अनजान ईमारत में बैठा वो जोर से रो रहा था ।
जाने क्या गम था ? आसूओं में जग भिगो रहा था ।
मैंने जाकर पूछा भाई क्यो इस कदर रो रहे हो ?
जिंदगी हैं चार दिन की क्यों दुःख में खो रहे हो ?
उसने पलट कर देखा मुझे ,मैं देख घबराई ।
झुर्रीदार चेहरा उसका ,आवाज भी थी भर्राई ।
मैले कुचेले कपड़े पहने ,वो सदियों से बैठा था ।
कोई न था सगा उसका हर कोई यह कहता था ।
मैंने पूछा भाई मेरे, अपना दुःख मुझे बताओ ।
कोई नही गर तुम्हारा, बेटी समझ कह जाओ ।
वह बोला बेटी मेरी क्या तुम्हे मैं बतलाऊ ?
मतलबी दुनिया का चलन कैसे मैं समझाऊ ?
एक समय था जब हर कोई मेरे लिए जीता था।
मेरे लिए ही तरसता ,मेरे लिए मरता था ।
मुझे ही सब कुछ मान गृहणी अपना घर सजाती थी।
माँ मुझसे ही सीख बच्चों को लोरी सुनाती थी।
बच्चे बुढे के मन में बस मैं ही रहता था।
जिंदगी की खुशियाँ चुन चुन सबको देता था।
पर जबसे आया धन छोटे -बडो के हाथ में ।
दुनिया भूली मुझको मैं बैठा इस आघात में ।
आज चहुँ ओर बस पैसे की लडाई हैं।
पैसा हुआ तो भाई वरना सब कसाई हैं।
दुःख तो तुम्हारा मैंने कहा ....,भाई मेरे जायज हैं।
पर हो कौन तुम दुनिया तुमसे क्यों भरमाई हैं ?
बोला वह .....................शब्द थे या हथियार?
आँखों से मेरे भी लगे झरने आसूं जब कहा उसने ...........
मैं हूँ प्यार .................................................
कहते हैं बेटी माँ की परछाई होती हैं ,वो मेरी परछाई नही ,एक दैवीय ज्योति हैं,जो जीवन को प्रकाशित करती हैं मेरा ही चेहरा,मेरी शक्ति,शांति,संगती ,गीति,आरोही ....
Friday, October 17, 2008
वो स्कूली बच्चे !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

मेरे घर के पास , बिल्कुल पास एक गली में स्कूल हैं ,लगभग दुपहर के इसी समय विद्यालय शुरू होता हैं .मेरा स्कूल के रास्ते से अनेको बार आना जाना होता हैं ,स्लेटी -सफ़ेद रंग का गणवेश (युनिफोर्म )पहने बच्चे साईकिल पर , कुछ चलते हुए ,कुछ भागते -गिरते हुए,हँसते-हँसाते हुए,कुछ हाथो में हाथ डाल ,झूमते -घूमते बतियाते विद्यालय प्रांगण में प्रवेश करते हैं ,इस विद्यालय के प्रांगण को प्रांगण कहना कहाँ तक उचित हैं यह मैं नही जानती ,दरअसल एक छोटी सी ईमारत; कुल मिलाकर दो कमरों की एक ईमारत को विद्यालय में परिवर्तित किया गया हैं, उन्ही दो कमरों में सारा विद्यालय ,सारी कक्षाएँ चलती हैं ,एक कमरे से दुसरे कमरे तक और हाँ बालकनी तक बच्चे पंक्तिबद्ध होकर खड़े होते हैं और तब प्रारम्भ की ईश प्रार्थना होती हैं ,६-से ८ अध्यापक और अधिकतर अध्यापिकाएं ही हैं जो इतने से विद्यालय के दो कमरों में चार से ८ कक्षाएँ संचालित कर लेते हैं ,बच्चों के पास खेलने के लिए न कोई प्रांगण हैं न गेम्स रूम । जब भोजनावकाश होता हैं तो सारे बच्चे जिनमें ३-४ बरस के बच्चे भी शामिल होते हैं सड़क पर खेलने आ जाते हैं ,उस गली में शहर का नामी और बहुत बड़ा अस्पताल हैं,साथ ही कई अच्छी दुकाने भी ,इस लिए आने जाने वालो की भीड़ हमेशा रहती हैं ,मुझे कई बार डर लगता हैं की कहीं कोई बच्चा गाड़ी के नीचें न आ जाए । कहीं कोई बच्चा खो न जाए ।
आजकल विद्यालयों में इतनी सुरक्षा ,सुविधाएँ होती हैं ,जिनकी कुछ वर्ष पूर्व कल्पना भी नही की जा सकती थी, हर एक्टिविटी के लिए अलग कक्ष ,अलग अध्यापिका ,अलग पुस्तक ,पुस्तिका । हर बच्चे की सुरक्षा का पूर्ण ध्यान ।
न जाने कितने विषय ,कितनी भाषायें,खेलों के कितने प्रकार ,संगीत की कक्षाएँ , हस्तकला ,सिलाई,बुनाई ,चित्रकला सभी के कालखंड ,विद्यालय का समय सुबह सात से शाम ४ ,घर आने के बाद होमवर्क का बोझ ,गणित अंग्रेजी की ट्यूशन ,बच्चा विद्यालय की पैसा बनाओ ,पालक लुभाओ तंत्र का एक मोहरा मात्र ।
हम भी स्कूल जाते थे,खेलते थे ,पढ़ते थे ,आगे बढ़ते थे ,पर कभी ट्यूशन नही गए ,अच्छा हैं स्कूल सब सिखा रहे हैं ,पर सिखाने और दिमाग में ठुसने में अंतर होना चाहिए न ,उनकी उम्र से अधिक ज्ञान ,उनके खेल कूद को भी अध्ययन का रूप ................................!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
