गोवा से अहमदाबाद आने वाली फ़्लाइट अपने नियत समय से १ घंटा :३० मिनिट की देरी से हैं,सारे यात्री परेशान हैं ,जैसे तैसे फ़्लाइट आती हैं ,सब विमान यात्री विमान में सवार होते हैं,विमान रन वे पर भागना शुरू होता हैं की अचानक एक बच्चा जोर जोर से रोने लगता हैं ,उसकी माँ उसे चुप करवाने की कोशिश करती हैं लेकिन व्यर्थ ,उसे देखकर फ़्लाइट में बैठे सभी नन्हे बच्चे जोर जोर से रोना चीखना चालू कर देते हैं ,पुरे विमान और पुरी यात्रा में बच्चे रोते रहते हैं,विमान यात्री उन्हें चुप करवाते रहते हैं ,और अपने कान बंद करते रहते हैं ,अहमदाबाद आते ही सब यात्री बच्चो की तरह तालिया बजाते हैं और खुशी से चिल्लाते हैं पहुँच गए अब उतर सकेंगे ...................
यह एक छोटा सा उदाहरण था बच्चो की आत्मीयता का ,इस कथा क्रम को शुरू करने वाली मेरी आरोही ही थी। इसी तरह एक दिन एक मॉल में एक बच्चा किसी बात पर जोर से हँसता हैं बात का तारतम्य न जानते हुए भी वहा खडे सब बच्चे जोर जोर से हँसने लगते हैं ।
यह हैं बचपन . यह हैं बच्चे ,बच्चे ,जीनमे अपना पराया का द्वेष नही,जो मित्रता शत्रुता से परे हैं ,जिन्हें सच झूठ,विश्वास ,अविश्वास ,रुपया ,पैसा,स्वार्थ ,परार्थ कुछ भी नही मालूम । उन्हें मालूम हैं तो बस प्यार। जिनका जीवन आनंद ,उत्साह से हर पल सजा रहता हैं । वे हर एक को चाहते हैं हर कोई उनका अपना हैं।
दो तीन दिन पहले मैं किसी बात पर सोच रही थी, की कैसी दुनिया हो गई हैं,सुबह ८ से रात १० ऑफिस,किसी को किसीके लिए फुरसत नही ,कोई किसी की भावनाओ को समझे,साथ हँसे बोले इतना समय नही,सुबह से इंसान रूपी मशीन बस काम पर लग जाती हैं ,कहीं वो प्यार नही वो आत्मीयता नही,बाजारों में जिंदगी को सजाने सवारने की सारी चीजे मौजूद हैं ,जिनकी चमक दमक जिंदगी को उपरी रूप से इतना सजाती हैं की जिंदगी में कोई कमी नज़र नही आती लेकिन सच्चे अर्थो में जो एक दुसरे के सुख दुःख में हँसे रोये,एक निर्मल मुस्कान से सबका मन अपनी और खींचे ,जो मीठे स्वर में प्यार के दो बोल कह सारा दुःख दर्द दूर कर दे ,ऐसी सच्ची जिंदगी कहा हैं ?यह सब सोचते सोचते ही पुरा दिन कट tगया ,शाम को हम लोग कैफे कॉफी डे गए ,बड़ा अजीब सा बनावटी वातावरण था ,सब लोग धीमे धीमे बात कर रहे थे,वेटर बड़े सलीके से पेश आ रहे थे , प्लेयर पर बड़े बुरे लेकिन नए गाने चल रहे थे,सामने कॉलेज के लड़के लड़कियों का ग्रुप हंस बोल रहा था,पीछे की टेबल पर एक महाशय किताब मुंह पर चिपकाये बैठे थे, कांच के दरवाजे के बाहर खडा एक १०-१२ साल का बच्चा मुझसे इशारे से भीख मांग रहा था . हम सब भी बातों की औपचारिकता निभा रहे थे ,कॉफी आई ,आरोही जो अभी तक इधर उधर खले रही थी,मेरे पास आई और अपने हाथ से कॉफी पिने की जिद करने लगी मैंने समझाया फ़िर भी नही मानी ,मेरे कप से स्ट्रा खींच के कुछ इस तरह से निकाली की सारी कॉफी उसके पापा के कपड़ो पर ,आरोही ने अपने पापा के कपड़ो पर कॉफी से स्प्रे पेंटिंग कर दी थी , पतिदेव को काटों तो खून नही ,सासु माँ मुंह छुपा कर हस रही थी ,ससुर जी इधर उधर देखकर अपनी हँसी छुपाने की असफल कोशिश कर रहे थे ,और मैं जोर जोर से हंस रही थी,आरोही मेरे स्वर में स्वर मिलाती हुई ,तालियाँ बजा बजाकर हंस रही थी । उसके साथ हँसतें हुए सब कुछ भूल गई ,कॉफी डे के बाहर निकले तो बच्चो का एक समूह हमारे पीछे चला आ रहा था और हम पर हंस रहा था ,उस समूह में वह भीख मांगने वाला बच्चा भी था,सारा माजरा समझ आया,और मन ने कहा................................ यहाँ हैं जिंदगी,यहाँ बच्चो में ,यहाँ जिंदगी अपने पुरे उत्साह ,उल्लास प्रेम और आनंद के साथ हँसती गाती झिलमिलाती हैं .जिंदगी यहाँ अब भी मुस्कुराती हैं ।
कहते हैं बेटी माँ की परछाई होती हैं ,वो मेरी परछाई नही ,एक दैवीय ज्योति हैं,जो जीवन को प्रकाशित करती हैं मेरा ही चेहरा,मेरी शक्ति,शांति,संगती ,गीति,आरोही ....
