कहते हैं बेटी माँ की परछाई होती हैं ,वो मेरी परछाई नही ,एक दैवीय ज्योति हैं,जो जीवन को प्रकाशित करती हैं मेरा ही चेहरा,मेरी शक्ति,शांति,संगती ,गीति,आरोही ....
Tuesday, December 16, 2008
एक ऐसा भी रियलिटी शो ...........
रियलिटी शो .................एक ऐसा फार्मूला जो टीवी चेनल्स की टीआरपी बढ़ने में चेनल्स की मदद करता हैं,जिसमे बच्चो को हीरो और हेरोइन की तरह पेश किया जाता हैं,बड़ी बड़ी बातें की जाती हैं ,बड़े बड़े स्टार्स बुलवाए जाते हैं ,दिवाली,क्रिसमस पर भी शायद न की जाए इतनी चमक दमक इस शो में की जाती हैं ,कुछ झूठी बनावटी तारीफे की जाती हैं ,कुछ पूर्वनियोजित बहस हो जाती हैं,जज एक दुसरे पर टिका टिप्पणी करते हैं,बच्चो की जरा सी गलती पर बढा चढाकर बुराई की जाती हैं ,इतना की कोई शिन्जनी सेन गुप्ता हमेशा के लिए आवाज़ खो देती हैं,तो कोई अपना आत्मविश्वास ,और जीन पर तारीफों की बौछार की जाती हैं,वो कोई एक संगीत दुनिया का चमकता सितारा बन जाता हैं ,इन सब में खासकर म्युजिकल रियलिटी शोज में संगीत कही नही रहता ,न बच्चे सुर में गाते हैं ,न सिखाने वाले सिखा पाते हैं ,रहती हैं तो सिर्फ़ बनावट ,दिखावट और सजावट।कुल मिलाकर रियलिटी शो ,रियलिटी शो न होकर ,बनावटी शो हो जाता हैं। लेकिन कहते हैं न आशा के सारे दरवाज़े बंद हो जाने पर भी एक दरवाज़ा कहीं न कहीं खुला होता हैं ,जो आशा की किरण अपने साथ ले आता हैं ,एक ऐसा ही रियलिटी शो मैं इन दिनों देख रही हूँ,वह हैं जी मराठी पर सोमवार ,मंगलवार रात ९:३० पर आने वाला मराठी सा रे ग म प , संचालन पल्लवी जोशी करती हैं ,वह जो भी कहती हैं एकदम सरल भाषा में ,सुंदर शब्दों में और उतना ही सत्य ,इस शो में जजेस एक दुसरे पर छीटा कशी नही करते ,नही प्रतियोगियों के बटवारे होते हैं , बच्चे अच्छा गाए तो जजेस मन से उनकी तारीफ करते हैं ,और जहाँ जो गलती हो उसे अच्छी तरह बच्चोको समझाते हैं। इस शो में बच्चे अपनी मासूम मुस्कराहट से,मधुर आवाज़ से और भोली बातों से जहाँ सबका दिल जीतते हैं वही उनके गायन की कोई तुलना नही की जा सकती,ये बच्चे जितना सुर में गाते हैं ,अच्छे अच्छे कलाकारों को लाइव प्रोग्राम मेंइतना सुरीला गाना कठिन जान पड़ता हैं , उनका आत्मविश्वास तो मानो दुनिया जीतने की ताकत रखता हैं,जब इस शो में आदरणीय शंकर महादेवन जी आए थे उस दिन बच्चो ने जिस मधुरता के साथ गाया मैं इन बच्चो की कलात्मकता और स्वर सिद्धि को देखकर मैं आनंद से रोने लगी ।मैं इस मराठी शो की तारीफे इसलिए नही कर रही क्योकि मैं मराठी हूँ ,बल्कि इसलिए कर रही हूँ क्योकि मैं एक संगीतकार, संगीत श्रोता ,और एक आम दर्शक हूँ । कभी अवसर मिले तो यह शो एक बार जरुर देखे जो सच्चे अर्थो में रियलिटी शो कहलाने का हक़दार हैं । इस लिंक पर जाए और इन बच्चो का गाना अवश्य सुने और इन्हे आशीर्वाद दे . http://www.zeemarathi.com/SRGMPLittleChamps2008/default.htm
Wednesday, December 3, 2008
हैरान हूँ मैं ..................