जानते हैं शहर की मेरिट लिस्ट में उसी विद्यालय जिसका जिक्र मैंने पहले किया के दो बच्चे अव्वल आए हैं ,मैं यह नही कहती बच्चों को हमेशा ऐसे स्कूल में पढ़ना चाहिए जो दो कमरों का हो ,जहाँ बच्चों की सुरक्षा का कोई ख्याल न हो ,पर इससे एक बात तो साफ हैं सीखना एक आत्मिक -मानसिक क्रिया हैं ,बच्चे तब ही सीख पाते हैं जब वह इसमे अपना मन लगते हैं ,अपनी आत्मा डुबोते हैं ।
हम बोनसाई करके पेडो से छोटे से रूप में फल फुल तो प्राप्त कर लेते हैं पर उनका सही और असली रूप पनपने नही देते ,बच्चे भी इन हँसते खेलते पौधों की तरह होते हैं ,समय समय पर उनकी काट - छाट होना जरुरी हैं पर खुली हवा में ,धुप में छाव में ,उनका बढ़ना भी जरुरी हैं । वो नदिया का पानी हैं ,जो अपनी दिशा ख़ुद ही तय कर लेता हैं ,वो सुगंधी हवाएं हैं जिन्हें जब और जहाँ बहाना हैं तब और वहीं बहती हैं ,उन्हें पनपने का मौका देना ही चाहिए ,तभी हम एक बच्चे से एक महान व्यक्तित्व तैयार होने की आशा कर सकते हैं ,अन्यथा सिर्फ़ पुस्तकी कीडा ।
Thursday, October 16, 2008
माँ तुम कहाँ खो गयी ?
पिछले दिनों पंचगनी और महाबलेश्वर जाना हुआ,हमारे शहर से तक़रीबन १७-१८ घंटे का सफर तय करके हम वहां पहुँचे । एक तो पंचगनी में ट्रेन जाती नही और मुझे बस भाती नही ,बस देखकर ही मुझे गुस्सा आने लगता हैं ,पर फ़िर भी एसी बस में भगवान का नाम लेते हुए ,आरोही को पतिदेव को सँभालने देकर, आखें मूंद कर; सोते सोते किसी तरह सफर पुरा किया । इतने लंबे सफर के बाद लग रहा था की कहाँ से यहाँ आ गये इतनी दूर .लेकिन बस से उतरते ही जब मैंने पंचगनी का प्राकृतिक सौंदर्य देखा तो सारी थकान उतर गयी ,तीन दिन कब खत्म हो गए पता ही नही चला , दूर दूर तक फैले पहाड़ ,उन पहाडो पर बिछी वृक्षो - पौधों की हरी चादर ,कहीं कहीं पीले रंग के फूलो से ढकी पर्वत श्रृंखलाऐ ,सुंदर वादियाँ,सुनहली धुप ,कभी हल्की छाव,ठंडी हवा ,कभी पंछियों का कलरव , कल कल ,छल छल बहते झरने ,यह सब स्वपन सा सुंदर ।
हमें नही पता था की हमारी कल्पना से अधिक नैसर्गिक सौंदर्य हमें महाबलेश्वर में देखने को मिलेगा,महाबलेश्वर पर मानो शिव और शिवा की विशेष कृपा हैं ,वहाँ की नैसर्गिक सुन्दरता का वर्णन करने के लिए मेरे पास शब्द नही हैं , मुझे नही लगता की कोई कविता,कोई आलेख ,कोई चित्र उस प्राकृतिक सुंदरता का सही- सही और पुरा वर्णन कर पायेगा/पायेगी , प्रकृति के उस सुंदर रूप को मैंने अपनी आखों में बसा लिया हैं।
कहते हैं माँ सिर्फ़ वही नही होती जो जन्म देती हैं ,माँ वह होती हैं जो पालती हैं ,पोसती हैं ,संरक्षण करती हैं ,इस अर्थ से प्रकृति भी हमारी माँ ही हुई न ! वहाँ जाकर मुझे भी कुछ ऐसा ही लगा जैसे मैं अपनी माँ की गोद में सर रखकर बैठी हूँ , माँ मेरे मन को अपने प्रेम से परिपूर्ण कर रही थी ,अपनी उपस्तिथि से मुझे आत्मिक शांति और आनंद प्रदान कर रही थी ।
हम में से शायद ही कोई होगा जिसे प्राकृतिक सौंदर्य से घृणा हो ,जिसे अपने आस- पास पेड़ पौधे देखना पसंद न हो ,जिसे पेडों की छाया में खड़े रहना ,नरम घास /दूब पर चलना पसंद न हो ,जिसे फूलो की सुगंध से नफ़रत हो ।
हम सभी उन स्थानों पर घुमने जाना पसंद करते हैं ,जहाँ पेड़ पौधों से हरियाली हो,इसलिए हम अपने आस पास उद्यान (गार्डन )बनाते हैं ,सुबह शाम वहाँ घुमने जाते हैं ।
प्रकृति हमारी माँ हैं उसने हमें धुप ,गर्मी ,मौसम की मार से हमेशा संरक्षण प्रदान किया हैं ,शुद्ध हवा दी हैं ,फलफूल ,भोजन दिया हैं । फ़िर भी हमने उसके साथ क्या किया ?अपने घर बनाने के लिए ,शॉपिंग मॉल बनाने के लिए ,फेक्ट्री बनाने के लिए उसे ही खत्म किया हैं .हर बार एक घर के लिए ४ -८ वृक्ष कटते हैं ,शहरो में हरी धरती देखना किस्से कहानियो की बात हो गयी हैं , साफ हवा की तो क्या कहिये ,रात के दस -१२ बजे भी वाहनों का धुआं वातावरण में इस कदर घुला मिला रहता हैं , उस समय भी वाहनों के धुएँ वाली हवा के कारण घुटन होती रहती हैं । कभी कभी सोचती हूँ आरोही जब बड़ी होगी तो उस समय ये बची खुची प्राकृतिक सुंदरता क्या उसे या उसके बच्चो को देखना नसीब होगी ?