Friday, November 14, 2008
Monday, November 10, 2008
संसार के सबसे बड़े मायावी..मित्र ..और शत्रु...
वे संसार के सबसे बड़े मायावी हैं ,हम आप और ईश्वर भी उनकी माया के अधीन हैं ,वे सर्वशक्तिमान हैं , उनके सामने न धन की ताकत टिकती हैं ,न बल की ,न शस्त्र उन्हें पराजित कर सकते हैं ,नही अस्त्र उनके सामने टिकते हैं,वे ब्रह्मास्त्र भी हैं और शास्त्रार्थ भी. कवि कलाकार,विद्वान उनके गुण गाते नही थकते ,उनकी माया जिनके साथ हो वो शिखर पर और जिन्होंने उन्हें नही पूजा ,उन्हें भूतल पर कहीं पाव ज़माने की जमीन भी नसीब नही होती । वे ही गीति हैं और वे ही दुर्गति ,उनसे ही संसार की मनोमय सुंदरतम लय हैं और उनसे ही अवनति । वे पल भर में आसमान गिरा सकते हैं ,वे ही जमीन पिघला सकते हैं,कभी छत्रछाया बनकर रक्षण कर सकते हैं ,कभी सर का छप्पर उड़ा कर भक्षण भी कर सकते हैं ,हर रिश्ते की बुनियाद इन पर ही टिकी होती हैं ,इनसे ही रिश्ते बनते हैं और इनसे ही टूट जाते हैं .ये जमीन हैं आसमान हैं ,वे सूर्य हैं चंद्र हैं और कल्याण भी हैं ,वे ईश है देव हैं और दैव भी हैं ,एक वही हैं जिनकी पूजा जिन्होंने कर ली वो तर गए बाकी जीते जी मर गए।
आप सोच रहे होंगे मैं क्यों पहेली बुझा रही हूँ?यह क्याहैं?मैं कबसे किसी मायावी के बारे में लिखने लगी?आदि आदि । पर जब मैं उनका नाम बताउंगी तो आप भी मुझसे सौ टका सहमत होंगे। सभी के मित्र और शत्रु ,कल्याणकारी और विनाशकारी, आनंददायी और दुखदायी वे मायावी हैं.................................. शब्द ।
शब्द जिनका राज्य पुरे संसार पर चलता हैं ,मनुष्य ने जबसे भावो की अभिवयक्ति के लिए शब्दों का सहारा लेना प्रारंभ किया तबसे आज तक वे मनुष्य जीवन को भाग्यनिर्धाता के रूप में चलाते आए हैं ,मनुष्य की किस्मत बनाते बिघाडते आए हैं।
इंसान पढ़ लिया , विद्वान हो लिया ,ज्ञानवान हो लिया ,न जाने कितनी भाषाओ का सृजक और पोषक हो लिया ,लेकिन शब्दों का सही प्रयोग और अभिवयक्ति की सही दिशा आज तक निर्धारित करना पुरी तरह से नही सिखा ,उसके पास शब्दों का भण्डार हैं लेकिन उनको किस तरह से प्रयोग करना हैं उसके दैनंदिन जीवन में ,वह आज भी यह नही जानता ,भषा विज्ञानी हैं ,लेकिन शब्दों का प्रयोग एक कला हैं ,कला आत्मा की अभिवयक्ति हैं ,और जहाँ यह अभिवयक्ति चुकी ,सारा काम बिघाड जाता हैं।
आज के पढ़े लिखे लोग जिस तरह की भाषा का प्रयोग करते हैं ,समझ नही आता भाषा की अधोगति पर रोया जाए या वाणी की अवनति और दुखदायी स्थिति पर । कहते हैं न एक बार ब्रह्मास्त्र की मार चुक जाए या उससे दुखे हुए इन्सान का इलाज हो वह ठीक हो जाए ,लेकिन शब्दास्त्र की मार युगों युगों तक आत्मा पर घाव बन कर मनुष्य ह्रदय को सलाती रहती हैं,जलाती रहती हैं ।
शब्द विज्ञानं हैं और बोलना कला , इसलिए वीणापाणी को वाणी भी कहा जाता हैं ,देवी के अन्य रूपों के साथ शब्दमयी देवी भी हैं , शब्दों को मधुरता से प्रेम से आनंद से बोला जाता हैं तो सुनने वाला आपका प्रेमी और मित्र हो जाता हैं ,और जब इन्ही शब्दों को तोड़ मरोड़ कर अपने निम्नतम स्तर पर बुरे स्वर के साथ प्रयोग किया जाता हैं ,तो सुनने वाले के लिए जीवन खत्म हो जाता हैं ,धरती और आकाश सब शून्य हो जाते हैं ,ह्रदय भावना शून्य ,करुणा शून्य ,प्रेम शून्य हो जाता हैं ,इसीसे उपजता हैं प्रतिकार ..विरोध... नफ़रत ...और शब्दास्त्र पर शब्दास्त्र का तीक्ष्ण प्रयोग। इन सबसे आहत हो जीवन कहीं छुप जाता हैं जैसे अमावास की रात्रि में चंद्र तारे कही छुप जाते हैं और बचता हैं केवल अँधेरा ।
शब्द धरोहर हैं ,मानवीय संस्कृति और संस्कार का अहम् भाग । उनका प्रयोग प्रेम से ,मधुर स्वर के साथ और शांति से किया जाए तो ही हम जीवन संघर्ष को जीत सकते हैं .और इन मायावी शब्दों को अपना मित्र बना कर सदैव आदर के पात्र और प्रिय बन सकते हैं ..मुझे लगता हैं हम बच्चो को पोथी पुस्तके पढाते हैं इन सबके साथ वाणी का सही प्रयोग ,आवाज़ को कम अधिक कर किस तरह से अपनी बात को औरो तक पहुचाया जाए ,स्वर का शब्द से सम्बन्ध और उसका यथोउचित प्रयोग यह विषय भी बच्चो को विद्यालय में रखा जाना चाहिए और साथ ही साथ माता पिता द्वारा भी बच्चो को पढाया जाना चाहिए। ताकि शब्द सके मित्र बन सके .