शाम का वही ७ बजे का समय,वही गीत के बोल और वही मैं ...लेकिन तब और अब में कितना अंतर आ गया हैं न!तब ये गीत सिर्फ़ एक गीत था और गीतों की तरह और आज सबसे बडा सच ,जीवन का सबसे बडा सच,हर भारतीय के जीवन का ही नही हर इंसान के जीवन का सच । तुझसे नाराज़ नही जिंदगी हैरान हूँ मैं ..तेरे मासूम सवालो से परेशान हूँ मैं ,नाराज़गी आख़िर किस बात की?हमने वह सब तो पा लिया जिसकी चाह थी ,कितने आगे बढ़ गए हम । बैलगाडी,रथ,से ऑटो ,कार ,ट्रेन,प्लेन तक ,झोपडी,कुटिया से ,बंगला ,फ्लेट ,अपार्टमेन्ट और 1bhk तक,सोने से हीरे,मोतियों, प्लेटिनम और आर्टिफिशियल ज्वेलरी तक, दाल, रोटी से पिज्जा, बर्गर, सेंडविच तक, हाट ,बाज़ार से बड़े बड़े शोपिंग मॉल्स तक, दीपों की रोशनी से बड़े बड़े बल्ब , ट्यूबलाइट और सी ऍफ़ एल की रोशनी तक,पृथ्वी से चाँद मंगल तक ,आयुर्वेदिक उपचारों से बड़ी बड़ी महंगी दवाइयों तक,घर में माँ के हाथ से सिले,दरजी के बनाये कपड़ो से डिजाइनर और कीमती कपड़ो तक ,खस के ठंडे पर्दों से ,पंखे से, कूलर से वातानुकूल यंत्र (एसी )तक ,छोटे से विद्यालयो से विश्वविद्यालयो तक , सरकारी कार्यालयों से मल्टीनेशनल कंपनी के चमकदार भव्य ऑफिस तक ,और संयुक्त परिवारों से एकाकी परिवारों और एकाकी जीवन तक,१०० sal की औसत उम्र 70 ,50 और २०-10 sal की अति औसत उम्र तक ,चोर डाकू से दंगाइयों के खौफ और आतंकवादियों के आतंक तक .....
जो कुछ भी मुंबई में हुआ उसने जीवन का अर्थ और उसके बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया,आतंक वादी कहाँ से आए?दंगे किसने करवाए ?परिवार क्यो टूटे?क्यो जिंदगी से नाराज़ नही होकर भी हर कोई हैरान हो गया ?इन सबके बारे में बहुत सोचा ।सुरक्षा कर्मी अपना कर्तव्य करते हुए शहीद हो गए,जिनके लोग गए वो दुःख में खो गए ,फ़िर सुरक्षा का वादा किया गया ,मुवावजा देने का आश्वासन दिया गया ,कुछ चीखे कुछ चिल्लाये,कुछ ने एक दुसरे को ताने मारे ,कुछ देश में रहने से ही घबराए ,कुछ देवस्थानों में घूम आए,कुछ छानबीन में लग गए,कुछ ने आशंकाए ,चिंताए जताई,और सब और एक डर फ़ैल गया ,हर कोई सवाल करने लगा उनसे ,औरो से अपने आप से और करने लगा आतंकवादी हमलो के शिकार की लिस्ट में अपने नाम का इंतजार ....
समय सच में मनन का हैं ,अपने अंतर मन के सच्चे इंसान को जगाने का ,जीवन कितना छोटा हैं ,एक दुसरे से प्रेम कर ,शांति से जीने का तरीका सीखने का ,ग़लत के विरोध में डट कर खड़े रहने का ,बुरे का अस्तित्व खत्म करने के प्रण लेने का,दिलो में पनपती नफ़रत को ख़त्म करने का,बदलाव का .....एक बहुत बड़े परिवर्तन का,राष्ट्र गीत गाने का नही ,राष्ट्र बनाने का,एक दुसरे का नही अमानवीयता का विरोध करने का ,स्त्री, पुरूष ,भाई बहन ,सास बहूँ ,हिंदू ,मुस्लिम के छोटे छोटे संघर्षो से उपर उठकर ,मानवता के लिए मानवता के संघर्ष का....... आने वाली पिढीयाँ यह न कहे,तुझसे नाराज़ नही जिंदगी हैरान हूँ मैं ....