जब भी कभी मेरे सामने एक पेड़ कटता हैं ,मेरे मन जोर जोर से रोता हैं ,उस पेड़ काटने वालो से पूछता हैं ,निर्दय मनुष्य इस सुंदर ,निर्दोष वृक्ष ने तुम्हारा क्या बिघाडा हैं ?यह तो मात्र थोड़ा सा पानी मांगता हैं ,निस्वार्थ भाव से ,सभीको ,छाया देता हैं .कभी सुंदर फूलो से तुम्हारे घर के सामने की राह को ढक कर तुम्हारे घर को सजाता हैं ,कभी स्वादिष्ट फलो से बच्चो के हृदयों को आनंद से भर देता हैं । पर हज़ार चाहने के बाद, कोशिशों के बाद भी पेड़ कटता हैं ?हरी भरी वसुंधरा ,पत्थरों की मीनार में ,हवेली में ,बंगले में ,फेक्ट्री से निकलने वाले रसायनों से जलकर ख़त्म होकर ,मरुभूमि में बदल जाती हैं । और मैं प्रकृति माता से माफ़ी मांगती हुई उसे पुकारती रहती हूँ ,पूछती रहती हूँ माँ तुम कहाँ खो गयी ?
हमें नही पता था की हमारी कल्पना से अधिक नैसर्गिक सौंदर्य हमें महाबलेश्वर में देखने को मिलेगा,महाबलेश्वर पर मानो शिव और शिवा की विशेष कृपा हैं ,वहाँ की नैसर्गिक सुन्दरता का वर्णन करने के लिए मेरे पास शब्द नही हैं , मुझे नही लगता की कोई कविता,कोई आलेख ,कोई चित्र उस प्राकृतिक सुंदरता का सही- सही और पुरा वर्णन कर पायेगा/पायेगी , प्रकृति के उस सुंदर रूप को मैंने अपनी आखों में बसा लिया हैं।
कहते हैं माँ सिर्फ़ वही नही होती जो जन्म देती हैं ,माँ वह होती हैं जो पालती हैं ,पोसती हैं ,संरक्षण करती हैं ,इस अर्थ से प्रकृति भी हमारी माँ ही हुई न ! वहाँ जाकर मुझे भी कुछ ऐसा ही लगा जैसे मैं अपनी माँ की गोद में सर रखकर बैठी हूँ , माँ मेरे मन को अपने प्रेम से परिपूर्ण कर रही थी ,अपनी उपस्तिथि से मुझे आत्मिक शांति और आनंद प्रदान कर रही थी ।
हम में से शायद ही कोई होगा जिसे प्राकृतिक सौंदर्य से घृणा हो ,जिसे अपने आस- पास पेड़ पौधे देखना पसंद न हो ,जिसे पेडों की छाया में खड़े रहना ,नरम घास /दूब पर चलना पसंद न हो ,जिसे फूलो की सुगंध से नफ़रत हो ।
हम सभी उन स्थानों पर घुमने जाना पसंद करते हैं ,जहाँ पेड़ पौधों से हरियाली हो,इसलिए हम अपने आस पास उद्यान (गार्डन )बनाते हैं ,सुबह शाम वहाँ घुमने जाते हैं ।
प्रकृति हमारी माँ हैं उसने हमें धुप ,गर्मी ,मौसम की मार से हमेशा संरक्षण प्रदान किया हैं ,शुद्ध हवा दी हैं ,फलफूल ,भोजन दिया हैं । फ़िर भी हमने उसके साथ क्या किया ?अपने घर बनाने के लिए ,शॉपिंग मॉल बनाने के लिए ,फेक्ट्री बनाने के लिए उसे ही खत्म किया हैं .हर बार एक घर के लिए ४ -८ वृक्ष कटते हैं ,शहरो में हरी धरती देखना किस्से कहानियो की बात हो गयी हैं , साफ हवा की तो क्या कहिये ,रात के दस -१२ बजे भी वाहनों का धुआं वातावरण में इस कदर घुला मिला रहता हैं , उस समय भी वाहनों के धुएँ वाली हवा के कारण घुटन होती रहती हैं । कभी कभी सोचती हूँ आरोही जब बड़ी होगी तो उस समय ये बची खुची प्राकृतिक सुंदरता क्या उसे या उसके बच्चो को देखना नसीब होगी ?