मेरा इन मायावी शब्दों को नमन ...
आप सोच रहे होंगे मैं क्यों पहेली बुझा रही हूँ?यह क्याहैं?मैं कबसे किसी मायावी के बारे में लिखने लगी?आदि आदि । पर जब मैं उनका नाम बताउंगी तो आप भी मुझसे सौ टका सहमत होंगे। सभी के मित्र और शत्रु ,कल्याणकारी और विनाशकारी, आनंददायी और दुखदायी वे मायावी हैं.................................. शब्द ।
शब्द जिनका राज्य पुरे संसार पर चलता हैं ,मनुष्य ने जबसे भावो की अभिवयक्ति के लिए शब्दों का सहारा लेना प्रारंभ किया तबसे आज तक वे मनुष्य जीवन को भाग्यनिर्धाता के रूप में चलाते आए हैं ,मनुष्य की किस्मत बनाते बिघाडते आए हैं।
इंसान पढ़ लिया , विद्वान हो लिया ,ज्ञानवान हो लिया ,न जाने कितनी भाषाओ का सृजक और पोषक हो लिया ,लेकिन शब्दों का सही प्रयोग और अभिवयक्ति की सही दिशा आज तक निर्धारित करना पुरी तरह से नही सिखा ,उसके पास शब्दों का भण्डार हैं लेकिन उनको किस तरह से प्रयोग करना हैं उसके दैनंदिन जीवन में ,वह आज भी यह नही जानता ,भषा विज्ञानी हैं ,लेकिन शब्दों का प्रयोग एक कला हैं ,कला आत्मा की अभिवयक्ति हैं ,और जहाँ यह अभिवयक्ति चुकी ,सारा काम बिघाड जाता हैं।
आज के पढ़े लिखे लोग जिस तरह की भाषा का प्रयोग करते हैं ,समझ नही आता भाषा की अधोगति पर रोया जाए या वाणी की अवनति और दुखदायी स्थिति पर । कहते हैं न एक बार ब्रह्मास्त्र की मार चुक जाए या उससे दुखे हुए इन्सान का इलाज हो वह ठीक हो जाए ,लेकिन शब्दास्त्र की मार युगों युगों तक आत्मा पर घाव बन कर मनुष्य ह्रदय को सलाती रहती हैं,जलाती रहती हैं ।
शब्द विज्ञानं हैं और बोलना कला , इसलिए वीणापाणी को वाणी भी कहा जाता हैं ,देवी के अन्य रूपों के साथ शब्दमयी देवी भी हैं , शब्दों को मधुरता से प्रेम से आनंद से बोला जाता हैं तो सुनने वाला आपका प्रेमी और मित्र हो जाता हैं ,और जब इन्ही शब्दों को तोड़ मरोड़ कर अपने निम्नतम स्तर पर बुरे स्वर के साथ प्रयोग किया जाता हैं ,तो सुनने वाले के लिए जीवन खत्म हो जाता हैं ,धरती और आकाश सब शून्य हो जाते हैं ,ह्रदय भावना शून्य ,करुणा शून्य ,प्रेम शून्य हो जाता हैं ,इसीसे उपजता हैं प्रतिकार ..विरोध... नफ़रत ...और शब्दास्त्र पर शब्दास्त्र का तीक्ष्ण प्रयोग। इन सबसे आहत हो जीवन कहीं छुप जाता हैं जैसे अमावास की रात्रि में चंद्र तारे कही छुप जाते हैं और बचता हैं केवल अँधेरा ।
शब्द धरोहर हैं ,मानवीय संस्कृति और संस्कार का अहम् भाग । उनका प्रयोग प्रेम से ,मधुर स्वर के साथ और शांति से किया जाए तो ही हम जीवन संघर्ष को जीत सकते हैं .और इन मायावी शब्दों को अपना मित्र बना कर सदैव आदर के पात्र और प्रिय बन सकते हैं ..मुझे लगता हैं हम बच्चो को पोथी पुस्तके पढाते हैं इन सबके साथ वाणी का सही प्रयोग ,आवाज़ को कम अधिक कर किस तरह से अपनी बात को औरो तक पहुचाया जाए ,स्वर का शब्द से सम्बन्ध और उसका यथोउचित प्रयोग यह विषय भी बच्चो को विद्यालय में रखा जाना चाहिए और साथ ही साथ माता पिता द्वारा भी बच्चो को पढाया जाना चाहिए। ताकि शब्द सके मित्र बन सके .
मेरा इन मायावी शब्दों को नमन ...