पिछले कुछ दिनों से शहर से बाहर होने के कारण ब्लॉग पर लिख नही पाई हूँ ,अत:पाठको से क्षमा चाहती हूँ ,पिछली कुछ पोस्ट्स पर श्री अर्श जी,श्री अनिल पुसदकर जी,श्री राज भाटिया जी ,श्री मीत जी,श्री ब्रिजभुषण श्रीवास्तव,श्री अशोक प्रियरंजन जी ,श्री अभिषेक जी,श्री शिव कुमार मिश्रा जी,सुश्री लावण्या जी ,श्री नीरज गोस्वामी जी ,श्री दिनेश राय द्विवेदी जी ,श्री कुश जी ,श्री सागर नाहर जी ,सुश्री अल्पना वर्मा जी ,डॉ .अनुराग जी ,
श्री समीर लाल जी । आदि सभी पाठको की टिप्पणिया मिली आप सभी का धन्यवाद और मेरी पोस्ट पढने के लिए आभार
जो कुछ भी मुंबई में हुआ उसने जीवन का अर्थ और उसके बारे में सोचने पर मजबूर कर दिया,आतंक वादी कहाँ से आए?दंगे किसने करवाए ?परिवार क्यो टूटे?क्यो जिंदगी से नाराज़ नही होकर भी हर कोई हैरान हो गया ?इन सबके बारे में बहुत सोचा ।सुरक्षा कर्मी अपना कर्तव्य करते हुए शहीद हो गए,जिनके लोग गए वो दुःख में खो गए ,फ़िर सुरक्षा का वादा किया गया ,मुवावजा देने का आश्वासन दिया गया ,कुछ चीखे कुछ चिल्लाये,कुछ ने एक दुसरे को ताने मारे ,कुछ देश में रहने से ही घबराए ,कुछ देवस्थानों में घूम आए,कुछ छानबीन में लग गए,कुछ ने आशंकाए ,चिंताए जताई,और सब और एक डर फ़ैल गया ,हर कोई सवाल करने लगा उनसे ,औरो से अपने आप से और करने लगा आतंकवादी हमलो के शिकार की लिस्ट में अपने नाम का इंतजार ....
समय सच में मनन का हैं ,अपने अंतर मन के सच्चे इंसान को जगाने का ,जीवन कितना छोटा हैं ,एक दुसरे से प्रेम कर ,शांति से जीने का तरीका सीखने का ,ग़लत के विरोध में डट कर खड़े रहने का ,बुरे का अस्तित्व खत्म करने के प्रण लेने का,दिलो में पनपती नफ़रत को ख़त्म करने का,बदलाव का .....एक बहुत बड़े परिवर्तन का,राष्ट्र गीत गाने का नही ,राष्ट्र बनाने का,एक दुसरे का नही अमानवीयता का विरोध करने का ,स्त्री, पुरूष ,भाई बहन ,सास बहूँ ,हिंदू ,मुस्लिम के छोटे छोटे संघर्षो से उपर उठकर ,मानवता के लिए मानवता के संघर्ष का....... आने वाली पिढीयाँ यह न कहे,तुझसे नाराज़ नही जिंदगी हैरान हूँ मैं ....
पिछले कुछ दिनों से शहर से बाहर होने के कारण ब्लॉग पर लिख नही पाई हूँ ,अत:पाठको से क्षमा चाहती हूँ ,पिछली कुछ पोस्ट्स पर श्री अर्श जी,श्री अनिल पुसदकर जी,श्री राज भाटिया जी ,श्री मीत जी,श्री ब्रिजभुषण श्रीवास्तव,श्री अशोक प्रियरंजन जी ,श्री अभिषेक जी,श्री शिव कुमार मिश्रा जी,सुश्री लावण्या जी ,श्री नीरज गोस्वामी जी ,श्री दिनेश राय द्विवेदी जी ,श्री कुश जी ,श्री सागर नाहर जी ,सुश्री अल्पना वर्मा जी ,डॉ .अनुराग जी ,
श्री समीर लाल जी । आदि सभी पाठको की टिप्पणिया मिली आप सभी का धन्यवाद और मेरी पोस्ट पढने के लिए आभार
Wednesday, November 26, 2008
तुम कहाँ हो?