जब भी कभी मेरे सामने एक पेड़ कटता हैं ,मेरे मन जोर जोर से रोता हैं ,उस पेड़ काटने वालो से पूछता हैं ,निर्दय मनुष्य इस सुंदर ,निर्दोष वृक्ष ने तुम्हारा क्या बिघाडा हैं ?यह तो मात्र थोड़ा सा पानी मांगता हैं ,निस्वार्थ भाव से ,सभीको ,छाया देता हैं .कभी सुंदर फूलो से तुम्हारे घर के सामने की राह को ढक कर तुम्हारे घर को सजाता हैं ,कभी स्वादिष्ट फलो से बच्चो के हृदयों को आनंद से भर देता हैं । पर हज़ार चाहने के बाद, कोशिशों के बाद भी पेड़ कटता हैं ?हरी भरी वसुंधरा ,पत्थरों की मीनार में ,हवेली में ,बंगले में ,फेक्ट्री से निकलने वाले रसायनों से जलकर ख़त्म होकर ,मरुभूमि में बदल जाती हैं । और मैं प्रकृति माता से माफ़ी मांगती हुई उसे पुकारती रहती हूँ ,पूछती रहती हूँ माँ तुम कहाँ खो गयी ?
Tuesday, October 14, 2008
नारी संरक्षण ,विकास . कैसे ?
जबसे ब्लॉग जगत में आई हूँ ,नारी के विकास के विषय में बहुत सारी चर्चा होते हुए देखी हैं ,पढ़कर बहुत अच्छा लगता हैं की,आज की नारियां नारी विकास के विषय में बहुत सगज और गंभीर साथ ही दॄढ प्रतिघ्य हैं ,यह जानकर और भी अच्छा लगता हैं की सिर्फ़ महिलाये ही नही कुछ पुरूष भी नारी विकास के विषय में सकारात्मक और अच्छा लिख रहे हैं ,हर कोई चाह रहा हैं नारी का विकास हो, उन्नति हो । हर कोई अपने नजरिये से इस प्रश्न का हल खोज रहा हैं की आज के युग में जहाँ नारी ,घर की जिम्मेदारी सँभालने के साथ , अध्ययन ,अध्यापन , अर्थ उपार्जन ,सब क्षेत्रो में काफी आगे बढ़ गई हैं , उसने जहाँ अपनी कार्यकुशलता को सिद्ध किया हैं ,उसे पुरा संरक्षण कैसे मिले और उसका विकास अधिकाधिक कैसे हो ?
मैंने भी अपने आसपास बहुत सी लड़कियों को कभी मनचाहा शिक्षण पाने के लिए ,अपने केरियर के लिए ,अपनी सुरक्षा के लिए ,अपने विवाह से संबंधित विषय पर परेशान होते ,लड़ते - झगड़ते देखा हैं । कई बार इस मुद्दे पर बहुत विचार किया हैं की ये सब क्या हो रहा हैं ?क्यों हो रहा हैं ?कब तक होता रहेगा?सिर्फ़ शारीरिक दृष्टि से दुर्बल होने का परिणाम नारी कब तक भोगती रहेगी ?
हर बार यही उत्तर मिला हैं की यह समस्या सिर्फ़ नारी की नही पुरे समाज की हैं ,क्योकि नारी और पुरूष ही समाज के घटक हैं ,इसलिए अगर समाज के किसी तत्त्व को कोई समस्या हैं तो वह सम्पूर्ण समाज की समस्या हैं ,और सम्पूर्ण समाज की मनोवृति ,या कहे सोच को बदल कर ,सामाजिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करकर ही इस समस्या का निराकरण सम्भव हैं । बात जब स्त्रियों के साथ हो रही छेड़खानी की आती हैं तो मैं बार बार कहती हूँ की इसके लिए स्त्री को ही सबसे पहले खुदको सबल और हिम्मती बनाना होगा ,जब जब स्त्रियाँ अपने साथ हुई इस छेड़खानी का सही -सही उत्तर इन ग़लत लोगो को देंगी तब तब उन्हें देखकर अन्य स्त्रियों की हिम्मत बढेगी और ऐसे मनचलों की हिम्मत घटेगी .हर लड़की को मेरे विचार से जुडो- कराटे जैसी विधाये स्वरक्षा के लिए सीखनी ही चाहिए ।साथ ही उसके संरक्ष्ण के लिए बने कानूनों का पूर्ण उपयोग करना चाहिए , अगर कोई किसी महिला से गलत व्ह्य्वार करता हैं तो इसके लिए स्त्री को ख़ुद ग्लानी महसूस करनी नही चाहिए यह उसकी नही बल्कि उस व्यक्ति की गलती हैं जिसने उसके साथ ऐसा किया हैं ,चरित्र नारी का नही उस व्यक्ति का खराब हुआ हैं ,बाकायदा हिम्मत करके उसके खिलाफ कार्यवाही करनी चाहिए ।
