वो हवा के घोडे पर बैठा जीवन के असीम आकश में सरपट भाग रहा हैं, कितनी बार चाहा की उसे रोक लू ,जैसे अल्लाउद्दीन के चिराग में जिन्न बंद रहता हैं ,वैसे ही किसी चिराग में उसे भी बंद कर लू ,वो मेरी मुठ्ठी में हो , मेरे बस में । पर वो किसी के रोकने से रुका हैं ?वो तो मनमौजी हैं ,अपनी ही चाल से चलता हैं ,अपने ही रीत से दुनिया को चलाता हैं ,शायद इसलिए ही उसे समय कहा जाता हैं ,हर बार वह यु ही हाथो से फिसल कर कही दूर ,बहुत दूर भाग जाता हैं और हम कहते रह जाते हैं............ काश.............समय हमारा होता ,काश.......... हमने उसे जी लिया होता . कभी कभी तो वह इतना याद आता हैं की जीवन की छोटी बड़ी खुशिया भी उसके ही साथ कहीं खो जाती हैं। हम फ़िर कहते हैं ,काश...........
काश.........की किताबो को अलमारी में नही दिल में कहीं कैद कर लिया होता . काश...........चांदनियो का यह शुभ्र धवल प्रकाश यु ही धरती पर हर रात फैला होता , युगों तक इसी प्राकृतिक प्रकाश का स्नेहिल सानिद्य हमें मिला होता और हम कह पाते वो देखो टूटता तारा ......काश .................किताबों में रटा रटाया कोर्स पढाने के बजाय हम बच्चो को जिन्दगी का हर रंग , किसी जादू की छड़ी से नीले आसमान में छिटक कर दिखा पाते ,उनसे कह पाते ,छु लो यह रंग,जान लो इसे अपना सा, न जाने कब यह तुम्हारे जीवन को अपने रंग में रंग जाए । काश........... टूटे हुए दिल के मोती बटोर कर एक सुंदर माला बना पाते ,काश .............आज से कुछ साल पहले हम और अधिक जिम्मेदार ,समझदार इन्सान बन पाते,काश ........... किसी जादूगरनी की तरह एक जादुई लट्टू हमारे पास होता और आने वाले हर दुःख से हम पहले ही सावधान हो जाते । काश...........खुशियों का भी बरस में एक बार मेला लगता और हम जैसे घरो में पुरे साल के गेहू ,चावल भरते हैं न, उसी तरह ही घरो में साल भर की खुशिया भर पाते । काश......... की पंछी भी बोले होते ,और उनके साथ सुर मिला कर हम जीवन गीत गाते ,जब हमारे अपने जिन्दगी की वय्स्त्ताओ में जिन्दगी को ही कहीं खोते जा रहे हैं । काश....की कभी किसी को नौकरी ही नही करनी पड़ती ,हर कोई राजा होता ,कोई रानी होती ,और छोटी राजकुमारी पेडो पर लगे रूपये तोड़ कर माँ बापू को बस खिलौना लाने की जिम्मेदारी सौपती । काश.... सपने सोती हुई आँखों में रात भर यु ही मंडराते,जब सुबह हम उन्हें पुकारा करते तो बिल्कुल हमारी माँ की तरह हमारे लिए दौडे चले आते । काश ..........की इतनी बड़ी धरती पर हर इंसान को रहने के लिए एक छोटा सा कोना मिला होता ,और हम वहां अपने सपनो का आशियाँ सजाते . ..............काश ...........जिन कृष्ण - कहनैया को हम छप्पन भोग लगाते हैं,उन्ही के छोटे- छोटे कई सारे , भूख से बिलखते रूपों को हम दो समय का पुरा खाना दे पाते । काश.....हम इतना पढ़ लिख जाने के बाद,अपनी पुरी उम्र ख़त्म होने तक ही, सच्चे ह्रदय से औरो से प्रेम करना सीख जाते ,न कोई आतंक होता न कोई अत्याचार ,दुनिया को बस बच्चो सा भोला और निर्मल बना पाते. काश .......काश....काश ..........न जाने और कितने काश..हमें जिंदगी में कभी कहने ही नही पड़ते ,इन काशो के कहने से ही तो हम जिन्दगी के कितने आकश कभी आत्नीय प्रेम का ,कभी हमारे सपनो से जुडा,कभी जिन्दगी को जिन्दगी की तरह जीने का ,अपने ही हाथो से ख़त्म कर देते हैं । जब हम काश..कह कर एक लम्बी श्वास भरते हैं तो सम्भावना के द्वार बंद हो जाते हैं और सपनो ,इच्छाओं ,आशाओं का विस्तृत ,अनंत आकाश ख़त्म हो जाता हैं । और हम कहते रह जाते हैं काश...............
कहते हैं बेटी माँ की परछाई होती हैं ,वो मेरी परछाई नही ,एक दैवीय ज्योति हैं,जो जीवन को प्रकाशित करती हैं मेरा ही चेहरा,मेरी शक्ति,शांति,संगती ,गीति,आरोही ....
Thursday, January 8, 2009
Monday, January 5, 2009
क्या पति ,पत्नी का एक दुसरे की खुशी के लिए बदलना गलत हैं ?