वो सुबह शाम तुम्हारा नाम लेती हैं ,तुम्हे पुकारती हैं ,तुम्हारी एक आहट के लिए घंटो आँखे लगाये बैठती हैं, कभी अपनों पर नही रखा शायद..............इतना विश्वास तुम पर करती हैं , रोज़ नए नए शब्द ,छंद लाकर न जाने कितनी कविताये तुम्हारे लिए लिखती हैं ,रोज़ न जाने कितने रागों में स्वरों और शब्दों को मोती की तरह पिरो कर प्रेम भरी संगीतमय पुष्पमालाये तुम्हे अर्पण करती हैं । वह कभी मन्दिर जाती हैं ,कभी मस्जिद जाती हैं,कभी चर्च जाकर प्रार्थना गाती हैं ,कभी वाहेगुरु को शीश नवाती हैं ,वह व्रत करती हैं ,कभी करती हैं पूजन ,कभी रोजे रखती हैं ,कभी करती हैं हवन । वह जो तुम्हारी हैं ,सदियों से ,इस सृष्टि के आदि से अंत तक ,सिर्फ़ तुम्हारी, उसका कौन हैं तुम्हारे सिवा बोलो ?फ़िर भी तुम नही आते ?कहीं नही दीखते ,हर बार वह ख़ुद को भरोसा दिलाती हैं की तुम आओगे इस बार नही अगली बार कभी तो कहीं तो .................................
हे ईश्वर................ विश्व की ७०% जनता रोज़ तुम्हे पुकारती हैं ,पुजती हैं ,प्रार्थना करती हैं ....और हर बार हर दुःख के बाद स्वयं को संभालती हैं और कहती हैं की तुम आओगे । माना की तुम ईश्वर हो ,यह कलयुग हैं सारा दर्शन माना, जाना । पर कल जैसी अँधेरी काली रात जब भारत जैसे देश पर बिजली की तरह टूटती हैं तो एक ही प्रश्न ह्रदय में बार बार उठता हैं की हे ईश्वर तुम कहाँ हो?.........
तुम अवतार नही ले सकते तो कम से कम इन अँधेरी राहों में जहाँ मनुष्यता कहीं खो गई हैं ,उजास तो भरो ,जो इनसे जूझना चाहते हैं उनका मार्गदर्शन तो करो ..........
इस साल जितने विस्फोटहुए हैं,क्या ये कलयुग की अति नही हैं ,तुम अति होने के बाद ही अवतार लेते हो ?ऐसा सब कहते हैं ..कम से कम किसी भारतीय नागरिक के मन में अवतरित होकर हमारा मार्गदर्शन करो,हम सब तुम्हारी संतान हैं करुणाकर ,अब तो पथप्रदर्षित करो ।
मेरा और न जाने कितने भारतीयों का मन बार बार तुमसे पूछ रहा हैं ..तुम कहाँ हो ?
हे ईश्वर................ विश्व की ७०% जनता रोज़ तुम्हे पुकारती हैं ,पुजती हैं ,प्रार्थना करती हैं ....और हर बार हर दुःख के बाद स्वयं को संभालती हैं और कहती हैं की तुम आओगे । माना की तुम ईश्वर हो ,यह कलयुग हैं सारा दर्शन माना, जाना । पर कल जैसी अँधेरी काली रात जब भारत जैसे देश पर बिजली की तरह टूटती हैं तो एक ही प्रश्न ह्रदय में बार बार उठता हैं की हे ईश्वर तुम कहाँ हो?.........
तुम अवतार नही ले सकते तो कम से कम इन अँधेरी राहों में जहाँ मनुष्यता कहीं खो गई हैं ,उजास तो भरो ,जो इनसे जूझना चाहते हैं उनका मार्गदर्शन तो करो ..........