बात जब पुरुषों की मनोवृत्ति बदलने की आती हैं तो मैं पुनः कहूँगी सारे पुरूष गलत नही होते ,समाज में अगर बुरे लोग हैं तो अच्छे भी लोग हैं नारी का सम्मान करने वाले ,उसे माँ का दर्जा देने वाले भी कई पुरूष हैं , जो गलत हैं ,जिनकी विकृत मनोवृत्ति हैं ,उनको अगर कहें की भाई अपनी सोच बदलो तो वह नही बदलने वाले ,कुछ को दैवीय कृपा के चलते अच्छे बुरे की समझ आ जाए तो यह चमत्कार ही होगा।
नारी जननी हैं ,माँ हैं ,वह एक व्यक्ति को जन्म मात्र ही नही देती बल्कि एक व्यक्तित्व निर्माण करती हैं ,इसलिए सबसे पहले स्वयं के विकास के लिए नारी को ख़ुद की क्षमताओ और अपने गुणों को अपने दैवीय रूप को समझाना जरुरी हैं ,जब स्त्री ही स्त्री के दुःख का कारण बनती हैं तो दुःख सबसे ज्यादा होता हैं , क्यो एक माँ अपने पति का या अपने बेटे का विरोध तब ज्यादा नही कर पाती जब वह उसकी लाडली ,पढ़ी लिखी बेटी की शादी किसी वयोवृद्ध या अनपढ़ व्यक्ति के साथ सिर्फ़ इसलिए कर देता हैं की उम्र २८ की हो गई अभी तक कुँवारी बैठी हैं ? क्यो एक सास अपनी बहूँ का साथ सिर्फ़ इसलिए नही दे पाती की बेटे का साथ न देने पर समाज आलोचना करेगा ?क्यों दहेज़ की बात आने पर माँ ,सास न चाहते हुए भी अपने घर के बडो का विरोध नही कर पाती ?क्यों एक स्त्री होते हुए भी एक स्त्री के जन्म पर वही सबसे ज्यादा दुखी हो जाती हैं ?क्यों किसी लड़की के साथ गलत हो जाने पर ,कई नारियां भी उसे ही दोष देती हैं ,या उसे बिचारी कहती हैं ?क्योकि वर्षो से उसको सिर्फ़ यही सिखाया गया हैं की उसे पुरूष की अनुसरणी बनकर चलना हैं ,उसे उसकी माँ ने, माँ की माँ ने ,पिता ने ,दादा ने,नानी ने नाना ने ,यही सिखाया हैं की बेटी तू बेटी हैं तुझे सहन करना हैं ।यह सही हैं की नारी में धैर्य ,सहनशीलता ,आदि गुण ज्यादा होते हैं ,और उन्ही गुणों के होने के कारण वह अपने परिवार को संभाल पाती हैं, सहेज पाती हैं । किंतु उन गुणों का हवाला देकर अत्याचार सहन करना गलत था, गलत हैं और गलत ही होगा . हो यह रहा हैं की नारी पढने लिखने के बाद भी ख़ुद को उस सोच से बाहर नही निकाल पा रही ,वह जितना पुरूष के कारण दुखी हैं ,बंधन में हैं ,उससे कहीं ज्यादा खुदने स्वयं को उसी सोच में बाँध कर रखा हैं । आजकल सोच बदली हैं और कुछ जागरूक नारियां इस संबंध में जागृति भी फैला रही हैं .किंतु हर अच्छी चीज़ की शुरुआत घर से ही होती हैं ,जरुरत हैं की नारी स्वयं को कम न समझे,अपने बेटो को वही संस्कार दे ,नारी का सम्मान सच्चे अर्थो में करना सिखाये,अभी भी देर नही हुई हैं,कम से कम आगे आने वाली पीढी में तो ऐसे पुरूष नही होंगे जो नारी का निरादर करेंगे,और जो निरादर करके रहे हैं ,नारी के सबल होने से उसका भयपुर्वक या आदर पूर्वक सम्मान ही करेंगे ।
हाँ एक बात और ये हिन्दी सिनेमा ने नारी को अबला दिखाने में कोई कसर नही छोड़ी हैं ,अमूमन हिन्दी सिनेमा में एक लड़की को लड़के छेड़ते हैं और वह हीरो को आवाज़ देती रह जाती हैं या गुंडों से विनती करती रह जाती हैं यह दिखाया जाता रहा हैं, दिखाया जाता हैं । इसका विरोध होना ही चाहिए ,लड़की के साथ छेड़ छाड हो रही हैं ऐसे दृश्यों से पिक्चर तो चलती हैं किंतु नारी की गरिमा का अपमान होता हैं ऐसे दृश्यों पर रोक लगनी चाहिए ।
इति
मैंने भी अपने आसपास बहुत सी लड़कियों को कभी मनचाहा शिक्षण पाने के लिए ,अपने केरियर के लिए ,अपनी सुरक्षा के लिए ,अपने विवाह से संबंधित विषय पर परेशान होते ,लड़ते - झगड़ते देखा हैं । कई बार इस मुद्दे पर बहुत विचार किया हैं की ये सब क्या हो रहा हैं ?क्यों हो रहा हैं ?कब तक होता रहेगा?सिर्फ़ शारीरिक दृष्टि से दुर्बल होने का परिणाम नारी कब तक भोगती रहेगी ?