पिछले दिनों रब ने बना दी जोड़ी फ़िल्म देखी,काफी तकनिकी और डायरेक्शन की गलतियों के बाद भी फ़िल्म चल गई ,लोगो ने इसकी कहानी की प्रशंसा भी की,पर फ़िल्म देखने के बाद मुझे इसकी कहानी ने सोचने पर मजबूर कर दिया ।
फ़िल्म में शाहरुख़ खान ने दो भूमिकाए निभाई हैं ,सुरींदर सूरी की भूमिका में वह एक बहुत सादा सरल व्यक्ति बना हैं जो अपनी पत्नी तानी से दिल ही दिल में बहुत प्यार करता हैं, पर न तो कभी उससे अपने प्यार इजहार करता हैं न उसके साथ ज्यादा बोलता हैं । दूसरी तरफ़ वह तानी को खुश करने के लिए राज भूमिका करता हैं ,जिसमे वह तानी की खुशी के लिए उनसे बाते करता हैं ,उसे हसाता हैं ,यहाँ तक की उसकी खुशी के लिए गोल गप्पे खाने की शर्त भी लगा लेता हैं और पेट ख़राब होने के बाद भी अपनी पत्नी के हाथ की बनी बिरयानी खाता हैं । कुल मिलाकर वह अपनी पत्नी से ह्रदय से प्रेम करता हैं ।
वास्तविकता के धरातल पर अगर इस कहानी की समीक्षा की जाए तो ऐसा लगता हैं की कहानी भटक गई हैं । विवाह के बाद पति और पत्नी को उम्र भर साथ रहना होता हैं ,उम्र भर एक दूर के गम और खुशियों को बाटना होता हैं,वे एक दुसरे का जीने का सहारा होते हैं ,जब एक दुखी होता हैं तो दूसरा संभालता हैं ,जब दूसरा दुखी होता हैं तो पहला उसे हसाता हैं ,यही विवाहित जीवन का अर्थ हैं,इसलिए ही एक दुसरे का साथ निभाने की कसमे और वचन लिए जाते हैं । अगर आप किसी से ह्रदय से प्रेम करते हैं चाहे वह आपकी माँ हो ,पिता हो ,भाई हो बहन हो या दोस्त तो उसकी खुशी के लिए आप क्या कुछ नही करते । ठीक उसी तरह अगर कोई पति अपनी पत्नी से प्रेम करता हैं तो उसकी खुशी के लिए वह उसके साथ घूमना फिरना ,उससे बातें करना उसके मन मुताबिक रहना शुरू कर दे तो इसमे बुराई ही क्या हैं ?हम तो इसी तरह रहेंगे ,आते ही ऑफिस से लेपटोप पर काम करना शुरू कर देंगे ,तुमसे बात भी नही करेंगे ,तुम्हे अगर पैसे की जरुरत हैं तो देंगे ,कुछ बाज़ार से सामान लाना हैं तो वह भी कर देंगे । पर क्योकि हम तुमसे सच्चा प्यार करते हैं तो तुम्हे हमारा यह अजीब सा स्वभाव भी स्वीकारना होगा । यह कैसा गुरुर हैं?
एक अच्छी लड़की यह कभी नही चाहती की उसका पति बहुत स्मार्ट हो,या बहुत पैसे वाला हो ,वह बस इतना चाहती हैं की उसका पति उसे ह्रदय से प्रेम करे ,उसे पति के रूप में एक मित्र की जरुरत होती हैं ,जो उसकी सारी बाते सुने ,उसकी हर छोटी बड़ी खुशी में अपनी खुशी जाहिर करे ,उसके दुःख को अपना कहे,जब वो रोये तो अपने पति के कंधे पर सर रखकर रो सके । और इसी दुविधा में तानी भी होती हैं ,एक तरफ़ राज जो उसकी सब बात समझता हैं,उसको जीने के लिए सहारा देता हैं ,उसे हँसाने के लिए क्या कुछ नही करता ,और एक तरफ़ सुरींदर बाबु ,जो उसे मन से प्यार तो करता हैं , उसे जरुरत के समय पैसा देता हैं ,उसे डांस सिखने से भी नही रोकता ,उसके पिता की इच्छा का सम्मान करते हुए उससे शादी भी कर लेता हैं । तानी चुने तो किसे ?क्योकि वो जानती हैं की सुरींदर भी बहुत अच्छा इन्सान हैं ,उससे बहुत प्रेम करता हैं और राज भी,पर राज के साथ वह ख़ुद को बहुत खुश पाती हैं ,और सुरींदर के साथ ख़ुद को सिर्फ़ एक कर्तव्य पूर्ण करने वाली पत्नी के रूप में ,एक तरफ़ सम्मान होता हैं जो वह सुरींदर का करती हैं और दूसरी तरफ़ प्रेम ,जो वह राज से करती हैं । भई तानी तो भाग्यशाली थी उसने दोनों रूप में अपने पति को ही चाहा ,पर एक आम लड़की अगर ह्रदय से अपने पति को चाहती हैं,आजन्म इस रिश्ते का सम्मान भी करती हैं ,पति की खुशी के लिए कितना कुछ करती हैं ,वो अगर चाहे की उसका पति उसकी भावनाओ का सम्मान करे,उससे बाते करे ,उसकी इच्छाओ को समझे,उसका दोस्त बन के रहे तो क्या ग़लत हैं ?क्योकि सुरींदर के दोस्त का ही वाक्य"कोई भी भगवान नही होता सब इन्सान ही होते हैं"इसका मतलब यह नही की पत्नी किसी और के साथ भाग जाए ,यह तो बेहद गलत हैं ,किंतु वह अपने पति से थोड़ा सा साथ ,मित्रवत वह्य्वार चाहे तो कुछ भी गलत नही हैं ।