Sunday, November 2, 2008
कौन हिंदू, कौन मुस्लिम ?
तक़रीबन १२ बजे का समय ,हम कोल्हापुर महालक्ष्मी देवस्थान से बाहर निकले ,वह तेजी से दौड़ता हुआ मेरे पतिदेव के पास आया और बोला "साहेब गाड़ी तैयार आहे" ,(गाड़ी तैयार हैं ) वो............ सफ़ेद कुर्ता पायजामा पहने,शुद्ध मराठी बोलता हुआ ,मराठी माणुस सा ।
आज सुबह ही हम कोल्हापुर पहुंचे थे ,मैं ,सासु माँ ,ससुर जी ,पतिदेव और बेटी हम सब गाड़ी में बैठ गए ,सब चुप थे ,पर वह बोलता जा रहा था ,"बघा साहेब इथे जवळस देवीच देवुळ आहे ...नंतर आपण ज्योतिबा मन्दिर चे दर्शन करू ,औदुम्बरच्या वाडीत चलू ..................................(यहाँ पास ही देवी का मन्दिर हैं ,बाद में हम ज्योतिबा मन्दिर के दर्शन को जायेंगे ,औदुम्बर के मन्दिर भी जायेंगे )आदि आदि आदि । मैं सोच रही थी ,यह बोलते बोलते थका नही क्या ?उस दिन वह हमें कम से कम चार तीर्थ स्थलों पर ले गया । दुसरे दिन फ़िर सुबह ७ से हम देव दर्शन के लिए निकल पड़े ,आज भी कल की तरह ही उसकी बातें- बातें । "बघा वहिनी हे आमच्या कोल्हापुरातले महान व्यक्तिंच घर । तुम्हाला सांगलीच्या गणपतीची गोष्ट सांगतो ....."(देखिये भाभी ये हमारे कोल्हापुर के महान व्यक्ति का घर,आपको सांगली के गणपति की कहानी सुनाता हूँ । )
एक जगह हम कुछ देर रुके उसके पास एक फोन आया ..........."हाँ बोल..काय?अस !!!!!!!जा ,बघू ...और उसने गुस्से से फ़ोन पटका धम्मम !!!!!!!!!!!!!!
फ़िर मेरी सासु माँ से कहने लगा ,बघा आई मैं सुबह से नमाज़ पढ़के निकलता हूँ ,पर मेरा भाई कुछ नही करता ,दिन भर घर में बैठा रहता हैं ,माझी आई म्हणते लहान ऐ ....(मेरी माँ कहती हैं वह तुम्हारा छोटा भाई हैं )
सासु माँ आश्चर्य से हक्की बक्की ...
घर आने के बाद उन्होंने मुझसे पूछा "राधिका ये भाई मुस्लिम था ....?"
हाँ वह मराठी माणुस सा दिखने वाला ड्राईवर मुसलमान था ,उसका नाम था "अल्ला बख्श बागबान "।
कोल्हापुर में हम तीन दिन थे . वही नही न जाने कितने मुसलमान शुद्ध मराठी बोल रहे थे,देवी महालक्ष्मी के दर्शनों को आतुर थे ,कुछ माँ की तस्वीरे बेच रहे थे,कुछ देवी की साडी और चूड़ी बेच रहे थे । सब देख कर मैं सोच में पड़ गई,जब मैं गुजरात में होती हूँ तो वहाँ हर कोई गुजराती दीखता हैं ,हिंदू ,मुस्लिम ,सिख, इसाई ...हर कोई ,जब महाराष्ट्र में होती हूँ तो हर कोई मराठी ...पंजाब में हर व्यक्ति वाहेगुरु की फतह कहता हैं ,और दक्षिण में हर व्यक्ति तिरुपति बालाजी को नमन करता हैं ।हम सब हाजी अली जाते हैं ,मियां तानसेन के मकबरे पर सब संगीतज्ञ मत्था टेकते हैं। मैं सोचती रह जाती हूँ कहीं कोई हिंदू दिखे,कहीं मुस्लिम ,कहीं सिख या फ़िर इसाई ,पर दीखते हैं सिर्फ़ इंसान ,धर्म ,जाती ,देश ,राज्य की सीमओं से परे,एक दुसरे के धर्मो का सन्मान करते ,मानवीय रिश्ते निभाते ,एक दुसरे से प्रेम भाव और बंधुता रखते इंसान और भारतीय । सच्चे भारतीय ,जिनकी नज़रे न तो हिंदू मुस्लिम का भेद जानती हैं ,न धर्म मजहब की चौखटे ,वह जानती हैं सिर्फ़ जीवन के मायने और भारतीयत्व ।
धर्म ,मजहब का द्वेष जिनके मनो में हैं ,वह मुस्लिम नही ,हिंदू भी नही ,उनका कोई धर्म नही वह या तो ख़ुद विकृत मनस्तिथि के हैं ,या अपना स्वार्थ चाहते हैं। सच्चा भारतीय तो भारत में हर कहीं हैं ,उसे देखकर मुझसा कोई भी प्रश्न में पड़ जाए की कौन हिंदू, कौन मुस्लिम ?