हर बार यही उत्तर मिला हैं की यह समस्या सिर्फ़ नारी की नही पुरे समाज की हैं ,क्योकि नारी और पुरूष ही समाज के घटक हैं ,इसलिए अगर समाज के किसी तत्त्व को कोई समस्या हैं तो वह सम्पूर्ण समाज की समस्या हैं ,और सम्पूर्ण समाज की मनोवृति ,या कहे सोच को बदल कर ,सामाजिक व्यवस्था में आमूलचूल परिवर्तन करकर ही इस समस्या का निराकरण सम्भव हैं । बात जब स्त्रियों के साथ हो रही छेड़खानी की आती हैं तो मैं बार बार कहती हूँ की इसके लिए स्त्री को ही सबसे पहले खुदको सबल और हिम्मती बनाना होगा ,जब जब स्त्रियाँ अपने साथ हुई इस छेड़खानी का सही -सही उत्तर इन ग़लत लोगो को देंगी तब तब उन्हें देखकर अन्य स्त्रियों की हिम्मत बढेगी और ऐसे मनचलों की हिम्मत घटेगी .हर लड़की को मेरे विचार से जुडो- कराटे जैसी विधाये स्वरक्षा के लिए सीखनी ही चाहिए ।साथ ही उसके संरक्ष्ण के लिए बने कानूनों का पूर्ण उपयोग करना चाहिए , अगर कोई किसी महिला से गलत व्ह्य्वार करता हैं तो इसके लिए स्त्री को ख़ुद ग्लानी महसूस करनी नही चाहिए यह उसकी नही बल्कि उस व्यक्ति की गलती हैं जिसने उसके साथ ऐसा किया हैं ,चरित्र नारी का नही उस व्यक्ति का खराब हुआ हैं ,बाकायदा हिम्मत करके उसके खिलाफ कार्यवाही करनी चाहिए ।
बात जब पुरुषों की मनोवृत्ति बदलने की आती हैं तो मैं पुनः कहूँगी सारे पुरूष गलत नही होते ,समाज में अगर बुरे लोग हैं तो अच्छे भी लोग हैं नारी का सम्मान करने वाले ,उसे माँ का दर्जा देने वाले भी कई पुरूष हैं , जो गलत हैं ,जिनकी विकृत मनोवृत्ति हैं ,उनको अगर कहें की भाई अपनी सोच बदलो तो वह नही बदलने वाले ,कुछ को दैवीय कृपा के चलते अच्छे बुरे की समझ आ जाए तो यह चमत्कार ही होगा।
नारी जननी हैं ,माँ हैं ,वह एक व्यक्ति को जन्म मात्र ही नही देती बल्कि एक व्यक्तित्व निर्माण करती हैं ,इसलिए सबसे पहले स्वयं के विकास के लिए नारी को ख़ुद की क्षमताओ और अपने गुणों को अपने दैवीय रूप को समझाना जरुरी हैं ,जब स्त्री ही स्त्री के दुःख का कारण बनती हैं तो दुःख सबसे ज्यादा होता हैं , क्यो एक माँ अपने पति का या अपने बेटे का विरोध तब ज्यादा नही कर पाती जब वह उसकी लाडली ,पढ़ी लिखी बेटी की शादी किसी वयोवृद्ध या अनपढ़ व्यक्ति के साथ सिर्फ़ इसलिए कर देता हैं की उम्र २८ की हो गई अभी तक कुँवारी बैठी हैं ? क्यो एक सास अपनी बहूँ का साथ सिर्फ़ इसलिए नही दे पाती की बेटे का साथ न देने पर समाज आलोचना करेगा ?क्यों दहेज़ की बात आने पर माँ ,सास न चाहते हुए भी अपने घर के बडो का विरोध नही कर पाती ?क्यों एक स्त्री होते हुए भी एक स्त्री के जन्म पर वही सबसे ज्यादा दुखी हो जाती हैं ?क्यों किसी लड़की के साथ गलत हो जाने पर ,कई नारियां भी उसे ही दोष देती हैं ,या उसे बिचारी कहती हैं ?क्योकि वर्षो से उसको सिर्फ़ यही सिखाया गया हैं की उसे पुरूष की अनुसरणी बनकर चलना हैं ,उसे उसकी माँ ने, माँ की माँ ने ,पिता ने ,दादा ने,नानी ने नाना ने ,यही सिखाया हैं की बेटी तू बेटी हैं तुझे सहन करना हैं ।यह सही हैं की नारी में धैर्य ,सहनशीलता ,आदि गुण ज्यादा होते हैं ,और उन्ही गुणों के होने के कारण वह अपने परिवार को संभाल पाती हैं, सहेज पाती हैं । किंतु उन गुणों का हवाला देकर अत्याचार सहन करना गलत था, गलत हैं और गलत ही होगा . हो यह रहा हैं की नारी पढने लिखने के बाद भी ख़ुद को उस सोच से बाहर नही निकाल पा रही ,वह जितना पुरूष के कारण दुखी हैं ,बंधन में हैं ,उससे कहीं ज्यादा खुदने स्वयं को उसी सोच में बाँध कर रखा हैं । आजकल सोच बदली हैं और कुछ जागरूक नारियां इस संबंध में जागृति भी फैला रही हैं .किंतु हर अच्छी चीज़ की शुरुआत घर से ही होती हैं ,जरुरत हैं की नारी स्वयं को कम न समझे,अपने बेटो को वही संस्कार दे ,नारी का सम्मान सच्चे अर्थो में करना सिखाये,अभी भी देर नही हुई हैं,कम से कम आगे आने वाली पीढी में तो ऐसे पुरूष नही होंगे जो नारी का निरादर करेंगे,और जो निरादर करके रहे हैं ,नारी के सबल होने से उसका भयपुर्वक या आदर पूर्वक सम्मान ही करेंगे ।
हाँ एक बात और ये हिन्दी सिनेमा ने नारी को अबला दिखाने में कोई कसर नही छोड़ी हैं ,अमूमन हिन्दी सिनेमा में एक लड़की को लड़के छेड़ते हैं और वह हीरो को आवाज़ देती रह जाती हैं या गुंडों से विनती करती रह जाती हैं यह दिखाया जाता रहा हैं, दिखाया जाता हैं । इसका विरोध होना ही चाहिए ,लड़की के साथ छेड़ छाड हो रही हैं ऐसे दृश्यों से पिक्चर तो चलती हैं किंतु नारी की गरिमा का अपमान होता हैं ऐसे दृश्यों पर रोक लगनी चाहिए ।
इति
Monday, October 6, 2008
जिम्मेदार कौन?