इति
वीणा साधिका
राधिका
फ़िल्म में शाहरुख़ खान ने दो भूमिकाए निभाई हैं ,सुरींदर सूरी की भूमिका में वह एक बहुत सादा सरल व्यक्ति बना हैं जो अपनी पत्नी तानी से दिल ही दिल में बहुत प्यार करता हैं, पर न तो कभी उससे अपने प्यार इजहार करता हैं न उसके साथ ज्यादा बोलता हैं । दूसरी तरफ़ वह तानी को खुश करने के लिए राज भूमिका करता हैं ,जिसमे वह तानी की खुशी के लिए उनसे बाते करता हैं ,उसे हसाता हैं ,यहाँ तक की उसकी खुशी के लिए गोल गप्पे खाने की शर्त भी लगा लेता हैं और पेट ख़राब होने के बाद भी अपनी पत्नी के हाथ की बनी बिरयानी खाता हैं । कुल मिलाकर वह अपनी पत्नी से ह्रदय से प्रेम करता हैं ।
वास्तविकता के धरातल पर अगर इस कहानी की समीक्षा की जाए तो ऐसा लगता हैं की कहानी भटक गई हैं । विवाह के बाद पति और पत्नी को उम्र भर साथ रहना होता हैं ,उम्र भर एक दूर के गम और खुशियों को बाटना होता हैं,वे एक दुसरे का जीने का सहारा होते हैं ,जब एक दुखी होता हैं तो दूसरा संभालता हैं ,जब दूसरा दुखी होता हैं तो पहला उसे हसाता हैं ,यही विवाहित जीवन का अर्थ हैं,इसलिए ही एक दुसरे का साथ निभाने की कसमे और वचन लिए जाते हैं । अगर आप किसी से ह्रदय से प्रेम करते हैं चाहे वह आपकी माँ हो ,पिता हो ,भाई हो बहन हो या दोस्त तो उसकी खुशी के लिए आप क्या कुछ नही करते । ठीक उसी तरह अगर कोई पति अपनी पत्नी से प्रेम करता हैं तो उसकी खुशी के लिए वह उसके साथ घूमना फिरना ,उससे बातें करना उसके मन मुताबिक रहना शुरू कर दे तो इसमे बुराई ही क्या हैं ?हम तो इसी तरह रहेंगे ,आते ही ऑफिस से लेपटोप पर काम करना शुरू कर देंगे ,तुमसे बात भी नही करेंगे ,तुम्हे अगर पैसे की जरुरत हैं तो देंगे ,कुछ बाज़ार से सामान लाना हैं तो वह भी कर देंगे । पर क्योकि हम तुमसे सच्चा प्यार करते हैं तो तुम्हे हमारा यह अजीब सा स्वभाव भी स्वीकारना होगा । यह कैसा गुरुर हैं?
एक अच्छी लड़की यह कभी नही चाहती की उसका पति बहुत स्मार्ट हो,या बहुत पैसे वाला हो ,वह बस इतना चाहती हैं की उसका पति उसे ह्रदय से प्रेम करे ,उसे पति के रूप में एक मित्र की जरुरत होती हैं ,जो उसकी सारी बाते सुने ,उसकी हर छोटी बड़ी खुशी में अपनी खुशी जाहिर करे ,उसके दुःख को अपना कहे,जब वो रोये तो अपने पति के कंधे पर सर रखकर रो सके । और इसी दुविधा में तानी भी होती हैं ,एक तरफ़ राज जो उसकी सब बात समझता हैं,उसको जीने के लिए सहारा देता हैं ,उसे हँसाने के लिए क्या कुछ नही करता ,और एक तरफ़ सुरींदर बाबु ,जो उसे मन से प्यार तो करता हैं , उसे जरुरत के समय पैसा देता हैं ,उसे डांस सिखने से भी नही रोकता ,उसके पिता की इच्छा का सम्मान करते हुए उससे शादी भी कर लेता हैं । तानी चुने तो किसे ?क्योकि वो जानती हैं की सुरींदर भी बहुत अच्छा इन्सान हैं ,उससे बहुत प्रेम करता हैं और राज भी,पर राज के साथ वह ख़ुद को बहुत खुश पाती हैं ,और सुरींदर के साथ ख़ुद को सिर्फ़ एक कर्तव्य पूर्ण करने वाली पत्नी के रूप में ,एक तरफ़ सम्मान होता हैं जो वह सुरींदर का करती हैं और दूसरी तरफ़ प्रेम ,जो वह राज से करती हैं । भई तानी तो भाग्यशाली थी उसने दोनों रूप में अपने पति को ही चाहा ,पर एक आम लड़की अगर ह्रदय से अपने पति को चाहती हैं,आजन्म इस रिश्ते का सम्मान भी करती हैं ,पति की खुशी के लिए कितना कुछ करती हैं ,वो अगर चाहे की उसका पति उसकी भावनाओ का सम्मान करे,उससे बाते करे ,उसकी इच्छाओ को समझे,उसका दोस्त बन के रहे तो क्या ग़लत हैं ?क्योकि सुरींदर के दोस्त का ही वाक्य"कोई भी भगवान नही होता सब इन्सान ही होते हैं"इसका मतलब यह नही की पत्नी किसी और के साथ भाग जाए ,यह तो बेहद गलत हैं ,किंतु वह अपने पति से थोड़ा सा साथ ,मित्रवत वह्य्वार चाहे तो कुछ भी गलत नही हैं ।
इति
वीणा साधिका
राधिका
Friday, January 2, 2009
उसे देखा हैं पहले भी कहीं ..............