आज सुबह ही हम कोल्हापुर पहुंचे थे ,मैं ,सासु माँ ,ससुर जी ,पतिदेव और बेटी हम सब गाड़ी में बैठ गए ,सब चुप थे ,पर वह बोलता जा रहा था ,"बघा साहेब इथे जवळस देवीच देवुळ आहे ...नंतर आपण ज्योतिबा मन्दिर चे दर्शन करू ,औदुम्बरच्या वाडीत चलू ..................................(यहाँ पास ही देवी का मन्दिर हैं ,बाद में हम ज्योतिबा मन्दिर के दर्शन को जायेंगे ,औदुम्बर के मन्दिर भी जायेंगे )आदि आदि आदि । मैं सोच रही थी ,यह बोलते बोलते थका नही क्या ?उस दिन वह हमें कम से कम चार तीर्थ स्थलों पर ले गया । दुसरे दिन फ़िर सुबह ७ से हम देव दर्शन के लिए निकल पड़े ,आज भी कल की तरह ही उसकी बातें- बातें । "बघा वहिनी हे आमच्या कोल्हापुरातले महान व्यक्तिंच घर । तुम्हाला सांगलीच्या गणपतीची गोष्ट सांगतो ....."(देखिये भाभी ये हमारे कोल्हापुर के महान व्यक्ति का घर,आपको सांगली के गणपति की कहानी सुनाता हूँ । )
एक जगह हम कुछ देर रुके उसके पास एक फोन आया ..........."हाँ बोल..काय?अस !!!!!!!जा ,बघू ...और उसने गुस्से से फ़ोन पटका धम्मम !!!!!!!!!!!!!!
फ़िर मेरी सासु माँ से कहने लगा ,बघा आई मैं सुबह से नमाज़ पढ़के निकलता हूँ ,पर मेरा भाई कुछ नही करता ,दिन भर घर में बैठा रहता हैं ,माझी आई म्हणते लहान ऐ ....(मेरी माँ कहती हैं वह तुम्हारा छोटा भाई हैं )
सासु माँ आश्चर्य से हक्की बक्की ...
घर आने के बाद उन्होंने मुझसे पूछा "राधिका ये भाई मुस्लिम था ....?"
हाँ वह मराठी माणुस सा दिखने वाला ड्राईवर मुसलमान था ,उसका नाम था "अल्ला बख्श बागबान "।
कोल्हापुर में हम तीन दिन थे . वही नही न जाने कितने मुसलमान शुद्ध मराठी बोल रहे थे,देवी महालक्ष्मी के दर्शनों को आतुर थे ,कुछ माँ की तस्वीरे बेच रहे थे,कुछ देवी की साडी और चूड़ी बेच रहे थे । सब देख कर मैं सोच में पड़ गई,जब मैं गुजरात में होती हूँ तो वहाँ हर कोई गुजराती दीखता हैं ,हिंदू ,मुस्लिम ,सिख, इसाई ...हर कोई ,जब महाराष्ट्र में होती हूँ तो हर कोई मराठी ...पंजाब में हर व्यक्ति वाहेगुरु की फतह कहता हैं ,और दक्षिण में हर व्यक्ति तिरुपति बालाजी को नमन करता हैं ।हम सब हाजी अली जाते हैं ,मियां तानसेन के मकबरे पर सब संगीतज्ञ मत्था टेकते हैं। मैं सोचती रह जाती हूँ कहीं कोई हिंदू दिखे,कहीं मुस्लिम ,कहीं सिख या फ़िर इसाई ,पर दीखते हैं सिर्फ़ इंसान ,धर्म ,जाती ,देश ,राज्य की सीमओं से परे,एक दुसरे के धर्मो का सन्मान करते ,मानवीय रिश्ते निभाते ,एक दुसरे से प्रेम भाव और बंधुता रखते इंसान और भारतीय । सच्चे भारतीय ,जिनकी नज़रे न तो हिंदू मुस्लिम का भेद जानती हैं ,न धर्म मजहब की चौखटे ,वह जानती हैं सिर्फ़ जीवन के मायने और भारतीयत्व ।
धर्म ,मजहब का द्वेष जिनके मनो में हैं ,वह मुस्लिम नही ,हिंदू भी नही ,उनका कोई धर्म नही वह या तो ख़ुद विकृत मनस्तिथि के हैं ,या अपना स्वार्थ चाहते हैं। सच्चा भारतीय तो भारत में हर कहीं हैं ,उसे देखकर मुझसा कोई भी प्रश्न में पड़ जाए की कौन हिंदू, कौन मुस्लिम ?
Friday, October 24, 2008
तमसो मा ज्योतिर्गमय(शुभ दीपावली )

दीपावली : दीपो का त्यौहार ,ऐश्वर्य का त्यौहार ,अनगिनत खुशियों का त्यौहार ,एक दुसरे से मिलने के अवसर का त्यौहार ,मिठाइयों का त्यौहार , पटाखों का त्यौहार , उजाले का त्यौहार । बच्चो से लेकर वृद्धो तक सभी को इस त्यौहार का इंतजार होता हैं ,इंतजार करते करते इस साल भी दिवाली आ ही गई । हम सभी ने अपनी अपनी तरह से दिवाली को आनंदमय बनाने के लिए कई सारी तैयारिया की हैं ,कोई घर द्वार सजा रहा हैं ,कोई नया सामान ला रहा हैं ,कोई पकवान बना रहा हैं ,कोई अपने रिश्तेदारों के यहाँ जा रहा हैं ,तो कोई घर पर ही मेहमानों का इंतजार कर रहा हैं .