कल कुछ काम से बाहर जाना था ,बेटी के साथ ऑटो में बैठी ,दुपहर का समय फ़िर भी रास्तो पर भीड़,चारो तरफ़ वाहनों का कोलाहल सब कुछ बडा बुरा लग रहा था , तभी ऑटो के सामने की तरफ़ छोटे छोटे अक्षरों में लिखे एक वाक्य पर नज़र गई ,वाक्य था "तूच तुझ्या जीवनाचा शिल्पकार "अर्थात तू स्वत: ही तेरे जीवन का शिल्पकार हैं ,अक्सर ऑटो पर कभी कोई शायरी ,कोई गीत लिखा होता हैं , पहली बार मैंने किसी ऑटो में इतना सुंदर और सच्चा वाक्य लिखा हुआ देखा ।
हम अक्सर सोचते हैं ?ऐसा हमारे साथ क्यों हुआ ?हमारी जिन्दगी में वह खुशियाँ क्यों नही हैं जो दूसरो के जीवन में हैं ?हम उससे अधिक काबिल हैं फ़िर भी उसे जो मान सम्मान मिला हैं ,हमारे पास क्यों नही ?उसके पास ये हैं ,वो हैं ,हमारे पास क्यों नही ?क्यों आख़िर हम हर क्षेत्र में उससे ज्यादा बुद्धिमान ,विद्वान होकर भी उससे काफी पीछे हैं ?गीता में कहा हैं जैसा कर्म करोगे वैसा फल मिलेगा । हमारा कर्म तो काफी अच्छा था ,तो हमें वैसा फल क्यो नही मिला ?आदि आदि आदि ............... और यह सब सोच कर कभी हम निराश हो जाते हैं ,कभी उदास ,परेशान और हताश । जीवन भर सोचने के बाद हमें जब इस प्रश्न का उत्तर नही मिलता तो एक सीधा सरल उपाय हम अपना लेते हैं ,आशावादी ,हताशावादी होने के बाद हम भाग्यवादी हो जाते हैं ।" क्या करे यह हमारे भाग्य में ही नही था ",ये वाक्य अकर्मण्यता और अपराध बोध को छुपाने वाला एकमात्र आदर्श वाक्य हैं । इसे कहने के बाद कहने और सुनने वाले के पास दूसरा कुछ कहने और सुनने के लिए नही रह जाता ।
वस्तुत: हम अपने जीवन से जुड़ी सभी घटनाओ की, परिस्तिथियों की जिम्मेदारी लेना ही नही चाहते ,हम जानकर भी नही जानना चाहते की हमने अपने जीवन में जो भी असफलताएँ पाई हैं उनके मूल कारण कहीं न कहीं हम स्वयम ही हैं ,हम अगर गहरे से विचार करे ,चिंतन करे तो हम आसानी से जान सकते हैं की हम औरो से ज्यादा बुद्धिमान ,मेहनती ,कर्तव्य निष्ठ होकर भी आज उससे हारे हुए क्यों हैं ?सिर्फ़ मंथन पुरी सच्चाई से किया जाना जरुरी हैं ,उसमे स्वयं से स्वयं की असफलता छुपा लेने वाला भाव नही होना चाहिए ।
हम कभी दोष देते हैं अपने माता पिता को,रिश्तेदारों को ,भाई -बहनों को,संस्कृति,संस्कारो को ,समाज को, देश को ,गरीबी को ,अमीरी को पर हमारी हार में दोष सिर्फ़ हमारा होता हैं ।
उदहारण स्वरुप हमने एक अच्छा अभिनेता/अभिनेत्री होने की ठानी ,पर हम नही बन सके ,जबकि हम जानते हैं की हम औरो से अच्छे अभिनेता या अभिनेत्री बन सकते थे ,वह भी अपनी शर्तो पर । अब जब हम सोचते हैं हम अभिनेता क्यों नही बन सके . तो विचारो का क्रम कुछ इस प्रकार शुरू होता हैं , हमारे माता पिता को हमारा अभिनय करना पसंद नही था .................. माता पिता की तो मनाही नही थी पर दादा दादी को पसंद नही था ,..........हमारे चाचा की बड़ी इच्छा थी की हम लेखक /लेखिका बने , ...............घर की आर्थिक परिस्तिथी अच्छी नही थी ,............ आसपास कोई अच्छा अभिनय विद्यालय नही था , ..............हमारे घर के लोगो की टीवी चेनल्स में जान पहचान नही थी ,हम छ: भाई- बहन थे ,मैं बड़ा भाई था /बहन थी । और अंत में वही सुंदर सा वाक्य शायद मेरे भाग्य में ही नही था ।
जबकि विचारो का क्रम ऐसा होना चाहिए ,मैं अपने माता पिता ,दादा-दादी ,को अपनी बात समझा नही सका /सकी ,मैंने अपने चाचा की इच्छा का सम्मान करते हुए अपनी इच्छा का सम्मान नही किया ,जबकि दोनों की इच्छा को न्याय दिया जा सकता था , मैं चाहता /चाहती तो इस सब पर कोई न कोई उपाय जरुर निकला जा सकता था। और अंत में मैंने कहीं न कहीं अपने जीवन को गुण ,ज्ञान और सफलता के शिखर पर ले जाने में कोई कमी की हैं और इसी कारण से आज मैं पीछे हूँ,हारा हुआ /हुई हूँ ।
यह सत्य हैं की मानव जीवन कठिनाइयों से भरा हुआ हैं ,अपने सपनो को सच करना कभी आसन नही था, नही होगा पर अगर वास्तव में अपने सपनो को सच करना हैं तो मन में पुरा विश्वास ,प्रबल इच्छा शक्ति के साथ इस बात का भी एहसास होना चाहिए की कोई और नही हमारे जीवन के शिल्पकार हम स्वयं हैं ,यह किसी ओर का जीवन नही और हमारी सफलताओ -असफलताओ की जिम्मेदारी किसी ओर की नही हमारी स्वयं की हैं ,जब हम ये सत्य मान लेते हैं तो अपने सफलता के मार्ग में बैठे हुए अपने स्वयं के डरपोक और भाग्यवादी रूप को हटा देते हैं और वही से शुरू होता हैं हमारी सफलता का सफर ।