लगता हैं ,जैसे उसे देखा हैं पहले भी कहीं ।
कहाँ? ये याद नही ।
शायद मेरे सपनो में ,
मेरी कल्पनाओ में ,
मेरी भावनाओ में ।
शायद...नीले बादलो में,
टीमटिमाते तारो में,
वासंती बहारो में ,
शायद...
कभी कहीं किसी मोड़ पर ,
इस या उस जनम के छोर पर,
रात को दिन बनाती भोर पर ।
उसे देखा हैं कहीं ....
इसी तरह मुस्कुराते हुए ,
रुठते- मनाते हुए ,
हँसते खिलखिलाते हुए ,
गाते लजाते हुए ,
देखा हैं कहीं ....
शायद ...अपने ही चेहरे में ,
वास्तविकता से बहरे
अंतर्मन के सुंदर सेहरे में ,
उसे देखा हैं मैंने कहीं ...
कहाँ ये जानती नही ...
पर हर पल आती जाती साँस मुझे बताती हैं ,
वह युगों से मेरी हैं ,मेरी सखी सहेली हैं ।
मेरी 'बेटी' सात सुर हैं मेरे, साथी जन्मो के ,
औरो के लिए भले वो नये गीत सी नवेली हैं ।
Wednesday, December 31, 2008
सेल्फ हेल्प बुक्स का बढ़ता बाज़ार.....क्या हैं सच ?
सेल्फ हेल्प बुक्स !किताबो की किसी भी बड़ी दुकान में सबसे अधिक किताबे जिस विषय पर संग्रहीत की गई होंगी वह हैं सेल्फ हेल्प। कई लेखको की कई सेल्फ हेल्प से सम्बंधित कई विषयों पर किताबे ,कभी आत्मविश्वास पर ,कभी जीवन को जीने के तरीके पर ,कभी महिला शक्ति पर ,कभी अच्छी आदतों पर ,कभी जीत पर ,कभी सकारात्मक विचारो पर ,कभी प्रभावी जीवन शैली पर,कभी कार्य कुशलता पर ,कभी रिश्ते नातो की साज संभाल पर..................किताबे ही किताबे . इन किताबो की बिक्री का बाज़ार बढ़ता ही जा रहा हैं ,इतनी किताबे और हर किताब की चालीस -पचास लाख प्रतिया बेचीं गई होने का दावा !इन किताबो की चमक दमक ,लेखको के सुनहले वादे और इन सब के बीच चकराता आम पाठक । करे तो आख़िर क्या ?पढ़े तो क्या ?ख़रीदे तो कौनसी किताब ?बडे बडे नाम ,बडे बडे पब्लिकेशन और एक सामान्य भारतीय वाचक ।
इन सबसे बडा प्रश्न यह की अचानक इन किताबो की इतनी बाढ़ सी जो आई हैं ,उसके पीछे क्या यह कारण हैं की यह किताबे बहुत अभूतपूर्व हैं?या इनके जैसे लेखक ज्ञात इतिहास में कभी नही हुए ?इन किताबो में जो लिखा गया हैं वो कभी भी कही भी नही लिखा गया ?या भारतीय व्यक्ति की जीवन शैली,जीवन पद्धति,जीवन दर्शन में आमूलचूल परिवर्तन आया हैं ।
आजकल जो यह सेल्फ हेल्प बुक्स धड़्ड्ले से बिकती जा रही हैं इसके पीछे ,इन्हे पढने का चलन होने के आलावा यह भी कुछ मत्वपूर्ण कारण हैं :-एकाकी परिवारों,नातो रिश्तो में जटिलता ,कठिनतम जीवन ,भाग दौड़,जीवन में बढ़ता तनाव ,बढती प्रतियोगिता ,अमीर बनने की ,श्रेष्ट बनने की अतीव इच्छा ।
दरअसल हो यह रहा हैं की इस कठिन समय में जब सबको जीवन में बहुत कुछ पाना हैं ,न जीवन की कोई गारंटी रही हैं ,नही शिक्षा की ,न किसी रिश्ते की,न प्रेम की ,सब कुछ पर से भरोसा उठता जा रहा हैं ,और यही मूल कारण हो रहा हैं की जब व्यक्ति ख़ुद को एकाकी समझता हैं तब उसे किसी न किसी सहारे की जरुरत पड़ती हैं ,वह सहारा किताबे भी हो सकती हैं,जो उसे जीवन के कठिन समय से लड़कर ,जीतकर आगे बढ़ना सिखाये इसलिए यह सेल्फ हेल्प की किताबे धडाधड बिकती जा रही हैं ।