आप सभी को दीपावली की शुभकामनाये , दीपावली सभी के घर में आस्था ,आनंद और प्रेम का प्रकाश लाये ,अमावस की दीपावली इस बार अनंत आकाश को चंद्र , तारांगणो से सजा जाए ,हर दुखी ह्रदय का दुःख मिट जाए ,वृक्ष वल्लियो से पुनः भारतीय धरा हरी भरी हो जाए , भूखो, अनाथो को नाथ और भोजन मिल जाए , जैसे दीपो का प्रकाश शांत सुंदर होता हैं वैसे ही मानव मन में असंख्य भक्ति ,करुणा ,मानवीयता और शांति के दीप जल जाए । जो जीवन के कठिन और अंधेरे रास्तो पर चल रहे हैं उनके रास्ते सरल और प्रकाशमय हो जाए ,जो वृद्ध बीमारीयों से पीड़ित, दुखी हैं ,वे उन पर विजय पा सुखी हो जाए ,जो इस जीवन में कलाओ से वंचित हैं उन पर माँ शारदा कृपा करके कलाए बरसाए ,जो माँ लक्ष्मी की कृपा से वंचित हैं उन्हें सुख ,समृद्धि ,सम्पत्ति मिल जाए ,स्वर आराधना करने वाले संगीत की उँचाइयो को पा जाए । अध्ययन करने वाले ज्ञान के दीप जलाये । शुभ दीपावली और यही प्रार्थना :असतो मा सद्गमय तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्योर् मा अमृतं गमय ॐ शांति शांति शांति
पिछली कुछ पोस्टस पर श्री कुश जी ,श्री मार्कंड जी,श्री सुशील कुमार छोक्कर जी ,श्री मनुज मेहता जी ,श्री सुनील .आर .कर्मले जी ,श्री राज भाटिया जी ,श्री शिव कुमार मिश्रा जी ,श्री संजय जुम्नानी जी ,श्री प.एन.सुब्रम्ह्न्यम जी ,श्री दीपक बहरे जी,सुश्री रंजना जी ,सुश्री शोभा जी ,श्री निशु जी,श्री नीरज रोहिला जी ,श्री समीर जी ,सुश्री लावण्या जी ,श्री नीरज गोस्वामी जी ,श्री मीत जी ,सुश्री मनविंदर जी ,श्री सुमन सौरभ जी ,श्री मंथन जी ,श्री ब्रजमोहन श्रीवास्तव जी ,सुश्री आशा जोगलेकर जी ,सुश्री घुघती बासूती जी ,श्री मोहन वशिष्ठ जी ,श्री अशोक प्रियरंजन जी,श्री श्यामल सुमन जी ,श्री श्रीकांत पराशर जी,सुश्री ऋचा जी ,श्री दिनेश राय द्विवेदी जी ,डॉक्टर अनुराग जी आदि सभी की टिप्पणिया मिली। आप सभी से मेरे लेखन के लिए अच्छी टिप्पणिया पाकर जो प्रोत्साहन मिलता हैं उस कारण ही लिख पा रही हूँ ,आप सभी को बहुत बहुत धन्यवाद ।
Thursday, October 23, 2008
दिवाली: खुशी की कीमत ...............
शाम के ७ बजे का समय ॥ बाज़ार में खासी भीड़ ,सोने के दाम शिखर को छू रहे हैं ,देश की अर्थवयवस्था की कमर टूट रही हैं ,फ़िर भी सोने चांदी की दुकानों पर ग्राहकों की भीड़ ,हो भी कैसे न ?दो दिन बाद दीपावली हैं ,कल धनतेरस हैं । अक्टुम्बर महिना शुरू होते ही श्यामला ने समीर से कह दिया था इस बार पुरे 3 तोले का हार खरीदूंगी पूजा के लिए । समीर ने भी तभी से पैसे जोड़ना शुरू कर दिए थे ,पर इस महंगाई में ३ तोले का हार ?????
पति के साथ श्यामला भी बाज़ार में ....ग्राहकों की आवाजाही से दुकान पर मेले जैसा माहौल । दुकानदार बीच बीच में अपने नौकरों को आदेश दे रहा हैं,.राकेश .............मेडम को जर्दोसी वाला हार दिखा ,मुकेश साहब को हीरे की अंगूठी दिखा .... मदन तू वहां क्या कर रहा हैं ,दादी जी को चुडिया बता ।..............
तो कहिये समीर भाई हार पसंद आया ,असली सोने का हैं पुरे बाईस केरेट का ,और कैसा बारीक़ काम हैं ।
समीर धीमे स्वर में .."हाँ वो तो सही हैं ..पर दाम?
ज्यादा नही भाई साहब आपके लिए ,आप तो हमेशा ही आते हैं ,बस पचास हज़ार "।
पचास हज़ार .......... नही कोई और दिखा दीजिये अभी इतना बजट नही हैं ,"
"अरे समीर भाई कैसी बात कर रहे हैं ,अब चीज़ भी तो देखिये आप... और तो फ़िर इससे कम में कहाँ आएगा ........."
ठीक हैं कोई बात नही .......
श्यामला चुप ,पति पत्नी घर जाकर चुपचाप ....
समीर: श्यामला अगली दिवाली पर तुम्हे पक्का हीरे का हार दिलवाऊंगा ॥
श्यामला : रहने दो हर दिवाली यही कहते हो,सोने का तो दिलवा न सके ...आखों से आसूं की धारा ॥
अगली सुबह श्यामला सब्जी मार्केट में ....
भाई भिन्डी क्या भाव हैं ?