इस साल जितने विस्फोटहुए हैं,क्या ये कलयुग की अति नही हैं ,तुम अति होने के बाद ही अवतार लेते हो ?ऐसा सब कहते हैं ..कम से कम किसी भारतीय नागरिक के मन में अवतरित होकर हमारा मार्गदर्शन करो,हम सब तुम्हारी संतान हैं करुणाकर ,अब तो पथप्रदर्षित करो ।
मेरा और न जाने कितने भारतीयों का मन बार बार तुमसे पूछ रहा हैं ..तुम कहाँ हो ?
Monday, November 24, 2008
जो सबको जीना सिखाये ....

शहर के एक छोटे पर नामचीन विद्यालय में बच्चो की भीड़ जुटी हुई हैं ,सब बच्चे प्रार्थना के लिए खड़े होते हैं और सुबह का प्रेरणा गीत शुरू होता हैं ,ख़ुद जिए सबको जीना सिखाये ,अपनी खुशिया चलो बाट आए...एक १२-१४ साल की लड़की खुशी से जोरो से यह गीत गा रही थी,चारो तरफ़ मानों खुशिया ही खुशिया बिखरी थी,की आचानक किसीने आवाज़ दी राधिका..........और मैं १२-१४ साल आगे वक़्त की गाड़ी में सवार प्रकाश से भी तेज़ गति में अपने आज में लौट आई ,आवाज़ देने वाली वही थी जो मुझे अपने साथ यहाँ खीच कर ले आई थी ,और अनजाने में अपने बचपन में चली गई थी ,यहाँ आज से पहले मैं कभी नही आई थी ,कहने को तो यह भी स्कूल था,यहाँ पर भी छोटे बच्चे पढ़ते थे ,पर उसने कहा था ,की यह स्पेशल बच्चो का स्कूल हैं ...मेरा बेटा स्पेशल हैं ...मतलब?मैं समझी नही थी ,शायद वह जीनियस होगा ..............। खैर .. यहाँ पहुँची तो मैंने कहा की मैं अन्दर आकर क्या करुँगी आप प्रिंसिपल से मिलकर आ जाओ,पर उसने कहा अरे इन बच्चो से मिलोगी नही?स्पेशल बच्चे हैं ...खैर अन्दर गई ,सब बच्चे हस रहे थे ,एक दुसरे से हिलमिल कर बाते कर रहे थे ,कुछ नाच रहे थे कुछ गा रहे थे ,कुछ खेल रहे थे और कुछ पढने का झूठा दिखावा कर रहे थे , बच्चों को खुशियों की बहार इसलिए ही कहा जाता हैं शायद...राधिका ...ये मेरा बेटा ... मुझे देखकर वह थोड़ा शरमाया ,फ़िर मुस्कुराया ,उसने कहा दीदी से हेलो बोलो ,वह कुछ तुतलाया ...जो कम से कम मुझे तो समझ नही आया,उसने कहा देखा ये सब बच्चे कितने स्पेशल हैं ...सच कितने प्यारे,कितने अच्छे वही सरलता, वही मासूमियत,वही भोलापन,वही बचपन ,वही सुंदरता,वही सादापन,पर उन्हें सबसे अलग बनती उनकी वही स्पेशलिटी .............. हाँ वही स्पेशलिटी जिसके कारण हम इन बच्चो को मानसिक विकलांग कहते हैं ...वही स्पेशलिटी जिसके कारण यह बच्चे और बच्चो से अलग दिखाई देते हैं ,वही स्पेशलिटी जो इनके जीवन को एक अलग ही रंग में रंग देती हैं ,जहाँ इनकी दुनिया अपनी ही गति में अपनीही तर्ज़ पर ताल देती हुई ,अपना संगीत ख़ुद ही लिखती और संसार से अलग खुदको सुनती सुनाती अपना पुरा जीवन बिताती हैं । ये वही स्पेशल बच्चे थे ,जो मानसिक कमियों के बावजूद उतनी ही खुशी से आनंद से और जज्बे से अपना जीवन बिता रहे थे,सीख रहे थे और सबको जीना सिखा रहे थे और वो उस स्पेशल बच्चे की स्पेशल माँ ,जो अपने बच्चे की कमी को स्पेशलिटी बताकर दुगुने प्यार ,ममता और जज्बे से अपने बच्चे को आने वाले कल के लिए मजबूत सक्षम बना रही थी ,जिन्दगी की सबसे कठिन परीक्षा को स्पेशल बताकर मुझे जीना सिखा रही थी......