कुछ किताबे जो वाकई में बहुत अच्छी हैं, उनकी बात छोड़ दी जाए तो बहुत सी किताबे ऐसी हैं ,जिनमे जीवन के कई पक्षों पर सारगर्भित विचार नही हुआ हैं ,किसी एक सोच ,किसी एक पक्ष को लेकर जीवन नही जिया जा सकता ,मनुष्य जीवन बहुआयामी हैं ,इसके कई रूप हैं,इसमे आने वाले प्रसंग कई रंग और रूप लेकर आते हैं,हर व्यक्ति की मूल भुत प्रवृति अलग अलग होती हैं ,परिस्तिथियाँ अलग अलग होती हैं ,इसे में किसी एक विचार विशेष को लेकर उसके सहारे सभी परिस्तिथियों के निर्वहन की बात कुछ अटपटी सी ही लगती हैं । मैंने भी बहुत सी किताबे पढ़ी हैं यही जानने के लिए की ऐसा कौनसा मंत्र हैं इनमे, की जिसे पढने के बाद जीवन ही बदल जाता हैं ,मजे की बाद यह हैं की इक्का दुक्का बातो को छोड़ दे तो सभी किताबो में नए रूप से ,नए तरीके से, लगभग वही बात लिखी गई हैं ,वही समझाया गया हैं हैं ,जो हम सभी हैं ,जानते हैं ,समझते हैं पर वह्य्वार में नही ला पाते ।
हो यह रहा हैं की हम बहुत अकेले पड़ते जा रहे हैं ,हमारी शिक्षा पद्धति हमें किताबी ज्ञान तो करवा देती हैं ,कई बार दो चार अच्छे सुभाषित भी रटवा देती हैं,अच्छी कलाओ का अति संषिप्त ज्ञान भी करवा देती हैं ,लेकिन जीवन जीने का सही तरीका,जीवन आख़िर क्या हैं? आने वाली हर कठिनाई का सामना कैसे किया जा सकता हैं ?इन सब बातों का ज्ञान नही करवा पाती । हम अकेले होने लगते हैं ,जब रिश्तो में टूटन आने लगती हैं,हम असफलता की ओर बढ़ते जाते हैं और तब याद आती हैं सेल्फ हेल्प बुक्स ,कई प्रबुद्ध पहले ही इन्हे पढ़ कर जीवन के रणक्षेत्र में सम्हले हुए योद्धा की तरह खड़े होते हैं . किंतु बात यहाँ आकर ख़त्म नही होती ,मैं नही कहती की इन किताबो का ,इन पुस्तकों का वाचन ग़लत हैं ,नही बिल्कुल नही ,हमें हमेशा पढ़ते ही रहना चाहिए ,किताबे मनुष्य की सबसे सगी मित्र होती हैं ,लेकिन इन किताबो में लिखी हर बात को अक्षरश: जीवन में पालन कर देखना मुझे नही लगता की यथार्थ के धरातल की पथरीली जमीन को नाज़ुक और सरल बना सकता हैं .
संस्कार जो बडे बच्चो को दे सकते हैं,विद्यालय जो अपने छात्रो को सिखा सकते हैं ,और आत्म विश्लेषण जो हम सभी मनुष्य कर सकते हैं ,इन तीन बातो का बड़ा महत्व हैं . कहते हैं न "आत्मा व अरे दृष्टव्य :"हमारी आत्मा में असीम ज्ञान भरा हैं,हर परिस्थिति से लड़ने का रास्ता हमें ही पता हैं ,हम जानते हैं की कब क्या करना सही हो सकता हैं और क्या ग़लत ,ये किताबे हमें सिर्फ़ रास्ता दिखाती हैं अत: इन्हे पढ़ना ग़लत नही हैं,लेकिन मंजिल हमें ख़ुद को पानी हैं ,अपने तरीके से,अपनी विचार श्रृंखला स्वत परिमार्जित कर ,स्वत: को सबल और सक्षम महसूस कर ,तभी हम जीवन में हमेशा जीत पा सकते हैं ,एक सुंदर और आनंदी जीवन निर्वाह कर सकते हैं .
