं ..और गुनगुनाने लगी बड़ा हुआ तो क्या हुआ जैसे पेड़ खजूर पंछी को छाया नही फल लगे अति दूर "मैंने गुस्से में उफनते हुए कहा "दुष्ट चिडिया तेरी ये हिम्मत "अब बोल ही दे कि तेरे पास ऐसा क्या हैं जो हम मानवों को अब भी अप्राप्य हैं । वह इठलाती हुई बोली एक हो तो बोलू . मैंने कहा बोल फ़िर भी। वह बोली "हम पंछियों के पास आज़ादी हैं । मैंने कहा हम भी आजाद हैं । वह बोली" कैसी आज़ादी ?मुझे देखो जहाँ चाहे ,जब चाहे उड़ सकती हूँ" . मैंने हँसकर कहा,बस इतना ही । मनुष्य ने अपनी शक्ति से हवाई जहाज़ बना लिए हैं पता नही तूझे। वह और सर ऊँचा करती हुई बोली तो क्या ?वो हवाई जहाज़ जिनकी कीमतें आसमान को छूती हैं ,आम आदमी पूरी उम्र उसमें बैठने को तरसता हैं ,या वह हवाई जहाज़ जिनकी कीमते कम होती हैं और यात्रियों को अपनी जान की कीमत देकर उनकी कीमत चुकानी पड़ती हैं ,या वह हवाई जहाज़ जो फ्यूल के दाम बढ़ने से एअरपोर्ट के बाहर ही नही निकल पाते । बोलो ...बोलो ... मैंने कहा ,तो क्या हुआ ?हमारे पास और भी बहुत सी गाडियां हैं जब चाहे जहाँ चाहे घूम सकते हैं . वह बोली अच्छा सच?सुबह सुबह ऑफिस जाना हो तो एक घंटा ट्रेफिक से उलझना पड़ता हैं तुम्हे ,धुल धुआँ तुम्हारी आँखों नाक और फेफडो में भर जाता हैं , हमें कम से कम ट्रेफिक जाम से तो नही उलझना पड़ता ,तुमने अपने साथ हमें भी शुद्ध हवा से वंचित कर दिया हैं । मैं चुप,वह फ़िर बोली "और हमारे पास संगठन की शक्ति हैं ,हम एक दुसरे के साथ उड़ते हैं ,साथ रहते हैं एक दुसरे के सुख दुःख में सहभागी बनते हैं ,और तुम मनुष्य ?मैंने कहा "तुमने कैसे सोच लिया की हम एक दुसरे के साथ नही रहते इतना बड़ा देश हैं फ़िर भी सब साथ साथ हैं .वह बोली तभी तो आज यहाँ ,कल वहां दंगे होते हैं ,भाई भाई को मारता हैं ,माँ बेटो को छोड़ कर चली जाती हैं ,बच्चे माँ पिता का सम्मान नही करते । हम कभी एक दुसरे से अलग नही होते.तुम्हारे यहाँ एक गिरता हैं दूसरा उसे नज़रंदाज़ कर चला जाता हैं .हमारे यहाँ एक ने आवाज़ लगाई की सारे दुसरे पंछी उसकी जान बचाने उड़ते चले आते हैं । मैं शांत .वह फ़िर बोली हमें किन्ही आतंकवादी हमलो का भी डर नही .बड़ी शांत दुनिया हैं हमारी । मुझे कुछ सूझा ..मैंने कहा ..दिन भर इधर उधर खाना ढूंढ़ते फिरते हो तुम ,ऐसे ही जीवन कट जाता हैं तुम्हारा ,हमें देखो कितना पैसा कमा लेते हैं हम, सुख से खाते हैं रोज़ नई नई चीजे । वह बोली "अच्छा ऐसा क्या?मुझे तो दिख रहे हैं न जाने कितने भूखे बच्चे ,अन्न के दाने दाने के लिए तरसते लोग,दिन भर मेहनत करके भी दो समय की दाल रोटी को तड़पते लोग,इन सबके बीच औरो की परवाह न कर खूब खा- खा कर अपना मोटापा बढाते,भारी भरकम बिमारियों से ग्रस्त लोग । मैं हिम्मत कैसे हारती? बोली,रहते हो इतने से घोसलों में जरा तेज़ आंधी बारिश आई तो घर टूट जाते हैं तुम्हारे ,वह व्यंगात्मक शैली में बोली,हाय रे तुम्हारे बंगले !