Monday, November 17, 2008
कला...और उसका अनोखा जहाँ
१७ नवंबर २००५ ..सुबह के १०:३० का समय ..सडको पर वाहनों की भारी आवाजाही,लगता हैं सारी दुनिया घर से बाहर इन रास्तो पर उतर आई हैं ,इस भारी भरकम भीड़ में एक युवती न जाने किन ख्यालो में खोयी जोर जोर से गाती गुनगुनाती हुई चली जा रही हैं ,कई लोग उसे देख रहे हैं ,उनमे से कई ने उसे पागल समझ लिया हैं ,पर वो शायद वहा हैं ही नही,वो तो बस जोर जोर से गा रही हैं ,राग बिहाग में लय तानो के प्रकार बना रही हैं ,अचानक पीछे से एक बस जोर से हार्न बजती हुई,बुरी तरह से ब्रेक मारकर रूकती हैं ,बस कन्डक्टर जोर से चिल्लाता हैं ......अरे बेटी.......
तब कहीं जाकर उस युवती की तंद्रा टूटती हैं । उसे समझ आता हैं की वह सड़क पर गाती हुई जा रही थी,तेज़ कदमो से चलती...लगभग भागती हुई,गंतव्य तक पहुँचती हैं ,और वहां जाकर अपने आप पर खूब हंसती हैं ,आप जानना चाहेंगे वह लड़की कौन थी ? .......................... वह लड़कीथी मैं ।
ऐसा कई बार होता हैं ,कुछ अच्छा सा संगीत सुना ,कोई राग दिलो दिमाग पर छा गया तो सब कुछ भूल कर मैं उस राग में खो जाती हूँ । शायद यही हैं कला का जादू ।
एक और घटना सुनिए , मेरे पतिदेव को लौकी के कोफ्ते बहुत पसंद हैं ,एक दिन सोचा आज बनाये जाए,लौकी ली,बेसन घोला ,और रेडियो ऑन,पंडित रविशंकर जी राग मारवा बजा रहे थे ,बस फ़िर क्या था,बड़ा सुरीला माहौल बन गया ,साथ लौकी के कोफ्ते भी बन गये ,कोफ्ते बनाने के बाद तक़रीबन में एक घंटा सोचती रही ,आज कोफ्ते हमेशा जैसे क्यो नही दिख रहे?क्या कमी रह गई? ..तब तक रेडियो पर समाचार शुरू हो गए ,रेडियो बंद किया और फ़िर लौकी के कोफ्ते देखे ,तब कहीं ध्यान आया की ....लौकी के कोफ्ते में मैं लौकी डालना भूल गई सितार सुनते हुए । तब क्या करती भजिये की सब्जी पतिदेव को खिलाई ।
ये कुछ मजेदार घटनाये थी जो मेरे साथ हुई ,कलाकार के साथ ऐसा अक्सर होता हैं ,कला लेखन हो ,संगीत हो ,चित्रकला हो,या और कोई,कलाकार एक बार कला समुन्दर में डूब गया की उसे निकालना ,जग के रक्षक विष्णुदेव को भी संभव नही होता ,उसे सारी दुनिया से अपनी दुनिया अच्छी लगती हैं,वह औरो के बीच में होकर भी कहीं खोया हुआ होता हैं,कुछ न कुछ सोचता रहता हैं,संगी संबंधी या तो उसे पागल करार देते हैं ,या उनकी नाराज़गी उससे कई कई गुना बढ़ जाती हैं । पर जिन्होंने कला से नाता जोड़ा हैं,जो कलाकार हैं वो जानते हैं की कला का जहाँ कितना अनोखा हैं ,प्रेमी युगल को जिस तरह जग की परवाह नही होती वैसे ही सारा जमाना चाहे शत्रु क्यो न बन जाए,हँसे ,पागल कहे ,पर कलाकार अपने कला विश्व को कभी नही भूलता ,उसमे जीना कभी नही छोड़ता । कला ही उसे परमानन्द देती हैं ,जीवनानंद देती हैं ,आत्मानंद देती हैं ,जो सुनता हैं ,पढ़ता हैं,समझता हैं ,वह कलाकार की इस दुनिया की कद्र करता हैं ,और ऐसे क़द्रदानो के कारण ही कलाकार जी पाता हैं ,अपनी कला को तराश पाता हैं . कहते हैं न..