नवीन वर्ष ,नवीन आशा ,उत्साह और नवीन समय लेकर कुछ ही समय में पदार्पण कर रहा हैं ,आप सभी को नवीन वर्ष की बहुत बहुत शुभकामनाये ,आशा करती हूँ आने वाला नवीन वर्ष आप सभी के लिए बहुत आनंददाई और मंगलमय होगा . इति
वीणा साधिका
राधिका
इन सबसे बडा प्रश्न यह की अचानक इन किताबो की इतनी बाढ़ सी जो आई हैं ,उसके पीछे क्या यह कारण हैं की यह किताबे बहुत अभूतपूर्व हैं?या इनके जैसे लेखक ज्ञात इतिहास में कभी नही हुए ?इन किताबो में जो लिखा गया हैं वो कभी भी कही भी नही लिखा गया ?या भारतीय व्यक्ति की जीवन शैली,जीवन पद्धति,जीवन दर्शन में आमूलचूल परिवर्तन आया हैं ।
आजकल जो यह सेल्फ हेल्प बुक्स धड़्ड्ले से बिकती जा रही हैं इसके पीछे ,इन्हे पढने का चलन होने के आलावा यह भी कुछ मत्वपूर्ण कारण हैं :-एकाकी परिवारों,नातो रिश्तो में जटिलता ,कठिनतम जीवन ,भाग दौड़,जीवन में बढ़ता तनाव ,बढती प्रतियोगिता ,अमीर बनने की ,श्रेष्ट बनने की अतीव इच्छा ।
दरअसल हो यह रहा हैं की इस कठिन समय में जब सबको जीवन में बहुत कुछ पाना हैं ,न जीवन की कोई गारंटी रही हैं ,नही शिक्षा की ,न किसी रिश्ते की,न प्रेम की ,सब कुछ पर से भरोसा उठता जा रहा हैं ,और यही मूल कारण हो रहा हैं की जब व्यक्ति ख़ुद को एकाकी समझता हैं तब उसे किसी न किसी सहारे की जरुरत पड़ती हैं ,वह सहारा किताबे भी हो सकती हैं,जो उसे जीवन के कठिन समय से लड़कर ,जीतकर आगे बढ़ना सिखाये इसलिए यह सेल्फ हेल्प की किताबे धडाधड बिकती जा रही हैं ।
कुछ किताबे जो वाकई में बहुत अच्छी हैं, उनकी बात छोड़ दी जाए तो बहुत सी किताबे ऐसी हैं ,जिनमे जीवन के कई पक्षों पर सारगर्भित विचार नही हुआ हैं ,किसी एक सोच ,किसी एक पक्ष को लेकर जीवन नही जिया जा सकता ,मनुष्य जीवन बहुआयामी हैं ,इसके कई रूप हैं,इसमे आने वाले प्रसंग कई रंग और रूप लेकर आते हैं,हर व्यक्ति की मूल भुत प्रवृति अलग अलग होती हैं ,परिस्तिथियाँ अलग अलग होती हैं ,इसे में किसी एक विचार विशेष को लेकर उसके सहारे सभी परिस्तिथियों के निर्वहन की बात कुछ अटपटी सी ही लगती हैं । मैंने भी बहुत सी किताबे पढ़ी हैं यही जानने के लिए की ऐसा कौनसा मंत्र हैं इनमे, की जिसे पढने के बाद जीवन ही बदल जाता हैं ,मजे की बाद यह हैं की इक्का दुक्का बातो को छोड़ दे तो सभी किताबो में नए रूप से ,नए तरीके से, लगभग वही बात लिखी गई हैं ,वही समझाया गया हैं हैं ,जो हम सभी हैं ,जानते हैं ,समझते हैं पर वह्य्वार में नही ला पाते ।
हो यह रहा हैं की हम बहुत अकेले पड़ते जा रहे हैं ,हमारी शिक्षा पद्धति हमें किताबी ज्ञान तो करवा देती हैं ,कई बार दो चार अच्छे सुभाषित भी रटवा देती हैं,अच्छी कलाओ का अति संषिप्त ज्ञान भी करवा देती हैं ,लेकिन जीवन जीने का सही तरीका,जीवन आख़िर क्या हैं? आने वाली हर कठिनाई का सामना कैसे किया जा सकता हैं ?इन सब बातों का ज्ञान नही करवा पाती । हम अकेले होने लगते हैं ,जब रिश्तो में टूटन आने लगती हैं,हम असफलता की ओर बढ़ते जाते हैं और तब याद आती हैं सेल्फ हेल्प बुक्स ,कई प्रबुद्ध पहले ही इन्हे पढ़ कर जीवन के रणक्षेत्र में सम्हले हुए योद्धा की तरह खड़े होते हैं . किंतु बात यहाँ आकर ख़त्म नही होती ,मैं नही कहती की इन किताबो का ,इन पुस्तकों का वाचन ग़लत हैं ,नही बिल्कुल नही ,हमें हमेशा पढ़ते ही रहना चाहिए ,किताबे मनुष्य की सबसे सगी मित्र होती हैं ,लेकिन इन किताबो में लिखी हर बात को अक्षरश: जीवन में पालन कर देखना मुझे नही लगता की यथार्थ के धरातल की पथरीली जमीन को नाज़ुक और सरल बना सकता हैं .