आलिशान फ्लेट्स! फ़िर बोली "हमारे घोसले तो फ़िर भी तिनका तिनका जोड़ कर ख़ुद ही बनते हैं हम उसके लिए प्रकृति की किसी संपदा का नुकसान नही करते ,पर तुमने न जाने कितने वृक्ष कट डाले दुष्ट मानव ,अपने फायदे के लिए हमारा घर उजाड़ डाला ,फ़िर भी, वो उपर वाला बैठा हैं न सारा न्याय करता हैं ,हमें तो फ़िर भी कही कोई टहनी मिल जाती हैं आसरे के लिए, तुम तो एक छोटा सा घर खरीदने के लिए जिन्दगी भर पैसे कमा कमा कर थक जाते हो फ़िर भी पूरी कीमत नही निकाल पाते ,निकाल भी ली,तो धोखे से बिल्डर ने सीमेंट की जगह रेती से बिठाये मजबूत घरो की बुनियाद एक ही भूकंप में हिल जाती हैं और तुम्हारी मल्टी स्टोरी बिल्डिंगे धराशायी हो जाती हैं । तुम भी मरते हो और तुम्हारे सपने भी । मानव होने की बातें करते हो ,श्रेष्ठ्त्व की बातें करते हो ,इतना भी नही जानते की बड़ा वह होता हैं जो अपनों से ज्यादा दूसरो का सुख जाने ,उसके दुःख को दूर करना जाने ,प्रेम दया शान्ति, करुणा ,सादगी जैसे गुणों से विभूषित किया था ईश्वर ने तुम्हें और साथ ही दी थी बुद्धि कितने विश्वास के साथ,पतितो तुमने वह विश्वास तोड़ दिया .मानव कहते हो खुदको ,कहाँ हैं मानवता तुममे ?बोलो कहाँ हैं मनुष्यता ?किस बात का दंभ करते हो? इन इमारतो का ?इन वाहनों का ?इस पैसे का?इस रूप का ?इन कपड़ो का?इन डिग्रीयों का ?किस बात का?जिसमे नैतिक गुण ही नही ,जो मानवीय मूल्यों को ही भूल गया हैं वह कैसा मानव । वह री मानवता ! मैं निरुत्तर ,हतबल,हतप्रभ । मुझे इस अवस्था में देख वह हँसी और फुर्र से उड़ती हुई दूर अपने दल के साथ मिल गई । मैं आसमान में न जाने कितनी देर तक देखती विचारों में खोयी रही ,दुहराती रही उसका कहा एक एक शब्द ,वह री मानवता ....आज मैं हार गई ,जीवन में पहली बार ,वह भी एक चिड़िया से ।
Wednesday, October 1, 2008
न्यूज़ चेनल्स :ठगी का नया अंदाज़
कहानी सुनी थी ,एक ठग था ,भोले लोगो को बड़ी बड़ी बातें बनाकर ठगता था । हर बार लोग उससे दूर रहने की, खबरदार रहने की ठानते और हर बार उसके झांसे में फँसकर ठगे जाते । जब नगर के कुछ प्रबुद्ध जनों ने मामले की गंभीरता को समझा तो राजा के पास गए ,राजा ने उस ठग को अपने राज्य से बहार निकल दिया ।
राज गए,राजा गये पर ठग रह गए ,वक्त के साथ साथ इन ठगों ने ठगी की नई नई विधियां भी ईजाद करली,आज के युग की सर्वोत्तम ठग विधि साबित हुई न्यूज़ चेनल्स की स्थापना । भारत में दूरदर्शन की स्थापना के बाद कई देशी विदेशी चेनल्स ने भारत भूमि में अपने पैर जमाये ,CNN,CNBC,BBC आदि चेनल्स ने अपने प्रसारण से लोगो को चमत्कृत कर दिया । कुछ वर्ष आगे बढे ,न्यूज़ चेनल्स की बाढ़ आ गई। आज टी.