सधन्यवाद ।
हम अक्सर सोचते हैं ?ऐसा हमारे साथ क्यों हुआ ?हमारी जिन्दगी में वह खुशियाँ क्यों नही हैं जो दूसरो के जीवन में हैं ?हम उससे अधिक काबिल हैं फ़िर भी उसे जो मान सम्मान मिला हैं ,हमारे पास क्यों नही ?उसके पास ये हैं ,वो हैं ,हमारे पास क्यों नही ?क्यों आख़िर हम हर क्षेत्र में उससे ज्यादा बुद्धिमान ,विद्वान होकर भी उससे काफी पीछे हैं ?गीता में कहा हैं जैसा कर्म करोगे वैसा फल मिलेगा । हमारा कर्म तो काफी अच्छा था ,तो हमें वैसा फल क्यो नही मिला ?आदि आदि आदि ............... और यह सब सोच कर कभी हम निराश हो जाते हैं ,कभी उदास ,परेशान और हताश । जीवन भर सोचने के बाद हमें जब इस प्रश्न का उत्तर नही मिलता तो एक सीधा सरल उपाय हम अपना लेते हैं ,आशावादी ,हताशावादी होने के बाद हम भाग्यवादी हो जाते हैं ।" क्या करे यह हमारे भाग्य में ही नही था ",ये वाक्य अकर्मण्यता और अपराध बोध को छुपाने वाला एकमात्र आदर्श वाक्य हैं । इसे कहने के बाद कहने और सुनने वाले के पास दूसरा कुछ कहने और सुनने के लिए नही रह जाता ।
वस्तुत: हम अपने जीवन से जुड़ी सभी घटनाओ की, परिस्तिथियों की जिम्मेदारी लेना ही नही चाहते ,हम जानकर भी नही जानना चाहते की हमने अपने जीवन में जो भी असफलताएँ पाई हैं उनके मूल कारण कहीं न कहीं हम स्वयम ही हैं ,हम अगर गहरे से विचार करे ,चिंतन करे तो हम आसानी से जान सकते हैं की हम औरो से ज्यादा बुद्धिमान ,मेहनती ,कर्तव्य निष्ठ होकर भी आज उससे हारे हुए क्यों हैं ?सिर्फ़ मंथन पुरी सच्चाई से किया जाना जरुरी हैं ,उसमे स्वयं से स्वयं की असफलता छुपा लेने वाला भाव नही होना चाहिए ।
हम कभी दोष देते हैं अपने माता पिता को,रिश्तेदारों को ,भाई -बहनों को,संस्कृति,संस्कारो को ,समाज को, देश को ,गरीबी को ,अमीरी को पर हमारी हार में दोष सिर्फ़ हमारा होता हैं ।
उदहारण स्वरुप हमने एक अच्छा अभिनेता/अभिनेत्री होने की ठानी ,पर हम नही बन सके ,जबकि हम जानते हैं की हम औरो से अच्छे अभिनेता या अभिनेत्री बन सकते थे ,वह भी अपनी शर्तो पर । अब जब हम सोचते हैं हम अभिनेता क्यों नही बन सके . तो विचारो का क्रम कुछ इस प्रकार शुरू होता हैं , हमारे माता पिता को हमारा अभिनय करना पसंद नही था .................. माता पिता की तो मनाही नही थी पर दादा दादी को पसंद नही था ,..........हमारे चाचा की बड़ी इच्छा थी की हम लेखक /लेखिका बने , ...............घर की आर्थिक परिस्तिथी अच्छी नही थी ,............ आसपास कोई अच्छा अभिनय विद्यालय नही था , ..............हमारे घर के लोगो की टीवी चेनल्स में जान पहचान नही थी ,हम छ: भाई- बहन थे ,मैं बड़ा भाई था /बहन थी । और अंत में वही सुंदर सा वाक्य शायद मेरे भाग्य में ही नही था ।
जबकि विचारो का क्रम ऐसा होना चाहिए ,मैं अपने माता पिता ,दादा-दादी ,को अपनी बात समझा नही सका /सकी ,मैंने अपने चाचा की इच्छा का सम्मान करते हुए अपनी इच्छा का सम्मान नही किया ,जबकि दोनों की इच्छा को न्याय दिया जा सकता था , मैं चाहता /चाहती तो इस सब पर कोई न कोई उपाय जरुर निकला जा सकता था। और अंत में मैंने कहीं न कहीं अपने जीवन को गुण ,ज्ञान और सफलता के शिखर पर ले जाने में कोई कमी की हैं और इसी कारण से आज मैं पीछे हूँ,हारा हुआ /हुई हूँ ।
यह सत्य हैं की मानव जीवन कठिनाइयों से भरा हुआ हैं ,अपने सपनो को सच करना कभी आसन नही था, नही होगा पर अगर वास्तव में अपने सपनो को सच करना हैं तो मन में पुरा विश्वास ,प्रबल इच्छा शक्ति के साथ इस बात का भी एहसास होना चाहिए की कोई और नही हमारे जीवन के शिल्पकार हम स्वयं हैं ,यह किसी ओर का जीवन नही और हमारी सफलताओ -असफलताओ की जिम्मेदारी किसी ओर की नही हमारी स्वयं की हैं ,जब हम ये सत्य मान लेते हैं तो अपने सफलता के मार्ग में बैठे हुए अपने स्वयं के डरपोक और भाग्यवादी रूप को हटा देते हैं और वही से शुरू होता हैं हमारी सफलता का सफर ।
सधन्यवाद ।
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