जी बेन ७० रूपये किलो ?
क्या !!!!!!!अच्छा गोभी ?
जी ९० रूपये किलो .
कद्दू ?
४० रूपये ...
दोपहर में श्यामला यह सोचकर की सोने का नही नकली ही सही फ़िर बाज़ार में .....
भाई यह मनके वाला हार कितने का ???
जी २ हज़ार का .....
२ हज़ार नकली हार के लिए ??
नही .....
दुखी श्यामला ....
समीर की सांत्वना .................: कोई बात नही ५००-६०० की कोई साडी ही खरीद लो ...
श्यामला : जो साडी मुझे पसंद हैं वो ६-७ हज़ार से कम की नही ,समीर तुमने भी नए कपड़े नही सिलवाए ...
न ! मुझे जो पसंद आया था सूट, वह ८ हज़ार का था ।
अगले दिन दिवाली के दीपक खरीदने दोनों बाज़ार में
भाई ये दीपक कितने का ??
जी साहब १२ रूपये का एक ।
१२ का एक और यह
५० के दो ...
घर आकर श्यामला का जी भर का रोना , दिवाली हैं चार कपड़े नही खरीद सकते ,सब्जी भाजी, दिए तक महंगे ................
बड़ी दीपावली का दिन श्यामला दुखी मन से सामने वाले बंगले की महिलाओ के ठाट बाट देखकर कुडती हुई ...
तभी समीर की आवाज "सुनंदा भाभी ने तुम्हे बुलवाया हैं "।
श्यामला भारी मन से धीमे -धीमे कदम बढाती हुई...रास्ते के दूसरी तरफ़ बनी एक छोटी सी झोपडी के बाहर एक महिला, एकदम पुरानी साडी पहने हुए ,न हाथो में सोने के कंगन ,न कानो में बाले ,फ़िर भी दियो की ज्योति को अपने मधुर हास्य से प्रकाश से भरते हुए , हंसती गाती खिलखिलाती औरो से बतियाती ..बहुत खुश ...
श्यामला ... पास जाकर.. तुम इतनी खुश क्यो हो?तुमने इस दिवाली क्या पा लिया ?तुमने क्या कीमत देकर इतनी खुशी खरीद ली ?
महिला :- खुशी की कोई कीमत नही होती ,खुशी हमारे मन में बसती हैं . दिवाली पाने का नही देने का नाम हैं ,अपनी आत्मा में संचित प्रकाश से जन जीवन आलोकित करने का नाम हैं दीपावली ।
श्यामला: तुम्हे अच्छी साडी पहनने की इच्छा नही होती ?तुम्हे नही लगता इस दिवाली तुम्हारे घर में अच्छे -अच्छे पकवान बने,घर कीमती वस्तुओ से सजे ,तुम्हारे पास बहुत सा सोना धन हो ?
महिला: क्यों नही लगता ,लगता हैं न !पर मेरे पास उससे भी बड़ा धन हैं ,सबसे बडा खजाना।
श्यामला: वह क्या?
महिला: संतोष ,आत्मिक शांति और मेरे घरवालो का प्रेम ।
इच्छाऐ अनंत हैं और वस्तुए नश्वर । हम जितना अधिक पाते हैं हर बार और अधिक पाना चाहते हैं ,मुझे भी अच्छे कपड़े, गहने पहनने की इच्छा होती हैं ,लेकिन मैं इन इच्छाओ को पुरा नही कर पाने के कारण बहुत दुखी नही होती । गहने इस शरीर की शोभा बढ़ते हैं ,मेरी आत्मा सुंदर हैं , मेरे पास मेरा परिवार हैं ,दो समय का भोजन हैं ,रहने को छप्पर हैं ,काम करने के लिए हाथ पाँव हैं ,क्या ये सब काफी नही हैं ,वो देखो वो सामने वाला बच्चा ..इसका कोई नही दो दिन से इसने भोजन नही किया ,वह देखो वह बूढी ताई .पति के मरने के बाद सारे गहने बेच कर भी घर नही बचा पाई ,वह देखो वह वृद्ध भिखारी ,दोनों हाथो पैरो से लाचार ...और किस किसको का दुःख दिखाऊ ?मैं सुखी हूँ और बहुत खुश ,मेरे पास सच्चा धन हैं ,सुकून हैं ,प्रेम हैं ।
श्यामला ....बहुत खुशी के साथ अपने घर की ओर कदम बढाती हुई . आकाश को मुट्ठी में पाकर मिलने वाली खुशी से ज्यादा खुश .आज वह बहुत खुश हैं हर दिवाली से ज्यादा खुश ।
पति के साथ श्यामला भी बाज़ार में ....ग्राहकों की आवाजाही से दुकान पर मेले जैसा माहौल । दुकानदार बीच बीच में अपने नौकरों को आदेश दे रहा हैं,.राकेश .............मेडम को जर्दोसी वाला हार दिखा ,मुकेश साहब को हीरे की अंगूठी दिखा .... मदन तू वहां क्या कर रहा हैं ,दादी जी को चुडिया बता ।..............
तो कहिये समीर भाई हार पसंद आया ,असली सोने का हैं पुरे बाईस केरेट का ,और कैसा बारीक़ काम हैं ।
समीर धीमे स्वर में .."हाँ वो तो सही हैं ..पर दाम?