वी ऑन करते ही रोज के नए नए न्यूज़ चेनल्स के दिव्य दर्शन हमें हो जाया करते हैं । वैसे तो मॉस मीडिया का ऐसा युग आया हैं की न्यूज़ चेनल्स हो या मनोरंजन चेनल्स गाजर घास की तरह बढ़ते ही जा रहे हैं । इन सभी के बीच एक प्रतिस्पधा हैं स्वयं को मीडिया के इस मार्केट में बनाये रखने की ,अपनी टी .आर .पी बढ़ाने की ,दुसरे न्यूज़ चेनल्स से स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने की और इसलिए अब चटपटे कार्यक्रम दिखाए जा रहे हैं । कुछ चेनल्स तो भुत भभूत ,अघोरी बाबाओं का जमघट लगते हैं । इनके पास दादी माँ के पिटारे से निकली न जाने कितनी अजीबो गरीब कहानियाँ दर्शको को दिखाने के लिए हैं ।
कोई भी हिन्दी न्यूज़ चेनल हो,कार्यक्रम प्रस्तुतिकरण में कार्यक्रम संचालक की आवाज की महत्वपूर्ण भूमिका होती हैं यह जानकर आजकल हर न्यूज़ चेनल के हर संवाददाता की आवाज लगभग स्टार न्यूज़ के सनसनी कार्यक्रम के संचालक श्री शाजी ज़मान जैसी हो गई लगती हैं ।
कोई भी न्यूज़ हो उदाहरणार्थ किसी युवती ने खुदखुशी की इस न्यूज़ की प्रस्तुति का तरीका कुछ इस तरह होता हैं ...एक फांसी लगाई लड़की का फोटो ,घबराहट पैदा करने वाला बेसुरा म्यूजिक,संवादाता की रहस्मय आवाज़... वो जीना नही चाहती थी ....साथ में बड़े बड़े लाल अक्षरों में लिखा हुआ .....वो जीना नही चाहती थी.म्यूजिक में बदलाव ...फ़िर स्क्रीन पर दूसरा वाक्य वो मरना चाहती थी .संवाददाता की आवाज़ ... वो मरना चाहती थी ...स्क्रीन पर तीसरा वाक्य वो जीने से उब चुकी थी...संवाददाता की आवाज़ .....यही क्रम लगभग ३ मिनटों तक जारी ,फ़िर स्क्रीन पर संवाददाता का नज़र आना और कहना " बिहार में एक महिला ने आज तड़के खुदखुशी कर ली हम बताएँगे क्यों ,कब ?कैसे ? पर पहले लेते हैं एक छोटा सा ब्रेक...(वाकई में ५-८ मिनिट का ब्रेक )ब्रेक के बाद हम फ़िर हाज़िर हैं अपनी विशेष पेशकश " "वह मरी " लेकर आइये देखे वह कैसे मरी। फ़िर एक लाश ,फ़िर उस लड़की के घर वालो के आसूंओ से भीगे चेहरे ,और फ़िर वही सवाल -आपकी बेटी ने आज ही फांसी लगाकर आत्महत्या की हैं ,आपको क्या लगता हैं ऐसा उसने क्यो किया होगा ?लोग कहते हैं वह किसी दूसरी जाती के लड़के से प्रेम करती थी ,क्या ये सही हैं ?उत्तरदाता...निरुत्तर ,अच्छा बताये इस समय आप क्या महसूस कर रहे हैं ??.........................प्रश्न -उत्तर, बिना कारण की सनसनी ,अफवाहों,सवाल ,जवाब,अनुमानों ,कुछ सच्चे कुछ झूठे प्रमाणों का क्रम जारी।
देश में न जाने कितने गंभीर मुद्दे चल रहे हैं लेकिन इन न्यूज़ चेनल्स वालो के पास इनके लिए उतना समय ही नही हैं ,अगर कोई गंभीर मुद्दा उठाया भी गया तो उसकी प्रस्तुति भी इस तरह होती हैं की वह गंभीर कम हास्यास्पद अधिक लगता हैं । जनता को २ घंटे टी वि के सामने बैठने पर भी कुछ सारगर्भित जानकारी हासिल नही होती।
एक चेनल बताता हैं मरने वालो की संख्या १५ दूसरा ५ तीसरा १० चौथा २१ . किसे सच मने?