संस्कार जो बडे बच्चो को दे सकते हैं,विद्यालय जो अपने छात्रो को सिखा सकते हैं ,और आत्म विश्लेषण जो हम सभी मनुष्य कर सकते हैं ,इन तीन बातो का बड़ा महत्व हैं . कहते हैं न "आत्मा व अरे दृष्टव्य :"हमारी आत्मा में असीम ज्ञान भरा हैं,हर परिस्थिति से लड़ने का रास्ता हमें ही पता हैं ,हम जानते हैं की कब क्या करना सही हो सकता हैं और क्या ग़लत ,ये किताबे हमें सिर्फ़ रास्ता दिखाती हैं अत: इन्हे पढ़ना ग़लत नही हैं,लेकिन मंजिल हमें ख़ुद को पानी हैं ,अपने तरीके से,अपनी विचार श्रृंखला स्वत परिमार्जित कर ,स्वत: को सबल और सक्षम महसूस कर ,तभी हम जीवन में हमेशा जीत पा सकते हैं ,एक सुंदर और आनंदी जीवन निर्वाह कर सकते हैं .
नवीन वर्ष ,नवीन आशा ,उत्साह और नवीन समय लेकर कुछ ही समय में पदार्पण कर रहा हैं ,आप सभी को नवीन वर्ष की बहुत बहुत शुभकामनाये ,आशा करती हूँ आने वाला नवीन वर्ष आप सभी के लिए बहुत आनंददाई और मंगलमय होगा . इति
वीणा साधिका
राधिका
Tuesday, December 23, 2008
लोग क्या कहेंगे ?
बेटी की शादी २८ की उम्र में भी नही करवाओगे ?लोग क्या कहेंगे ?
इस बार भी स्कूल में छठा स्थान चीनू!इस बार भी फर्स्ट नही !दिनु की मामी ,टीनू के पापा ,मीनू की मम्मी क्या कहेंगी ?लोग क्या कहेंगे?
अच्छा खासा इंजीनियरिंग छोड़कर खेतो ,फुल पौधों का काम करोगे (एग्रीक्लचर )?लोग क्या कहेंगे ?
एकलौते बेटे की शादी और जरा भी तामझाम नही,नही चाट का स्टाल ,न डीजे का धमाल,न रोशनियों की चमक,न सगे संबंधियों को उपहार ,लोग क्या कहेंगे ?
अच्छा खासी नौकरी करते हो ,काफी पैसा हैं तुम्हारे पास ,फ़िर उसी पुराने घर में उसी टूटे फूटे फर्नीचर के साथ रहोगे?लोग क्या कहेंगे ?
बड़ी बहु होकर भी रिश्तेदारों के यहाँ नही गई ?समाज वाले क्या कहेंगे ?लोग क्या कहेंगे ?
कैसे पति हो ,शादी १० वि वर्षगाठ पर भी मुझे महंगा तोहफा नही दिलवा सकते मेरी सहेलिया क्या कहेंगी ?
चाहे कितना कष्ट हो ससुराल में यु घर परिवार और पति को छोड़कर अकेली रहोगी?लोग क्या कहेंगे ?
त्यौहार दिन भी वही पुरानी साडी ?आसपास की औरते क्या कहेंगी?
बुढापा आ गया हैं अब इस उम्र में मेकडांल्ड्स में बैठ कर बर्गर खाउन्गी। तो लोग क्या कहेंगे ?
अरे इस छोटी सी शादी करने के उम्र में ,सजने सवारने की उम्र में यहाँ पार्वती माता की पूजा करती रहेगी , तेरी सहेलिया क्या कहेंगी?लोग क्या कहेंगे?
बड़ी सी मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी छोड़ एक छोटा सा रेस्तौरेंत खोल लिया । लोग क्या कहेंगे ?
लोग क्या कहेंगे ??भारतीय समाज में ,भारतीय परिवारों में रोज़ रोज़ उठने वाला एक अत्यन्त ,गंभीर ,ज्वलंत प्रश्न । इस प्रश्न के सामने तृतीय विश्व युद्ध का प्रश्न ?आर्थिक मंदी का प्रश्न?भ्रष्ट राजनीती का प्रश्न?आतंकवाद का प्रश्न ?शिक्ष्ण के उच्च स्तर का प्रश्न?कलाओ की विरासत को सँभालने सहेजने के प्रश्न ?बिघडते पर्यावरण का प्रश्न ?सब के सब प्रश्न छोटे नज़र आते हैं । कयोकी हममें से आधिकतर लोग घर में बैठ कर५ बाहर के लोग क्या कहेंगे ?इस प्रश्न पर ही अपनी आधी से अधिक उम्र तक विचार करते रहते हैं ?शुक्र हैं हम यह नही कहते...फला आतंकवादी मारा गया अब आतंकवाद बिरादरी के लोग क्या कहेंगे?
मैं नही कहती की समाज में रह कर हमें समाज के निति नियमो को नही मानना चाहिए या समाज का थोड़ा बहुत विचार नही करना चाहिए । लेकिन यह सब एक सीमा से अधिक नही होना चाहिए,ईश्वर ने मनुष्य को विवेक दिया हैं , जिसका इस्तमाल कर वो सही ग़लत,अच्छे बुरे की समझ रखता हैं ,हर व्यक्ति की सोच, परिस्तिथिया, अलग होती हैं ,जीवन को देखने का ,उसे जीने का ,लक्ष्य निर्धारित करने का तरीका अलग होता हैं ,इसलिए सिर्फ़ लोग क्या कहेंगे इसके आधार पर किसी के जीवन की दिशा निर्धारित करना कहाँ तक सही हैं ?