ज्यादा नही भाई साहब आपके लिए ,आप तो हमेशा ही आते हैं ,बस पचास हज़ार "।
पचास हज़ार .......... नही कोई और दिखा दीजिये अभी इतना बजट नही हैं ,"
"अरे समीर भाई कैसी बात कर रहे हैं ,अब चीज़ भी तो देखिये आप... और तो फ़िर इससे कम में कहाँ आएगा ........."
ठीक हैं कोई बात नही .......
श्यामला चुप ,पति पत्नी घर जाकर चुपचाप ....
समीर: श्यामला अगली दिवाली पर तुम्हे पक्का हीरे का हार दिलवाऊंगा ॥
श्यामला : रहने दो हर दिवाली यही कहते हो,सोने का तो दिलवा न सके ...आखों से आसूं की धारा ॥
अगली सुबह श्यामला सब्जी मार्केट में ....
भाई भिन्डी क्या भाव हैं ?
जी बेन ७० रूपये किलो ?
क्या !!!!!!!अच्छा गोभी ?
जी ९० रूपये किलो .
कद्दू ?
४० रूपये ...
दोपहर में श्यामला यह सोचकर की सोने का नही नकली ही सही फ़िर बाज़ार में .....
भाई यह मनके वाला हार कितने का ???
जी २ हज़ार का .....
२ हज़ार नकली हार के लिए ??
नही .....
दुखी श्यामला ....
समीर की सांत्वना .................: कोई बात नही ५००-६०० की कोई साडी ही खरीद लो ...
श्यामला : जो साडी मुझे पसंद हैं वो ६-७ हज़ार से कम की नही ,समीर तुमने भी नए कपड़े नही सिलवाए ...
न ! मुझे जो पसंद आया था सूट, वह ८ हज़ार का था ।
अगले दिन दिवाली के दीपक खरीदने दोनों बाज़ार में
भाई ये दीपक कितने का ??
जी साहब १२ रूपये का एक ।
१२ का एक और यह
५० के दो ...
घर आकर श्यामला का जी भर का रोना , दिवाली हैं चार कपड़े नही खरीद सकते ,सब्जी भाजी, दिए तक महंगे ................
बड़ी दीपावली का दिन श्यामला दुखी मन से सामने वाले बंगले की महिलाओ के ठाट बाट देखकर कुडती हुई ...
तभी समीर की आवाज "सुनंदा भाभी ने तुम्हे बुलवाया हैं "।
श्यामला भारी मन से धीमे -धीमे कदम बढाती हुई...रास्ते के दूसरी तरफ़ बनी एक छोटी सी झोपडी के बाहर एक महिला, एकदम पुरानी साडी पहने हुए ,न हाथो में सोने के कंगन ,न कानो में बाले ,फ़िर भी दियो की ज्योति को अपने मधुर हास्य से प्रकाश से भरते हुए , हंसती गाती खिलखिलाती औरो से बतियाती ..बहुत खुश ...
श्यामला ... पास जाकर.. तुम इतनी खुश क्यो हो?तुमने इस दिवाली क्या पा लिया ?तुमने क्या कीमत देकर इतनी खुशी खरीद ली ?
महिला :- खुशी की कोई कीमत नही होती ,खुशी हमारे मन में बसती हैं . दिवाली पाने का नही देने का नाम हैं ,अपनी आत्मा में संचित प्रकाश से जन जीवन आलोकित करने का नाम हैं दीपावली ।
श्यामला: तुम्हे अच्छी साडी पहनने की इच्छा नही होती ?तुम्हे नही लगता इस दिवाली तुम्हारे घर में अच्छे -अच्छे पकवान बने,घर कीमती वस्तुओ से सजे ,तुम्हारे पास बहुत सा सोना धन हो ?
महिला: क्यों नही लगता ,लगता हैं न !पर मेरे पास उससे भी बड़ा धन हैं ,सबसे बडा खजाना।
श्यामला: वह क्या?
महिला: संतोष ,आत्मिक शांति और मेरे घरवालो का प्रेम ।
इच्छाऐ अनंत हैं और वस्तुए नश्वर । हम जितना अधिक पाते हैं हर बार और अधिक पाना चाहते हैं ,मुझे भी अच्छे कपड़े, गहने पहनने की इच्छा होती हैं ,लेकिन मैं इन इच्छाओ को पुरा नही कर पाने के कारण बहुत दुखी नही होती । गहने इस शरीर की शोभा बढ़ते हैं ,मेरी आत्मा सुंदर हैं , मेरे पास मेरा परिवार हैं ,दो समय का भोजन हैं ,रहने को छप्पर हैं ,काम करने के लिए हाथ पाँव हैं ,क्या ये सब काफी नही हैं ,वो देखो वो सामने वाला बच्चा ..इसका कोई नही दो दिन से इसने भोजन नही किया ,वह देखो वह बूढी ताई .पति के मरने के बाद सारे गहने बेच कर भी घर नही बचा पाई ,वह देखो वह वृद्ध भिखारी ,दोनों हाथो पैरो से लाचार ...और किस किसको का दुःख दिखाऊ ?मैं सुखी हूँ और बहुत खुश ,मेरे पास सच्चा धन हैं ,सुकून हैं ,प्रेम हैं ।
श्यामला ....बहुत खुशी के साथ अपने घर की ओर कदम बढाती हुई . आकाश को मुट्ठी में पाकर मिलने वाली खुशी से ज्यादा खुश .आज वह बहुत खुश हैं हर दिवाली से ज्यादा खुश ।
मंच पर पटाक्षेप ।
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