रियलिटी शो का प्रसारण संबंधित चेनल्स पर हर दिन होता हैं पर हमारे ये न्यूज़ चेनल वाले सस्ती टी .आर .पी के चक्कर में लगभग पुरा पुरा कार्यक्रम अपने न्यूज़ चेनल पर दिखाते हैं । (भारतीय शास्त्रीय संगीत ,कला आदि से संबंधित समाचार भी दिखाने के लिए इनके लिए ज्यादा समय नही होता )
ऐसे भी संवाददाता हैं जिन्हें ठीक से पढ़ना भी नही आता ,वे शब्दों का गलत उच्चारण करते हैं ।
पत्रकारिता एक बहुत जिम्मेदारी का काम हैं .किसी भी न्यूज़ को चलाना ,उसमे न्यूज़ प्रस्तुत करना अत्यन्त गम्भीर,दायित्व पूर्ण कार्य हैं ,इन समाचारों से लोगो की जिंदगिया जुड़ी होती ,उनका आज और कल जुड़ा होता हैं। ऐसे में सस्ते कार्यकम ,समाचार दिखाकर ये लोग अपना पेट तो भर लेते हैं ,पर समाज की भावनाओ को छल कर ,अपनी तिजोरी भरकर ये बहुत बड़ी ठगी करते हैं ।
जो भी भाई , बहन इन न्यूज़ चेनल्स के लिए काम करते हैं ,या जिनके ये न्यूज़ चेनल्स हैं उनसे मेरा अनुरोध हैं की आप सभी पर बहुत जिम्मेदारी हैं ,न्यूज़ देना ,उसका प्रसारण करना ,उसे पढ़ना कोई आसन काम नही हैं । बहुत ही लगन से किया जाने वाला काम हैं । आपका दायित्व हैं सच और झूठ का सही सही पता लगना,जनता को सही सही जानकारी देना। समाचारों की कोई कमी नही ,पर समाचार किसे बनाया जाना चाहिए इसका खरा निर्णय आप पर हैं । आप जो भी अपने चेनल पर दिखा रहे हैं उसके संबंध में आपने कितना जाना हैं, रिसर्च किया हैं ,यह बहुत महत्वपूर्ण हैं ,इसलिए कृपया अपने उत्तरदायित्व को समझे और इन न्यूज़ चेनल्स के साथ -साथ देश और जनता का भी भला होने दे ।
इति ।
पिछली कुछ प्रविष्टियों पर श्री अनूप शुक्ल जी ,सुश्री संगीता पुरी जी, श्री समीर लाल जी ,श्री संजय जी ,श्री शिव कुमार मिश्रा जी,श्री कुश जी ,सुश्री रंजना भाटिया जी ,श्री मोहन वशिष्ठ जी,,श्री रंजन जी ,श्री अनुनाद जी,सुश्री लावण्या जी ,श्री रोहित जी,श्री दीपक जी ,श्री दिनेश राय द्विवेदी जी ,श्री मार्कंड जी ,श्री अभिषेक ओझा जी , श्री सागर नाहर जी और अन्य कई पाठको की टिप्पणियाँ मिली । आप सभी को धन्यवाद । आपकी टिप्पणियों से मुझे लिखने की प्रेरणा मिलती हैं ।
राज गए,राजा गये पर ठग रह गए ,वक्त के साथ साथ इन ठगों ने ठगी की नई नई विधियां भी ईजाद करली,आज के युग की सर्वोत्तम ठग विधि साबित हुई न्यूज़ चेनल्स की स्थापना । भारत में दूरदर्शन की स्थापना के बाद कई देशी विदेशी चेनल्स ने भारत भूमि में अपने पैर जमाये ,CNN,CNBC,BBC आदि चेनल्स ने अपने प्रसारण से लोगो को चमत्कृत कर दिया । कुछ वर्ष आगे बढे ,न्यूज़ चेनल्स की बाढ़ आ गई। आज टी.