तंत्री नाद कवित्त रस सरस राग रति रंग ।
अनबुढे बुढे तीरे जो बुढे सब अंग । ।
तो ऐसा हैं कला का अनोखा जहाँ ।
तब कहीं जाकर उस युवती की तंद्रा टूटती हैं । उसे समझ आता हैं की वह सड़क पर गाती हुई जा रही थी,तेज़ कदमो से चलती...लगभग भागती हुई,गंतव्य तक पहुँचती हैं ,और वहां जाकर अपने आप पर खूब हंसती हैं ,आप जानना चाहेंगे वह लड़की कौन थी ? .......................... वह लड़कीथी मैं ।
ऐसा कई बार होता हैं ,कुछ अच्छा सा संगीत सुना ,कोई राग दिलो दिमाग पर छा गया तो सब कुछ भूल कर मैं उस राग में खो जाती हूँ । शायद यही हैं कला का जादू ।
एक और घटना सुनिए , मेरे पतिदेव को लौकी के कोफ्ते बहुत पसंद हैं ,एक दिन सोचा आज बनाये जाए,लौकी ली,बेसन घोला ,और रेडियो ऑन,पंडित रविशंकर जी राग मारवा बजा रहे थे ,बस फ़िर क्या था,बड़ा सुरीला माहौल बन गया ,साथ लौकी के कोफ्ते भी बन गये ,कोफ्ते बनाने के बाद तक़रीबन में एक घंटा सोचती रही ,आज कोफ्ते हमेशा जैसे क्यो नही दिख रहे?क्या कमी रह गई? ..तब तक रेडियो पर समाचार शुरू हो गए ,रेडियो बंद किया और फ़िर लौकी के कोफ्ते देखे ,तब कहीं ध्यान आया की ....लौकी के कोफ्ते में मैं लौकी डालना भूल गई सितार सुनते हुए । तब क्या करती भजिये की सब्जी पतिदेव को खिलाई ।
ये कुछ मजेदार घटनाये थी जो मेरे साथ हुई ,कलाकार के साथ ऐसा अक्सर होता हैं ,कला लेखन हो ,संगीत हो ,चित्रकला हो,या और कोई,कलाकार एक बार कला समुन्दर में डूब गया की उसे निकालना ,जग के रक्षक विष्णुदेव को भी संभव नही होता ,उसे सारी दुनिया से अपनी दुनिया अच्छी लगती हैं,वह औरो के बीच में होकर भी कहीं खोया हुआ होता हैं,कुछ न कुछ सोचता रहता हैं,संगी संबंधी या तो उसे पागल करार देते हैं ,या उनकी नाराज़गी उससे कई कई गुना बढ़ जाती हैं । पर जिन्होंने कला से नाता जोड़ा हैं,जो कलाकार हैं वो जानते हैं की कला का जहाँ कितना अनोखा हैं ,प्रेमी युगल को जिस तरह जग की परवाह नही होती वैसे ही सारा जमाना चाहे शत्रु क्यो न बन जाए,हँसे ,पागल कहे ,पर कलाकार अपने कला विश्व को कभी नही भूलता ,उसमे जीना कभी नही छोड़ता । कला ही उसे परमानन्द देती हैं ,जीवनानंद देती हैं ,आत्मानंद देती हैं ,जो सुनता हैं ,पढ़ता हैं,समझता हैं ,वह कलाकार की इस दुनिया की कद्र करता हैं ,और ऐसे क़द्रदानो के कारण ही कलाकार जी पाता हैं ,अपनी कला को तराश पाता हैं . कहते हैं न..
तंत्री नाद कवित्त रस सरस राग रति रंग ।
अनबुढे बुढे तीरे जो बुढे सब अंग । ।
तो ऐसा हैं कला का अनोखा जहाँ ।
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