भारत एक विकासशील देश हैं और देश के विकास के लिए यह आवश्यक हैं की लोग क्या कहेंगे इस प्रश्न से उपर उठ कर ,हमारे लिए ,हमारे अपनों के लिए,हमारे देश के लिए क्या सही हैं इसका विचार किया जाए ,वरना इस प्रश्न में उलझ कर हम कभी तरक्की नही कर सकते । अगर उन्नति करना हैं तो छोटी छोटी बातो से लड़ना और आगे बढ़ना भी सीखना ही होगा .
इति
वीणा साधिका
राधिका
इस बार भी स्कूल में छठा स्थान चीनू!इस बार भी फर्स्ट नही !दिनु की मामी ,टीनू के पापा ,मीनू की मम्मी क्या कहेंगी ?लोग क्या कहेंगे?
अच्छा खासा इंजीनियरिंग छोड़कर खेतो ,फुल पौधों का काम करोगे (एग्रीक्लचर )?लोग क्या कहेंगे ?
एकलौते बेटे की शादी और जरा भी तामझाम नही,नही चाट का स्टाल ,न डीजे का धमाल,न रोशनियों की चमक,न सगे संबंधियों को उपहार ,लोग क्या कहेंगे ?
अच्छा खासी नौकरी करते हो ,काफी पैसा हैं तुम्हारे पास ,फ़िर उसी पुराने घर में उसी टूटे फूटे फर्नीचर के साथ रहोगे?लोग क्या कहेंगे ?
बड़ी बहु होकर भी रिश्तेदारों के यहाँ नही गई ?समाज वाले क्या कहेंगे ?लोग क्या कहेंगे ?
कैसे पति हो ,शादी १० वि वर्षगाठ पर भी मुझे महंगा तोहफा नही दिलवा सकते मेरी सहेलिया क्या कहेंगी ?
चाहे कितना कष्ट हो ससुराल में यु घर परिवार और पति को छोड़कर अकेली रहोगी?लोग क्या कहेंगे ?
त्यौहार दिन भी वही पुरानी साडी ?आसपास की औरते क्या कहेंगी?
बुढापा आ गया हैं अब इस उम्र में मेकडांल्ड्स में बैठ कर बर्गर खाउन्गी। तो लोग क्या कहेंगे ?
अरे इस छोटी सी शादी करने के उम्र में ,सजने सवारने की उम्र में यहाँ पार्वती माता की पूजा करती रहेगी , तेरी सहेलिया क्या कहेंगी?लोग क्या कहेंगे?
बड़ी सी मल्टीनेशनल कंपनी की नौकरी छोड़ एक छोटा सा रेस्तौरेंत खोल लिया । लोग क्या कहेंगे ?
लोग क्या कहेंगे ??भारतीय समाज में ,भारतीय परिवारों में रोज़ रोज़ उठने वाला एक अत्यन्त ,गंभीर ,ज्वलंत प्रश्न । इस प्रश्न के सामने तृतीय विश्व युद्ध का प्रश्न ?आर्थिक मंदी का प्रश्न?भ्रष्ट राजनीती का प्रश्न?आतंकवाद का प्रश्न ?शिक्ष्ण के उच्च स्तर का प्रश्न?कलाओ की विरासत को सँभालने सहेजने के प्रश्न ?बिघडते पर्यावरण का प्रश्न ?सब के सब प्रश्न छोटे नज़र आते हैं । कयोकी हममें से आधिकतर लोग घर में बैठ कर५ बाहर के लोग क्या कहेंगे ?इस प्रश्न पर ही अपनी आधी से अधिक उम्र तक विचार करते रहते हैं ?शुक्र हैं हम यह नही कहते...फला आतंकवादी मारा गया अब आतंकवाद बिरादरी के लोग क्या कहेंगे?
मैं नही कहती की समाज में रह कर हमें समाज के निति नियमो को नही मानना चाहिए या समाज का थोड़ा बहुत विचार नही करना चाहिए । लेकिन यह सब एक सीमा से अधिक नही होना चाहिए,ईश्वर ने मनुष्य को विवेक दिया हैं , जिसका इस्तमाल कर वो सही ग़लत,अच्छे बुरे की समझ रखता हैं ,हर व्यक्ति की सोच, परिस्तिथिया, अलग होती हैं ,जीवन को देखने का ,उसे जीने का ,लक्ष्य निर्धारित करने का तरीका अलग होता हैं ,इसलिए सिर्फ़ लोग क्या कहेंगे इसके आधार पर किसी के जीवन की दिशा निर्धारित करना कहाँ तक सही हैं ?
भारत एक विकासशील देश हैं और देश के विकास के लिए यह आवश्यक हैं की लोग क्या कहेंगे इस प्रश्न से उपर उठ कर ,हमारे लिए ,हमारे अपनों के लिए,हमारे देश के लिए क्या सही हैं इसका विचार किया जाए ,वरना इस प्रश्न में उलझ कर हम कभी तरक्की नही कर सकते । अगर उन्नति करना हैं तो छोटी छोटी बातो से लड़ना और आगे बढ़ना भी सीखना ही होगा .
इति
वीणा साधिका
राधिका
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