वी ऑन करते ही रोज के नए नए न्यूज़ चेनल्स के दिव्य दर्शन हमें हो जाया करते हैं । वैसे तो मॉस मीडिया का ऐसा युग आया हैं की न्यूज़ चेनल्स हो या मनोरंजन चेनल्स गाजर घास की तरह बढ़ते ही जा रहे हैं । इन सभी के बीच एक प्रतिस्पधा हैं स्वयं को मीडिया के इस मार्केट में बनाये रखने की ,अपनी टी .आर .पी बढ़ाने की ,दुसरे न्यूज़ चेनल्स से स्वयं को श्रेष्ठ साबित करने की और इसलिए अब चटपटे कार्यक्रम दिखाए जा रहे हैं । कुछ चेनल्स तो भुत भभूत ,अघोरी बाबाओं का जमघट लगते हैं । इनके पास दादी माँ के पिटारे से निकली न जाने कितनी अजीबो गरीब कहानियाँ दर्शको को दिखाने के लिए हैं ।
कोई भी हिन्दी न्यूज़ चेनल हो,कार्यक्रम प्रस्तुतिकरण में कार्यक्रम संचालक की आवाज की महत्वपूर्ण भूमिका होती हैं यह जानकर आजकल हर न्यूज़ चेनल के हर संवाददाता की आवाज लगभग स्टार न्यूज़ के सनसनी कार्यक्रम के संचालक श्री शाजी ज़मान जैसी हो गई लगती हैं ।
कोई भी न्यूज़ हो उदाहरणार्थ किसी युवती ने खुदखुशी की इस न्यूज़ की प्रस्तुति का तरीका कुछ इस तरह होता हैं ...एक फांसी लगाई लड़की का फोटो ,घबराहट पैदा करने वाला बेसुरा म्यूजिक,संवादाता की रहस्मय आवाज़... वो जीना नही चाहती थी ....साथ में बड़े बड़े लाल अक्षरों में लिखा हुआ .....वो जीना नही चाहती थी.म्यूजिक में बदलाव ...फ़िर स्क्रीन पर दूसरा वाक्य वो मरना चाहती थी .संवाददाता की आवाज़ ... वो मरना चाहती थी ...स्क्रीन पर तीसरा वाक्य वो जीने से उब चुकी थी...संवाददाता की आवाज़ .....यही क्रम लगभग ३ मिनटों तक जारी ,फ़िर स्क्रीन पर संवाददाता का नज़र आना और कहना " बिहार में एक महिला ने आज तड़के खुदखुशी कर ली हम बताएँगे क्यों ,कब ?कैसे ? पर पहले लेते हैं एक छोटा सा ब्रेक...(वाकई में ५-८ मिनिट का ब्रेक )ब्रेक के बाद हम फ़िर हाज़िर हैं अपनी विशेष पेशकश " "वह मरी " लेकर आइये देखे वह कैसे मरी। फ़िर एक लाश ,फ़िर उस लड़की के घर वालो के आसूंओ से भीगे चेहरे ,और फ़िर वही सवाल -आपकी बेटी ने आज ही फांसी लगाकर आत्महत्या की हैं ,आपको क्या लगता हैं ऐसा उसने क्यो किया होगा ?लोग कहते हैं वह किसी दूसरी जाती के लड़के से प्रेम करती थी ,क्या ये सही हैं ?उत्तरदाता...निरुत्तर ,अच्छा बताये इस समय आप क्या महसूस कर रहे हैं ??.........................प्रश्न -उत्तर, बिना कारण की सनसनी ,अफवाहों,सवाल ,जवाब,अनुमानों ,कुछ सच्चे कुछ झूठे प्रमाणों का क्रम जारी।
देश में न जाने कितने गंभीर मुद्दे चल रहे हैं लेकिन इन न्यूज़ चेनल्स वालो के पास इनके लिए उतना समय ही नही हैं ,अगर कोई गंभीर मुद्दा उठाया भी गया तो उसकी प्रस्तुति भी इस तरह होती हैं की वह गंभीर कम हास्यास्पद अधिक लगता हैं । जनता को २ घंटे टी वि के सामने बैठने पर भी कुछ सारगर्भित जानकारी हासिल नही होती।
एक चेनल बताता हैं मरने वालो की संख्या १५ दूसरा ५ तीसरा १० चौथा २१ . किसे सच मने?
रियलिटी शो का प्रसारण संबंधित चेनल्स पर हर दिन होता हैं पर हमारे ये न्यूज़ चेनल वाले सस्ती टी .आर .पी के चक्कर में लगभग पुरा पुरा कार्यक्रम अपने न्यूज़ चेनल पर दिखाते हैं । (भारतीय शास्त्रीय संगीत ,कला आदि से संबंधित समाचार भी दिखाने के लिए इनके लिए ज्यादा समय नही होता )
ऐसे भी संवाददाता हैं जिन्हें ठीक से पढ़ना भी नही आता ,वे शब्दों का गलत उच्चारण करते हैं ।
पत्रकारिता एक बहुत जिम्मेदारी का काम हैं .किसी भी न्यूज़ को चलाना ,उसमे न्यूज़ प्रस्तुत करना अत्यन्त गम्भीर,दायित्व पूर्ण कार्य हैं ,इन समाचारों से लोगो की जिंदगिया जुड़ी होती ,उनका आज और कल जुड़ा होता हैं। ऐसे में सस्ते कार्यकम ,समाचार दिखाकर ये लोग अपना पेट तो भर लेते हैं ,पर समाज की भावनाओ को छल कर ,अपनी तिजोरी भरकर ये बहुत बड़ी ठगी करते हैं ।
जो भी भाई , बहन इन न्यूज़ चेनल्स के लिए काम करते हैं ,या जिनके ये न्यूज़ चेनल्स हैं उनसे मेरा अनुरोध हैं की आप सभी पर बहुत जिम्मेदारी हैं ,न्यूज़ देना ,उसका प्रसारण करना ,उसे पढ़ना कोई आसन काम नही हैं । बहुत ही लगन से किया जाने वाला काम हैं । आपका दायित्व हैं सच और झूठ का सही सही पता लगना,जनता को सही सही जानकारी देना। समाचारों की कोई कमी नही ,पर समाचार किसे बनाया जाना चाहिए इसका खरा निर्णय आप पर हैं । आप जो भी अपने चेनल पर दिखा रहे हैं उसके संबंध में आपने कितना जाना हैं, रिसर्च किया हैं ,यह बहुत महत्वपूर्ण हैं ,इसलिए कृपया अपने उत्तरदायित्व को समझे और इन न्यूज़ चेनल्स के साथ -साथ देश और जनता का भी भला होने दे ।
इति ।
पिछली कुछ प्रविष्टियों पर श्री अनूप शुक्ल जी ,सुश्री संगीता पुरी जी, श्री समीर लाल जी ,श्री संजय जी ,श्री शिव कुमार मिश्रा जी,श्री कुश जी ,सुश्री रंजना भाटिया जी ,श्री मोहन वशिष्ठ जी,,श्री रंजन जी ,श्री अनुनाद जी,सुश्री लावण्या जी ,श्री रोहित जी,श्री दीपक जी ,श्री दिनेश राय द्विवेदी जी ,श्री मार्कंड जी ,श्री अभिषेक ओझा जी , श्री सागर नाहर जी और अन्य कई पाठको की टिप्पणियाँ मिली । आप सभी को धन्यवाद । आपकी टिप्पणियों से मुझे लिखने की प्रेरणा मिलती हैं ।
Subscribe to:
Posts (Atom)
